उद्योगों के संचालन और बिजली उत्पादन जैसी गतिविधियों से भारी मात्रा में ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन ग्लोबल वॉर्मिंग की प्रमुख वजह है। इसे कार्बन कैप्चर के ज़रिये ही नियंत्रित किया जा सकता है।
स्रोत : आईएईए
भारतीय वैज्ञानिकों ने खोजी कार्बन कैप्चर की सस्ती कारगर तकनीक, ग्रीन हाउस गैस से मुक्ति की नई राह
ग्लोबल वॉर्मिंग और क्लाइमेट चेंज की रफ्तार पर अंकुश लगाने में कार्बन कैप्चर की तकनीक को काफी कारगर उपाय माना जा रहा है। भारतीय रिसर्चरों ने इस दिशा में महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है। संस्थान ने कम लागत में कार्बन कैप्चर की दो सस्ती और कारगर तकनीके विकसित की हैं। पहली तकनीक में बसाल्ट की मदद से कार्बन कैप्चर करके उसे ज़मीन के भीतर पहुंचाने की है। दूसरी तकनीक उत्प्रेरक और पानी की मदद से कार्बन कैप्चर कर उसे कैल्शियम कार्बोनेट में बद देती है, जिसका औद्योगिक क्षेत्र में इस्तेमाल होता है। यह दोनों ही तकनीकें काफ़ी कम लागत में वातावरण से ग्रीन हाउस गैस की मात्रा घटाने में मददगार हो सकती है।
कैसे काम करती हैं यह तकनीकें
आईआईटी बॉम्बे में हवा से कार्बन डाईऑक्साइड को हटाने यानी कार्बन कैप्चर के दो तरीकों से जुड़ी तकनीकों पर शोध चल रहा है। विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्रालय की ओर से दी गई जानकारी के मुताबिक इसमें से पहता तरीका है हवा मे से कार्बन डाईऑक्साइड से कैल्शियम कार्बोनेट बनाकर उसे औद्योगिक इस्तेमाल के लिए भेजना। दूसरी तकनीक इससे काफ़ी हटकर और थोड़ी अनूठी है। इसमें हवा से कार्बन डाईऑक्साइड को इकट्ठा करके कंप्रेशर से कंप्रेस यानी संघनित किया जाता है और फिर उसे पाइपों के ज़रिये पंप करके ज़मीन के नीचे दो से तीन किलोमीटर की गहराई में भेज दिया जाता है। वहां मौजूद बसाल्ट की चट्टाने इस गैस के कार्बन को सोख लेती हैं। इन चट्टानों में बसाल्ट के साथ ही कैल्शियम, मैग्नीशियम, सोडियम, पोटेशियम, आयरन जैसे कैटायंस यानी सोखने वाले तत्व भी होते हैं। यह तथ्व इस कार्बन से प्रतिक्रिया करके उसे विभिन्न प्रकार के कार्बोनेट खनिजों में बदल देते हैं। इस तरह इस प्रक्रिया के जरिये कार्बन डाईऑक्सइड में मौजूद कार्बन को धरती के भीतर ठोस रूप में जमा किया जा सकता है।
क्या है कार्बन कैप्चर की CCUS तकनीक
कार्बन कैप्चर, उपयोग और भंडारण यानी CCUS (Carbon Capture, Utilisation and Storage) एक ऐसी तकनीक है जिसमें उद्योगों या वातावरण से निकलने वाली कार्बन डाईऑक्साइड को पकड़ कर या तो उपयोगी उत्पादों में बदला जाता है या उसे सुरक्षित तरीके से धरती के नीचे जमा कर दिया जाता है। यह व्यापक रूप से Carbon Capture and Storage (CCS) या Carbon Capture, Utilisation and Storage (CCUS) तकनीक का हिस्सा है।
भारत में इस दिशा में जो रिसर्च चल रही है, उसमें प्रमुख भूमिका आईआईटी बॉम्बे के वैज्ञानिकों की टीम निभा रही है। खासतौर पर इस क्षेत्र में काम कर रहे प्रमुख वैज्ञानिक हैं:
प्रो. अर्णव दत्ता (Arnab Dutta) – केमिस्ट्री विभाग, IIT Bombay
प्रो. विक्रम विशाल (Vikram Vishal) – अर्थ साइंसेज और क्लाइमेट स्टडीज, IIT Bombay
इन दोनों वैज्ञानिकों ने National Centre of Excellence in Carbon Capture and Utilisation (NCoE-CCU) के तहत ऐसी तकनीकों पर काम किया है जो CO₂ को पकड़कर उसे स्थायी कार्बोनेट खनिजों में बदलने या भूगर्भ में सुरक्षित रूप से जमा करने में मदद करती हैं। इस तकनीक का पूरा मॉडल तीन चरणों पर आधारित होता है:
CO₂ कैप्चर – हवा या औद्योगिक गैसों से कार्बन डाईऑक्साइड को अलग करना।
कंप्रेशन और ट्रांसपोर्ट – गैस को कंप्रेस करके पाइपलाइन या अन्य माध्यम से ले जाना।
जियोलॉजिकल स्टोरेज – उसे जमीन के नीचे बेसाल्ट जैसी चट्टानों में इंजेक्ट करना, जहां वह रासायनिक प्रतिक्रिया से स्थायी कार्बोनेट खनिज बन जाती है।
कार्बन उत्सर्जन और कार्बन कैप्चर का चक्र कुछ इस प्रकार काम करता है।
स्रोत : विकी कॉमंस
क्यों खास है बेसाल्ट चट्टानों में कार्बन भंडारण
कार्बन को भूगर्भ में जमा करने की कई तकनीकें विकसित की जा रही हैं, लेकिन बेसाल्ट चट्टानों में CO₂ को कैद करना अपेक्षाकृत सुरक्षित और स्थायी तरीका माना जाता है। बेसाल्ट एक ज्वालामुखीय चट्टान है, जिसमें कैल्शियम और मैग्नीशियम जैसे तत्व प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं।
जब कार्बन डाईऑक्साइड इन चट्टानों के संपर्क में आती है तो यह रासायनिक प्रतिक्रिया के जरिए कैल्शियम कार्बोनेट या मैग्नीशियम कार्बोनेट जैसे स्थायी खनिजों में बदल जाती है। यह प्रक्रिया प्राकृतिक रूप से भी होती है, लेकिन वैज्ञानिकों की तकनीक इसे बहुत तेज कर देती है।
भारत में डेक्कन ट्रैप्स क्षेत्र—जो महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, गुजरात और कर्नाटक के बड़े हिस्से में फैला है—दुनिया के सबसे बड़े बेसाल्ट क्षेत्रों में से एक है। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि यहां सैद्धांतिक रूप से सैकड़ों गीगाटन कार्बन डाईऑक्साइड को सुरक्षित रूप से जमा किया जा सकता है।
खेती में भी मददगार है बेसाल्ट, मिट्टी होती है उपजाऊ
बसाल्ट की चट्टाने काफी मजबूत होती हैं। इसलिए इसका इस्तेमाल मुख्यत: टायलें व काउंटर टॉप जैसी सख्त चीजें बनाने और सड़क निर्माण जैसे कामों में होता है। अपनी कार्बन कैप्चर क्षमता के कारण बेसाल्ट किसानों के लिए खेती में भी मददगार होता है। बेसाल्ट चट्टानों को पीसकर महीन चूरा बना देने से उसकी कार्बन सोखने की क्षमता कई गुना बढ़ जाती है। इसे और बेहतर बनाने के लिए इसमें थोड़ी मात्रा में पोटेशियम या मैग्नीशियम जैसा उत्प्रेरक भी मिलाया जाता है। इस कारण ऊसर या बंजर ज़मीन की मिट्टी को सुधारने में इसका इस्तेमाल महाराष्ट्र व मध्य प्रदेश में बेसाल्ट की खदानों के आसपास के इलाकों में काफी किया जाता है। खदानों में चट्टानों के उत्खनन के दौरान प्रचुर मात्रा में छोटे-छोटे पत्थर और चूरा निकलता है, जिसे बारीक पीस कर उसका पाउडर बना दिया जाता है। इस पाउडर को खोतों में डालकर जुताई कर देने से मिट्टी कार्बन का अवशोषण करके उपजाऊ बन जाती है। खेतों में डाले जाने के बाद बसाल्ट पाउडर मिट्टी और पानी के साथ मिलकर कार्बन डाईऑक्साइड को सोखता है और धीरे-धीरे उसे ज़मीन के नीचे पहुंचा देता है। जबकि, सतह पर रह गए मोटे कण बारिश के पानी के साथ बहकर नदी-नालों के ज़रिये समुद्र में पहुंच जाते हैं। महाराष्ट्र के युवा उद्यमी अनिमेष घोष की कंपनी ईई लैब कार्बन आईआईटी बॉम्बे और खड़गपुर के साथ मिलकर इस दिशा में काम कर रही है। महाराष्ट्र के वाशिम जिले में वह किसानों के साथ मिलकर बसाल्ट की मदद से मिट्टी की उर्वरता सुधारने का काम कर रहे हैं।
हमारे सांस लेने के लिए CO₂ भी है ज़रूरी मनुष्य सहित ज्यादातर जीव सांस लेते समय ऑक्सीजन (O₂) ग्रहण करते हैं और कार्बन डाईऑक्साइड (CO₂) छोड़ते हैं। वहीं पेड़-पौधों की प्रक्रिया इसके उलट होती है। क्योंकि, वे वायुमंडल से CO₂ लेकर ऑक्सीजन छोड़ते हैं। इसी वजह से वातावरण में CO₂ की एक निश्चित मात्रा का होना जरूरी है, क्योंकि उसी के सहारे पौधे हमें जीवनदायी ऑक्सीजन उपलब्ध कराते हैं और प्रकृति इन दोनों गैसों का संतुलन बनाए रखती है। समस्या तब पैदा होती है जब उद्योगों और जीवाश्म ईंधन के जलने से CO₂ की मात्रा जरूरत से ज्यादा बढ़ जाती है। यह गैस गर्मी को रोकने वाली ग्रीनहाउस गैस है, इसलिए इसकी बढ़ती मात्रा वायुमंडल का तापमान बढ़ाती है और ग्लोबल वॉर्मिंग व जलवायु परिवर्तन को तेज करती है। यही कारण है कि अतिरिक्त CO₂ को कार्बन कैप्चर जैसी तकनीकों से कम करना जरूरी हो गया है।
वायु मंडल में बढ़ता कार्बन डाईआक्साइड का स्तर न केवल प्रदूषण फैला रहा है, बल्कि यह जलवायु परिवर्तन का भी कारण बन रहा है।
स्रोत : विकी कॉमंस
पानी भी कार्बन कैप्चर में मददगार
आईआईटी बॉम्बे के एसोसिएट प्रोफेसर अर्णव दत्ता ने अपनी रिसर्च के आधार पर पानी के जरिये कार्बन कैप्चर की तकनीक विकसित की है। इसमें पानी में उत्प्रेरक मिलाकर उसमें हवा प्रवाहित की जाती है। इससे हवा में मौजूद कार्बन डाईऑक्साइड उत्प्रेरक से प्रतिक्रिया करके कैल्शियम कार्बोनेट बनाती है, जो पानी की सतह पर तैरने लगता है। इसे सुखाकर इसका पाउडर बना लिया जाता है। इस तहर बनाए गए कैल्शियम कार्बोनेट का इस्तेमाल स्टील, सीमेंट, पेंट और कागज़ उद्योग में किया जा सकता है, जहां इसकी काफी मांग है। इसे पूरा करने के लिए दुनिया भर में खदानों से कैल्शियम कार्बोनेट को निकाला जाता है, जो कि खर्चीला होने के साथ धरती की सेहत के लिए भी नुकसानदायक है खनन की प्रक्रिया में उत्सर्जन भी काफी मात्रा में होता है, जोकि खनन में इस्तेमाल ऊर्जा उपलब्ध कराने में जीवाश्म ईंधन को जलाने से होता है । ऐसे में आईआईटी बॉम्बे की पानी आधारित तकनीक दोहरा काम कर सकती है। एक ओर यह बिना उत्खनन किए कैल्शियम कार्बोनेट बनाकर पर्यावरण की रक्षा कर सकती है साथ ही यह हवा में मौजूद कार्बन डाईऑक्साइड को सोखकर ग्रीन हाउस गैस की मात्रा को भी नियंत्रित करने में मददगार हो सकती है, जोकि ग्लोबल वॉर्मिंग का सबसे प्रमुख कारण है।
कम लागत है इस तकनीक की खासियत
दुनिया में कार्बन कैप्चर की कई तकनीकें पहले से मौजूद हैं, लेकिन उनमें से अधिकतर बहुत महंगी हैं। उदाहरण के लिए कार्बन कैप्चर और स्टोरेज पर दुनिया भर में तेजी से काम हो रहा है। आइसलैंड, नॉर्वे और अमेरिका जैसे देशों में पहले से ही बड़े स्तर पर ऐसे प्रोजेक्ट चल रहे हैं, जहां CO₂ को जमीन के नीचे चट्टानों में इंजेक्ट किया जाता है। कार्बन कैप्चर की इन तकनीकों में अमीन आधारित रसायनों का इस्तेमाल होता है, जो महंगे होते हैं। इसी तरह आइसलैंड के प्रसिद्ध CarbFix प्रोजेक्ट में कार्बन डाईऑक्साइड को पानी के साथ मिलाकर बेसाल्ट चट्टानों में इंजेक्ट किया जाता है, जहां यह कुछ वर्षों के भीतर ठोस कार्बोनेट खनिजों में बदल जाती है। इसकी लागत भी काफ़ी ज्यादा बैठती है। इसके विपरीत आईआईटी बॉम्बे द्वारा विकसित तकनीकें काफी किफायती हैं, क्योंकि इनमें पृथ्वी पर प्रचुर मात्रा में उपलब्ध तत्वों और पानी आधारित घोलों का उपयोग किया जाता है। इससे लागत कम होती है और पर्यावरणीय जोखिम भी घटता है।
यह तकनीक औद्योगिक गैसों के साथ-साथ सीधे हवा से भी कार्बन डाईऑक्साइड पकड़ सकती है। इसके अलावा इसमें उपयोग किए गए उत्प्रेरक (कैटलिस्ट) को बार-बार पुन: उपयोग किया जा सकता है, जिससे इसकी आर्थिक व्यवहार्यता और बढ़ जाती है।
क्यों ज़रूरी है कार्बन कैप्चर
ऊर्जा, इस्पात, सीमेंट और रासायनिक उद्योग दुनिया में कार्बन उत्सर्जन के सबसे बड़े स्रोतों में शामिल हैं। कोयला आधारित बिजली संयंत्र, स्टील और सीमेंट कारखाने बड़ी मात्रा में कार्बन डाईऑक्साइड वातावरण में छोड़ते हैं। कार्बन कैप्चर पर नज़र रखने वाली अंतरराष्ट्रीय एजेंसी IEA की रिपोर्ट के मुताबिक वैश्विक स्तर पर केवल सीमेंट उद्योग ही कुल CO₂ उत्सर्जन का लगभग 7–8 प्रतिशत हिस्सा पैदा करता है, जबकि इस्पात उद्योग का योगदान भी करीब 7 प्रतिशत के आसपास माना जाता है। भारत जैसे तेजी से विकसित हो रहे देशों में बिजली उत्पादन और भारी उद्योगों की बढ़ती मांग के कारण यह उत्सर्जन और भी तेज़ी से बढ़ रहा है।
भारत में हर साल अरबों टन कार्बन डाईऑक्साइड उत्सर्जित होती है और इसमें ऊर्जा तथा भारी उद्योगों की हिस्सेदारी सबसे अधिक है। समस्या यह है कि इन उद्योगों की कई प्रक्रियाएँ—जैसे इस्पात निर्माण में कोक का उपयोग या सीमेंट उत्पादन में चूना पत्थर का विघटन—स्वाभाविक रूप से CO₂ पैदा करती हैं। इसलिए केवल नवीकरणीय ऊर्जा अपनाने से ही इन क्षेत्रों का उत्सर्जन पूरी तरह खत्म नहीं किया जा सकता। वैज्ञानिकों का मानना है कि ऐसे कठिन क्षेत्रों के उत्सर्जन को कम करने के लिए कार्बन कैप्चर तकनीक एक जरूरी समाधान बन सकती है।
कार्बन कैप्चर तकनीक का मूल विचार यह है कि कारखानों की चिमनियों या सीधे वातावरण से निकलने वाली CO₂ को पकड़कर उसे या तो उपयोगी उत्पादों में बदल दिया जाए या फिर भूगर्भ में सुरक्षित रूप से जमा कर दिया जाए। इससे एक ओर वातावरण में ग्रीनहाउस गैसों की मात्रा घटती है, वहीं दूसरी ओर उद्योगों को अपनी उत्पादन क्षमता कम किए बिना भी उत्सर्जन घटाने का विकल्प मिल जाता है। यही कारण है कि जलवायु परिवर्तन से निपटने की वैश्विक रणनीतियों में कार्बन कैप्चर को एक अहम तकनीकी समाधान के रूप में देखा जा रहा है।
डेक्कन ट्रैप्स: भारत का प्राकृतिक कार्बन बैंक भारत में कार्बन भंडारण की संभावनाओं पर चर्चा करते समय डेक्कन ट्रैप्स का उल्लेख अक्सर किया जाता है। यह क्षेत्र करीब 5 लाख वर्ग किलोमीटर में फैला है और दुनिया के सबसे बड़े ज्वालामुखीय बेसाल्ट क्षेत्रों में से एक है। भूवैज्ञानिकों का मानना है कि इन चट्टानों की संरचना कार्बन डाईऑक्साइड को स्थायी रूप से कैद करने के लिए बेहद अनुकूल है। यहां मौजूद सूक्ष्म दरारें और खनिज संरचना CO₂ को तेजी से कार्बोनेट खनिजों में बदल सकती हैं। इसी कारण वैज्ञानिक इस क्षेत्र को भारत के भविष्य के “कार्बन बैंक” के रूप में देख रहे हैं, जहां बड़े पैमाने पर कार्बन को सुरक्षित रूप से संग्रहित किया जा सकता है।
उद्योगों से निकलने वाली ग्रीन हाउस गैसों का कार्बन कैप्चर करके ही 2070 तक नेट ज़ीरो यानी शून्य का लक्ष्य हासिल किया जा सकता है।
स्रोत : विकी कॉमंस
भारत के नेट-जीरो लक्ष्य में कार्बन कैप्चर की बड़ी भूमिका
भारत ने वर्ष 2070 तक नेट-जीरो उत्सर्जन हासिल करने का लक्ष्य तय किया है। लेकिन बिजली उत्पादन, इस्पात, सीमेंट और रसायन उद्योग जैसे क्षेत्रों में उत्सर्जन को पूरी तरह खत्म करना मुश्किल है।
ऐसे में वैज्ञानिकों का मानना है कि कार्बन कैप्चर तकनीक इन क्षेत्रों के लिए अनिवार्य समाधान बन सकती है। भारत में हर साल लगभग 2.9 अरब टन कार्बन डाईऑक्साइड उत्सर्जित होती है, जिसमें बिजली क्षेत्र का योगदान बहुत बड़ा है। ऐसे उत्सर्जन को कम करने के लिए भूगर्भीय कार्बन भंडारण जरूरी माना जा रहा है।
यही कारण है कि नीति आयोग और कई सरकारी एजेंसियां भी भारत में कार्बन कैप्चर और स्टोरेज तकनीक के विकास को बढ़ावा दे रही हैं।
आगे की चुनौतियां और संभावनाएं
कार्बन कैप्चर तकनीक जलवायु परिवर्तन से निपटने का महत्वपूर्ण साधन बन सकती है, लेकिन इसके सामने कई चुनौतियां भी हैं। सबसे बड़ी चुनौती इसकी लागत घटाकर इसे बड़े पैमाने पर लागू करने की है। इसके लिए विशाल इंफ्रास्ट्रक्चर, पाइपलाइन नेटवर्क और सुरक्षित भूगर्भीय भंडारण स्थलों की जरूरत होगी। साथ ही यह भी सुनिश्चित करना होगा कि जमीन के नीचे जमा की गई CO₂ भविष्य में रिसाव के रूप में वापस वातावरण में न पहुंचे। इसके लिए दुनिया को केवल उत्सर्जन कम करने से ही नहीं, बल्कि वातावरण में पहले से मौजूद कार्बन को हटाने के तरीकों पर भी काम करना होगा। ऐसा करके ही जलवायु परिवर्तन के बढ़ते खतरे से निपटा जा सकता है।
इसे देखते हुए वैज्ञानिकों का मानना है कि आईआईटी के शोधकर्ताओं द्वारा तैयार की गई तकनीकें नवीकरणीय ऊर्जा, ग्रीन हाइड्रोजन और ऊर्जा दक्षता जैसे उपायों के साथ मिलकर जलवायु संकट से निपटने में अहम भूमिका निभा सकती है। आने वाले वर्षों में इसे अगर बड़े पैमाने पर लागू किया जा सका, तो यह भारत को न केवल अपने नेट-जीरो लक्ष्य की ओर तेज़ी से बढ़ने में मदद करेगी, बल्कि दुनिया के लिए भी कम लागत वाली कार्बन हटाने की एक नई तकनीकी राह खोल सकती है।
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