कौन थे प्रो. माधव गाडगिल जिन्होंने समुदायों को बनाया पर्यावरण संरक्षण का हिस्सा
भारत में हिमालय से लेकर पश्चिमी घाट तक, थार रेगिस्तान से लेकर सुंदरबन तक पानी के लाखों स्रोत, छोटी-छोटी धाराओं, बावड़ियों, कूपों, झीलों, नदियों, आदि के रूप में अलग-अलग आकार में पाये जाते हैं। इनके संरक्षण के लिए तमाम प्रयास किए जाते हैं, लेकिन जब जंगल काटे जाते हैं, जल स्रोत सूख जाते हैं, या उनमें पानी कम हो जाता है, तब उनका रियल टाइम डाटा सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज नहीं होता है, और यह देश के लिए बेहद चिंता का विषय है। दरअसल यह चिंता व्यक्त की थी पारिस्थितिकी विज्ञानी (इकोलॉजिस्ट) प्रो. माधव गाडगिल ने, जो अब हमारे बीच नहीं हैं।
प्रो. गाडगिल का बुधवार को पुणे में निधन हो गया। वे 83 वर्ष के थे। गुरुवार सुबह गाडगिल के परिवार ने उनके निधन की जानकारी देते हुए बताया कि वे कुछ समय से बीमार चल रहे थे और बीती रात पुणे के एक अस्पताल में उन्होंने अंतिम सांस ली। पश्चिमी घाट को वैश्विक जैव विविधता की दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है और प्रो. गाडगिल ने अपना पूरा जीवन इसी क्षेत्र के अध्ययन को समर्पित कर दिया। प्रो. गाडगिल जो खुद को ज़मीनी स्तर का व्यक्ति बताते थे, वे उन लोगों की आवाज़ उठाते थे, जिनकी बातें नीतिनिर्धारकों और सत्ता के गलियारों तक नहीं पहुँचतीं पाती थी।
कौन थे प्रो. माधव गाडगिल?
प्रो. माधव धोंडो गाडगिल, भारत के सबसे प्रतिष्ठित ईकोलॉजिस्ट, पर्यावरण चिंतक और नीति-निर्माता थे। पांच दशकों से अधिक समय तक उन्होंने जमीनी स्तर पर काम किए जिनकी वजह से देश के जंगलों, नदियों और उनसे जुड़े समुदायों के संरक्षण की दिशा में पर्यावरण नीति को विशेष आकार दिया। उन्होंने अपने जमीनी अनुभव से भारतीय पर्यावरण विमर्श को वैज्ञानिक तथ्यों, जमीनी अनुभवों और लोकतांत्रिक भागीदारी से जोड़ने का कार्य किया। वे मानते थे कि प्रकृति को केवल संसाधन नहीं, बल्कि समाज और संस्कृति से जुड़ी जीवित व्यवस्था के रूप में देखना चाहिए। प्रो. गाडगिल को केवल एक पारिस्थितिकीविद् के रूप में नहीं, बल्कि एक शिक्षक, लेखक और शिक्षाविद् के रूप में भी उन्हें जाना जाता रहेगा। विभिन्न संस्थानों के निर्माण में उनके योगदान को हमेशा याद रखा जाएगा।
ट्रेकिंग और स्कूबा डाइविंग भी करते थे प्रो. गाडगिल
बचपन से ही उनकी रुचि केवल विज्ञान तक सीमित नहीं थी, बल्कि इतिहास, संस्कृति, ट्रैकिंग, स्कूबा डाइविंग, मराठी कविता और प्रकृति में भी उनकी गहरी दिलचस्पी थी। उनका परिवार हमेशा उनकी रुचियों का समर्थन करता रहा। मात्र 20 वर्ष की आयु में उन्होंने मराठी भाषा की पत्रिकाओं के लिए लेखन कार्य शुरू किया था। उन्होंने सलीम अली, वासिली लियोटीफ, जेबीएस हाल्डेन, जूलियन हक्सले जैसे प्रतिष्ठित विद्वानों के मार्गदर्शन में पढ़ाई की। उन्होंने फर्ग्यूसन कॉलेज से स्नातक की डिग्री और बॉम्बे विश्वविद्यालय स्नातकोत्तर की डिग्री प्राप्त की, और फिर 1971 में हार्वर्ड विश्वविद्यालय से पारिस्थितिकी में पीएचडी की उपाधि हासिल की।
पीएचडी पूरी करने के बाद, वे भारत लौट आए और यहां से पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में उनकी आगे की यात्रा शुरू हुई। पुणे के अगरकर रिसर्च इंस्टीट्यूट में बतौर शिक्षक अपनी सेवाएं देने के बाद उन्होंने 1973 में उन्होंने बैंगलोर के भारतीय विज्ञान संस्थान में शिक्षण पद संभाला। प्रो. गाडगिल भारत में पारिस्थितिकी के क्षेत्र में अपने अग्रणी कार्य के लिए सबसे अधिक जाने जाते थे। उन्होंने पश्चिमी भारत की पर्वत श्रृंखलाओं की पारिस्थितिकी और जैव विविधता को समझने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। उन्होंने भारत में प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण पर भी काम किया। उनकी वैज्ञानिक जांच ने वनों की कटाई, शहरीकरण और प्रदूषण जैसे मानवजनित प्रभावों को उजागर किया है।
प्रो. गाडगिल का जीवन सफर
1942: 24 अप्रैल 1942 को अर्थशास्त्री धनंजय गाडगिल और प्रमिला के घर उनका जन्म हुआ।
1946-60: बाल शिक्षण और मॉडर्न हाईस्कूल पुणे से प्राथमिक एवं माध्यमिक शिक्षा प्राप्त की।
1962: मराठी पत्रिकाओं के लिए लेखन शुरू किया। बचपन से ही उन्हें इतिहास, संस्कृति, साहित्य में रुचि थी।
1958: जीव विज्ञान में स्नातक की डिग्री प्राप्त करने के लिए फर्ग्यूसन कॉलेज, पुणे विश्वविद्यालय में दाखिला लिया।
1967: मुंबई विश्वविद्यालय से जन्तु विज्ञान में परास्नातक की डिग्री प्राप्त की और शोध की दिशा में आगे बढ़ गए।
1971: विलियम बॉसरट के तहत हार्वर्ड यूनिवर्सिटी से मैथमेटिकल इकोलॉजी में पीएचडी की उपाधि मिली।
1971: भारत वापस आये और अगरकर रिसर्च इंस्टीट्यूट, पुणे में बतौर शोधकर्ता कार्य शुरू किया।
1972: वन्यजीव संरक्षण कानून 1972 के बाद आप प्रोजेक्ट टाइगर का हिस्सा बने।
1973: इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस (IISc), बेंगलुरु में बतौर शिक्षक ज्वाइन किया।
1974–1982: वर्ल्ड वाइड फंड में दक्षिण भारत का प्रतिनिधित्व किया। इसी दौरान कर्नाटक स्टेट वाइल्डलाइफ कमेटी और कर्नाटक स्टेट बैम्बू कमेटी में बतौर सदस्य अपनी सेवाएं दीं।
1979-81: राष्ट्रीय पर्यावरण फेलोशिप मिली।
1981: नागरिक सम्मान पुरस्कार पद्मश्री से सम्मानित किया गया।
1983: IISc में सेंटर फॉर इकोलॉजिकल साइंसेज (CES) की स्थापना की।
1983: कर्नाटक राज्य राज्योत्सव पुरस्कार से सम्मानित हुए।
1985: रबिंद्रनाथ टैगोर अवार्ड से सम्मानित हुए।
1986: नीलगिरि बायोस्फीयर रिजर्व स्थापित करने में मदद की और प्रधानमंत्री की वैज्ञानिक सलाहकार परिषद में शामिल हुए। इसी वर्ष उन्हें शांति स्वरूप भटनागर पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
1990: विक्रम साराभाई पुरस्कार से सम्मानित हुए।
1992: रामचंद्र गुहा के साथ 'दिस फिशर्ड लैंड' प्रकाशित की।
1993-96: प्यू फेलोशिप मिली।
1995: गुहा के साथ 'इकोलॉजी एंड इक्विटी' प्रकाशित की।
2001: वॉल्वो पर्यावरण पुरस्कार से सम्मानित हुए।
2004: IISc से चेयरमैन के पद से रिटायर हुए।
2010-2011: वेस्टर्न घाट इकोलॉजी एक्सपर्ट पैनल (WGEEP) की अध्यक्षता की।
2011: पर्यावरण के क्षेत्र में उपलब्धियों के लिए टायलर पुरस्कार साझा किया।
2006: पर्यावरण के क्षेत्र में अग्रणी भूमिका निभान पर पद्म भूषण से सम्मानित हुए।
2024: संयुक्त राष्ट्र चैंपियंस ऑफ द अर्थ पुरस्कार प्राप्त किया।
प्रो. माधव गाडगिल के लेखन और प्रकाशन
प्रो. गाडगिल अपने वैज्ञानिक और संरक्षण कार्य के अलावा, वे एक लेखक भी थे और उन्होंने पारिस्थितिकी और पर्यावरण पर कई लेख और पुस्तकें लिखीं। उन्होंने 89 प्रकाशन लिखे जिनमें कॉन्फ्रेंस पेपर, लेख, पुस्तकें, संपादकीय, आदि शामिल हैं। संख्या की बात करें तो उन्होंने 71 लेख, 5 रिव्यू, 3 संपादकीय, 2 पुस्तकें, 2 पुस्तकों में अध्याय, 2 नोट, 1 कॉन्फ्रेंस पेपर, 1 पत्र और एक सर्वेक्षण लिखा। उनके प्रकाशन भारत के अलावा कनाडा, स्वीडन, अमेरिका, घाना, नीदरलैंड्स, यूके में भी प्रकाशित हुए। उनकी रचनाएं पारिस्थितिकीय शोधकर्ताओं के बीच लोकप्रिय रहीं। उनके शैक्षणिक पत्र, पुस्तकें और लोकप्रिय लेखन ने क्षेत्र में योगदान दिया।
प्रो. गाडगिल की प्रमुख रचनाएं
दिस फिशर्ड लैंड: एन इकोलॉजिकल हिस्ट्री ऑफ इंडिया (1993)
इकोलॉजी एंड इक्विटी: द यूज एंड एब्यूज ऑफ नेचर इन कंटेम्परेरी इंडिया (1995)
डायवर्सिटी: द कॉर्नरस्टोन ऑफ लाइफ (1997)
नर्चरिंग बायोडायवर्सिटी: एन इंडियन एजेंडा (1998)
इकोलॉजिकल जर्नीज: द साइंस एंड पॉलिटिक्स ऑफ कंजर्वेशन इन इंडिया (2005)
द यूज एंड एब्यूज ऑफ नेचर" (2004)
आईआईएससी बैंगलोर में करीब एक दशक की सेवाओं के बाद 1983 में उन्होंने सेंटर फॉर इकोलॉजिकल साइंसेज के नाम से एक अलग विभाग की स्थापना की। यह आज भी कई भारतीय छात्रों और विदेशी विद्वानों के लिए एक प्रमुख पारिस्थितिकीय अध्ययन केंद्र बना हुआ है।
उन्होंने वर्ल्ड वाइल्डलाइफ फंड में दक्षिण भारत का प्रतिनिधित्व करने के साथ-साथ कर्नाटक राज्य वन्यजीव समिति और कर्नाटक राज्य बांस समिति के सदस्य के रूप में अपनी सेवाएं दीं। यही नहीं, वे बाघ संरक्षण के क्षेत्र में भारत सरकार की सबसे बड़ी परियोजना प्रोजेक्ट टाइगर का हिस्सा भी बने। उन्होंने पारिस्थितिकी सोसाइटी ऑफ इंडिया और इंडियन एकेडमी ऑफ साइंसेज के अध्यक्ष के रूप में भी कार्य किया।
1981 में पद्मश्री और 2006 में पद्म भूषण से सम्मानित हुए
प्रकृति के बीच अपना पूरा जीवन खपा देने वाले प्रो. गाडगिल को उनके कार्य के लिए 1981 में भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मानों में से एक पद्म श्री और 2006 में पद्म भूषण से सम्मानित किया गया। उन्हें 1983 में कर्नाटक राज्य राज्योत्सव पुरस्कार, 1985 में रवींद्रनाथ टैगोर पुरस्कार, 1986 में शांति स्वरूप भटनागर पुरस्कार और 1990 में विक्रम साराभाई पुरस्कार से सम्मानित किया गया। 2001 में प्रतिष्ठित वोल्वो पर्यावरण पुरस्कार और 2011 में टायलर प्राइज फॉर एनवायरनमेंटल अचीवमेंट भी मिला।
समुदायों के साथ प्रगाढ़ संबंध रखते थे प्रो. गाडगिल
प्रो. माधव के जीवन को और करीब जानने के लिए हमने उनके पूर्व सहयोगियों से बातचीत की। गोखले इंस्टीट्यूट ऑफ पॉलिटिक्स एंड इकोनॉमिक्स, पुणे के सेंटर फॉर सस्टेनेबल डेवलपमेंट के निदेशक डॉ. गुरुदास नूलकर ने इंडिया वॉटर पोर्टल से बातचीत में कहा कि प्रो. माधव किसी भी विषय पर अपनी बात रखने से पहले तथ्यों को जानने के लिए वास्तविक रूप से उस जगह पर जाते थे। समुदायों के साथ उनके प्रगाढ़ संबंध थे। ज़मीनी स्तर पर काम करने वाले लोगों के साथ वो बहुत गहराई से जुड़े रहते थे। कुछ समुदायों की बात करें तो नंदुरबार, गढ़चिरौली, आदि जगहों से गरीब, अशिक्षित व अपेक्षित समुदायों से आने वाले लोगों के साथ उनका सीधा जुड़ाव था। वे यह बात हमेशा कहते थे कि पर्यावरण और पारिस्थितिकी के सर्वश्रेष्ठ विशेषज्ञ स्थानीय समुदाय होते हैं, न कि शोधकर्ता व शिक्षाविद, इसलिए हमें उन्हें अपने खुद के निर्णय लेने में सक्षम बनाने की ज़रूरत है।
डॉ. नूलकर बताते हैं कि प्रो. माधव टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल करने में हमेशा आगे से आगे रहते थे। आज सोचते हैं कि कैसे ग्रामीण एवं जनजातीय इलाकों में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का प्रयोग कर पंचायत स्कूलों के शिक्षकों को सशक्त बनाया जाए। जबकि वो मानते थे कि एआई के जरिए लाभान्वितों को भी नीति निर्धारण की प्रक्रिया का हिस्सा बनाने की पहल करनी चाहिए। डॉ. नूलकर ने आगे कहा, "प्रो. नीति निर्धारण के दौरान केवल शैक्षिक शोध पर निर्भर नहीं रहना चाहिए, बल्कि क्षेत्र में जाकर समस्याओं को समझना चाहिए। वे मानते थे कि मनुष्य अपने प्राकृतिक वातावरण और जैवविविधता का हिस्सा हैं और विकास की मुख्यधारा से जैवविविधता को अलग नहीं किया जा सकता है।"
प्रो. गाडगिल के निधन के साथ भारत ने अपने सबसे सम्मानित और प्रभावशाली पर्यावरणविदों में से एक को खो दिया है। भविष्य में जब-जब भारत में प्राकृतिक संसाधनों की समझ और संरक्षण पर कोई चर्चा होगी तब-तब प्रो. गाडगिल याद आयेंगे। जल संसाधनों की बात करें तो उनके पारिस्थितिकीय अध्ययनों ने यह स्पष्ट किया कि जैव विविधता, वन और जल प्रणालियों के बीच एक अटूट रिश्ता है। उन्होंने जीवन भर इस बात पर जोर दिया कि वनों की कटाई और पारिस्थितिकी तंत्र का विनाश सीधे तौर पर जल स्रोतों, नदियों और भूजल को प्रभावित करता है।
प्रो. गाडगिल का जीवन और कार्य आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बना रहेगा। इंडिया वाटर पोर्टल के पाठकों के लिए उनका यह संदेश आज भी प्रासंगिक है - जल संरक्षण केवल तकनीकी समाधान नहीं है, इसके लिए समग्र पारिस्थितिकीय समझ और सामुदायिक भागीदारी जरूरी है।
नोट- यह जीवनी प्रो. गाडगिल के जीवन पर ओपी जिंदल विश्वविद्यालय में प्रकाशित पेपर पर आधारित है।

