

गांधी जयंती पर सारी दुनिया में महात्मा गांधी और उनके आदर्शों को याद किया जाता है।
फोटो : आईडब्लूपी
2 अक्टूबर को दुनिया भर में भारत के राष्ट्रपिता कहे जाने वाले महात्मा गांधी यानी मोहनदास करमचंद गांधी की जयंती मनाई जाती है। गांधी जी को दुनिया भर में सत्य, अहिंसा और सत्याग्रह जैसे सिद्धांतों के लिए जाना जाता है। पर गांधी जी के जीवन और चिंतन को गहराई से देखा और समझा जाए, तो उनके चिंतन में पानी, प्रकृति और पर्यावरण की चिंता साफ झलकती थी। गांधी जी का एक कथन कई दशकों से काफी चर्चित रहा है। 16 फरवरी, 1916 को मद्रास (चेन्नई) में दिए गए एक ऐतिहासिक भाषण में उन्होंने कहा था ‘धरती सबकी जरूरत पूरी कर सकती है, लालच की नहीं’ यानी Earth provides enough to satisfy every man's needs, but not every man's greed. यह कथन को न केवल उनकी न्यासिता (Trusteeship) यानी सहभागिता की सोच और दूरदर्शिता को दर्शाता है, बल्कि अपने युग की सोच से कहीं आगे की पर्यावरणीय चिंता की झलक भी इसमें मिलती है। आज से 110 साल पहले जब दुनिया को पर्यावरण और पानी जैसे मुद्दों की कोई चिंता नहीं थी, तब महात्मा गांधी प्राकृतिक संसाधनों को केवल ज़रूरत के हिसाब से और सोच-समझ कर सहभागिता की भावना से इस्तेमाल करने की बात कर रहे थे। नवजीवन ट्रस्ट, अहमदाबाद द्वारा 1960 में प्रकाशित गांधी विचारमाला संकलन के मुताबिक अपने भाषण में उन्होंने मूल रूप से ये शब्द कहे थे -
गांधी जी ने अपने संबोधन में यह बात अहमदाबाद में नव-स्थापित आश्रम, जिसे बाद में साबरमती आश्रम के नाम से जाना गया, के व्रतों और नियमों की व्याख्या करते हुए कही थी। आज गांधी जी के इस विचार को पूरी दुनिया में 'सतत विकास' (Sustainable Development) और पर्यावरण संरक्षण के सबसे बड़े मूलमंत्र के रूप में जाना जा रहा है। इसी भाषण में सत्य, अहिंसा के साथ-साथ 'अस्तेय' (चोरी न करना/Non-stealing) और 'अपरिग्रह' (जरूरत से ज्यादा इकट्ठा न करना/Non-possession) के सिद्धांतों को समझा रहे थे। इस भाषण में मूलत: गांधी जी ने जो बात कहनी चाही थी वह यह है कि यदि हम अपनी जरूरत से ज्यादा संसाधनों का इस्तेमाल करते हैं, तो वह एक प्रकार की चोरी है। इसी दौरान उन्होंने प्रकृति के नियम की बात करते हुए कहा कि प्रकृति हमारी रोजमर्रा की जरूरतों के लिए पर्याप्त उत्पादन करती है, लालच को नहीं। यही विचार बाद में "नीड एंड ग्रीड" (Need and Greed) यानी जरूरत बनाम लालच के प्रसिद्ध उद्धरण के रूप में लोकप्रिय हुआ।
महात्मा गांधी संसाधनों के न्यूनतम उपयोग के हिमायती थे। यह उनके लिए महज़ एक सिद्धांत नहीं, बल्कि रोजमर्रा की जिंदगी से जुड़ा एक व्यावहारिक पहलू था। वह कागज बचाने के लिए न केवल छोटे अक्षरों में कागज के दोनों ओर लिखते थे, बल्कि उनके पास आने वाली चिट्ठियों के लिफाफों पर भी अपने नोट्स बना लेते थे। पेड़ों से बनने वाले कागज की यह बचत प्राकृतिक संसाधनों के प्रति उनकी संवेदनशीलता को प्रदर्शित करती है। उनके आश्रम केवल राजनीतिक और सामाजिक गतिविधियों के केंद्र नहीं थे, बल्कि वे ऐसे विचारों को दैनिक जीवन में आजमाने की जगह भी थे।
साबरमती आश्रम हो या सेवाग्राम, यहां जीवन का आधार सादगी, श्रम और सामूहिक जिम्मेदारी के साथ ही जरूरतों को सीमित रखते हुए संसाधनों के सीमित उपयोग के विचार को ध्यान में रखा जाता था। जरूरतों को सीमित करने, अनावश्यक उपभोग से बचने और उपलब्ध संसाधनों के विवेकपूर्ण इस्तेमाल की बात उनके लेखों में भी देखने को मिलती है। उनके लेख और पुस्तकें बताती हैं कि उनका जोर जीवन को इस तरह व्यवस्थित करने पर था, जिसमें व्यक्ति अपनी जरूरत और अपनी इच्छा या लालच के बीच अंतर को समझे। इसके लिए गांधी जी के आश्रमों में सामुदायिक जीवन और अनुशासन को विशेष महत्व दिया जाता था।
पानी को लेकर भी यही सोच महत्वपूर्ण थी कि वह असीमित उपभोग की वस्तु नहीं, बल्कि जीवन की एक साझा जरूरत है। उनकी पुस्तक आरोग्य की चाबी भी इसी व्यापक दृष्टिकोण का हिस्सा थी। हालांकि, पुख्ता तौर पर यह तो नहीं कहा जा सकता कि साबरमती या सेवाग्राम आश्रम में आज के पर्यावरणीय अभियानों की तरह कोई उन्नत “वाटर मैनेजमेंट सिस्टम” मौजूद था। इसकी वजह यह थी कि गांधी आश्रमों की सोच आधुनिक तकनीकी जल प्रबंधन से ज्यादा कम जरूरत, सामुदायिक उपयोग, स्वच्छता और संसाधनों के प्रति जिम्मेदारी की जीवन-पद्धति में थी, जिसमें पानी से लेकर सारे प्राकृतिक संसाधनों इस्तेमाल सोच-समझ कर विवेकपूर्ण ढंग से करने पर थी।
बच्चों को स्कूल में पानी का जरूरत के मुताबिक ही इस्तेमाल करने और पानी की बर्बादी रोकने की शिक्षा देकर इसे उनकी आदत में शामिल किया जा सकता है।
स्रोत : globalgiving
गांधी के चिंतन में जरूरत और लालच के बीच अंतर एक महत्वपूर्ण विचार था। उनके पर्यावरण संबंधी लेखन में भी सीमित जरूरतों, सादगी और प्राकृतिक संसाधनों को अगली पीढ़ी के लिए बचाए रखने की सोच देखने को मिलती है। आज प्राकृति संसाधनों, खासकर पानी के संदर्भ में इस विचार को देखें तो तस्वीर बिल्कुल अलग दिखाई देती है। एक तरफ करोड़ों लोगों के लिए सुरक्षित और पर्याप्त पानी अभी भी चुनौती है, दूसरी तरफ शहरों में पाइपलाइन लीकेज, अनावश्यक बहाव, अत्यधिक घरेलू खपत और उपचारित पानी के कम पुन: उपयोग जैसी समस्याएं देखने को मिलती हैं। घरों में नल खुला छोड़ देना, जरूरत से ज्यादा पानी इस्तेमाल करना, पीने लायक स्वच्छ जल से वाहन या फर्श धोने जैसी पानी की बर्बादियों के साथ ही शहरी घरों में RO तकनीक वाले वाटर फिल्टरों से निकलने वाले रिजेक्ट पानी का उपयोग न करना ऐसी खामियां हैं, जो बड़ी मात्रा में पानी की बर्बादी कर रही हैं। इसी तरह कृषि और औद्योगिक क्षेत्र में भी अंधाधुंध भूजल दोहन और पानी की बड़े पैमाने पर बर्बादी देखने को मिलती है। कृषि में सिंचाई दक्षता और स्थानीय जल उपलब्धता के अनुरूप फसल चयन करके पानी की खपत को कम किया जा सकता है। इसी तरह उद्योगों में पानी के दोबारा इस्तेमाल यानी रीयूज़ को अपना कर पानी की बर्बादी पर लगाम लगाई जा सकती है। पर, इस सोच का अभाव दिखाई देता है, क्योंकि समाज अब गांधी जी के आदर्शों को भूलता जा रहा है। गांधी के विचारों को लागू करने का अर्थ पानी का इस्तेमाल बिल्कुल रोक देना नहीं, बल्कि जरूरत, उपलब्धता और भविष्य की पीढ़ियों की जरूरत को ध्यान में रखकर पानी का इस्तेमाल करना है। जल क्षेत्र में उनकी सादगी और संयम की सोच का यही आधुनिक अर्थ निकाला जा सकता है।
गांधी जी के लिए स्वच्छता केवल उनकी निजी आदत नहीं थी। वे इसे सामाजिक जिम्मेदारी और सार्वजनिक जीवन से जोड़कर देखते थे। इसका एक उल्लेखनीय उदाहरण उनके नदी संबंधी लेखन में मिलता है। EARTH CHARTER & GANDHI में Young India में 23 दिसंबर 1926 को प्रकाशित गांधी जी के लेख का उल्लेख किया गया है, जिसमें उन्होंने कहा है कि आधुनिक समाज नदियों का इस्तेमाल अपने गंदे पानी को उनमें डालने के लिए कर रहा है और इस प्रक्रिया में नदियों को और गंदा कर रहा है। गौरतलब यह है गांधी जी ने यह टिप्पणी उस समय की थी, जब भारत में आज जैसी विशाल शहरी आबादी और औद्योगिक विस्तार नहीं था। यह पर्यावरण और पानी को लेकर उनकी दूरदर्शिता को दर्शाता है, क्योंकि आज करीब एक सदी बाद भी जल संकट का सवाल एक गंभीर मुद्दे के रूप में हमारे सामने खड़ा हुआ है। देश की अनेक नदियों में शहरों का सीवेज, औद्योगिक अपशिष्ट और ठोस कचरा पहुंचना आज हमारी नदियों के प्रदूषण की बड़ी वजहों में शामिल है। साबरमती इसका एक महत्वपूर्ण उदाहरण है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) के आंकड़ों में अहमदाबाद क्षेत्र में साबरमती की जल गुणवत्ता के साथ BOD और कोलीफॉर्म जैसे प्रदूषण संकेतकों की समस्या दर्ज हुई है। 2023 के CPCB आंकड़ों में साबरमती के अलग-अलग निगरानी केंद्रों पर जल गुणवत्ता के मानकों में काफी अंतर दिखाई देता है।
इस लिहाज से गांधी जी की स्वच्छता की सोच को केवल नदियों के घाटों पर झाड़ू लगाने या कचरा उठाने तक सीमित करना अधूरा होगा। नदी की वास्तविक स्वच्छता का मतलब उसके कैचमेंट, जल प्रवाह, सीवेज, औद्योगिक अपशिष्ट और नदी किनारे की पारिस्थितिकी को भी समझना है। गांधी के समय का सवाल था कि हम नदी को गंदा क्यों कर रहे हैं। आज उस सवाल में हमें यह भी जोड़ना होगा कि साफ की जा रही नदियां फिर से प्रदूषित क्यों हो रही हैं?
साबरमती नदी गांधी के जीवन से इसलिए भी विशेष रूप से जुड़ी है क्योंकि अहमदाबाद में उनके आश्रम का जीवन इसी नदी के किनारे विकसित हुआ। आगे चलकर इसे 'साबरमती आश्रम' के नाम से जाना भी गया। गांधी जी ने 1915 में भारत लौटने के बाद अहमदाबाद को अपने सामाजिक और राजनीतिक प्रयोगों के प्रमुख केंद्रों में बनाया और साबरमती आश्रम उनके सार्वजनिक जीवन का महत्वपूर्ण स्थल बना। इसलिए गांधी और साबरमती का संबंध केवल किसी नदी के किनारे रहने तक सीमित नहीं था। साबरमती उनके आश्रम जीवन और रचनात्मक कार्यक्रमों की पृष्ठभूमि भी थी। गांधी के समय की साबरमती को आज की तरह बड़े शहरी नदी-तंत्र, विशाल बुनियादी ढांचे और नदी के व्यापक पुनर्विकास के संदर्भ में नहीं देखा जा सकता।
आज साबरमती एक तेजी से विकसित हुए शहरी और औद्योगिक क्षेत्र से होकर गुजरती है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड यानी CPCB के अनुसार अहमदाबाद से वौठा तक करीब 52 किलोमीटर का हिस्सा प्रदूषित नदी क्षेत्र के रूप में पहचाना गया था और इसके पीछे शहरी तथा औद्योगिक विकास के साथ सिंचाई के लिए बढ़ती पानी की मांग को भी महत्वपूर्ण कारणों में गिना गया। CPCB की निगरानी में कुछ स्थानों पर BOD, कोलीफॉर्म और अन्य जल गुणवत्ता संकेतकों में समस्या दर्ज की गई है। वहीं 2023 के आंकड़ों में साबरमती के कुछ ऊपरी हिस्सों में BOD अपेक्षाकृत कम, जबकि अहमदाबाद के कुछ निगरानी केंद्रों पर अधिक पाया गया।
ऐसे में गांधी जयंती पर साबरमती को याद करना केवल आश्रम और गांधी की तस्वीर तक सीमित नहीं होना चाहिए। असली सवाल यह है कि जिस नदी के किनारे गांधी ने सादगी, श्रम, स्वच्छता और प्रकृति के साथ संतुलित जीवन का प्रयोग किया था, उस नदी का आज का पर्यावरणीय स्वास्थ्य कैसा है? गांधी की विरासत को नदी से जोड़कर देखने पर यह सवाल और महत्वपूर्ण हो जाता है कि क्या नदी को केवल सुंदर बनाने और उसके किनारे (रिवर बैंक) विकास करने से आगे बढ़कर उसके प्राकृतिक प्रवाह, जल गुणवत्ता और पूरे नदी तंत्र को स्वस्थ बनाया जा रहा है?
महात्मा गांधी का ग्राम स्वराज केवल राजनीतिक विकेंद्रीकरण या गांवों को प्रशासनिक अधिकार देने की अवधारणा नहीं था। इसके केंद्र में ऐसा आत्मनिर्भर गांव था, जो अपनी बुनियादी जरूरतों को यथासंभव अपने स्थानीय संसाधनों, श्रम और सामुदायिक सहयोग से पूरा कर सके। इस दृष्टि से पानी ग्राम स्वराज का स्वाभाविक और महत्वपूर्ण हिस्सा बनता है। गांव की आजीविका, खेती, पशुपालन, स्वच्छता और दैनिक जीवन सभी स्थानीय जल उपलब्धता पर निर्भर थे। इसलिए गांव के तालाब, कुएं, छोटे जलाशय, वर्षाजल और स्थानीय जलग्रहण क्षेत्र केवल प्राकृतिक संसाधन नहीं, बल्कि सामुदायिक जीवन की आधारभूत संपत्ति थे। गांधी की स्थानीयता और आत्मनिर्भरता की सोच को आज के संदर्भ में देखें तो इसका अर्थ यह भी है कि गांव अपनी पानी की जरूरतों के लिए पूरी तरह बाहरी स्रोतों या दूर से लाई जाने वाली जलापूर्ति पर निर्भर न हो, बल्कि स्थानीय वर्षा और जलस्रोतों को संरक्षित करके अपनी जल सुरक्षा मजबूत करें। वर्षाजल संचयन, भूजल पुनर्भरण, पुराने तालाबों का संरक्षण और सामुदायिक जल प्रबंधन इस सोच को साकार कर सकते हैं। आज जब जल-सुरक्षित गांव (Water-Secure Village) की अवधारणा पर जोर दिया जा रहा है, गांधी का ग्राम स्वराज हमें यह याद दिलाता है कि जल आत्मनिर्भरता केवल पर्याप्त पानी उपलब्ध कराने का सवाल नहीं, बल्कि पानी के स्थानीय स्रोतों, उनके संरक्षण और सामुदायिक जिम्मेदारी को मजबूत करने का भी सवाल है।
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