कई कंपनियां अब कर्मचारियों को तनाव मुक्त करने और मधुमक्खियों की टीम वर्क की भावना से प्रेरित करने के लिए कार्यालय परिसर में मधुमक्खी के छत्तों को रख रही हैं।
स्रोत : विकी कॉमंस
ऑफिस में मधुमक्खियां : कर्मचारियों को प्रकृति से जोड़कर ‘आउटपुट' बढ़ाने का जुगाड़ अपना रहीं कंपनियां
दफ़्तर में एक बेहतर और सकारात्मक बनाए रखने के लिए कर्मचारियों को चाय, हेल्दी खाना, फ्री फ्रूट्स, गेमिंग ज़ोन, योग व मेडिटेशन सेशन और यहां तक कि लंच के बाद सोने की व्यवस्था किए जाने तक के प्रयोग कंपनियों द्वारा बीते कई वर्षों से किए जा रहे हैं। इन प्रयोगों में अब एक अनूठी कड़ी जुड़ गई है वर्कप्लेस पर मधुमक्खियों को रखना या कर्मचारियों को मधुमक्खियों के बीच ले जाना। कंपनियां कर्मचारियों के काम के तनाव यानी वर्क स्ट्रेस को कम करने के लिए इस उपाय को अपना रही हैं। साथ ही इससे उन्हें इन नन्हें मेहनती जीवों के परिश्रम और टीम भावना के साथ काम करने की सीख भी अप्रत्यक्ष रूप से देकर कंपनी में सहयोग और सद्भाव का माहौल बनाने का भी प्रयास किया जा रहा है।
इस प्रयोग के पीछे क्या है सोच
आज कई कंपनियों के लॉन, गार्डन या रूफटॉप में सजावटी पौधों के साथ ही मधुमक्खी के छत्ते यानी बीहाइव भी देखने को मिल सकते हैं। यह बीहाइव कोई ‘शोपीस’ नहीं है, बल्कि कर्मचारियों के मानसिक स्वास्थ्य और तालमेल को बेहतर बनाने की एक नई कोशिश का हिस्सा हैं। यह ट्रेंड खासतौर पर यूरोप, अमेरिका और धीरे-धीरे एशिया के कुछ विकसित देशों में भी देखने को मिल रहा है। बीहाइव या मधुमक्खी के छत्ते प्रकृति, सहयोग और सामुदायिक जीवन के प्रतीक हैं। कंपनियों का मानना है कि ये प्रतीक कार्यालय की ट्रेड-ऑफ यानी काम की बोरियत मिटाने और मानसिक स्वास्थ्य को बेहतर बनाने में मददगार साबित हो सकते हैं। खासतौर पर, उन कर्मचारियों के लिए जो लगातार कंप्यूटर स्क्रीन, मीटिंग और काम के दबाव के बीच फंसे रहते हैं। मधुमक्खियों को उनके छत्तों में अपनी गतिविधियों में तल्लीन देखना कर्मचारियों में काम की बोरियत और मानसिक थकावट को मिटाता है। इसके अलावा यह परोक्ष रूप से कर्मचारियों को समन्वय के साथ टीम के रूप में अनुशासित ढंग से काम करने की सीख भी देता है, क्योंकि मधुमक्खियां टीम वर्क में अनुशासन का पालन करते हुए छत्तों का निर्माण, उनकी देखभाल और शहद बनाने जैसे काम करती हैं। मधुमक्खियां सिर्फ शहद बनाने वाली जीव नहीं हैं। वे एक अत्यंत अनुशासित सामाजिक संरचना में रहती हैं। इनके समूह में हर सदस्य का एक स्पष्ट उद्देश्य और भूमिका होती है। साथ ही इनके बीच सहयोग और ज़रूरत पड़ने पर ज़रूरतमंद साथी के बचाव की भी व्यवस्था होती है। मधुमक्खियों की यही सामाजिक संरचना कॉर्पोरेट टीमों के लिए एक प्रेरणादायक मॉडल बनती है।
कर्मचारियों को मधुमक्खियों के बीच ले जाने के प्रयोग के सकारात्मक परिणाम देखने को मिल रहे हैं।
स्रोत : विकी कॉमंस
‘बीहाइव-ब्रेक’ के तहत क्या करती हैं कंपनियां
द गार्जियन में प्रकाशित एक ताज़ा रिपोर्ट के मुताबिक कार्य स्थल पर बेहतर माहौल बनाने के लिए मधुमक्खियों के छत्तों के इस्तेमाल का चलन यूरोपीय देशों में तेज़ी पकड़ रहा है। एक ओर जहां इसे अपनाने वाली कंपनियों की संख्या बढ़ रही है। कुछ कंपनियों में बीहाइव पैनल की व्यवस्था होती है, जिनमें कर्मचारियों के लिए जालीदार कपड़ों में सुरक्षित रूप से छत्तों के नीचे बैठने की व्यवस्था होती है। यहां कर्मचारी कुछ मिनट बिता सकते हैं। इस दौरान उनके फोन की स्क्रीन ऑफ रहती है और फोन साइलेंट मोड में रहता है और कर्मचारियों का ध्यान सिर्फ छत्ते की गतिविधियों पर होता है। इसका नतीजा आत्म-एकाग्रता, संतुलन और भावनात्मक शांति के रूप में देखा जा रहा है। इसलिए कंपनियों में यह ट्रेंड खासतौर पर लोकप्रिय हो रहा है।
इसके अलावा कुछ कंपनियों में बड़ी स्क्रीन पर कैमरे के माध्यम से लाइव दिखाई जाते हैं, ताकि कर्मचारी छोटी-छोटी गतिविधियों जैसे पराग इकट्ठा करना, छत्ते का निर्माण, या शहद भंडारण को देख सकें। यह अनुभव उन्हें केवल प्रकृति से जोड़ता नहीं, बल्कि ध्यान और तनाव मुक्त करने का मौका भी देता है। इस तरह के ब्रेक कर्मचारियों के लिए एक ‘नेचुरल डिटैच’ का काम करते हैं और मानसिक स्वास्थ्य के लिए बेहतर साबित होते हैं विशेषज्ञ बताते हैं कि कुछ कंपनियों में जहां इन छत्तों की स्थापना हुई है, कर्मचारियों ने बताया कि मधुमक्खियों की देखभाल ने उनमें एक साझा लक्ष्य और जिम्मेदारी का भाव जगाया है। इससे टीम के अंदर खुले संवाद और सहयोग को प्रोत्साहन मिला है। यह सादा से क्रिया ध्यान, सांस-केंद्रित गतिविधियों और प्रकृति-संपर्क को मिलाकर एक सामूहिक तनाव प्रबंधन तरीका बनती है, जिससे कर्मचारी अधिक संपर्क, सहयोग और टीम भावना महसूस करते हैं। इसे देखते हुए कुछ कार्यालयों ने इस अनुभव को बढ़ाने के लिए बीहाइव वर्कशॉप्स भी शुरू कर दी हैं, जहाँ कर्मचारी सीखते हैं कि कैसे छत्ते की सफाई होती है, मधुमक्खियाँ क्या खाती हैं और उनके स्वभाव को कैसे समझा जाता है। यह न केवल सहकर्मियों को एक साथ काम करने का अनुभव देता है, बल्कि प्रकृति के साथ मौन जुड़ाव भी प्रदान करता है।
कुछ कंपनियों ने अपने टेरेस गार्डन में मधुमक्खी पालन शुरू किया है, जहां ब्रेक के समय में कर्मचारी जाकर इनकी गतिविधियों को देखकर तनाव मुक्त होते हैं।
स्रोत : आरईएम लि.
कई बड़ी कंपनियों ने अपनाया बीहाइव मॉडल
‘बीहाइव ब्रेक’ के इस बढ़ते चलन के बीच इसे अपनाने वाली कंपनियों की संख्या बढ़ रही है। हाल के दिनों में कई बड़ी कंपनियां इस मॉडल को अपनाने के लिए आगे आई हैं। बीहाइव मॉडल के चलन में हो रही इस बढ़ोतरी के साथ ही इससे जुड़ी व्यवस्थाओं, प्रबंधन और संचालन की सेवाएं देने वाली कंपनियों की संख्या भी बढ़ रही है। बीहाइव मॉडल से जुड़ी कुछ प्रमुख कंपनियां इस प्रकार हैं-
Green Folk Recruitment – यह मैनचेस्टर स्थित भर्ती कंपनी है जिसने अपने कर्मचारियों को प्रकृति से जोड़ने के लिए छत्ते और बिएकिपिंग वर्कशॉप्स में भागीदारी शुरू की है।
DoubleTree by Hilton (होटल चेन) – इस होटल चेन के कुछ स्थानों पर भी बीहाइव-आधारित वेलबीइंग प्रोग्राम के हिस्से के रूप में मधुमक्खिया रखी जा रही हैं।
Park House, Oxford Street, London – बड़े कार्यालय स्थानों में एक छत्ता है जिसे कर्मचारी “क्वीन बी फिलिपा” कहते हैं और इसे एक यादगार लाभ के रूप में देखा जाता है।
Buckley’s Bees – यह एक प्रोफेशनल मधुमक्खी पालन सेवा प्रदाता है, जो लगभग 24 यूके क्लाइंट्स और अंतरराष्ट्रीय कंपनियों के लिए ऑफिस बीहाइव प्रोग्राम चलाती है।
BeesMax Ltd – यह कंपनी कार्यालयों में मधुमक्खी छत्ते लगाने, उनमें देखभाल और कर्मचारियों के लिए अनुभव को मैनेज करने का काम करती है।
Codemasters (वीडियो गेम डेवलपमेंट कंपनी) – BeesMax के क्लाइंट के रूप में ऑफिस छत्ते से जुड़ी वेलबीइंग गतिविधि चला रही है।
क्या यह सिर्फ ‘दिखावटी’ है?
वैसे तो कंपनियों में बीहाइव मॉडल को अपनाने और काम के बीच कर्मचारियों को ‘बीहाइव-ब्रेक’ देने के पीछे वैज्ञानिक अध्ययनों से मिली प्रेरणा का हाथ है। इसके सकारात्मक नतीज़े भी कंपनियों को देखने को मिले हैं। फिर भी देखने में आया है कि कई जगह कार्यस्थल पर इस ट्रेंड को सिर्फ दिखावे के लिए भी अपनाया जा रहा है, ताकि वे अपनी कंपनी की सस्टेनेबिलिटी और क्लाइमेट-फ्रेंडली इमेज बना और दिखा सकें। इसके चलते आलोचक इसे ’ग्रीन-वॉशिंग’ भी कह रहे हैं। यानी बिना वास्तविक पर्यावरण या कर्मचारी कल्याण के लाभ के इसे लागू करना। उनका कहना है कि अगर इसे ठीक तरीके से लागू किया जाए, जैसे कि स्थानीय पौधों के साथ संयोजन, उचित स्थान और समय प्रबंधन के साथ, तो यह वास्तव में कर्मचारियों के मानसिक संतुलन और पर्यावरणीय शिक्षण के लिए उपयोगी साबित हो सकता है। पर, इस सबके बिना यह महज़ एक दिखावे से ज़्यादा कुछ नहीं। कंपनियों को इस बात को समझने की ज़रूरत है कि बीहाइव मॉडल को इस तरह से अपनाया जाए, जिससे इन मेहनतकश कीटों को किसी तरह का नुकसान न होने पाए और यह उनके जीवन की गतिविधियों और मूलभूत स्वभाव को प्रभावित न करे।
कार्यालय परिसर के भीतर बक्सों में मधुमक्खी पालन से कर्मचारियों को शहद भी खाने को मिल रहा है।
स्रोत : विकी कॉमंस
पर्यावरण से जुड़ा जोखिम भी छिपा है
कंपनियों द्वारा वर्क स्पेस का माहौल सुधारने और कर्मचारियों को तनाव मुक्त रखने के लिहाज़ से तो बीहाइव मॉडल को अपनाना एक पॉजिटिव कदम दिखाई देता है, पर प्रकृति और पर्यावरण की दृष्टि से देखें तो कुछ नकारात्मक पहलू और जोखिम भी इससे जुड़े हुए हैं। साइंस जर्नल साइंस डायरेक्ट में प्रकाशित एक रिसर्च रिपोर्ट के मुमाबिक अगर कहीं भी बहुत अधिक नियंत्रित मधुमक्खियों की कॉलोनियों शहरों में या दफ्तर जैसे चहल-पहल वाली जगहों पर रखा जाता है, तो इससे स्थानीय जंगली परागण करने वाले कीटों जैसे तितलियों और वन-मधुमक्खियों की संसाधन प्रतिस्पर्धा बढ़ सकती है। इससे जैव विविधता पर नकारात्मक प्रभाव भी पड़ता है। अधिक मानवीय गतिविधियों वाले और सघनता भरे माहौल में रखा जाना मधुमक्खियों की प्रजनन क्षमता और स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकती है।साथ ही यह शोध शहरी मधुमक्खी आबादी और जंगली मधुमक्खी समुदाय के बीच नकारात्मक संबंध की आशंका भी जताता है। इसके अलावा प्रतिष्ठित विज्ञान पत्रिका नेचर में प्रकाशित एक शोध अध्ययन के मुताबिक उच्च सघनता वाली कॉलोनियां मधुमक्खियों के फोरेजिंग यानी पराग इकट्ठा करने की सफलता को भी कम कर देती हैं। कोनकोरिडा यूनिवर्सिटी की एक रिसर्च रिपोर्ट बताती है कि शहरी मधुमक्खी आबादी में वृद्धि से जंगली मधुमक्खियों की विविधता कम हुई है। इस सबको देखते हुए कुछ बीहाइव प्रदाता कंपनियां अब यह भी कह रही हैं कि वे सख्त पर्यावरणीय आकलन के बिना कहीं भी छत्ते नहीं लगाएंगी। उदाहरण के लिए वे उन स्थानों पर छत्ते लगाने से परहेज करते हैं जहां पहले से ही स्थानीय कीटों और वन-कीटों की आबादी कम है।
भारत में क्या हो रहा है?
जहां तक भारत में बीहाइव मॉडल को अपनाने की बात है, इसका चलन अभी देखने को नहीं मिल रहा। कम से कम सार्वजनिक रिपोर्टिंग में तो ऐसा कोई उदाहरण नहीं दिख रहा है। यूरोपीय विकसित देशों में भी यह हाल ही में शुरू हुआ है। ऐसे में भारत में इसे अपनाए जाने में अभी कुछ समय लगेगा। दरअसल, भारत में मधुमक्खी पालन मुख्यतः कृषि और ग्रामीण आजीविका से जुड़ा गतिविधि के रूप में देखा जाता है, न कि कार्यालयों की वेलबीइंग प्रोग्राम के रूप में। इसलिए भारत में मधुमक्खी पालन के लिए राष्ट्रीय मधुमक्खी पालन एवं शहद मिशन (NBHM) जैसी सरकारी पहलों में तो अच्छी प्रगति हो रही है, जिससे मधुमक्खियों का वैज्ञानिक और व्यवस्थित पालन बढ़ रहा है। किसानों और ग्रामीण उद्यमियों को सब्सिडी, प्रशिक्षण और बाजार समर्थन भी मिल रहा है। पर, कार्यस्थलों पर बीहाइव मॉडल को अपनाने जैसे इनोवेशन अभी सामने नहीं आए हैं।
सरकारी और स्वयंसेवी व सहकारी संस्थाओं के प्रयासों से उत्तर प्रदेश, हरियाणा जैसे राज्यों में मधुमक्खी पालन का विस्तार हो रहा है। कृषि विभाग मधुमक्खी पालन के लिए उपकरण, प्रशिक्षण और सहायता प्रदान कर रहे हैं, ताकि किसानों की आमदनी बढ़े और कृषि के परागण में मधुमक्खियों की भूमिका मजबूत हो। इन कार्यक्रमों के ज़रिये मधुमक्खी पालन का दायरा बढ़ने के साथ ही मानसिक स्वास्थ्य, पर्यावरण और रोजगार तीनों को जोड़ने वाले इस तरह के कार्यक्रम धीरे-धीरे जोर पकड़ सकते हैं। क्या पता अगले कुछ वर्षों में भारत में भी आधुनिक वर्कप्लेस वेलबीइंग मॉडल के हिस्से के रूप में बीहाइव को अपनाया जाए।
मधुमक्खी के छत्तों में उनके क्रिया-कलाप देखकर कर्मचारी खुद को प्रकृति से जुड़ा हुआ महसूस कर रहे हैं।
स्रोत : विकी कॉमंस
सीख और आगे की दिशा
आज जब कर्मचारी भौतिक और मानसिक दबाव, डिजिटल बर्नआउट और लगातार कार्य-जीवन के बीच संतुलन तलाश रहे हैं, ऐसे में कंपनियां भी प्राकृतिक तत्वों का सहारा लेने लगी हैं। मधुमक्खियां अपनी शांतिपूर्ण कार्यशैली और सामूहिक जीवन के मॉडल के साथ वर्कप्लेस कल्चर में एक ताज़ा बदलाव ला सकती हैं। अगर यह काम कर्मियों की वास्तविक भलाई के लिए किया जाए, तो भारत में भी इसका सदुपयोग देखने को मिल सकता है। आज जब कर्मचारी भौतिक और मानसिक दबाव, डिजिटल बर्नआउट और वर्क-लाइफ बैलेंस यानी काम और व्यक्तिगत जीवन के बीच संतुलन तलाश रहे हैं, ऐसे में कंपनियां भी पारंपरिक वेलबीइंग उपायों से आगे बढ़कर प्राकृतिक तत्वों का सहारा लेने लगी हैं। मधुमक्खियां अपनी शांतिपूर्ण कार्यशैली, स्पष्ट भूमिकाओं और सामूहिक जीवन के मॉडल के साथ वर्कप्लेस कल्चर में एक ताज़ा और अर्थपूर्ण बदलाव का संकेत देती हैं। यह पहल कर्मचारियों को प्रकृति से जुड़ने का मौका देती है, जिससे ध्यान, जिम्मेदारी और आपसी सहयोग की भावना मजबूत हो सकती है। हालांकि यह प्रयोग तभी कारगर होगा, जब इसे इमेज बिल्डिंग के दिखावे या ब्रांडिंग से परे ले जाकर कर्मियों की वास्तविक भलाई और पर्यावरणीय संतुलन को ध्यान में रखकर अपनाया जाए। वैज्ञानिक सलाह, स्थानीय जैव विविधता की समझ और सीमित, जिम्मेदार हस्तक्षेप के साथ यदि ऐसे मॉडल विकसित किए जाएं, तो भारत में भी कार्यस्थलों पर मानसिक स्वास्थ्य और पर्यावरणीय चेतना को एक साथ साधने का यह प्रयोग सार्थक रूप ले सकता है।
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