तमिलनाडु के कांचीपुरम का एकंबरेश्वर और तिरुचिरापल्ली का जम्बुकेश्वर जैसे मंदिरों की बनावट यह समझने में मदद करती है कि आस्था और विज्ञान मिलकर जल प्रबंधन की ऐसी टिकाऊ प्रणालियां बना सकते हैं।

तमिलनाडु के कांचीपुरम का एकंबरेश्वर और तिरुचिरापल्ली का जम्बुकेश्वर जैसे मंदिरों की बनावट यह समझने में मदद करती है कि आस्था और विज्ञान मिलकर जल प्रबंधन की ऐसी टिकाऊ प्रणालियां बना सकते हैं।

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आस्था से संरचना तक: एकंबरेश्वर और जम्बुकेश्वर से भूजल संरक्षण की सीख

दक्षिण भारत के एकंबरेश्वर और जम्बुकेश्वर जैसे प्राचीन शिव मंदिर केवल आस्था के केंद्र नहीं हैं, बल्कि जल प्रबंधन और भूजल पुनर्भरण की संरचनाएं हैं जिनका निर्माण हज़ारों वर्ष पूर्व हुआ था। वॉटर मैनेजमेंट की ये संरचनाएं आज भी जीवंत हैं। इनकी पारंपरिक वास्तुकला, जल अनुशासन और स्थानीय समझ के गहन अध्ययन से मौजूदा जल संकट के लिए व्यवहारिक समाधान ढूंढ़ने में मदद मिल सकती है।
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हिंदू परंपरा में शिव और शिवरात्रि दोनों का विशेष महत्त्व है। लेकिन शिवरात्रि को केवल उपासना और अनुष्ठान के पर्व तक सीमित करके देखना सही नहीं। यह पर्व उस स्मृति को भी जगाने का अवसर है, जिसमें शिव को प्रकृति के मूल तत्वों - पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश - से जोड़ा गया।

पूरे भारत में ऐसे अनेक मंदिर और तीर्थस्थल हैं, जो शिव के इन तत्वों के प्रतीक माने जाते हैं। लेकिन इन प्रतीकों के भीतर भी दक्षिण भारत के दो प्राचीन शिव मंदिर, तमिलनाडु के कांचीपुरम का एकंबरेश्वर और तिरुचिरापल्ली का जम्बुकेश्वर, विशेष ध्यान खींचते हैं। ये मंदिर शिव से अपने इस जुड़ाव को केवल प्रतीकात्मक नहीं रखते, बल्कि उसे जल प्रबंधन और ड्रेनेज की जीवित परंपरा में बदल देते हैं।

आज जब भारत के कई हिस्सों में भूजल स्तर लगातार गिर रहा है, ऐसे में इन मंदिरों की संरचना हमें जल संरक्षण के वैकल्पिक और स्थानीय मॉडल की ओर देखने को मजबूर करती है। इन मंदिरों की बनावट यह समझने में मदद करती है कि आस्था और विज्ञान मिलकर जल प्रबंधन की ऐसी टिकाऊ प्रणालियां बना सकते हैं, जो बिना मशीनों और अतिरिक्त ऊर्जा के लंबे समय तक काम करती हैं।

एकंबरेश्वर मंदिर: पृथ्वी तत्व और जल का अनुशासन

कांचीपुरम स्थित एकंबरेश्वर मंदिर ‘पंचभूत स्थलों’ में से एक है और इसे पृथ्वी तत्व का प्रतिनिधि माना जाता है। यहां से जुड़ी लोककथा बताती है कि देवी पार्वती ने रेत से शिवलिंग का निर्माण किया और बाढ़ से बचाने के लिए उसे अपने आलिंगन में लिया। यह कथा केवल आध्यात्मिक नहीं है, बल्कि जल के प्रति संवेदनशीलता का संकेत भी देती है।

एकंबरेश्वर मंदिर की वास्तुकला ऐसी है कि बारिश का पानी और अभिषेक के बाद का अतिरिक्त जल स्वाभाविक ढलानों और पत्थर की नालियों के माध्यम से सीधे इन जलाशयों तक पहुंच जाता है।

एकंबरेश्वर मंदिर का निर्माण चोल राजाओं ने 7वीं सदी में बनवाया था। आगे चलकर विजयनगर साम्राज्य के दौरान मंदिर की संरचना को विस्तार दिया गया। मंदिर के गोपुरम की ऊंचाई 192 फीट है। मंदिर प्रांगण में 3500 वर्ष पुराना आम का पेड़ भी है, जिसमें चार प्रकार के आम उगते हैं। 

मंदिर में शिव के अभिषेक के दौरान जल का उपयोग अत्यंत नियंत्रित तरीके से किया जाता है। अतिरिक्त जल को व्यर्थ बहने देने के बजाय पूरी जल-व्यवस्था उसे संरक्षित करने पर आधारित है।

मंदिर की वास्तुकला ऐसी है कि बारिश का पानी और अभिषेक के बाद का अतिरिक्त जल स्वाभाविक ढलानों और पत्थर की नालियों के माध्यम से सीधे इन जलाशयों तक पहुंच जाता है। यह पानी जमीन में रिसकर आसपास के इलाके के भूजल को रिचार्ज करता है। सदियों से यह प्रक्रिया बिना किसी तकनीकी हस्तक्षेप के जारी है और सुचारू रूप से काम कर रही है।

यहां ड्रेनेज यानी निकासी का अर्थ जल को बाहर निकालना नहीं, बल्कि उसे सही जगह तक पहुंचाना है।

जम्बुकेश्वर मंदिर: जल तत्व का जीवंत स्वरूप

<div class="paragraphs"><p>तिरुचिरापल्ली का जम्बुकेश्वर मंदिर शिव के जल तत्व का प्रतिनिधित्व करता है। यहां के शिवलिंग को ‘अप्पू लिंगम’ कहा जाता है। </p></div>

तिरुचिरापल्ली का जम्बुकेश्वर मंदिर शिव के जल तत्व का प्रतिनिधित्व करता है। यहां के शिवलिंग को ‘अप्पू लिंगम’ कहा जाता है।

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जहां एकंबरेश्वर मंदिर पृथ्वी तत्व का प्रतिनिधि है वहीं, तिरुचिरापल्ली का जम्बुकेश्वर मंदिर जल तत्व का प्रतिनिधित्व करता है। यहां के शिवलिंग को ‘अप्पू लिंगम’ कहा जाता है। इसके गर्भगृह में मौजूद एक प्राकृतिक झरना इस शिवलिंग को लगातार जलमग्न रखता है। सबसे रोचक यह है कि इस झरने के पानी का स्रोत कोई पाइप या टंकी नहीं, बल्कि प्राकृतिक जलधारा है जिससे यह सीधे जुड़ा हुआ है।

एकंबरेश्वर मंदिर के गर्भगृह में बहता जल, अभिषेक का अतिरिक्त जल और वर्षा जल, ये सभी पत्थर से बनी नालियों के माध्यम से मंदिर के तालाबों तक पहुंचते हैं।

तिरुचिरापल्ली में स्थित जम्बुकेश्वर मंदिर तमिलनाडु के पांच प्रमुख शिव मंदिरों में से एक है जो महाभूत या पांच तत्वों का प्रतिनिधित्व करते हैं। जंबुकेश्वर के गर्भगृह में एक भूमिगत जलधारा है। इस मंदिर का निर्माण 1800 साल पूर्व चोल साम्राज्य के दौरान हुआ था।

इस मंदिर की खास बात इसकी वह ड्रेनेज व्यवस्था है, जो बहुत पुरानी होने के बावजूद आज भी सटीक रूप से काम करती है। गर्भगृह में बहता जल, अभिषेक का अतिरिक्त जल और वर्षा जल, ये सभी पत्थर से बनी नालियों के माध्यम से मंदिर के तालाबों तक पहुंचते हैं। इसके बाद यह जल धीरे-धीरे जमीन में रिसकर आसपास के क्षेत्र में भूजल स्तर को संतुलित बनाए रखने में मदद करता है।

स्थानीय परंपराओं, मंदिर से जुड़े जलाशयों और सालों के सामुदायिक अनुभवों के अनुसार, इन मंदिर परिसरों के आसपास जल संकट अपेक्षाकृत कम देखने को मिलता रहा है। यह आकलन किसी एक सांख्यिकीय अध्ययन पर आधारित नहीं है। यह उन तालाबों, कुंडों और प्राकृतिक रिसाव क्षेत्रों के निरंतर उपयोग पर टिका है, जो वर्षा जल और अभिषेक के अतिरिक्त जल को संचित कर धीरे-धीरे भूजल में समाहित करते हैं।

इसके अलावा, भारतीय विरासत संरक्षण संस्था इंडियन नेशनल ट्रस्ट फॉर आर्ट एंड कल्चरल हेरिटेज (INTACH) के अध्ययनों में भी यह बात सामने आई है कि दक्षिण भारत के कई ऐतिहासिक मंदिर परिसरों में जल संचयन, निकास और भूजल पुनर्भरण को वास्तुकला का अभिन्न हिस्सा बनाया गया था।

दक्षिण भारत के कई हिस्सों, विशेषकर तमिलनाडु में, मंदिर परिसरों से जुड़े जलाशयों और सामुदायिक अनुभव यह संकेत देते हैं कि जब धार्मिक स्थलों की बनावट में पानी के बहाव, उसके संचयन और जमीन में रिसाव का ध्यान रखा जाता है, तो वे केवल आस्था के केंद्र नहीं रहते।

चेन्नई जैसे शहरों में मंदिर टैंकों पर आधारित जल संरक्षण के अनुभव दिखाते हैं कि ये पारंपरिक जल संरचनाएं वर्षा जल को संचित कर आसपास के इलाक़ों में भूजल रिचार्ज और स्थानीय जल सुरक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।

एकंबरेश्वर और जम्बुकेश्वर जैसे मंदिर यह याद दिलाते हैं कि पारंपरिक समझ और समझदारी से किए गए निर्माण जब एक साथ मिल जाएं तो जल प्रबंधन के टिकाऊ और स्थायी उपाय मिल सकते हैं।

यह व्यवस्था कैसे काम करती है?

इन दोनों मंदिरों में जल प्रबंधन के कुछ साझा सिद्धांत दिखाई देते हैं:

  • प्राकृतिक ढलान का उपयोग: जल को पंप या मशीन के बजाय गुरुत्वाकर्षण के सहारे प्रवाहित किया जाता है।

  • पत्थर की नालियां और छेद वाले फर्श: इस व्यवस्था से पानी धीरे-धीरे रिसकर वापस ज़मीन में चला जाता है जिससे भूजल के स्तर को बनाए रखने में मदद मिलती है।

  • जलाशयों से जुड़ाव: हर अतिरिक्त बूंद किसी न किसी तालाब, कुंड या नदी तक पहुंचती है।

  • अनुष्ठान और संरचना का तालमेल: अभिषेक में उपयोग में लाए जाने वाली जल की मात्रा और उसका समय भी संरचनात्मक क्षमता के अनुरूप तय किया गया है।

ये सभी तत्व मिलकर ऐसी व्यवस्था बनाते हैं, जिसमें न तो जल की बर्बादी होती है और न ही अचानक जलभराव की स्थिति बनती है।

यह अनुभव इस बात की ओर संकेत करता है कि जब धार्मिक परिसरों की संरचना जल के प्रवाह, संचयन और जमीन में रिसाव को ध्यान में रखकर की जाती है, तो वे केवल आस्था के केंद्र नहीं रहते, बल्कि स्थानीय जल सुरक्षा के सहायक ढांचे भी बन जाते हैं।

एकंबरेश्वर और जम्बुकेश्वर जैसे मंदिर यह याद दिलाते हैं कि पारंपरिक समझ और समझदारी से किए गए निर्माण जब एक साथ मिल जाएं तो जल प्रबंधन के टिकाऊ और स्थायी उपाय मिल सकते हैं।

आज के मंदिर और शहर क्या सीख सकते हैं?

आज देश के कई मंदिरों और धार्मिक स्थलों पर प्रतिदिन हजारों लीटर पानी मंदिरों में जल अभिषेक के लिए उपयोग में लाया जाता है। लेकिन उसका अधिकांश हिस्सा व्यवस्थित बहाव प्रणाली की कमी और अनुपस्थिति दोनों के कारण नालियों के mमाध्यम से बेकार बह जाता है। ऐसे में एकंबरेश्वर और जम्बुकेश्वर के ये शिव मंदिर यह दिखाते हैं कि आस्था और संरक्षण एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। इन मंदिरों की जल-निकासी और जल-संरक्षण व्यवस्थाओं से कुछ बातें सीखी जा सकती हैं:

  • मंदिर परिसरों में वर्षा जल संचयन और अभिषेक जल रीसाइक्लिंग की व्यवस्था बनाई जा सकती है।

  • शहरी इलाकों में ड्रेनेज सिस्टम को भूजल रिचार्ज से जोड़ा जा सकता है।

  • नई इमारतों और सार्वजनिक स्थलों में तालाब, कुंड और रिसाव क्षेत्र अनिवार्य किए जा सकते हैं।

यह मॉडल पूरी तरह से आज के समय में भी कारगर है, बशर्ते हम इसे केवल विरासत न मानें, बल्कि व्यवहारिक समाधान की तरह अपनाएं।

शिवरात्रि पर जलाभिषेक 

शिवरात्रि के दिन जब हम शिवलिंग पर जल चढ़ाते हैं, तब ये मंदिर याद दिलाते हैं कि जल केवल चढ़ाने की वस्तु नहीं है, बल्कि उसकी हर बूंद को संभालने की जिम्मेदारी भी हमारी है।

एकंबरेश्वर और जम्बुकेश्वर जैसे मंदिर बताते हैं कि टिकाऊ ड्रेनेज और भूजल रिचार्ज कोई नई अवधारणा नहीं है। यह ज्ञान हमारे पास पहले से मौजूद है, बस उसे फिर से देखने, समझने और अपनाने की जरूरत है।

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