गर्मी के मौसम में भारत के कई इलाकों में जल संकट इतना गंभीर हो जाता है कि महिलाओं को पानी लेने के लिए कई किलोमीटर दूर जाना पड़ता है।
स्रोत : विकी कॉमंस
भारत में पानी का भविष्य : क्या हम ‘वाटर बैंकक्रप्सी’ की ओर बढ़ रहे हैं?
पानी का संकट दुनिया भर में अब भविष्य का मुद्दा नहीं, बल्कि वर्तमान की की समस्या और सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक बन चुका है। भारत जैसे देश के लिए तो यह और भी महत्वपूर्ण विषय है, जहां तेजी से बढ़ती आबादी, जलवायु परिवर्तन, भूजल का अत्यधिक दोहन और जल प्रबंधन की खामियां मिलकर ऐसे हालात पैदा कर रही हैं जिससे आने वाले दिनों में “वॉटर बैंकक्रप्सी” यानी इस्तेमाल योग्य पानी खत्म होने की स्थिति पैदा होने की आशंकका बढ़ती जा रही है। संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट इस बात पर जोर देती है कि जल संसाधनों का उपयोग प्राकृतिक पुनर्भरण (रीचार्ज) की सीमा से ज्यादा हो गया तो “हाइड्रोलॉजिकल ओवरशूट” की स्थिति बन जाएगी, जो “वॉटर बैंकक्रप्सी” की नौबत ला सकती है। अंतरराष्ट्रीय जल दिवस यानी International Water Day के मौके पर यह सवाल और महत्वपूर्ण हो जाता है कि क्या भारत भी इसी ओर बढ़ रहा है? आंकड़े बताते हैं कि देश में जल उपलब्धता घट रही है, मांग तेजी से बढ़ रही है। इससे देश के कई क्षेत्रों में डे-जीरो (Day Zero) जैसी स्थिति की आशंका व्यक्त की जा रही है। जोकि एक ऐसी स्थिति होती है, जब किसी शहर या क्षेत्र में जल स्रोत इतने कम हो जाते हैं कि सरकार को पाइपलाइन से नियमित पानी की आपूर्ति बंद या बेहद सीमित करनी पड़ती है और लोगों को तय मात्रा में सार्वजनिक वितरण केंद्रों या टैंकरों से पानी लेना पड़ता है।
क्या होती है ‘वाटर बैंकक्रप्सी’ ?
“वाटर बैंकक्रप्सी” या जल दिवालियापन कोई कानूनी शब्द नहीं, बल्कि जल प्रबंधन और पर्यावरण विज्ञान में इस्तेमाल होने वाली एक विश्लेषणात्मक अवधारणा है। इसका अर्थ उस स्थिति से है जब किसी क्षेत्र या देश की जल मांग उसकी प्राकृतिक और प्रबंधित जल आपूर्ति क्षमता से स्थायी रूप से अधिक हो जाती है। यानी जल संसाधनों का उपयोग उनकी पुनर्भरण क्षमता से तेज गति से होने लगता है।
संयुक्त राष्ट्र से जुड़े प्लेटफॉर्म UN-Water के अनुसार जब किसी क्षेत्र में भूजल स्तर लगातार गिरता रहे, नदियों का प्रवाह घटने लगे और जलाशय पर्याप्त भंडारण न कर पाएं, तो यह “हाइड्रोलॉजिकल ओवरड्राफ्ट” की स्थिति कहलाती है। लंबे समय तक यही स्थिति बनी रहे तो उसे “वाटर बैंकक्रप्सी” माना जाता है।
इसका सबसे बड़ा असर खाद्य सुरक्षा, ऊर्जा उत्पादन और शहरी जल आपूर्ति पर पड़ता है। उदाहरण के लिए, यदि किसी क्षेत्र में सिंचाई के लिए अत्यधिक भूजल निकाला जाए और मानसून कमजोर रहे, तो अगले वर्षों में खेती के लिए पर्याप्त पानी उपलब्ध न होने के कारण कृषि उत्पादन घट सकता है। दूसरी ओर, ऐसी स्थिति में शहरों में जल आपूर्ति बाधित होने से उद्योग, स्वास्थ्य सेवाएं और दैनिक जीवन प्रभावित होता है। विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं कि “वाटर बैंकक्रप्सी” अचानक नहीं आती, बल्कि दशकों तक गलत नीतियों, जल अपव्यय और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों के एक साथ मिल जाने से यह स्थिति बनती है।
क्या भारत ‘वॉटर बैंकक्रप्सी’ के करीब है?
भारत में “वॉटर बैंकक्रप्सी” यानी जल दिवालियापन का खतरा एक उभरती हुई चिंता के रूप में देखा जा रहा है। यूएन से जुड़े विश्लेषणों में यह बात सामने आई है कि भारत जैसे देश में यह जोखिम इसलिए अधिक है क्योंकि यहां जनसंख्या दबाव, जल प्रबंधन की खामियां और जलवायु परिवर्तन तीनों एक साथ काम कर रहे हैं। संयुक्त राष्ट्र (UN) की विश्व जल विकास रिपोर्ट (WWDR) 2025 चेतावनी देती है कि यदि जल उपयोग दक्षता, पुनर्चक्रण (रीसाइकिल), पुनर्भरण (रीचार्ज) और संरक्षण पर तत्काल ध्यान नहीं दिया गया, तो आने वाले दशकों में जल संकट राष्ट्रीय सुरक्षा और विकास की बड़ी चुनौती बन सकता है। भारत में तेजी से बढ़ती आबादी, भूजल पर अत्यधिक निर्भरता, जलवायु परिवर्तन से प्रभावित मानसून और असंतुलित शहरीकरण इस जोखिम को बढ़ाते हैं।
रिपोर्ट यह भी रेखांकित करती है कि जलवायु परिवर्तन के कारण वर्षा के पैटर्न में अनिश्चितता बढ़ रही है। कहीं अत्यधिक वर्षा से बाढ़, तो कहीं लंबे सूखे की स्थिति बन रही है। इससे जल संचयन और प्रबंधन की चुनौतियां और बढ़ जाती हैं। मानसून पर अत्यधिक निर्भर भारत के लिए यह जोखिम विशेष रूप से गंभीर है, क्योंकि असंतुलित वर्षा वितरण के कारण कई बार कुल वर्षा सामान्य रहने के बावजूद जल संकट की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। इस कारण कई क्षेत्रों में भूजल स्तर गिर रहा है और जल स्रोतों का प्रदूषण प्रभावी जल उपलब्धता को और कम कर रहा है। यदि जल उपयोग दक्षता बढ़ाने, अपशिष्ट जल पुनर्चक्रण, वर्षा जल संचयन और पारंपरिक जल संरचनाओं के पुनर्जीवन जैसे उपायों को बड़े पैमाने पर लागू नहीं किया गया, तो आने वाले दशकों में जल संकट खाद्य सुरक्षा, आर्थिक विकास और सामाजिक स्थिरता के लिए गंभीर चुनौती बन सकता है। हालांकि समय रहते टिकाऊ जल प्रबंधन अपनाने से इस खतरे को काफी हद तक कम किया जा सकता है।
शहरों की बढ़ती आबादी के चलते अब अकसर देश के महानगरों में भी पानी की किल्लत देखने को मिलती है।
स्रोत : विकी कॉमंस
चिंताजनक हैं भारत के आंकड़े
भारत दुनिया की लगभग 18% आबादी का घर है, लेकिन उसके पास वैश्विक मीठे पानी का केवल लगभग 4% हिस्सा है। इसी कारण भारत को दुनिया के सबसे जल-तनावग्रस्त देशों में गिना जाता है। नीति आयोग की रिपोर्टों के अनुसार, देश में लगभग 60 करोड़ लोग अधिक से अत्यधिक पानी की किल्लत का सामना कर रहे हैं। भारत को दुनिया का सबसे बड़ा भूजल उपयोगकर्ता माना जाता है। देश हर साल लगभग 251 अरब घन मीटर भूजल का उपयोग करता है, जो वैश्विक उपयोग का एक बड़ा हिस्सा है।
शहरी क्षेत्रों में पानी की आपूर्ति का लगभग 45% हिस्सा भूजल से आता है। लेकिन अनियंत्रित दोहन और अनियमित मानसून के कारण कई शहरों के जलभृत तेजी से खाली हो रहे हैं। जल उपलब्धता के आंकड़े चिंताजनक संकेत देते हैं। प्रति व्यक्ति वार्षिक जल उपलब्धता 1700 घन मीटर से कम होने पर देश “वॉटर स्ट्रेस” की श्रेणी में आता है और 1000 घन मीटर से नीचे जाने पर “वॉटर स्केर्सिटी” की स्थिति मानी जाती है। भारत में यह उपलब्धता 2021 में लगभग 1486 घन मीटर थी और 2031 तक इसके 1367 घन मीटर तक गिरने का अनुमान है। भारत में पानी की खपत से जुड़े कुछ प्रमुख तथ्य और आंकड़े इस प्रकार हैं-
घरेलू क्षेत्र हर साल 56 क्यूबिक मीटर पानी की खपत करता है। इसमें से ज़्यादातर खपत शहरी क्षेत्र द्वारा की जाती है।
भारतीय आबादी के बढ़ते शहरीकरण के कारण, अगले 20 वर्षों में इस मांग के 4 गुना बढ़ने का अनुमान है।
लगभग 50 करोड़ शहरी भारतीय हर दिन प्रति व्यक्ति 135 – 196 लीटर पानी की खपत करते हैं।
24 x 7 पानी की आपूर्ति शहरी आबादी के केवल 15 – 20% हिस्से तक ही सीमित है।
घरेलू पानी की आपूर्ति ज़्यादातर मीटर से नहीं मापी जाती और इसके लिए एक तय रकम (lump sum) शुल्क के तौर पर ली जाती है।
ग्रामीण भारतीयों के मामले में, पानी की खपत में काफ़ी अंतर होता है – यह सिर्फ़ गुज़ारे लायक पानी से लेकर, प्रति व्यक्ति हर दिन 80 लीटर से भी कम तक हो सकती है।
उपरोक्त आकलन बताते हैं कि यह स्तर कई क्षेत्रों में 1100 घन मीटर के आसपास पहुंच चुका है, जो जल संकट की दहलीज के बेहद करीब है। इस तरह, हम देखते हैं कि भारत में यदि भूजल पुनर्भरण की गति उपयोग की तुलना में इसी प्रकार धीमी रही, तो कई क्षेत्रों में “डे-जीरो” यानी पाइप से पानी का आना बंद होने जैसी स्थिति पैदा हो सकती है।
कृषि और जल : गहराता जा रहा संकट
भारत में जल उपयोग का सबसे बड़ा हिस्सा कृषि क्षेत्र में इस्तेमाल होता है। यही वजह है कि जब भी जल संकट की चर्चा होती है, तो कृषि क्षेत्र का जिक्र प्रमुखता से आता है। देश में हरित क्रांति के बाद सिंचाई के लिए नहरों के साथ-साथ ट्यूबवेल और बोरवेल पर निर्भरता तेजी से बढ़ी है, जिससे कई राज्यों में भूजल स्तर लगातार गिर रहा है। विशेष रूप से चावल और गन्ना जैसी अधिक पानी मांगने वाली फसलें उन इलाकों में भी उगाई जा रही हैं जहां प्राकृतिक जल उपलब्धता सीमित है। इससे जल संसाधनों पर दबाव और बढ़ जाता है।
अनुमान है कि देश में कुल जल मांग 2025 तक लगभग 1093 अरब घन मीटर और 2050 तक करीब 1447 अरब घन मीटर तक पहुंच सकती है, जबकि उपयोग योग्य जल क्षमता लगभग 1122 अरब घन मीटर के आसपास ही रहने का अनुमान है। यदि यह अंतर लगातार बढ़ता रहा तो सिंचाई, खाद्य उत्पादन और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर गंभीर असर पड़ सकता है तथा “वॉटर बैंकक्रप्सी” जैसी स्थिति की आशंका और मजबूत हो सकती है।
भूजल के अनियंत्रित दोहन से हैंड पम्पों से पानी पीने और भरने के ऐसे नज़ारे दिखना मुश्किल होता जा रहा है।
स्रोत : globalgiving
जलवायु परिवर्तन : जल संकट बढ़ने की एक बड़ी वजह
संयुक्त राष्ट्र से जुड़े प्लेटफॉर्म UN-Water की रिपोर्टों में जलवायु परिवर्तन को वैश्विक जल संकट का सबसे बड़ा “गुणक” यानी संकट को कई गुना बढ़ाने वाला कारक बताया गया है। बढ़ते तापमान के कारण वाष्पीकरण की दर तेज हो रही है, जिससे मिट्टी और जलाशयों में पानी का ठहराव कम होता जा रहा है। इसके साथ ही वर्षा के पैटर्न में अस्थिरता बढ़ रही है। कहीं अत्यधिक बारिश, तो कहीं लंबे समय तक सूखे जैसी स्थिति देखने को मिल रही है।
भारत जैसे मानसून-निर्भर देश में यह चुनौती और गंभीर हो जाती है। कई बार कुल वर्षा सामान्य रहने के बावजूद उसका भौगोलिक और समयगत वितरण असंतुलित होता है, जिससे जल संचयन और पुनर्भरण प्रभावित होता है। परिणामस्वरूप एक ओर अचानक बाढ़ की घटनाएं बढ़ती हैं तो दूसरी ओर गर्मियों में जल स्रोत तेजी से सूखने लगते हैं। इस तरह जलवायु परिवर्तन जल उपलब्धता, कृषि उत्पादन और पेयजल सुरक्षा, तीनों पर एक साथ दबाव बनाता है।
शहरों का जल संकट : कंक्रीट के जंगल और सूखते जल स्रोत
तेजी से बढ़ता शहरीकरण भारत के जल संकट को एक नए आयाम में बदल रहा है। शहरों के विस्तार के साथ झीलों, तालाबों और प्राकृतिक जल निकासी तंत्र पर निर्माण होने से जल संग्रहण और भूजल पुनर्भरण की क्षमता लगातार घट रही है। कई अध्ययनों में सामने आया है कि पिछले दो दशकों में कुछ महानगरों में जल निकायों का क्षेत्रफल कई गुना कम हुआ है, जिसके कारण जल संकट और शहरी बाढ़ दोनों की समस्या एक साथ बढ़ी है।
इसके साथ ही शहरों में पाइपलाइन आधारित आपूर्ति के साथ-साथ टैंकरों और निजी बोरवेलों पर निर्भरता तेजी से बढ़ रही है। इससे न केवल भूजल का अनियंत्रित दोहन होता है, बल्कि पानी तक पहुंच में असमानता भी बढ़ती है, जहां संपन्न वर्ग महंगा पानी खरीद लेता है, वहीं गरीब बस्तियों को सीमित या असुरक्षित जल पर निर्भर रहना पड़ता है। दीर्घकाल में यह स्थिति शहरी जल सुरक्षा और सामाजिक संतुलन दोनों के लिए चुनौती बन सकती है।
जल संकट की वैश्विक स्थिति
संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट यह चेतावनी दे रही है कि पानी अब केवल संसाधन नहीं, बल्कि आर्थिक विकास, खाद्य सुरक्षा, जलवायु कार्रवाई और शांति से जुड़ा एक रणनीतिक तत्व बन चुका है। The United Nations World Water Development Report 2025, Mountains and glaciers: water towers शीर्षक से प्रकाशित इस रिपोर्ट में विशेष रूप से ग्लेशियरों के पिघलने और पर्वतीय जल स्रोतों के घटने को भविष्य के जल संकट का बड़ा कारण बताया गया है, जो विश्व के लगभग 2 अरब लोगों की जल और खाद्य सुरक्षा को प्रभावित कर सकता है।
यूएन रिपोर्ट के अनुसार वैश्विक स्तर पर सुरक्षित पेयजल तक पहुंच अभी भी करोड़ों लोगों के लिए चुनौती है। 2024 के आसपास भी लगभग 2.2 अरब लोग सुरक्षित पेयजल सेवाओं से वंचित रहे, जबकि 3.4 अरब लोगों को सुरक्षित स्वच्छता सुविधाएं नहीं मिल पाईं।
यह संकट केवल विकासशील देशों तक सीमित नहीं है। शहरीकरण, औद्योगिकीकरण और जलवायु परिवर्तन के कारण दुनिया के बड़े शहरों में भी जल संकट बढ़ रहा है। 2050 तक जल संकट झेलने वाली शहरी आबादी लगभग दोगुनी हो सकती है।
दुनिया के सबसे ज़्यादा जल संकट वाले देश
वैश्विक स्तर पर जल संकट की स्थिति का आकलन करने के लिए कई संस्थाएं काम करती हैं। इनमें World Resources Institute का Aqueduct Water Risk Atlas विशेष रूप से उल्लेखनीय है, जो देशों को “अत्यधिक जल तनाव” से लेकर “कम जल तनाव” तक श्रेणियों में वर्गीकृत करता है।
इस आकलन के अनुसार मध्य-पूर्व और उत्तर अफ्रीका क्षेत्र के कई देश दुनिया के सबसे अधिक जल संकटग्रस्त माने जाते हैं। Qatar, Israel, Lebanon, Iran और Jordan जैसे देशों में उपलब्ध जल संसाधनों का 80% से अधिक हिस्सा हर वर्ष उपयोग में ले लिया जाता है, जिससे वहां अत्यधिक जल तनाव की स्थिति बनती है।
दक्षिण एशिया में भी हालात चिंताजनक हैं। Pakistan और भारत दोनों को उच्च जल तनाव वाले देशों की श्रेणी में रखा गया है। हालांकि प्रति व्यक्ति जल उपलब्धता, जनसंख्या दबाव और कृषि निर्भरता जैसे कारकों को देखें तो भारत की चुनौती अधिक जटिल मानी जाती है।
भारत की तुलनात्मक स्थिति
भारत तुलनात्मक रूप से कुछ अफ्रीकी देशों की तुलना में बेहतर स्थिति में है क्योंकि यहां मानसूनी वर्षा, बड़े नदी तंत्र और विविध जल स्रोत उपलब्ध हैं। लेकिन जल प्रबंधन की खामियां, तेजी से बढ़ता शहरीकरण और भूजल पर अत्यधिक निर्भरता इसे तेजी से संकट की ओर धकेल रहे हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि भारत ने जल उपयोग दक्षता बढ़ाने, जल पुनर्चक्रण अपनाने और पारंपरिक जल संरचनाओं के पुनर्जीवन जैसे कदम समय रहते नहीं उठाए तो यह भी उन देशों की श्रेणी में शामिल हो सकता है जहां जल संकट विकास और सामाजिक स्थिरता के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन चुका है।
भारत की तुलनात्मक स्थिति
भारत तुलनात्मक रूप से कुछ अफ्रीकी देशों की तुलना में बेहतर स्थिति में है क्योंकि यहां मानसूनी वर्षा, बड़े नदी तंत्र और विविध जल स्रोत उपलब्ध हैं। लेकिन जल प्रबंधन की खामियां, तेजी से बढ़ता शहरीकरण और भूजल पर अत्यधिक निर्भरता इसे तेजी से संकट की ओर धकेल रहे हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि भारत ने जल उपयोग दक्षता बढ़ाने, जल पुनर्चक्रण अपनाने और पारंपरिक जल संरचनाओं के पुनर्जीवन जैसे कदम समय रहते नहीं उठाए तो यह भी उन देशों की श्रेणी में शामिल हो सकता है जहां जल संकट विकास और सामाजिक स्थिरता के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन चुका है।
देश के ग्रामीण इलाकों में पानी भरने के लिए मटकों की कतार का यह नज़ारा अब आम होता जा रहा है।
स्रोत : विकी कॉमंस
समाधान की राह : क्या किया जा सकता है?
जल संकट का समाधान केवल नए बांध, जलाशय या लंबी पाइपलाइन परियोजनाएं बनाने तक सीमित नहीं है। विशेषज्ञ मानते हैं कि पानी की चुनौती को केवल आपूर्ति बढ़ाकर नहीं, बल्कि मांग प्रबंधन और संसाधनों के टिकाऊ उपयोग के जरिए ही प्रभावी ढंग से संभाला जा सकता है। इसके लिए जल के पूरे चक्र—संग्रहण, उपयोग, पुनर्भरण और पुनर्चक्रण—को एक समग्र रणनीति के तहत देखने की जरूरत है। साथ ही स्थानीय भौगोलिक परिस्थितियों, पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक तकनीक के संतुलित उपयोग से ही दीर्घकालिक समाधान संभव है। तेजी से बढ़ती आबादी और शहरीकरण के बीच यह भी जरूरी है कि जल प्रबंधन को विकास योजनाओं का अनिवार्य हिस्सा बनाया जाए, ताकि भविष्य में जल संकट आर्थिक और सामाजिक प्रगति में बाधा न बने।
वर्षा जल संचयन और भूजल पुनर्भरण
फसल पैटर्न में बदलाव
जल पुनर्चक्रण और अपशिष्ट जल प्रबंधन
जल निकायों का पुनर्जीवन
सामुदायिक भागीदारी
इस तरह हम देखते हैं कि भारत का जल भविष्य अनिश्चित जरूर है, लेकिन पूरी तरह अंधकारमय नहीं। यूएन रिपोर्टें चिंताजनक स्थिति की ओर इशारा तो करती हैं, पर साथ ही इस बात का भी संकेत देती हैं कि यदि अभी से टिकाऊ जल प्रबंधन के तरीकों को अपनाया जाए, तो संकट को स्थितियों को सुधारा जा सकता है। अंतरराष्ट्रीय जल दिवस पर हमें यह समझने की ज़रूरत है कि पानी केवल प्राकृतिक संसाधन नहीं बल्कि जीवन, अर्थव्यवस्था और सामाजिक स्थिरता की आधारशिला है। “वॉटर बैंकक्रप्सी” से बचने के लिए सरकार और समाज दोनों को ही मिलकर जल संरक्षण को एक राष्ट्रीय आंदोलन के रूप में आगे बढ़ाना होगा।
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