कार्यशाला को संबोध‍ित करते डॉ. राजेश थडानी, मंच पर उपस्थित अन्य वक्ता

कार्यशाला को संबोध‍ित करते डॉ. राजेश थडानी, मंच पर उपस्थित अन्य वक्ता

"ग्लेश्यिरों के साथ-साथ माउंटेन एक्विफर भी हो रहे खाली, संकट में हिमालय का पानी"

सेंटर फॉर माइक्रोफाइनेंस एंड लाइवलीहुड (सीएमएल) द्वारा गुवाहाटी में आयोजित कार्यशाला में हुई जल धाराओं को बचाने और हिमालय में जल संकट पर हुई चर्चा।
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हिमालय की पर्वत शृंखलाओं पर बसे भारत के लगभग सभी राज्यों में आने वाले समय में भीषण जल संकट दस्तक दे सकता है। इसका कारण केवल ग्लोबल वॉर्मिंग की वजह से हो रहा जलवायु पविर्तन नहीं बल्कि मानवीय गतिविधियां भी हैं, जिनके कारण ग्लेशियरों के साथ-साथ माउंटेन एक्विफर भी अब खाली हो रहे हैं। इस कारण हिमालय का पानी भीषण संकट की ओर बढ़ रहा है। 

यह मुद्दा बेहद गंभीर है और यही कारण है कि इस पर चर्चा करने के लिए देश के अलग-अलग कोने से पर्यावरण विशेषज्ञ 17 जून को गुवाहाटी में एकत्र हुए। सेंटर फॉर माइक्रोफाइनेंस एंड लाइवलीहुड (सीएमएल) द्वारा आयोजित कार्यशाला - Regional Workshop on Himalayan Water Partnership: Strengthening Knowledge, Practice and Partnerships for Springshed Management जिसमें हिमालय की धाराओं, झरनों के साथ-साथ इन क्षेत्रों में पीने के पानी पर चर्चा हुई। इस कार्यशाला में इंडिया वाटर पोर्टल ने आउटरीच पार्टनर के रूप में सहभागिता दर्ज की। 

<div class="paragraphs"><p>गुवाहाटी में आयोजित कार्यशला&nbsp;</p></div>

गुवाहाटी में आयोजित कार्यशला 

इस मौके पर टाटा ट्रस्ट्स के साथ जुड़े फॉरेस्ट ईकोलॉजिस्ट राजेश थडानी ने कहा कि अब हम उस जगह पर खड़े हैं जहां पर जलवायु परिवर्तन की वजह से होने वाले प्रभावों को रोकना बेहद मुश्किल है, लेकिन सही जल प्रबंधन के साथ जल स्रोतों को बचाया जा सकता है। उन्‍होंने कहा कि यह पता करना मुश्किल है कि किस जलभृत (एक्विफर) की रिचार्ज कपैसिटी कितनी है, कितनी उसकी स्टोरेज कपैसिटी है, और अलग-अलग जगह पाए जाने वाले एक्विफर अलग-अलग तरह से व्यवहार करते हैं। और चूंकि ये हमें दिखाई नहीं देते, तो हम सीधे तौर पर इनकी मरम्मत नहीं कर सकते, लेकिन हां यह जरूर है कि जमीन के ऊपर होने वाली गतिविधियों पर नियंत्रण कर हम इन जलभृतों को होने वाले नुकसान से बचा जरूर सकते हैं। 

<div class="paragraphs"><p>बायं से दाएं - शिल्प वर्मा, रंजीत बरठाकुर, राजेश थडानी, रबिंद कुमार समल, स्क्रीन पर दिव्यांग वाघेला&nbsp;</p></div>

बायं से दाएं - शिल्प वर्मा, रंजीत बरठाकुर, राजेश थडानी, रबिंद कुमार समल, स्क्रीन पर दिव्यांग वाघेला 

कार्यशाला में सीएमएल के चेयरमैन रंजीत बरठाकुर ने कहा कि हिमालय की धाराओं को बचाने के साथ-साथ उन धाराओं को पुनर्जीवित करने की जरूरत है, जो सूख चुकी हैं। उन्‍होंने कहा 50 प्रतिशत धाराएं बेहद क्रिटिकल स्‍टेज पर हैं, हिमालय का 40 प्रतिशत भूजल खत्म हो चुका है और 3 बिलियन लोग हिमालय के पानी पर निर्भर हैं। ऐसे में एक ठोस नीति बनाने की जरूरत है जो आने वाले समय में जल संकट को गंभीर होने से रोक सके। 

वनों को काटने और कॉन्‍क्रीटीकरण के कारण पर्वतों पर रुक नहीं रहा है पानी 

इस मौके पर आईएफएस एवं त्रिपुरा सरकार में प्रमुख सचिव (वन) रबिंद्र कुमार समल ने कहा कि एक समय था जब पहाड़ों पर बारिश होती थी, तब जगह-जगह पानी ठहरता था और मिट्टी के अंदर होते हुए पानी जलभृतों को रिचार्ज करता था। लेकिन अब पहाड़ों पर वनों को काटे जाने और बढ़ते कॉन्‍क्रीटीकरण की वजह से अधिकांश पानी बह जाता है। जंगलों के काटे जाने की वजह से स्प्रिंग (धाराएं) रिचार्ज नहीं हो पाती हैं। वहीं इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ ह्यूमन सेटेलमेंट के जगदीश कृष्‍णास्वामी ने कहा कि बारिश के मौसम में जंगल पानी को अवशोषित करते हैं और वही पानी ड्राई सीजन में स्प्रिंग के रूप में हमें मिलता है। हिमालय की जलधाराओं का सीधा कनेक्शन पेड़ों से है। हमें यह समझना होगा कि स्प्रिंग सिस्टम कोई जिलोसिस्‍टम (भगर्भीय प्रणाली) नहीं है बल्कि जियो-बायोलॉजिकल सिस्टम (भूगर्भीय - जैविक प्रणाली) है। किसी सिप्रंग में कितना पानी आयेगा यह उसके आस-पास वनों पर निर्भर करता है।       

<div class="paragraphs"><p>कार्यशाला को संबोध‍ित करते डॉ. हिमांशु कुलकर्णी&nbsp;</p></div>

कार्यशाला को संबोध‍ित करते डॉ. हिमांशु कुलकर्णी 

इस कार्याशला में ऑनलाइन सहभागिता दर्ज करने वाले एक्वाडैम के संस्थापक डॉ. हिमांशु कुलकर्णी ने कहा कि स्प्रिंग शेड मैनेजमेंट को केवल धाराओं को पुनर्जीवित करने तक सीमित नहीं रखने की जरूरत है बल्कि यह प्रबंधन है हिमालय के जलभृत प्रणालियों को पुनर्जीवित करने के रूप में देखना चाहिए। उन्‍होंने जलप्रपातों को व्यापक पुनर्भरण परिदृश्यों से जुड़ी भूजल प्रणालियों के रूप में समझने की आवश्यकता पर बल दिया।  

कार्यशाला में हिममोत्थान सोसाइटी के डॉ. विनोद कोठारी ने मध्य एवं पश्चिमी हिमालय में संचालित स्प्रिंग एटलस पहल के अनुभव साझा करते हुए बताया कि वैज्ञानिक मानचित्रण, डेटा संग्रह और व्यवस्थित प्रलेखन किस प्रकार जलस्रोतों के संरक्षण एवं पुनर्जीवन के प्रयासों को बड़े पैमाने पर प्रभावी बना सकते हैं।

इस मौके पर टाटा ट्रस्ट्स के WASH इनिशिएटिव टाटा वाटर मिशन के प्रमुख दिव्यांग वाघेला, नार्थ ईस्‍टर्न रीजनल इस्टिट्यूट ऑफ वाटर एंड लैंड मैनेजमेंट के डॉ. प्रदीप कुमार बोरा, एमबीडीए के डॉ. ऐबेन स्‍वेर, आईडब्‍ल्‍यूएमआई के शिल्प वर्मा, जेजेएम असम के वरिष्‍ठ जियोलॉजिस्‍ट डॉ. बिजॉय कृष्‍ण सेटिया, नाबार्ड, नॉर्थ त्रिपुरा की जिलाधिकारी चांदनी चंद्रन, सीएमएल असम के संजय सिंह, चिराग के एग्जिक्‍यूटिव डायरेक्टर डॉ. बद्रीश मेहरा समेत कई विशेषज्ञों ने स्प्रिंग मैनेजमेंट के लिए जल प्रबंधन पर अपने विचार रखे।

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