लोक संस्कृति

तमिलनाडु के कांचीपुरम का एकंबरेश्वर और तिरुचिरापल्ली का जम्बुकेश्वर जैसे मंदिरों की बनावट यह समझने में मदद करती है कि आस्था और विज्ञान मिलकर जल प्रबंधन की ऐसी टिकाऊ प्रणालियां बना सकते हैं।
हलमा की प्राचीन परंपरा के तहत सामूहिक श्रमदान के जरिये रतलाम की बजाना तहसील के तीन गांवों के अदिवासियों ने सुख चुके पानी के नालों को फिर से खोद कर जलाशय तैयार किया। 
कश्मीर के सीढ़ीदार खेतों में धान के सूखते हुए गट्ठर हैं। पहाड़ों पर सूरज की छाया पड़ रही है, जबकि घाटी मौसम के अलग-अलग रंगों से गुलज़ार है।
कैबार्ता जैसे समुदायों के लिए ब्रह्मपुत्र सिर्फ़ एक नदी नहीं, ज़िंदगी की ज़रूरतें पूरी करने वाली एक सतत धारा है।
इमेज क्रेडिट: शरत चंद्र प्रसाद
आस्‍था तो आस्‍था है, पानी चाहे गंदा हो या ज़हरीला, पूजा-पाठ की परंपरा को निभाने छठ व्रतियों का मेला हर साल यमुना के घाटों पर लग ही जाता है।
सूर्य ढलते ही घाट जीवंत हो उठते हैं। महिलाएं गीत गाती हैं, बच्चे खेलते हैं और पानी में दीप झिलमिलाते हैं। नदी का किनारा आस्था और आनंद का संगम बन जाता है।
डाढापुर के जिस कुएं पर एक समय महिलाओं की बैठकी, सखियों की बातचीत हुआ करती थी, लोग पीने के पानी के लिए जिसपर आश्रित थे, आज वहां गंदगी है। अब यहां बकरियां बांधी जाती हैं।
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