लोक संस्कृति

इमेज क्रेडिट: शरत चंद्र प्रसाद
आस्‍था तो आस्‍था है, पानी चाहे गंदा हो या ज़हरीला, पूजा-पाठ की परंपरा को निभाने छठ व्रतियों का मेला हर साल यमुना के घाटों पर लग ही जाता है।
सूर्य ढलते ही घाट जीवंत हो उठते हैं। महिलाएं गीत गाती हैं, बच्चे खेलते हैं और पानी में दीप झिलमिलाते हैं। नदी का किनारा आस्था और आनंद का संगम बन जाता है।
डाढापुर के जिस कुएं पर एक समय महिलाओं की बैठकी, सखियों की बातचीत हुआ करती थी, लोग पीने के पानी के लिए जिसपर आश्रित थे, आज वहां गंदगी है। अब यहां बकरियां बांधी जाती हैं।
कुंती के हाथों में चिपके हैं छोटे-छोटे मीठे महुआ के फूल — जंगल की एक मीठी सौगात।
सीता बावड़ी
बैलों से चलने वाले पत्‍थर  के कोल्‍हू में कुछ इस तरह की जाती थी गन्‍ने और सरसों की पेराई
परंपरागत तालाब; फोटो - विकिमीडिया, Rakesh.5suthar
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