समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र में बदलाव व्यापक स्तर पर हो रहे हैं। समुद्र का यह संकट तेल रिसाव या प्लास्टिक के ढेर की तरह पहली नज़र में दिखाई नहीं दे रहा है।
फोटो - क्रिश्चियन याकुबू (विकीकॉमन्स)
जलीय जीवों की कोशिकाओं तक पहुंचा समुद्री प्रदूषण, कहां-कहां हो सकता है इसका असर?
भारत की अर्थव्यवस्था का 4 फ़ीसद ब्लू इकोनॉमी से जुड़ा है और भारत सरकार का लक्ष्य है कि 2030 को ब्लू इकोनॉमी की विकास दर को डबल डिजिट तक ले जाएं। यह लक्ष्य पूरा होगा या नहीं, यह पूरी तरह जलीय जीवों के स्वास्थ्य पर निर्भर करेगा। और दुर्भाग्यवश ये जीव आज थका हुआ महसूस कर रहे हैं, इनमें पहले जैसी ऊर्जा नहीं रही। इसके पीछे कारणों पर चर्चा जरूरी है। चर्चा इस बात पर भी ज़रूरी है कि यह घटती ऊर्जा किन-किन क्षेत्रों पर अपना असर डाल सकते हैं।
समुद्री जीवों की अस्वस्थ्य कोशिकाएं
समुद्र की सतह से लेकर उसके गहरे तल तक जीवन की एक जटिल और संतुलित दुनिया बसती है, जहां मछलियां, शैवाल, प्रवाल, समुद्री पक्षी और अनगिनत जीव एक-दूसरे से जुड़े हुए पारिस्थितिकी तंत्र का हिस्सा हैं। यह तंत्र दिखने में विशाल और स्थिर लगता है, लेकिन इसकी सेहत कई अदृश्य प्रक्रियाओं पर निर्भर करती है।
हाल के शोध बताते हैं कि समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र में बदलाव व्यापक स्तर पर हो रहे हैं। समुद्र का यह संकट तेल रिसाव या प्लास्टिक के ढेर की तरह पहली नज़र में दिखाई नहीं दे रहा है, बल्कि वह भीतर ही भीतर, चुपचाप आकार ले रहा है।
“पॉल्यूटेंट एक्सपोज़र शेप्स मिटोकोंड्रियल बायोएनर्जेटिक्स इन ए वाइल्ड सीबर्ड” शीर्षक वाले इस अध्ययन में वैज्ञानिकों के हवाले से कहा गया है कि समुद्र में पारा (Mercury) और पीएफएएस की बढ़ती मात्रा जलीय जीवों को नुकसान पहुंचा रही है। इन रसायनों के संपर्क में आने पर समुद्री जीवों की कोशिकाओं में मौजूद माइटोकॉन्ड्रिया प्रभावित हो रहा है। माइटोकॉन्ड्रिया वो संरचना है जो कोशिकाओं को ऊर्जा (एटीपी) प्रदान करती है।
इसी कारण से इन जीवों की कोशिकाओं में ऊर्जा संचार में कमी हो रही है और उसके परिणामस्वरूप ये जीव अपनी दैनिक गतिविधियों में धीमें पड़ रहे हैं। समुद्री कछुए या सैल्मन जैसी मछलियां जो हज़ारों किलोमीटर तैरती थीं, अब उनकी ऊर्जा का क्षय हो रहा है। इसके अलावा, जलवायु परिवर्तन के कारण समुद्र के तापमान में वृद्धि हो रही है, और इसका सीधा असर उनके मेटाबॉलिज़्म पर पड़ रहा है, और यह भी उनकी ऊर्जा के स्तर में आने वाली कमी का एक बड़ा कारण है।
“पॉल्यूटेंट एक्सपोज़र शेप्स मिटोकोंड्रियल बायोएनर्जेटिक्स इन ए वाइल्ड सीबर्ड” शीर्षक वाले इस अध्ययन में वैज्ञानिकों के हवाले से कहा गया है कि समुद्र में पारा (Mercury) और पीएफएएस की बढ़ती मात्रा जलीय जीवों को नुकसान पहुंचा रही है।
पीएफएएस यानि एंड पॉलीफ्लोरोअल्काइल सब्सटेंस (Per- and Polyfluoroalkyl Substances) को 'फॉरएवर केमिकल्स' (Forever Chemicals) भी कहा जाता है क्योंकि ये प्रकृति में कभी पूरी तरह नष्ट नहीं होते। ये रसायन अगर मिट्टी और भूजल में मिल जायें हैं तो ये कैंसर, लिवर की समस्याओं और हार्मोनल असंतुलन का कारण बन सकते हैं।
हालांकि, वैज्ञानिकों का कहना है कि यह प्रभाव तुरंत मृत्यु का कारण नहीं बनता, बल्कि जीवों को धीरे-धीरे कमजोर करता है। इसके अन्य प्रभाव इस प्रकार हैं:
उनकी बढ़ने की दर धीमी पड़ जाती है
प्रजनन दर में कमी आती है
अन्य जीवों में संक्रमण का खतरा बढ़ जाता है
समुद्री जीव खाने की तलाश और लंबी दूरी तय करने में थकान महसूस करते हैं
वैज्ञानिकों का कहना है कि समुद्री पारिस्थितिकी में जलीय जीवों की उर्जा में कमी पूरी खाद्य श्रृंखला को प्रभावित कर सकती है।
भारतीय तटीय अर्थव्यवस्था और समुद्री संसाधन
भारत के परिप्रेक्ष्य में बात करें तो यहां की समुद्री तटरेखा लगभग 11,098 किमी लंबी है, जिसमें नौ तटीय राज्य और दो केन्द्रशासित प्रदेश शामिल हैं, और यह देश के समुद्री संसाधनों का आधार है।
केंद्रीय मत्स्यिकी, पशुपालन एवं डेयरी मंत्रालय की 2023-24 की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार, वित्त वर्ष 2022-23 में देश का कुल मत्स्य उत्पादन लगभग 17.54 मिलियन मीट्रिक टन (175.4 लाख टन) रहा। मत्स्य क्षेत्र में लगभग 58 लाख से अधिक लोग सीधे जुड़े हैं, जबकि करोड़ों लोग इससे अप्रत्यक्ष रूप से आजीविका प्राप्त करते हैं।
ऐसे में यदि समुद्री प्रदूषक जीवों की कोशिकीय ऊर्जा प्रणाली को प्रभावित कर रहे हैं, तो इसका असर केवल पारिस्थितिकी तक सीमित नहीं रहेगा। मछलियों की संख्या, आकार और पोषण गुणवत्ता में बदलाव तटीय अर्थव्यवस्था और खाद्य सुरक्षा दोनों को प्रभावित कर सकता है।
कई तटीय राज्यों में पकड़ की संरचना (species composition) और आकार में बदलाव दर्ज किए गए हैं।
चित्र: विकिमीडिया कॉमन्स
समुद्री मत्स्य उत्पादन में गिरावट
भारत में मत्स्य उत्पादन को लेकर ताजा आंकड़े और रिपोर्ट्स मिली-जुली तस्वीर पेश करती हैं। जहां एक ओर अंतर्देशीय (Inland/Aquaculture) उत्पादन रिकॉर्ड ऊंचाई पर है, वहीं समुद्री (Marine) मछली पकड़ने के क्षेत्र में गिरावट दर्ज की गई है।
ICAR-सेंट्रल मरीन फिशरीज रिसर्च इंस्टीट्यूट (CMFRI) की 2025 की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार 2024 में भारत की समुद्री मछली की लैंडिंग (Marine Fish Landings) में 2023 की तुलना में 2 फ़ीसद की गिरावट दर्ज की गई। यह कुल 3.47 मिलियन टन रही। केरल (4 फ़ीसद की गिरावट), कर्नाटक, गोवा और दमन-दीव में उत्पादन में महत्वपूर्ण कमी देखी गई।
पेट्रोलियम प्लानिंग एंड एनालिसिस सेल (पीपीएसी) के अनुसार पिछले कुछ सालों में ईंधन के मूल्यों में हुए उतार-चढ़ाव ने मछली पकड़ने वाली समुद्री नावों के परिचालन में होने वाले खर्च को भी प्रभावित किया है।
घटती पकड़, बढ़ता खर्च: तटीय अर्थव्यवस्था पर दबाव
समुद्री मत्स्य क्षेत्र केवल उत्पादन का सवाल नहीं है, बल्कि लागत, जोखिम और आय के संतुलन का भी सवाल है। ICAR-CMFRI के हालिया आकलनों और मत्स्यिकी विभाग के आंकड़ों से स्पष्ट होता है कि कई तटीय राज्यों में पकड़ की संरचना (species composition) और आकार में बदलाव दर्ज किए गए हैं। इसके अलावा, छोटी आकार की मछलियों की हिस्सेदारी बढ़ने और कुछ पारंपरिक प्रजातियों की उपलब्धता घटने की प्रवृत्ति की बात भी सामने आई है।
साथ ही ईंधन की बढ़ती क़ीमतों के कारण समुद्र में लंबी दूरी तक जाने और मौसमीय अनिश्चितता के कारण भी मछुआरों की जेब पर दबाव बढ़ रहा है। पेट्रोलियम प्लानिंग एंड एनालिसिस सेल (पीपीएसी) के अनुसार पिछले कुछ सालों में ईंधन के मूल्यों में हुए उतार-चढ़ाव ने मछली पकड़ने वाली समुद्री नावों के परिचालन में होने वाले खर्च को भी प्रभावित किया है।
केरल और तमिलनाडु के तटीय समुदायों में मछुआरों के संगठनों ने बार-बार यह चिंता जताई है। उनका कहना है कि उन्हें पहले की तुलना में ज्यादा दूर और ज्यादा समय तक समुद्र में रहना पड़ता है, जबकि पकड़ की मात्रा और गुणवत्ता दोनों में अनिश्चितता बढ़ी है।
मछुआरों का कहना है कि अब उन्हें पहले की तुलना में ज्यादा दूर और ज्यादा समय तक समुद्र में रहना पड़ता है, जबकि पकड़ की मात्रा और गुणवत्ता दोनों में अनिश्चितता बढ़ी है।
चित्र: विकिमीडिया कॉमन्स
अगर समुद्री प्रदूषक जीवों की ऊर्जा-प्रणाली को प्रभावित कर रहे हैं, जैसा कि 2025 के अध्ययन में संकेत दिया गया है, तो इसका असर पकड़ की मात्रा, आकार और बाज़ार मूल्य पर पड़ सकता है। धीमी वृद्धि और कम प्रजनन जैसी प्रवृत्तियां तटीय अर्थव्यवस्था पर अतिरिक्त दबाव डाल सकती हैं।
मछली बाज़ार में आम तौर पर बड़ी और परिपक्व मछलियों की कीमत अधिक होती है, जबकि छोटे आकार की मछलियों का प्रति किलोग्राम दाम कम होता है। ऐसे में आकार में गिरावट सीधे आय पर असर डाल सकती है।
इसलिए समुद्री प्रदूषण का प्रभाव प्रयोगशाला तक सीमित नहीं रह जाता बल्कि वह नाव, जाल और बाज़ार तक पहुंच जाता है। यही वह बिंदु है जहां पर्यावरणीय संकट आजीविका के संकट में बदलता दिखाई देता है।
नीतिगत अंतराल: निगरानी कहां कमजोर है?
भारत में तटीय और समुद्री जल की गुणवत्ता की निगरानी के लिए संस्थागत ढांचा मौजूद है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) और राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और राष्ट्रीय समुद्र तटीय प्रदूषण निगरानी कार्यक्रम नियमित रूप से आंकड़े एकत्र करते हैं। तटीय विनियमन क्षेत्र (सीआरजेड) नोटिफ़िकेशन 2019 तटीय संरक्षण का कानूनी आधार भी प्रदान करता है।
इन सबके बावजूद ज़मीनी हक़ीक़त कुछ और ही कहानी बयान करती है:
उभरते प्रदूषकों की सीमित निगरानी: भारी धातुओं की आंशिक निगरानी होती है, लेकिन पीएफएएस जैसे “फॉरएवर केमिकल्स” की नियमित समुद्री और जैव-नमूना निगरानी अभी व्यापक नहीं है।
उप-घातक प्रभावों पर ध्यान का अभाव: नीतियां अक्सर मछलियों की मृत्यु या चरम प्रदूषण घटनाओं पर केंद्रित रहती हैं। धीमी वृद्धि, कम प्रजनन और ऊर्जा-क्षमता में गिरावट जैसे संकेतकों की व्यवस्थित ट्रैकिंग नहीं होती।
बहु-विषयी समन्वय की कमी: प्रजाति-संरचना में बदलाव पर CMFRI और ICAR के कुछ अध्ययन उपलब्ध हैं। लेकिन उन्हें प्रदूषण जैव-रसायन से जोड़ने वाला एकीकृत ढांचा सीमित है।
नदी-मुहाना–समुद्र का अलग-अलग प्रबंधन: भारत की प्रमुख नदियां, जैसे गंगा, ब्रह्मपुत्र, गोदावरी, कृष्णा, महानदी आदि औद्योगिक और शहरी प्रदूषण को समुद्र तक ले जाती हैं। फिर भी नमामि गंगे जैसे नदी प्रदूषण नियंत्रण और समुद्री मत्स्य प्रबंधन अक्सर अलग-अलग नीति खांचों में चलते हैं।
समुद्री प्रदूषण से उत्पन्न जैविक थकान के कारण प्रभावित क्षेत्र
समुद्री जीवों और पौधों में जैविक थकान केवल पारिस्थितिकी संकट नहीं है। इससे निम्न क्षेत्र प्रमुख रूप से प्रभावित हो सकते हैं:
आगे का रास्ता: जैव-स्वास्थ्य को आजीविका संकेतक बनाना
अगर वैज्ञानिक अध्ययन यह संकेत दे रहे हैं कि प्रदूषण समुद्री जीवों की ऊर्जा प्रणाली को प्रभावित कर सकता है, तो नीति को भी “जीवित रहने” से आगे बढ़कर “स्वस्थ रहने” पर ध्यान देना होगा।
इस दिशा में कुछ आवश्यक कदम हो सकते हैं:
तटीय जल और मछलियों में पारा और पीएफएएस की नियमित जैव-निगरानी
मछलियों के ऊतक (fish tissue) में प्रदूषक स्तर की सार्वजनिक रिपोर्टिंग
नदी-मुहाना-समुद्र को एकीकृत पारिस्थितिकी तंत्र के रूप में नीति में शामिल करना
मछुआरा समुदायों को सहभागी निगरानी में शामिल करना
समुद्री जैव-स्वास्थ्य संकेतकों को मत्स्य नीति का हिस्सा बनाना
समुद्री जीवों की घटती ऊर्जा अब केवल प्रयोगशाला का विषय नहीं रही। यदि समुद्र भीतर से क्षीण हो रहा है, तो उसका असर मछुआरों की पकड़, तटीय बाज़ारों और खाद्य सुरक्षा तक पहुंचेगा।
जब सरकार 2026-27 के बजट में ब्लू इकोनॉमी के लिए 2,761.80 करोड़ रुपये आवंटित कर 2030 तक डबल डिजिट ग्रोथ का लक्ष्य रख रही है, तब जलीय जीवों का कमजोर होता स्वास्थ्य इस सपने पर सवालिया निशान लगा सकता है, और उसका प्रभाव अंततः आम लोगों की जेब पर भी पड़ सकता है।

