हाल ही में लंदन में आयोजित समारोह में 2026 के व्हिटली अवार्ड वितरित किए गए। दो भारतीय महिलाओं परवीन शेख और बरखा सुब्बा के अलावा मरीना कामेनी (कैमरून), मोरएंजेल्स म्बिज़ाह (जिम्बाब्वे), पाओला सांगोलकी (इक्वाडोर) और इस्सा सेडू (घाना ) इस बार के विजेताओं में शामिल हैं।

हाल ही में लंदन में आयोजित समारोह में 2026 के व्हिटली अवार्ड वितरित किए गए। दो भारतीय महिलाओं परवीन शेख और बरखा सुब्बा के अलावा मरीना कामेनी (कैमरून), मोरएंजेल्स म्बिज़ाह (जिम्बाब्वे), पाओला सांगोलकी (इक्वाडोर) और इस्सा सेडू (घाना ) इस बार के विजेताओं में शामिल हैं।

स्रोत : फेसबुक

भारत की दो बेटियों को मिला "ग्रीन ऑस्कर" कहा जाने वाला व्हिटली अवार्ड

नदी में रहने वाले लुप्‍तप्राय पक्षी स्किमर के सरंक्षण के लिए परवीन शेख और दुर्लभ हिमालयी सेलेमेंडर के अध्‍ययन के लिए बरखा सुब्बा को मिला अंतरराष्‍ट्रीय सम्‍मान, 2026 का गोल्डमैन पर्यावरण पुरस्कार भी छह महिलाओं को मिला
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भारत की दो बेटियों ने इस वर्ष "ग्रीन ऑस्कर" कहे जाने वाले प्रतिष्ठित व्हिटली पुरस्कार को प्राप्‍त कर देश का नाम रोशन किया है। नदियों के इर्द-गिदै जीवन बिताने वाले भारतीय स्किमर पक्षी का अध्ययन और उनके संरक्षण के लिए काम करने वाली परवीन शेख के अलावा हिमालयी सेलेमेंडर नाम के दुर्लभ उभयचर पर रिसर्च और उनके संरक्षण के उपायों के लिए बरखा सुब्बा को यह पुरस्‍कार दिया गया है। हाल ही में लंदन में रॉयल ज्योग्राफिकल सोसाइटी की ओर से आयोजित एक समारोह में उन्‍हें व्हिटली पुरस्कारों की संरक्षक, यूनाइटेड किंगडम की राजकुमारी ऐनी के हाथों यह पुरस्कार दिया गया। 

दोनों भारतीय महिलाओं सहित इस साल कुछ छह पर्यावरण कार्यकर्ताओं व संरक्षणवादियों को व्हिटली पुरस्कार दिया गया है। इसके अन्‍य विजेता हैं मरीना कामेनी (कैमरून), मोरएंजेल्स म्बिज़ाह (जिम्बाब्वे), पाओला सांगोलकी (इक्वाडोर) और घाना की इस्सा सेडू।

मरीना कामेनी को दक्षिण-पश्चिम कैमरून में स्थानिक उभयचर आबादी के संरक्षण के लिए उनके कामों के लिए पुरस्‍कृत किया गया है, जबकि मोरएंजेल्स म्बिज़ाह को उत्तरी जिम्बाब्वे में संरक्षित क्षेत्रों और सामुदायिक भूमि के बीच शेरों की आवाजाही और संरक्षण के लिए एक सह-अस्तित्व वाले मॉडल के विकास एवं विस्तार के लिए पुरस्‍कार मिला है। 

पाओला सांगोलकी को गंभीर रूप से लुप्तप्राय गैलापागोस पेट्रेल के घोंसले बनाने के स्थलों को आक्रामक प्रजातियों से बचाने के लिए और इस्सा सेडू को घाना के पश्चिमी तटरेखा के साथ गिटारफिश के संरक्षण के कार्यों और देश में अपनी तरह का पहला स्थानीय रूप से प्रबंधित समुद्री क्षेत्र बनाने की योजनाओं को आगे बढ़ाने के लिए यह अवार्ड दिया गया है। 

क्‍या है व्हिटली पुरस्कार?

व्हिटली अवार्ड (Whitley Awards) व्हिटली फंड फॉर नेचर ( Whitley Fund for Nature) द्वारा दिया जाने वाला एक सालाना पुरस्‍कार है। इसे दुनिया के सबसे प्रतिष्ठित प्रकृति एवं पर्यावरण संरक्षण सम्मानों में माना जाता है। इसीलिए इसे अकसर ग्रीन ऑस्‍कर (Green Oscar) भी कहा जाता है। इस अंतरराष्‍ट्रीय पुरस्‍कार की शुरुआत वर्ष 1993 में हुई थी। यह पुरस्कार उन संरक्षणवादियों, वैज्ञानिकों और सामाजिक कार्यकर्ताओं को दिया जाता है, जो अपने-अपने देशों में जैव विविधता संरक्षण, वन्यजीव सुरक्षा, जलवायु परिवर्तन, समुदाय आधारित संरक्षण और प्राकृतिक संसाधनों की देखरेख के लिए जमीनी स्तर पर महत्‍वपूर्ण काम कर रहे हैं।

इसे “ग्रीन ऑस्कर” कहे जाने की वजह यह है कि इस पुरस्‍कार के जरिये यह केवल किसी विचार या शोध को नहीं, बल्कि धरातल पर दिखाई देने वाले प्रभावी संरक्षण कार्यों को अंतरराष्‍ट्रीय स्‍तर पर मान्‍यता प्रदान करते हुए सम्मानित किया जाता है। इस पुरस्कार के तहत विजेताओं को एक वर्ष के लिए 50,000 पाउंड (लगभग 50 लाख रुपये से अधिक) की आर्थिक सहायता प्रदान की जाती है, ताकि वे अपने संरक्षण अभियानों और परियोजनाओं को और व्यापक स्तर पर आगे बढ़ा सकें। इस धनराशि के अलावा आवश्‍यकता होने पर विजेताओं को प्रशिक्षण और लघु फिल्मों सहित प्रचार-प्रसार के अवसर प्रदान किए जाते हैं।

इसके अलावा विजेताओं को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रशिक्षण, मीडिया कवरेज, नेटवर्किंग और लघु डॉक्यूमेंट्री फिल्मों के माध्यम से प्रचार-प्रसार का अवसर भी मिलता है। कई बार इस सम्मान को प्राप्त करने वाले संरक्षणकर्मी बाद में वैश्विक पर्यावरण नीतियों और संरक्षण अभियानों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। यह पुरस्कार विशेष रूप से स्थानीय समुदायों को संरक्षण कार्यों से जोड़ने और प्रकृति संरक्षण के व्यावहारिक मॉडल विकसित करने पर जोर देता है।

जानिए परवीन शेख और उनके काम को

बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी की वैज्ञानिक परवीन शेख एक दुर्लभ नदी पक्षी भारतीय स्किमर की संरक्षक हैं। उन्‍होंने स्थानीय लोगों को अपनी संरक्षक गतिविधियों में शामिल व प्रशिक्षित कर तेजी से लुप्‍त हो रहे भारतीय स्किमर पक्षियों को बचाने का काम बड़े ही प्रभावशाली ढंग से किया है। ज़मीनी स्‍तर पर किए गए इस मेहनत भरे और महत्‍वपूर्ण काम के लिए ही उन्‍हें यह पुरस्कार प्रदान किया गया है।

परवीन शेख चंबल नदी पर सामुदायिक नेतृत्व वाली 'गार्जियंस ऑफ द स्किमर' पहल के माध्यम से भारतीय स्किमर के संरक्षण के लिए काम कर रही हैं। परवीन एक ‘गार्जियन’ मॉडल का उपयोग करती हैं। इसके तहत वह स्थानीय समुदाय के सदस्यों को घोंसलों की निगरानी करने, घुसपैठियों से रेत के टीलों की रक्षा करने और महत्त्वपूर्ण प्रजनन सीजन (मार्च से जून) के दौरान पानी छोड़े जाने के प्रबंधन के लिये अधिकारियों के साथ मिलकर कार्य करने हेतु प्रशिक्षित करती हैं। 

इनके प्रयासों के तहत स्थानीय 'घोंसला संरक्षकों' की भर्ती और निरंतर वैज्ञानिक निगरानी के माध्यम से, घोंसलों के जीवित रहने की दर 14% से बढ़कर 27% हो गई है, और स्थानीय आबादी 2017 में 400 से बढ़कर 2025 में लगभग 1,000 हो गई है। शेख की टीम ने चंबल नदी के किनारे 30 से अधिक घोंसला संरक्षकों को प्रशिक्षित और मार्गदर्शन दिया है ताकि आवारा कुत्तों और सियार जैसे शिकारियों के साथ-साथ मवेशियों द्वारा रौंदे जाने के खतरे से जूझ रहे पक्षियों के घोंसलों की रक्षा की जा सके।  

इसी कार्य के लिए उन्हें इस वर्ष व्हिटली पुरस्कार से सम्मानित किया गया। एक रिपोर्ट के अनुसार, इस पुरस्कार के साथ, शेख चंबल में इस प्रजाति के संरक्षण को मजबूत करेंगी और गंगा बेसिन में उत्तर प्रदेश के प्रयागराज तक सामुदायिक नेतृत्व वाले नदी पक्षी संरक्षण मॉडल का विस्तार करेंगी। शेख और उनकी टीम चंबल और प्रयागराज दोनों जगहों पर स्थानीय घोंसला संरक्षकों को नियुक्त करेगी और उन्हें प्रोत्साहन देगी, ताकि वे स्किमर पक्षियों के घोंसलों और उनके विकास की निरंतर निगरानी कर सकें। वे नदी के संवेदनशील हिस्सों में शिकारियों से बचाव के लिए बाड़ लगाएंगे। चंबल में वे कृत्रिम घोंसला बनाने के चबूतरों पर भी प्रयोग करेंगे।

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विलुप्‍त होने के कगार पर पहुंच चुके नदियों के आसपास रहने वाले इंडियन स्किमर पक्षी के संरक्षण के लिए परवीन शेख को "ग्रीन ऑस्कर" कहा जाने वाला व्हिटली अवार्ड दिया गया है।

स्रोत : विकी कॉमंस

नदियों का परिंदा इंडियन स्किमर 

इंडियन स्किमर एक नदी में रहने वाला पक्षी है जिसकी चोंच कैंची जैसी होती है, जिसके कारण इसे इंडियन सिज़र-बिल भी कहा जाता है। यह पक्षी मछलियों को पकड़ने के लिए नदी की सतह पर तैरते हैं, जो इनका मुख्य भोजन है। कभी दक्षिण-पूर्व एशिया में व्यापक रूप से पाए जाने वाले इस पक्षी के प्राकृतिक आवास का तेजी से क्षरण होने के कारण यह अपने अधिकांश ऐतिहासिक क्षेत्रों से विलुप्त हो चुका है। इसका मुख्य कारण बढ़ता शहरीकरण, प्रदूषण, रेत खनन और जलविद्युत परियोजनाओं द्वारा नदियों पर बांध बनाना है। 

यह पक्षी अब बहुत सीमित संख्‍या में केवल भारत और बांग्लादेश में ही पाया जाता है, और नेपाल और पाकिस्तान से इसके कुछ ही रिकॉर्ड मिले हैं। भारत में इसकी लगभग 3,000 की वैश्विक आबादी का 90% से अधिक हिस्सा निवास करता है। स्किमर मौसमी मध्य-नदी द्वीपों, जिन्हें रेत के टीले कहा जाता है, पर घोंसला बनाते हैं। इसलिए नदी के प्रवाह में मामूली बदलाव भी इनके घोंसलों को नष्ट कर सकता है और जल प्रदूषण का भी गंभीर प्रभाव इनके जीवन व प्रजनन पर पड़ रहा है।

बरखा सुब्बा और सेलेमेंडर के लिए उनका काम

बरखा सुब्बा स्थानीय गैर सरकारी संगठन फेडरेशन ऑफ सोसाइटीज फॉर एनवायरनमेंटल प्रोटेक्शन के साथ वैज्ञानिक सलाहकार के रूप में जुड़ी हुई हैं। वह पश्चिम बंगाल में दार्जिलिंग के हिमालयी इलाकों में पानी और ज़मीन दोनों जगह रहने वाले जीव सेलेमेंडर का अध्ययन कर रही हैं। 

अपने व्हिटली पुरस्कार के माध्यम से, सुब्बा सेलेमेंडर के आवास को पुनर्स्थापित करेंगी, आक्रामक प्रजातियों को हटाएंगी, घातक चिट्रिड कवक रोग (जिसने विश्व स्तर पर उभयचरों के बड़े पैमाने पर विलुप्त होने का कारण बना है) की जांच करेंगी, साथ ही स्थानीय लोगों को सतत भूमि उपयोग और पर्यावरण के अनुकूल पर्यटन को बढ़ावा देने वाले जागरूकता कार्यक्रमों में शामिल करेंगी। उनका कार्य, जिसमें स्थानीय समुदायों, चाय बागान प्रबंधकों और सरकारी एजेंसियों के साथ साझेदारी को मजबूत करना शामिल होगा, क्षेत्र के सात सबसे महत्वपूर्ण प्रजनन स्थलों पर केंद्रित होगा, जिनमें सरकारी भूमि, निजी स्वामित्व वाले चाय बागान और सामुदायिक स्वामित्व वाली भूमि शामिल हैं।

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भारत में हिमालयी क्षेत्र की आर्द्रभूमि में पाया जाने वाला हिमालयी सेलेमेंडर, जिसके संरक्षण के लिए भारत की बरखा सुब्बा को व्हिटली अवार्ड मिला है। 

स्रोत : नेचुरलिस्‍ट

छिपकली जैसा उभयचर सेलेमेंडर 

सेलेमेंडर को न्यूट्स भी कहा जाता है। दिखने में छिपकली जैसा लगने के बावजूद सेलेमेंडर मेंढकों और टोडों के करीबी रिश्‍तेदार होते हैं। ये अंगों को पुनर्जीवित करने की अपनी क्षमता के लिए सबसे अधिक जाने जाते हैं।  हिमालयी सेलेमेंडर केवल भारत, नेपाल और भूटान में पाया जाता है और इसकी लंबाई 17 सेंटीमीटर तक हो सकती है और यह 11 वर्ष तक जीवित रह सकता है।  यह प्रजाति कभी दार्जिलिंग के ठंडे, छायादार आर्द्रभूमि और वन क्षेत्रों में व्यापक रूप से फैली हुई थी। हालांकि, सेलेमेंडर के लिए मुख्य खतरे आर्द्रभूमि का क्षरण, अनियंत्रित पर्यटन और चाय बागानों के भूमि विविधीकरण हैं, जो न केवल आवास को बदलते हैं बल्कि प्रजनन क्षेत्रों को भी संकुचित करते हैं। दार्जिलिंग हिमालय में, केवल लगभग 30 प्रजनन स्थल ही बचे हैं। इनमें से कई स्थल संरक्षित क्षेत्रों के बाहर स्थित हैं।

इन भारतीयों को मिल चुका है व्हिटली पुरस्कार

परवीन शेख और बरखा सुब्बा के अलावा कुछ और भारतीय पर्यावरण संरक्षणवादियों को अतीत में व्हिटली पुरस्कार मिल चुका है। इनमें 2017 में पुरस्‍कार पाने वाले संजय गुब्बी और पूर्णिमा बर्मन शामिल हैं , जिन्होंने असम में ग्रेटर एडजुटेंट सारस पर अपने काम के लिए 2024 में व्हिटली गोल्ड पुरस्कार जीता था।

<div class="paragraphs"><p>2026 का गोल्डमैन पर्यावरण पुरस्कार पाने वाली छह महिलाएं। इनमें&nbsp;सारा फिंच,&nbsp;इरोरो तानशी,&nbsp;बोरिम किम,&nbsp;थियोनिला रोका मटबोब,&nbsp;अलाना अकाक हर्ली और&nbsp;युवेलिस मोरालेस ब्लैंको शामिल हैं।&nbsp;</p></div>

2026 का गोल्डमैन पर्यावरण पुरस्कार पाने वाली छह महिलाएं। इनमें सारा फिंच, इरोरो तानशी, बोरिम किम, थियोनिला रोका मटबोब, अलाना अकाक हर्ली और युवेलिस मोरालेस ब्लैंको शामिल हैं। 

स्रोत : गोल्डमैन वेबसाइट

2026 का गोल्डमैन पर्यावरण पुरस्कार छह महिलाओं को

पर्यावरण की दुनिया के सबसे बड़े पुरस्‍कारों में शुमार ‘गोल्डमैन अवार्ड' इस बार छह महिलाओं को दिया गया है। 'ग्रीन नोबेल' के नाम से मशहूर इस प्रतिष्ठित पुरस्कार के तहत 2026 में दुनिया के छह अलग-अलग महाद्वीपों पर पर्यावरण के लिए जमीनी स्तर पर काम करने वाली छह महिला पर्यावरण कार्यकर्ताओं को सम्मानित किया गया है। यह उपलब्धि वैश्विक पर्यावरण नेतृत्व में महिलाओं की बढ़ती भूमिका को दर्शाती है। 

इन महिलाओं को जलवायु न्याय, जैव विविधता संरक्षण, आदिवासी अधिकारों और खनन विरोधी आंदोलनों में उनके उल्लेखनीय योगदान के लिए चुना गया है। यह पुरस्कार केवल व्यक्तिगत सम्मान नहीं है, बल्कि यह इस बात का प्रतीक भी है कि पर्यावरण संरक्षण की सबसे मजबूत लड़ाइयां अकसर घर-परिवार व स्थानीय समुदायों के स्तर से शुरू होती हैं। वर्ष 2026 के गोल्डमैन पुरस्‍कार के लिए छह महिलाओं का यह चयन इस संदेश को और अधिक मजबूत करता है।

क्या है गोल्डमैन पर्यावरण पुरस्कार

गोल्डमैन पर्यावरण पुरस्कार की स्थापना वर्ष 1989 में यह प्रतिष्ठित पुरस्कार 1989 में परोपकारी रिचर्ड और रोड्डा गोल्डमैन द्वारा स्थापित Goldman Environmental Foundation द्वारा की गई थी। इसे अकसर “ग्रीन नोबेल पुरस्कार (Green Nobel Prize) कहा जाता है, क्योंकि यह पुरस्‍कार जमीनी स्तर पर पर्यावरण संरक्षण के लिए दुनियाभर में सबसे महत्‍वपूर्ण कार्य करने वाले कार्यकर्ताओं को दिया जाता है।  इसका उद्देश्य उन लोगों को पहचान देना है, जो पर्यावरण विनाश के खिलाफ स्थानीय स्तर पर जोखिम उठाकर संघर्ष करते हैं और जनजागरूकता बढ़ाते हैं। हर वर्ष यह पुरस्कार छह महाद्वीपीय क्षेत्रों अफ्रीका, एशिया, यूरोप, उत्तर अमेरिका, दक्षिण अमेरिका और द्वीपीय देशों से एक-एक पर्यावरण कार्यकर्ता को दिया जाता है।

कौन हैं 2026 के विजेता ?

इस वर्ष के छह विजेता विभिन्न क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व करते हैं और सभी महिलाएं हैं। 2026 के गोल्डमैन पर्यावरण पुरस्कार के विजेताओं के नाम इस प्रकार हैं- 

  1. सारा फिंच (United Kingdom) : वील्ड एक्शन ग्रुप के साथ जीवाश्म ईंधन परियोजनाओं के खिलाफ ऐतिहासिक कानूनी जीत।

  2. इरोरो तानशी (Nigeria) : समुदाय-आधारित वर्षावन और चमगादड़ संरक्षण।

  3. बोरिम किम (South Korea) : Youth 4 Climate Action के माध्यम से जलवायु कार्रवाई की वकालत।

  4. थियोनिला रोका मटबोब (Papua New Guinea) : रियो टिंटो खनन कंपनी के खिलाफ समुदायों का नेतृत्व।

  5. अलाना अकाक हर्ली (United States) : स्वदेशी अधिकारों और अलास्का में खनन के खिलाफ लड़ाई।

  6. युवेलिस मोरालेस ब्लैंको (Colombia) : मैग्डालेना नदी को फ्रैकिंग (fracking) से बचाने वाली युवा कार्यकर्ता। 

इनमें सबसे मशहूर ना यूनाइटेड किंगडम की साशा फिंच का है, जो जीवाश्म ईंधन विस्तार के खिलाफ अपने अभियानों और नए तेल ड्रिलिंग प्रोजेक्ट्स के विरोध के लिए दुनिया भर में जानी जाती हैं। अन्य विजेताओं ने वन संरक्षण, नदियों और जल स्रोतों की रक्षा, खनन विरोधी आंदोलनों और आदिवासी समुदायों को भूमि शोषण से बचाने के लिए महत्वपूर्ण कार्य किए हैं। इनका काम यह दर्शाता है कि स्थानीय स्तर पर उठाए गए कदम वैश्विक पर्यावरण नीति को भी प्रभावित कर सकते हैं।

क्यों ऐतिहासिक है इस वर्ष का पुरस्‍कार ?

गोल्डमैन पर्यावरण पुरस्कार की शुरुआत से अब तक पहली बार ऐसा हुआ है कि सभी विजेता महिलाएं हैं। वर्ष 2026 की पूरी महिला विजेता सूची एक विशेष संदेश देती है कि जलवायु कार्रवाई, सतत विकास और पर्यावरण न्याय के क्षेत्र में महिलाओं का नेतृत्व अब वैश्विक स्तर पर और अधिक मजबूत हो रहा है। यह महिलाओं की भूमिका को केवल भागीदारी तक सीमित नहीं, बल्कि नेतृत्व के रूप में स्थापित करता है। Goldman Environmental Foundation के अनुसार अब तक 98 देशों के 239 विजेताओं को यह सम्मान दिया जा चुका है, जिनमें 112 महिलाएं शामिल रही हैं।

इन भारतीयों को मिल चुका है गोल्‍डमैन पुरस्‍कार

बीते वर्षों में कई भारतीयों को प्रतिष्ठित गोल्डमैन पर्यावरण पुरस्कार मिल चुका है। हाल ही में, छत्तीसगढ़ के पर्यावरण कार्यकर्ता आलोक शुक्ला को हसदेव अरण्य के जंगलों को कोयला खदानों से बचाने के लिए 2024 का यह पुरस्कार दिया गया है। गोल्डमैन पर्यावरण पुरस्कार प्राप्‍त करने वाले प्रमुख भारतीय विजेताओं के नाम इस प्रकार हैं :

  1. आलोक शुक्ला (2024) : छत्तीसगढ़ में 21 नियोजित कोयला खदानों से 445,000 एकड़ जैव विविधता से समृद्ध जंगलों को बचाने के लिए।

  2. प्रफुल्ल सामंतरा (2017) : ओडिशा में नियमगिरि पहाड़ियों को खनन से बचाने के लिए 12 साल तक कानूनी लड़ाई लड़ने के लिए।

  3. रमेश अग्रवाल (2014) : छत्तीसगढ़ में बड़े पैमाने पर कोयला खनन के खिलाफ निवासियों को लामबंद करने के लिए।

  4. एम.सी. मेहता (1996) : भारत में प्रदूषण और पर्यावरण संरक्षण के लिए कानूनी लड़ाई लड़ने के लिए।

  5. मेधा पाटकर (1992) : नर्मदा बचाओ आंदोलन के लिए।

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