भारत की पारंपरिक जल प्रणालियां

भारत की पारंपरिक जल प्रणालियां

Nature-Based Solutions क्या हैं? भारत की पारंपरिक जल प्रणालियों से सीखें पर्यावरण संरक्षण के तरीके

विश्व पर्यावरण दिवस पर जानिए कैसे कुएं, तालाब, बावड़ियां, जोहड़, आहर-पइन और पवित्र उपवन जैसी पारंपरिक भारतीय व्यवस्थाएं जल संरक्षण, भूजल पुनर्भरण, जैव विविधता और जलवायु अनुकूलन के प्रभावी मॉडल थीं।
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आज पर्यावरण दिवस पर हम पेड़ लगाते हैं, प्लास्टिक कम करने की बात करते हैं और पर्यावरण बचाने के संकल्प लेते हैं। लेकिन भारतीय समाज में पर्यावरण संरक्षण कभी एक अलग गतिविधि नहीं था। वह रोज़मर्रा के जीवन, जल स्रोतों, खेती और लोक परंपराओं में रचा-बसा था।

दुनिया जलवायु परिवर्तन, भूजल संकट, शहरी बाढ़ और बढ़ते तापमान से जूझ रही है। ऐसे में एक शब्द बार-बार सुनाई देता है - नेचर-बेस्ड सॉल्यूशन्स यानी प्रकृति-आधारित समाधान। आसान भाषा में कहें तो प्रकृति के विरुद्ध जाकर नहीं बल्कि उसके साथ तालमेल बिठाकर पर्यावरणीय समस्याओं का समाधान करने वाले उपाय।

दिलचस्प बात यह है कि भारत में ऐसे समाधान कोई नई खोज नहीं हैं। बहुत पहले, जलवायु परिवर्तन, सतत विकास और पर्यावरणीय प्रभाव आकलन जैसे विचार सार्वजनिक विमर्श का हिस्सा नहीं थे। तब भी समाज ने पानी और प्रकृति के साथ संतुलन बनाकर जीने के अनेक तरीके विकसित कर लिए थे।

<div class="paragraphs"><p>भोपाल का 'बड़ा तालाब' (भोजताल) एशिया की सबसे बड़ी मानव निर्मित झीलों में से एक है। <br></p></div>

भोपाल का 'बड़ा तालाब' (भोजताल) एशिया की सबसे बड़ी मानव निर्मित झीलों में से एक है।

चित्र- चंद्रशेखर बिरादर

कुएं, तालाब, बावड़ियां, जोहड़, मानवनिर्मित झीलों, आहर-पइन और कुंड जैसी संरचनाएं केवल जल संचयन के साधन नहीं थीं। वे स्थानीय पारिस्थितिकी, सामुदायिक जीवन और पर्यावरण संरक्षण की ऐसी व्यवस्थाएं थीं जिन्हें आज हम नेचर-बेस्ड सॉल्यूशन्स कहेंगे। 

इनमें से अधिकांश व्यवस्थाएं उस समय विकसित हुईं जब न बिजली आधारित पंप थे, न बड़ी जलापूर्ति योजनाएं और न ही आधुनिक पर्यावरणीय नीतियां। फिर भी वे सदियों तक समुदायों की जल और पर्यावरण संबंधी जरूरतों को पूरा करती रहीं।

<div class="paragraphs"><p>भोपाल का भोजताल, जिसका निर्माण परमार राजा भोज ने 11वीं सदी में करवाया था।</p><p></p></div>

भोपाल का भोजताल, जिसका निर्माण परमार राजा भोज ने 11वीं सदी में करवाया था।

चित्र- चंद्रशेखर बिरादर

जब समाज खुद पर्यावरण का प्रहरी था

आज पर्यावरण संरक्षण की जिम्मेदारी मुख्यतः सरकारों, कानूनों और संस्थाओं पर केंद्रित दिखाई देती है। लेकिन भारतीय समाज में लंबे समय तक जल स्रोतों और प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा का काम केवल प्रशासनिक व्यवस्था का हिस्सा नहीं था। यह सामुदायिक जीवन का हिस्सा था।

गांवों में तालाब, कुएं, बावड़ियां और नौले केवल पानी लेने की जगह नहीं थे, बल्कि उनके उपयोग और संरक्षण को लेकर समाज के अपने नियम भी थे। कई स्थानों पर पीने के पानी के लिए अलग घाट बनाए जाते थे, जबकि पशुओं को पानी पिलाने और कपड़े धोने के लिए अलग स्थान निर्धारित होते थे। इससे जल स्रोतों की स्वच्छता बनी रहती थी और पानी का प्रदूषण कम होता था।

उत्तराखंड के अनेक नौलों के आसपास पेड़ काटने, गंदगी फैलाने या पशुओं को ले जाने पर सामाजिक रोक थी। राजस्थान के जोहड़ों और तालाबों की नियमित सफाई सामुदायिक श्रमदान से होती थी। कई क्षेत्रों में वर्षा ऋतु शुरू होने से पहले पूरे गांव के लोग मिलकर जल स्रोतों की मरम्मत और गाद निकालने का काम करते थे।

कई क्षेत्रों में जल स्रोतों की देखभाल को धार्मिक और सामाजिक दायित्व माना जाता था। तालाबों की सफाई, गाद निकालना और जल स्रोतों के आसपास वृक्षारोपण जैसे कार्य सामुदायिक उत्सवों का रूप ले लेते थे। इस प्रकार पर्यावरण संरक्षण कोई अलग कार्यक्रम नहीं, बल्कि सामाजिक जीवन का हिस्सा था।

<div class="paragraphs"><p>तालाब से पानी भरती महिला <br> </p></div>

तालाब से पानी भरती महिला

चित्र: नीतू सिंह 

दिलचस्प बात यह है कि इनमें से अधिकांश नियम किसी लिखित कानून का हिस्सा नहीं थे। वे लोक परंपराओं, सामाजिक अनुशासन और साझा जिम्मेदारी की भावना से संचालित होते थे। लोगों को यह समझ थी कि यदि जल स्रोत खराब होंगे तो उसका असर पूरे समुदाय पर पड़ेगा।

इस तरह देखें तो पारंपरिक जल संरचनाएं केवल इंजीनियरिंग के उदाहरण नहीं थीं। वे सामाजिक संस्थाएं भी थीं, जो समुदाय को यह सिखाती थीं कि पर्यावरण की रक्षा केवल सरकार का काम नहीं, बल्कि समाज की साझा जिम्मेदारी है।

आज जब नदियों, झीलों और भूजल स्रोतों के संरक्षण के लिए बड़े-बड़े कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं, तब यह प्रश्न प्रासंगिक हो जाता है कि क्या आधुनिक समाज ने पानी के प्रति वह सामुदायिक जिम्मेदारी कहीं खो दी है, जो कभी गांवों और कस्बों के जीवन का स्वाभाविक हिस्सा हुआ करती थी।

भारत की पारंपरिक जल प्रणालियों की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि वे केवल पानी जमा करने के लिए नहीं बनाई गई थीं। वे स्थानीय भूगोल, जलवायु, समाज और संस्कृति को साथ लेकर चलती थीं। 

यही कारण है कि देश के अलग-अलग क्षेत्रों में जल संरक्षण के तरीके भी अलग-अलग विकसित हुए। भारत की जल प्रणालियां इस बात का उदाहरण हैं कि प्रकृति को समझे बिना जल प्रबंधन संभव नहीं था।

<div class="paragraphs"><p>हम्‍पी का स्‍टेप वेल (सीढ़ी युक्त कुआं) <br> </p></div>

हम्‍पी का स्‍टेप वेल (सीढ़ी युक्त कुआं)

चित्र: विकीकॉमन्‍स 

जब पानी का प्रबंधन स्थानीय भूगोल से तय होता था

भारत की भौगोलिक विविधता ने यहां जल संरक्षण की विविध प्रणालियों को जन्म दिया। राजस्थान के शुष्क क्षेत्रों में कुंड और जोहड़ बने, बिहार में आहर-पइन प्रणाली विकसित हुई, मध्य भारत और दक्षिण भारत में तालाबों का विशाल नेटवर्क खड़ा हुआ और पश्चिमी भारत में बावड़ियों ने जल संचयन को स्थापत्य कला के साथ जोड़ दिया।

इन सभी प्रणालियों की एक साझा विशेषता थी। वे स्थानीय वर्षा, मिट्टी और भूगोल को समझकर बनाई गई थीं।

आज जिन समस्याओं को हल करने के लिए करोड़ों रुपये की परियोजनाएं बनती हैं, उनका समाधान इन संरचनाओं में निहित था। वे वर्षाजल को रोकती थीं, उसे धीरे-धीरे जमीन में समाने देती थीं और भूजल को पुनर्भरित करती थीं।

यही कारण है कि भारत के अलग-अलग हिस्सों में पानी को बचाने के तरीके भी अलग-अलग दिखाई देते हैं। लेकिन इन सभी का उद्देश्य एक ही था - वर्षाजल को स्थानीय स्तर पर जितना हो सके उतनी मात्रा में रोकना, संजोना और जमीन के भीतर पहुंचाना। इन प्रणालियों के कुछ प्रमुख उदाहरण आज भी देश के अलग-अलग हिस्सों में देखे जा सकते हैं।

<div class="paragraphs"><p>हम्‍पी का पुषकर्णी (टैंक) जो विजयनगर शासनकाल में बनवाया गया था। </p></div>

हम्‍पी का पुषकर्णी (टैंक) जो विजयनगर शासनकाल में बनवाया गया था।

चित्र: विकीकॉमन्‍स 

आज दुनिया जिन नेचर-बेस्ड सॉल्यूशन्स की बात कर रही है, उनकी मूल भावना नई नहीं है। जल, मिट्टी, वनस्पति और स्थानीय भूगोल को साथ लेकर चलने वाली भारतीय जल प्रणालियाँ इसी सोच पर आधारित थीं। 

वे पानी को केवल संग्रहित नहीं करती थीं, बल्कि भूजल पुनर्भरण, जैव विविधता संरक्षण, स्थानीय तापमान नियंत्रण और सामुदायिक भागीदारी जैसे अनेक पारिस्थितिक लाभ भी प्रदान करती थीं। इसी कारण वे आज भी जलवायु परिवर्तन के दौर में प्रासंगिक दिखाई देती हैं।

तालाब: केवल जलाशय नहीं, एक पारिस्थितिकी तंत्र

भारतीय गांवों में तालाब अक्सर किसी बस्ती का केंद्र हुआ करते थे। वे केवल पानी संग्रहित नहीं करते थे, बल्कि पूरे स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र को सहारा देते थे।

तालाबों से पशुओं को पानी मिलता था, खेतों की सिंचाई होती थी, भूजल स्तर बना रहता था और अनेक पक्षियों तथा जलीय जीवों को आवास मिलता था। बारिश के मौसम में अतिरिक्त पानी को रोककर वे बाढ़ के जोखिम को भी कम करते थे।

आज जब कई शहरों में बारिश के कुछ घंटों बाद जलभराव और कुछ महीनों बाद जल संकट देखने को मिलता है, तब तालाबों की भूमिका और अधिक प्रासंगिक दिखाई देती है।

<div class="paragraphs"><p>दिल्ली में अग्रसेन की बावड़ी <br> </p></div>

दिल्ली में अग्रसेन की बावड़ी

चित्र: विकीकॉमन्‍स

बावड़ियां: पानी और स्थापत्य का अद्भुत संगम

राजस्थान और गुजरात में विकसित बावड़ियां केवल जल संरचनाएं नहीं थीं, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन का भी हिस्सा थीं।

गहरी सीढ़ियों वाली इन संरचनाओं में वर्षाजल संग्रहित किया जाता था। जमीन के भीतर होने के कारण इनमें पानी लंबे समय तक सुरक्षित रहता था और वाष्पीकरण अपेक्षाकृत कम होता था।

बावड़ियां स्थानीय तापमान को भी प्रभावित करती थीं। उनके आसपास का वातावरण अपेक्षाकृत ठंडा रहता था, जिससे वे जलवायु-अनुकूल सार्वजनिक स्थान का काम करती थीं।

आज जब शहरों में क्लाइमेट रेजिलिएंट डिजाइन की चर्चा हो रही है, तब बावड़ियां हमें याद दिलाती हैं कि ऐसे विचार हमारी परंपराओं में पहले से मौजूद थे।

<div class="paragraphs"><p>राजस्थान के ठाठवटा में जोहड़</p></div>

राजस्थान के ठाठवटा में जोहड़

चित्र: विकीकॉमन्‍स 

जोहड़: राजस्थान का जल विज्ञान

राजस्थान में विकसित जोहड़ वर्षाजल संचयन की ऐसी संरचनाएं हैं जिन्होंने सूखे से लड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। ये छोटे मिट्टी या पत्थर के बांध होते हैं जो वर्षाजल को रोककर धीरे-धीरे जमीन में समाने देते हैं। इससे आसपास के कुओं और भूजल स्रोतों का जलस्तर बढ़ता है।

राजस्थान में कई स्थानों पर समुदायों ने जोहड़ों के पुनर्जीवन के माध्यम से सूख चुके जलस्रोतों को पुनर्जीवित करने का प्रयास किया है। यह दिखाता है कि जल संरक्षण केवल इंजीनियरिंग का नहीं, सामुदायिक भागीदारी का भी प्रश्न है।

पिछले कुछ दशकों में इन संरचनाओं के पुनर्जीवन के प्रयासों ने भी उनकी उपयोगिता को प्रमाणित किया है। राजस्थान के अलवर जिले में राजेंद्र सिंह और तरुण भारत संघ द्वारा जोहड़ों के पुनर्जीवन का कार्य इस बात का चर्चित उदाहरण है कि पारंपरिक जल ज्ञान आज भी सूखे और जल संकट से निपटने में प्रभावी भूमिका निभा सकता है।

आहर-पइन: बिहार का सामुदायिक जल प्रबंधन

दक्षिण बिहार में विकसित आहर-पइन प्रणाली भारत की सबसे उल्लेखनीय पारंपरिक जल प्रणालियों में से एक है।

आहर जल संचयन के लिए बने जलाशय होते थे, जबकि पइन उन तक पानी पहुंचाने वाली नहरें। यह प्रणाली वर्षाजल और नदी के अतिरिक्त प्रवाह को नियंत्रित करने के लिए विकसित की गई थी।

इससे बाढ़ और सूखे दोनों परिस्थितियों से निपटने में मदद मिलती थी। यह इस बात का उदाहरण है कि पारंपरिक समाज स्थानीय जल परिस्थितियों को कितनी गहराई से समझता था।

कुंड: मरुस्थल का जल बैंक

राजस्थान और पश्चिमी भारत के शुष्क इलाकों में विकसित कुंड वर्षाजल संचयन की अत्यंत प्रभावी संरचनाएं थीं।

इनका डिजाइन ऐसा होता था कि आसपास के क्षेत्र से वर्षाजल एकत्र होकर भूमिगत जलाशय में पहुंच जाए। इससे कम वर्षा वाले क्षेत्रों में भी लंबे समय तक पेयजल उपलब्ध रहता था।

आज जब जलवायु परिवर्तन के कारण सूखे की घटनाएं बढ़ रही हैं, तब कुंड जैसी संरचनाएं जल सुरक्षा के उपयोगी मॉडल प्रस्तुत करती हैं।

नौला: हिमालय का जीवित जलस्रोत

उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों में सदियों से नौले पेयजल का प्रमुख स्रोत रहे हैं। पत्थरों से निर्मित ये संरचनाएं प्राकृतिक जलधाराओं और भूजल रिसाव को सुरक्षित रखने के लिए बनाई जाती थीं।

नौले केवल पानी लेने की जगह नहीं थे, बल्कि स्थानीय समाज की साझा धरोहर थे। इनके आसपास सफाई और संरक्षण के नियम होते थे तथा कई स्थानों पर पेड़ काटने या गंदगी फैलाने पर सामाजिक रोक भी थी।

पहाड़ों के लोगों ने बहुत पहले समझ लिया था कि पानी का स्रोत केवल वह स्थान नहीं है जहां पानी दिखाई देता है। उसके पीछे पूरा जलग्रहण क्षेत्र, जंगल और मिट्टी की नमी काम करती है। इसलिए नौलों का संरक्षण पूरे पारिस्थितिकी तंत्र की रक्षा से जुड़ा था।

आज जलवायु परिवर्तन और घटते भूजल के कारण अनेक नौले सूख रहे हैं, लेकिन उनका पुनर्जीवन हिमालयी क्षेत्रों में जल सुरक्षा की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। 

उत्तराखंड के कई क्षेत्रों में स्थानीय समुदायों और नागरिक संगठनों द्वारा नौलों के पुनर्जीवन की पहलें चल रही हैं, जिनसे यह समझ मजबूत हुई है कि जल स्रोतों का संरक्षण केवल संरचना नहीं, बल्कि पूरे जलग्रहण क्षेत्र के संरक्षण से जुड़ा है।

<div class="paragraphs"><p>कर्नाटक के मलपनगुडी में सूलाई टैंक <br></p></div>

कर्नाटक के मलपनगुडी में सूलाई टैंक

चित्र: विकीकॉमन्‍स

जंगल जिन्हें धर्म ने बचाया

भारत में पर्यावरण संरक्षण की कुछ सबसे दिलचस्प कहानियां पानी की नहीं, जंगलों की हैं। लेकिन इन जंगलों को बचाने का उद्देश्य भी अंततः पानी और जीवन को बचाना ही था।

राजस्थान में इन्हें ओरण, झारखंड और छत्तीसगढ़ के आदिवासी इलाकों में सरना, पश्चिमी घाट में देवराई या देवरे और उत्तर-पूर्व के कई राज्यों में अलग-अलग स्थानीय नामों से जाना जाता है। इन स्थानों को किसी देवता, ग्राम-देवी या स्थानीय आस्था से जोड़ा जाता था, जिसके कारण वहां पेड़ काटना, शिकार करना या भूमि उपयोग बदलना सामाजिक रूप से वर्जित माना जाता था।

पहली नज़र में यह धार्मिक परंपरा दिखाई देती है, लेकिन पर्यावरणीय दृष्टि से देखें तो इन पवित्र उपवनों ने सदियों तक स्थानीय जल स्रोतों और जैव विविधता की रक्षा की।

कई पवित्र उपवन प्राकृतिक झरनों, छोटी जलधाराओं या जलस्रोतों के आसपास विकसित हुए। समुदायों का अनुभव था कि यदि इन जंगलों को नुकसान पहुँचेगा तो पानी के स्रोत भी प्रभावित होंगे। इसलिए जल स्रोत की रक्षा का सबसे प्रभावी तरीका उसके आसपास के वन क्षेत्र को सुरक्षित रखना माना गया।

पश्चिमी घाट में किए गए अनेक अध्ययनों से पता चलता है कि पवित्र उपवन स्थानीय जल संतुलन बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। वे मिट्टी की नमी संरक्षित रखते हैं और छोटे झरनों के प्रवाह को बनाए रखने में मदद करते हैं। घने वृक्षावरण के कारण वर्षाजल धीरे-धीरे जमीन में समाता है और लंबे समय तक भूजल तथा झरनों को पोषित करता रहता है।

झारखंड के सरना स्थलों में भी अक्सर पुराने वृक्षों के समूह और छोटे जल स्रोत एक साथ दिखाई देते हैं। स्थानीय समुदाय इन्हें केवल धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि जीवनदायी प्राकृतिक धरोहर मानते हैं। यही कारण है कि इन क्षेत्रों में जंगल और पानी को अलग-अलग नहीं देखा जाता।

राजस्थान के कई ओरण ऐसे क्षेत्रों में विकसित हुए जहां पानी की उपलब्धता सीमित थी। वहां लोगों ने समझ लिया था कि यदि जंगल बचेंगे तो मिट्टी की नमी और जल स्रोत भी लंबे समय तक सुरक्षित रहेंगे। इस प्रकार आस्था ने पर्यावरण संरक्षण का काम किया और पर्यावरण संरक्षण ने जल सुरक्षा का।

अब जंगल केवल लकड़ी का स्रोत नहीं रहे

आज जब जलवायु परिवर्तन, वनों की कटाई और जल स्रोतों के क्षरण की चर्चा हो रही है, तब पवित्र उपवन हमें एक महत्वपूर्ण सीख देते हैं। वे बताते हैं कि पर्यावरण संरक्षण केवल कानूनों और योजनाओं से नहीं, बल्कि सांस्कृतिक मूल्यों और सामुदायिक सहमति से भी संभव है।

दरअसल, इन उपवनों की सबसे बड़ी विशेषता यही थी कि उन्होंने जंगल को केवल लकड़ी का स्रोत नहीं माना। उसे पानी, मिट्टी, जैव विविधता और सामुदायिक जीवन के आधार के रूप में देखा। आधुनिक भाषा में कहें तो ये क्षेत्र सदियों पुराने नेचर-बेस्ड सॉल्यूशन्स थे, जिन्होंने बिना किसी औपचारिक पर्यावरण नीति के स्थानीय पारिस्थितिकी की रक्षा की।

पवित्र उपवनों और पारंपरिक जल संरचनाओं की एक और महत्वपूर्ण विशेषता थी। वे केवल मनुष्यों के लिए पानी उपलब्ध नहीं कराते थे, बल्कि असंख्य जीव-जंतुओं और वनस्पतियों को भी जीवन देते थे। यही कारण है कि जल संरक्षण और जैव विविधता संरक्षण को अलग-अलग नहीं देखा जा सकता।

reserve forest
reserve forest

जल संरचनाएं और जैव विविधता

आज जब किसी तालाब, झील या जलाशय की चर्चा होती है तो अक्सर उसका मूल्यांकन इस आधार पर किया जाता है कि वह कितने लोगों को पानी उपलब्ध करा सकता है। लेकिन पारंपरिक समाज जल स्रोतों को केवल जल भंडारण की संरचना के रूप में नहीं देखता था। वे एक पूरे जीवित पारिस्थितिकी तंत्र का हिस्सा थे।

गांवों के तालाबों में केवल पानी नहीं होता था। वहां मछलियां, मेंढक, कछुए, जलीय कीट, घोंघे और अनेक प्रकार के सूक्ष्म जीव रहते थे। तालाबों के किनारे उगने वाली घास, झाड़ियां और पेड़ अनेक पक्षियों के लिए आश्रय स्थल का काम करते थे। गर्मियों में जब आसपास के छोटे जल स्रोत सूख जाते थे, तब यही तालाब अनेक जीवों के लिए जीवनरेखा बन जाते थे।

कई पारंपरिक तालाबों और आर्द्रभूमियों में आज भी सैकड़ों प्रजातियों के पक्षी, उभयचर और जलीय जीव पाए जाते हैं, जो स्थानीय खाद्य श्रृंखला और पारिस्थितिकी तंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।

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राजस्थान के जोहड़, मध्य भारत के तालाब, बिहार के आहर और उत्तराखंड के नौले भी केवल जल संरचनाएं नहीं थे। वे स्थानीय जैव विविधता को बनाए रखने वाले सूक्ष्म पारिस्थितिकी तंत्र थे। इनके आसपास की मिट्टी में नमी बनी रहती थी, जिससे अनेक वनस्पतियां और जीव-जंतु फलते-फूलते थे।

पक्षियों के प्रवास में भी इन जल स्रोतों की महत्वपूर्ण भूमिका होती थी। अनेक स्थानीय और प्रवासी पक्षी ऐसे जल निकायों पर निर्भर रहते हैं। यही कारण है कि जब किसी तालाब या जल स्रोत का क्षरण होता है तो उसका असर केवल पानी की उपलब्धता पर नहीं, बल्कि पूरे पारिस्थितिकी तंत्र पर पड़ता है।

दिलचस्प बात यह है कि पारंपरिक समाज ने इस संबंध को वैज्ञानिक भाषा में नहीं, बल्कि अपने अनुभवों के माध्यम से समझा था। इसलिए जल स्रोतों को जीवित इकाई की तरह देखा जाता था। कई स्थानों पर तालाबों और कुओं से जुड़े लोकगीत, पर्व और अनुष्ठान भी इसी भाव को व्यक्त करते हैं कि पानी केवल मनुष्यों का नहीं, बल्कि समस्त जीव-जगत का साझा संसाधन है।

आज विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर जब जैव विविधता संरक्षण की बात की जाती है, तब यह याद रखना आवश्यक है कि भारत की पारंपरिक जल प्रणालियां जल संरक्षण और जैव विविधता संरक्षण को एक-दूसरे से अलग नहीं मानती थीं। उनके लिए पानी बचाना, जीवन बचाना था।

<div class="paragraphs"><p>दिल्ली के शहरी वेटलैंड्स पर हुए विभिन्न <a href="https://www.indiawaterportal.org/environment/ecology/fast-disappearing-urban-wetlands-delhi">अध्ययनों</a> से संकेत मिलता है कि जल निकायों की समस्या केवल उनके सिकुड़ते जलक्षेत्र तक सीमित नहीं है। </p></div>

दिल्ली के शहरी वेटलैंड्स पर हुए विभिन्न अध्ययनों से संकेत मिलता है कि जल निकायों की समस्या केवल उनके सिकुड़ते जलक्षेत्र तक सीमित नहीं है।

चित्र: डॉ कुमारी रोहिणी

हमने क्या खोया?

पिछली एक सदी में भारत के जल परिदृश्य में बड़े बदलाव आए हैं। नलकूपों, पाइपलाइन आधारित जलापूर्ति और बड़े बांधों ने पानी तक पहुंच आसान बनाई, लेकिन इसके साथ पानी से हमारा रिश्ता भी बदल गया।

नीति आयोग की 2018 की समग्र जल प्रबंधन रिपोर्ट ने चेतावनी दी थी कि भारत के कई बड़े शहर भूजल संकट के गंभीर जोखिम का सामना कर रहे हैं। यह संकट केवल पानी की बढ़ती मांग का परिणाम नहीं है, बल्कि उन पारंपरिक प्रणालियों के क्षरण से भी जुड़ा है जो कभी वर्षाजल को जमीन में पहुंचाने का काम करती थीं।

कई शहरों और कस्बों में पुराने तालाब भर दिए गए, बावड़ियां उपेक्षित हो गईं, नौले सूखने लगे और जलग्रहण क्षेत्र सिकुड़ते चले गए। पानी अब समुदाय के साझा संसाधन के बजाय एक सेवा में बदलता गया, जो किसी नल, टैंकर या बोतल के माध्यम से उपलब्ध हो जाती है।

पानी तक पहुंच आसान हुई, लेकिन पानी के स्रोतों से हमारा रिश्ता दूर होता गया। कभी जिन तालाबों और कुओं की सफाई पूरे समुदाय का साझा दायित्व थी, वे धीरे-धीरे प्रशासन या किसी विभाग की जिम्मेदारी बन गए। परिणामस्वरूप जल संरक्षण केवल तकनीकी विषय बनकर रह गया, जबकि उसका सामाजिक और सांस्कृतिक पक्ष कमजोर पड़ता गया।

कई भारतीय शहरों में झीलों, तालाबों और प्राकृतिक जल निकासी मार्गों पर हुए अतिक्रमण के नतीजे अब साफ दिखाई देने लगे हैं। बेंगलुरु में झीलों का सिकुड़ना, चेन्नई और दिल्ली में जल निकासी मार्गों पर अतिक्रमण और बढ़ता शहरी तापमान वर्तमान की गंभीर समस्याएं हैं। ये सारे बदलाव इस बात की याद दिलाते हैं कि जल निकाय केवल सौंदर्य का विषय नहीं, बल्कि शहरों की पारिस्थितिक सुरक्षा का आधार भी हैं।

पैसा कमाने की होड़ में प्राकृतिक संसाधनों को बेचने का सिसिलसिला देश के अलग-अलग कोने में जारी है।

दरअसल, जिन संरचनाओं को कभी शहरों के विकास में बाधा समझकर पाट दिया गया था, वही संरचनाएँ आज शहरी बाढ़, भूजल पुनर्भरण और तापमान नियंत्रण के समाधान के रूप में फिर से चर्चा में हैं।

इस परिवर्तन ने केवल जल संरचनाओं को नहीं, बल्कि उन सामाजिक व्यवस्थाओं को भी कमजोर किया जो कभी जल स्रोतों की रक्षा करती थीं। परिणामस्वरूप पानी को समझने और उसकी रक्षा करने का स्थानीय ज्ञान भी धीरे-धीरे कमजोर पड़ता गया।

पानी, मिट्टी और समुदाय का रिश्ता

विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर पर्यावरण संरक्षण की चर्चा अक्सर वृक्षारोपण तक सीमित रह जाती है। पेड़ निस्संदेह महत्वपूर्ण हैं, लेकिन पर्यावरण केवल पेड़ों से नहीं बनता। मिट्टी, पानी, जैव विविधता और स्थानीय समुदायों का रिश्ता भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

भारत की पारंपरिक जल प्रणालियां हमें यही सिखाती हैं कि पर्यावरण संरक्षण का अर्थ केवल प्रकृति को बचाना नहीं, बल्कि उसके साथ तालमेल बिठाकर जीवन की ऐसी व्यवस्था बनाना है जिसमें मनुष्य और प्रकृति दोनों साथ रह सकें।

अतीत से भविष्य की ओर

जलवायु परिवर्तन के इस दौर में अक्सर यह कहा जाता है कि हमें नए समाधान खोजने होंगे। यह बात सही है, लेकिन उतना ही महत्वपूर्ण यह भी है कि हम उन समाधानों को याद करें जिन्हें हमने पीछे छोड़ दिया है।

कुएं, तालाब, बावड़ियां, जोहड़ और आहर-पइन केवल इतिहास की धरोहर नहीं हैं। वे इस बात के उदाहरण हैं कि किसी समाज ने अपने पर्यावरण को समझते हुए पानी के साथ किस तरह का रिश्ता बनाया था।

शायद विश्व पर्यावरण दिवस का सबसे बड़ा संदेश यही हो सकता है कि भविष्य की स्थायी और जलवायु-अनुकूल दुनिया केवल नई तकनीकों से नहीं बनेगी। वह तब बनेगी जब हम आधुनिक विज्ञान और पारंपरिक ज्ञान के बीच संवाद स्थापित कर पाएंगे।

और उस संवाद में पानी की ये पुरानी संरचनाएं आज भी हमारी सबसे महत्वपूर्ण शिक्षकों में से एक हैं।

जिन्हें आज हम नेचर-बेस्ड सॉल्यूशन्स कहते हैं, उनमें से कई हमारे समाज ने सदियों पहले ही विकसित कर लिए थे। चुनौती केवल उन्हें याद करने की नहीं, बल्कि बदलती जलवायु और बदलते समाज के बीच नए संदर्भों में पुनर्जीवित करने की है। संभव है कि भविष्य की राह पूरी तरह नई न हो; उसके कुछ महत्वपूर्ण सूत्र हमारे अतीत में भी सुरक्षित हों।

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