नागालैंड की महिलाएं अपने रोज़मर्रा के अनुभव और पारंपरिक ज्ञान के सहारे यहां के पर्यावरण को सुरक्षित बनाए रखने के प्रयास करती हैं।

नागालैंड की महिलाएं अपने रोज़मर्रा के अनुभव और पारंपरिक ज्ञान के सहारे यहां के पर्यावरण को सुरक्षित बनाए रखने के प्रयास करती हैं।

चित्र साभार: वर्ल्ड बैंक

उत्तर-पूर्व से सीख: नागालैंड की महिलाएं और जलवायु अनुकूलन की नई राह

नागालैंड में जलवायु परिवर्तन के बढ़ते प्रभावों के बीच यहां की महिलाएं का पारंपरिक कृषि ज्ञान और उनके सामुदायिक प्रयास, जलवायु अनुकूलन में मिसाल कायम कर रहे हैं…
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भारत में जलवायु परिवर्तन पर चर्चाएं अक्सर बड़े शहरों और बड़े बुनियादी ढांचे तक सिमट कर रह जाती हैं। लेकिन देश के उत्तर-पूर्वी पहाड़ी राज्यों में, खासकर नागालैंड के कई ग्रामीण इलाकों में बदलते वर्षा पैटर्न, अनियमित मानसून, लंबे समय तक रहने वाला सूखा और अचानक होने वाली तेज़ बारिश के कारण जल संकट पैदा होता रहता है।

नतीजतन यहां के लोग अपनी रोज़मर्रा की जिंदगी में जल संकट से जूझते रहते हैं। ऐसे में यहां कुछ गांवों में महिलाओं ने पानी, खेती और जंगल की जिम्मेदारी अपने कंधों पर ली है।

न नीति, न परियोजना, सिर्फ़ पारंपरिक ज्ञान का सहारा

नागालैंड की महिलाएं अपने रोज़मर्रा के अनुभव और पारंपरिक ज्ञान के सहारे यहां के पर्यावरण को सुरक्षित बनाए रखने के प्रयास करती हैं।

पानी और पेड़ों को बचाने के लिए यहां की महिलाएं निम्न उपाय करती हैं:

पारंपरिक जल स्रोतों की देखभाल

वर्षा जल को सहेजने के छोटे-छोटे ट्रेंच 

स्थायी खेती के लिए पानी का संतुलन

विभिन्न कार्यों के लिए स्थानीय जल स्रोतों का चयन 

इन महिलाओं के ये प्रयास जंगल के साथ सहजीवी रिश्ता कायम करते हैं। इन चीजों के लिए इन्हें कोई प्रशिक्षण नहीं दिया जाता है, बल्कि यह तो पीढ़ियों का अनुभव है जो इन्हें विरासत में मिला है।

ये महिलाएं जानती हैं कि कौन-सा झरना किस मौसम में ज़्यादा भरोसेमंद होगा, किस ढलान पर कौन-सी फसल टिक पाएगी और किस पेड़ को बचाना आने वाले वर्षों के पानी से जुड़ा है।

इन प्रयासों की खास बात यह है कि इनमें स्थानीय समुदाय और प्रकृति के बीच कोई दूरी नहीं है। सामूहिक श्रम, साझा निर्णय और आपसी भरोसे पर आधारित ये समाधान जल संकट को केवल तकनीकी समस्या नहीं, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक सवाल के रूप में देखते हैं। 

नागालैंड की महिलाएं अपने पारंपरिक ज्ञान के सहारे यह स्पष्ट कर रही हैं कि जलवायु परिवर्तन के समय में अनुकूलन हमेशा बाहर से आयातित मॉडल नहीं होता, कई बार वह उसी ज़मीन, उसी जंगल और उन्हीं लोगों के बीच पहले से मौजूद होता है, जिन्हें संकट सबसे पहले और सबसे गहराई से छूता है।

नागालैंड की महिलाएं जानती हैं कि कौन-सा झरना किस मौसम में ज़्यादा भरोसेमंद होगा, किस ढलान पर कौन-सी फसल टिक पाएगी और किस पेड़ को बचाना आने वाले वर्षों के पानी से जुड़ा है।

नागालैंड की जलवायु और जल-सुरक्षा की पृष्ठभूमि

नागालैंड की लगभग 70 फ़ीसद आबादी आज भी वर्षा आधारित खेती पर निर्भर है। झूम खेती, मिश्रित फसल प्रणाली और सामुदायिक वनों का उपयोग यहां की खेती और जल व्यवस्था का हिस्सा रहा है। इन प्रणालियों ने लंबे समय तक स्थानीय पारिस्थितिकी के साथ संतुलन बनाए रखा।

लेकिन जलवायु परिवर्तन ने इस संतुलन को कमजोर किया है। कई इलाकों में वर्षा की मात्रा और समय दोनों में अस्थिरता बढ़ी है। कम समय में अधिक बारिश से मिट्टी का कटाव बढ़ रहा है, जबकि लंबे समय तक सूखा रहने के कारण खेतों में नमी बनाए रखना कठिन हो गया है। झरने और छोटे नाले, जैसे पारंपरिक जल स्रोत कई जगहों पर सूखते या कमजोर पड़ते दिख रहे हैं।

इन परिस्थितियों में एक बड़ी चुनौती यह भी है कि सरकारी योजनाएं और तकनीकी हस्तक्षेप अक्सर स्थानीय भौगोलिक और सामाजिक विविधताओं को पूरी तरह नहीं समझ पाते। पहाड़ी इलाकों में जल प्रबंधन केवल इंजीनियरिंग का विषय नहीं, बल्कि समुदाय, जंगल और भूमि के रिश्ते से जुड़ा मामला है।

महिलाएं और पारंपरिक ज्ञान: एक अनदेखा आधार

नागालैंड में जलवायु अनुकूलन के कई उभरते प्रयास जैसे कि बीज संरक्षण, जल स्रोतों की सामुदायिक देखभाल और खेती के पारंपरिक तरीकों का पुनर्जीवन आदि महिलाओं की अगुवाई में सामने आ रहे हैं।

नागालैंड की महिलाएं खेती, बीज संरक्षण और जल स्रोतों की देखभाल में शामिल हैं, उनका पारंपरिक ज्ञान जलवायु अनुकूलन की नींव है।

इसके बावजूद लंबे समय तक इस ज्ञान को औपचारिक नीतियों और योजनाओं में गंभीरता से नहीं लिया गया। इसे अक्सर पारंपरिक या अनौपचारिक मानकर विकास की मुख्यधारा से अलग रखा गया। 

लेकिन अनियमित मानसून, सूखे और अत्यधिक वर्षा जैसे जलवायु प्रभावों ने अब यह स्पष्ट कर दिया है कि स्थानीय और आदिवासी ज्ञान जलवायु अनुकूलन की मज़बूत नींव बन सकता है। विभिन्न राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय फ़ोरम भी इस बात की पुष्टि करते हैं।

अंतर-सरकारी जलवायु परिवर्तन पैनल (आईपीसीसी) और संयुक्त राष्ट्र की खाद्य और कृषि संगठन-महिला (एफ़एओ-यूएन- वीमेन) के अध्ययन पुष्टि करते हैं कि स्थानीय और महिलाओं के नेतृत्व वाले प्रकृति-आधारित उपाय टिकाऊ और प्रभावी अनुकूलन में सहायक होते हैं।

महिलाएं न केवल इस ज्ञान की वाहक हैं, बल्कि इसके रोज़मर्रा के उपयोग और संरक्षण में भी केंद्रीय भूमिका निभाती हैं। यही कारण है कि नागालैंड में जलवायु अनुकूलन के कई उभरते प्रयास जैसे कि बीज संरक्षण, जल स्रोतों की सामुदायिक देखभाल और खेती के पारंपरिक तरीकों का पुनर्जीवन आदि महिलाओं की अगुवाई में सामने आ रहे हैं।

नागालैंड में अपनाए जा रहे कुछ प्रमुख प्रकृति‑आधारित उपाय

  • वर्षा जल संचयन की पारंपरिक प्रणालियां: पहाड़ों पर वर्षा जल को खेतों और बस्तियों के आसपास रोककर मिट्टी में नमी बनाए रखना और भू‑जल को पुनर्स्थापित करना। जैसे नागा समुदायों में विकसित रुझा प्रणाली।

  • सामुदायिक जंगलों का संरक्षण: जंगलों और हरे-भरे क्षेत्र जीवित जल स्रोतों के पुनर्भरण में मदद करते हैं, जिससे झरने, जल-धाराएं और छोटी झीलें बरसात के बाद भी पानी प्रदान करती हैं।

  • मिश्रित और जैविक खेती: स्थानीय बीजों का चयन, जैविक खाद का उपयोग और विविध फसल प्रणालियां अपनाकर मिट्टी की उर्वरता और नमी बनाए रखी जाती है।

इन उपायों की खासियत यह है कि वे कम लागत वाले, स्थानीय संसाधनों पर आधारित, सामुदायिक स्वामित्व वाले हैं। इससे बाहरी प्रौद्योगिकी या महंगी परियोजनाओं की निर्भरता कम होती है और स्थानीय लोग, विशेष रूप से महिलाएं, इन समाधानों का निरीक्षण, संचालन और संरक्षण कर पाते हैं।

IPCC और FAO दोनों का मानना है कि, ऐसे स्थानीय और महिलाओं के नेतृत्व वाले प्रकृति‑आधारित समाधान न केवल जल संकट से निपटने में मदद करते हैं, बल्कि समुदाय की सामूहिकता, पर्यावरणीय संतुलन और लचीलेपन को भी मजबूत करते हैं। यही जलवायु अनुकूलन की असली नींव है।

बेस्ट प्रैक्टिस: सेनो त्सुहाह और पारंपरिक कृषि का पुनर्जीवन

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सेनो त्सुहाह के प्रयास का एक प्रमुख केंद्र मोटे अनाज, विशेषकर मिलेट आधारित खेती है।

चित्र साभार: इंडिया.मोंगाबे

नागालैंड में महिलाओं के नेतृत्व वाले कई स्थानीय प्रयासों में से एक उदाहरण है सेनो त्सुहाह का काम। फेक जिले के चिजामी गांव की रहने वाली सेनो ने पारंपरिक कृषि और स्थानीय बीजों को जलवायु अनुकूलन के संदर्भ में फिर से महत्व देने की पहल की है।

सेनो के प्रयास का एक प्रमुख केंद्र मोटे अनाज, विशेषकर मिलेट आधारित खेती है। ये फसलें कम पानी में उगती हैं, बदलते तापमान और अनियमित वर्षा को अपेक्षाकृत बेहतर ढंग से सहन कर सकती हैं, और मिट्टी की उर्वरता को बनाए रखने में मदद करती हैं। इससे न केवल कृषि उत्पादन सुरक्षित रहता है, बल्कि स्थानीय खाद्य विविधता और पोषण सुरक्षा भी बनी रहती है।

सेनो ने सामुदायिक बीज बैंक शुरू किया, जहां स्थानीय बीज संग्रहित और संरक्षित किए जाते हैं। इससे यह सुनिश्चित होता है कि पीढ़ियों से आए पारंपरिक बीज भविष्य के लिए उपलब्ध रहें और आपदा या जलवायु अस्थिरता की स्थिति में ग्रामीण समुदाय इन्हें भरोसे के साथ उपयोग कर सकें।

सेनो के इस प्रयास से यह स्पष्ट हुआ कि पारंपरिक ज्ञान केवल सांस्कृतिक धरोहर नहीं, बल्कि जलवायु संकट के समय में व्यावहारिक समाधान भी हो सकता है, खासकर तब, जब इसे महिलाओं और समुदायों के अनुभव, नेतृत्व और सामुदायिक साझेदारी के साथ जोड़ा जाए।

नीतिगत ढांचा और ज़मीनी हकीकत

महिलाओं‑नेतृत्व वाली पहलों को सीमित मात्रा में संस्थागत समर्थन मिलता है।

विश्व बैंक समर्थित परियोजनाएं स्थानीय वन संरक्षण और पारंपरिक उपायों के साथ सामुदायिक आजीविकाओं और रोजगार को जोड़ने पर ध्यान देती हैं। 

उदाहरण के तौर पर, त्रिपुरा और नागालैंड में विश्व बैंक समर्थित “एन्हांसिंग लैंडस्केप एंड इकोसिस्टम मैनेजमेंट” परियोजना (ELEMENT) है, जो 7 लाख से अधिक लोगों को जंगलों को बेहतर तरीके से प्रबंधित करने, मिट्टी संरक्षण और जल उपलब्धता सुधारने में सहायता देने के लिये लागू की जा रही है।

यह परियोजना 1 लाख हेक्टेयर से अधिक वनों को संरक्षित और पुनर्स्थापित करने के साथ‑साथ स्थानीय वन उत्पादों और प्रकृति‑आधारित पर्यटन जैसे वैकल्पिक आजीविकाओं को बढ़ावा देगी, तथा युवाओं और महिलाओं के लिए लगभग 60,000 रोजगार के अवसर करेगी। 

इन नीतिगत प्रयासों में यह उम्मीद की जाती है कि स्थानीय समुदायों और पारंपरिक ज्ञान को शामिल किया जाए, पर ज़मीनी स्तर पर वास्तविकता अक्सर थोड़ी अलग दिखती है।

व्यापक ढांचा तो है लेकिन स्पष्ट प्रक्रियाओं की कमी: राष्ट्रीय नीतिगत ढांचा मौजूद है, लेकिन स्थानीय पारंपरिक ज्ञान को शामिल करने की स्पष्ट प्रक्रिया अक्सर नहीं है। महिलाओं‑नेतृत्व वाली पहलों को सीमित मात्रा में संस्थागत समर्थन मिलता है।

महिलाओं‑नेतृत्व वाली पहलों को संस्थागत समर्थन सीमित: जमीनी स्तर पर महिलाएं और समुदाय पारंपरिक उपाय अपनाकर जलवायु अनुकूलन में काम कर रहे हैं, लेकिन उन पहलों को स्थानीय प्रशासन, वित्तीय संसाधन और तकनीकी सहायता की कमी का सामना करना पड़ता है।

अक्सर योजनाएं केवल बड़े ढांचे तक सीमित रह जाती हैं और स्थानीय स्तर पर अनुकूलन के इन जीवंत, नीतिगत रूप से संगठित मॉडल को ठीक से संसाधित नहीं किया जाता।

लोकल से नेशनल तक का अंतर

जब तक पारंपरिक ज्ञान और महिलाओं‑के नेतृत्व वाले समाधानों को नीतिगत दस्तावेज़ों, बजट प्रावधानों, और अभियोजन‑विशेष समर्थन योजनाओं में स्पष्ट रूप से शामिल नहीं किया जाता, तब तक ज़मीनी स्तर पर ये प्रयास अक्सर स्वैच्छिक, अनौपचारिक और सीमित संसाधन‑आधारित ही रहते हैं।

हालांकि विश्व बैंक जैसी अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थाएं न केवल बड़े परियोजनाएं ला रही हैं, बल्कि सामुदायिक संरक्षण और सहनशीलता को बढ़ाने के लिये स्थानीय नेतृत्व, पारंपरिक ज्ञान और समुदाय के स्वामित्व को भी अपने कार्यक्रम का हिस्सा बना रही हैं। 

जैसा कि मेघालय के पारिस्थितिक पुनर्स्थापन प्रोजेक्ट में देखा गया है, जहां 400 से अधिक गांवों के समुदायों ने अपनी भूमि, जल और जंगलों को पारंपरिक और वैज्ञानिक तरीके से मिलाकर सशक्त किया। 

इन पहलुओं को देखते हुए यह स्पष्ट होता है कि नीतिगत ढांचा तो बन रहा है, लेकिन ज़मीनी हकीकत में इसे स्थानीय समुदायों, विशेषकर महिलाओं और उनके पारंपरिक ज्ञान को संगठित, वित्तपोषित और संस्थागत रूप देने की दिशा में अभी और काम करना बाकी है।

चुनौतियां और सीमाएं

इन प्रयासों के सामने कई संरचनात्मक चुनौतियां भी हैं। 

  • युवाओं का खेती से दूर जाना: आधुनिक शिक्षा और शहरों में अवसर पारंपरिक खेती को कमजोर कर रहे हैं।

  • बाज़ार पर निर्भरता और भूमि का खंडित होना: छोटे किसान बाहरी इनपुट और बीजों पर अधिक निर्भर

  • जलवायु परिवर्तन की अनिश्चितता: अस्थिर वर्षा और चरम मौसम पारंपरिक प्रणालियों को चुनौती देते हैं।

  • संरचनात्मक समर्थन की कमी: प्रशिक्षण, वित्त और तकनीकी सहायता अक्सर अपर्याप्त।

  • सफल पहलें: जैसे उत्तराखंड में जड़ी-बूटी आधारित खेती, जिसने ग्रामीण पलायन रोका और पारंपरिक खेती को सशक्त किया।

आज की पीढ़ी के लिए यह महत्वपूर्ण है कि हमारे कौशल समुदाय की जरूरतों को पूरा करें और हम इसके माध्यम से आजीविका सृजित करें। इसलिए हमने महिलाओं द्वारा बुने जाने वाले पारंपरिक मेखला (नागा महिलाओं द्वारा पहनी जाने वाली स्कर्ट) और शॉल से परे उत्पादों पर ध्यान देना शुरू किया।

सेनो त्सुहाह, पर्यावरण कार्यकर्ता, नागालैंड

स्थानीय समाधान टिकाऊ हो सकते हैं बशर्ते समर्थित हों

स्थानीय समाधान तब टिकाऊ हो सकते हैं जब उन्हें सही समर्थन, प्रशिक्षण और मान्यता मिले। जब ज़मीनी हकीकत और नीति‑ढांचा साथ मिलते हैं, तो पारंपरिक और प्रकृति‑आधारित उपाय टिकाऊ और सामुदायिक केंद्रित बन सकते हैं।

ऐसे प्रयास दिखाते हैं कि ज़मीनी हकीकत और नीति‑ढांचा जब साथ मिलते हैं, तो पारंपरिक और प्रकृति‑आधारित अनुकूलन उपाय न केवल टिकाऊ बन सकते हैं बल्कि सामाजिक‑आर्थिक रूप से समावेशी और सामुदायिक केंद्रित भी हो सकते हैं।

नागालैंड के अनुभव यह दर्शाते हैं कि जलवायु अनुकूलन केवल तकनीकी उपायों या बड़े बुनियादी ढांचे तक सीमित नहीं होना चाहिए। स्थानीय पारंपरिक ज्ञान, प्रकृति-आधारित उपाय और सामुदायिक भागीदारी, विशेषकर महिलाओं की सक्रिय भूमिका, जल और जलवायु संकट से निपटने के लिए महत्वपूर्ण संसाधन हो सकते हैं।

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