बैलों से चलने वाले पत्थर के कोल्हू में कुछ इस तरह की जाती थी गन्ने और सरसों की पेराई
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कहां गुम हो गए ईख-सरसों पेरने वाले मिर्ज़ापुर-जौनपुर के पत्थर के कोल्हू?
आज हमारे देश और दुनिया भर में प्राकृतिक विधि से तैयार किए गए ऑर्गेनिक उत्पादों की मांग उछाल पर है। पत्थर की धीमी चक्की पर पिसे आटे से लेकर लकड़ी के कोल्हू में पेरा गया सरसों, मूंगफली और तिल का तेल मुंहमांगी कीमतों पर बिक रहा है। देसी तरीके से बनाए गए ऑर्गेनिक गुड़ की मांग भी बहुत ज़्यादा है। ऐसे में लोगों को घरों में इस्तेमाल होने वाली चक्कियों, गांवों में चलने वाली घानियों और कोल्हुओं की न सिर्फ़ याद आ रही है, बल्कि उनका महत्व भी पता चल रहा है, जो हमें प्राकृतिक उत्पाद तैयार करके देते थे, वह भी बहुत कम दामों में। उत्तर प्रदेश के मिर्जा़पुर और उसके पड़ोसी जिले जौनपुर में बनने वाले गन्ना पेरने वाले पत्थर के कोल्हू इतिहास की एक ऐसी बहुमूल्य विरासत है, जो समय की दौड़ में पिछड़ कर कहीं गुम हो गई है।
विंध्याचल इलाके की खदानों से निकलने वाले पत्थरों से बनने वाले कोल्हू का इस्तेमाल सदियों तक बनारस जैसे पड़ोसी जिले के अलावा पूर्वांचल के गोरखपुर, देवरिया, बस्ती तक होता रहा। इस इलाके के किसान इन्हीं पत्थर के के कोल्हुओं को बैल से चला कर गन्ना पेरते रहे किसान। इनसे धीमी गति से पेराई करके गन्ने का रस निकलता था, जिससे प्राकृतिक तरीके से गुड़बनाया जाता था।
चौरी-चौरा के पास खेत में आज भी रखा है प्राचीन कोल्हू
गोरखपुर के प्रसिद्ध चौरी-चौरा के पास चौरी के एक खेत में रखा प्राचीन कोल्हू आज भी उस युग की गवाही दे रहा है। पत्थर का यह कोल्हू केवल एक औजार नहीं था, बल्कि खेती-किसानी की संपूर्ण संस्कृति का हिस्सा था। जिस तरह घरों में हाथ की चक्की और गांवों में लकड़ी की घानी आम बात थी, उसी तरह गन्ना उत्पादक क्षेत्रों में पत्थर का कोल्हू ग्रामीण अर्थव्यवस्था की धुरी हुआ करता था।
बड़ी-बड़ी चीनी मिलों के दौर से पहले खेत से गन्ना कटकर सीधे इन्हीं कोल्हू में आता था। यहां बैलों की धीमी चाल के साथ इनसे धीमे-धीमे रस निकलता था, जो आज मशीनों में पेरे जाने वाले गन्ने के रस की तुलना में गाढ़ा और मोटा हुआ करता था। इस रस को पास ही बनी भट्ठियों और कड़ाहों में उसे उबालकर दानेदार गुड़ तैयार होता। धैर्य पूर्वक की जाने वाली यह पूरी प्रक्रिया ग्रामीण सामुदायिक श्रम, सहयोग और प्राकृतिक संतुलन का सुंदर उदाहरण पेश करती थी।
कोल्हू के भारी-भरकम बेलनाकार पत्थरों को रस्सियों और बल्लियों के सहारे खींच और धकेल कर अपने मुकाम पर पहंचाया जाता था।
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विंध्याचल की खदानों से खेतों तक
विंध्याचल पर्वतमाला पर स्थित मिर्जापुर और जौनपुर क्षेत्र में उपलब्ध कठोर बलुआ पत्थर और चूना पत्थर से इन कोल्हुओं का निर्माण किया जाता था। भूगर्भीय अध्ययनों के मुताबिक विंध्य के पहाड़ हिमालय से भी प्राचीन हैं। विंध्य पर्वतमाला के भूगर्भीय महत्व का उल्लेख भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण यानी Geological Survey of India की रिपोर्ट में विंध्य पर्वतमाला का भौगोलिक और भूगर्भीय विवरण विस्तार से मिलता है।
यह रिपोर्ट विन्ध्यन बेसिन के भूविज्ञान, स्तरीकरण, पत्थर/शैलों तथा उसके स्ट्रैटिग्राफ़िक/टेक्टोनिक महत्व को विस्तृत रूप से दर्शाती है, जो भूगर्भीय दृष्टि से विंध्य पर्वतमाला को समझने के लिए उपयोगी है। इसके अलावा Vindhyan Supergroup – Geology Overview शीर्षक से प्रकाशित अध्ययन भी विंध्य क्षेत्र की भूगर्भीय बनावट, इसकी चट्टानों/स्तरों का वर्णन, और इसका प्रसरण/उत्पत्ति जैसे प्रमुख भूगर्भीय बिंदुओं को सरल भाषा में समझाता है।
मजबूती और दीर्घायु के लिए प्रसिद्ध विंध्य के पत्थर
विंध्य पर्वत के पत्थर अपनी मजबूती और दीर्घायु के लिए प्रसिद्ध रहे हैं। स्थानीय कारीगर इन्हीं पत्थरों को बड़े गोल आकार में तराश कर उसके बीच में गड्ढेनुमा संरचना बनाते थे। बीच में लोहे या सख्त लकड़ी की धुरी लगाई जाती थी। इस प्रकार बने कोल्हू को बैल घुमाते थे। कोल्हू को अपने मुकाम पर पहुंचाने में रास्ते में पड़ने वाले हर गांव का के लोगों का सहयोग होता था।
मिर्जापुर, जौनपुर में बने कोल्हू को पहले ट्रेन, ट्रक या नाव से आसपास के इलाके में कोल्हू को पहुंचाया जाता था। जिस गांव की सीमा पर कोल्हू पहुंचता था, वहां के नौजवान इसे अपने गांव की की सीमा तक पहुंचाने को तैयार रहते थे। वे कोल्हू के बेलनाकार पत्थरों को मिलकर धकेल-धकेल कर अपना गांव पार करा देते थे। मज़े की बात यह है कि यह मेहनत सामाजिक कार्य समझ कर की जाती थी, जिसका कोई मेहनताना नहीं, कोई शुल्क नहीं लिया जाता था। माहौल कुछ ऐसा था कि अगर किसी गांव में वह कोल्हू रुक जाता था, तो उस गांव की नाक कट जाती कि इस गांव के युवकों में शायद पौरुष बल नहीं है। इस तरह की सामाजिक व्यवस्था के चलते कोल्हू सैकड़ों किलोमीटर का सफर तय करके अपने मुकाम तक पहुंच जाया करता था।
अपने गंतव्य तक पहुंचने के बाद इस कोल्हू से गुड़ के उत्पादन की प्रक्रिया भी बड़ी आसान थी। ऊपर से गन्ना डाला जाता और नीचे से रस बहकर लकड़ी या लोहे की नांद में इकट्ठा होता। इस पूरी प्रक्रिया में बिजली या डीजल की कोई जरूरत नहीं होती थी। सारा काम बैल और मानवीय श्रम से होता था। इस कारण की इसकी गति धीमी होती थी, जिससे गन्ने के रस और उससे बनने वाले गुड़ में पोषक तत्व बने रहते थे।
यह पारंपरिक तकनीक सदियों तक चली। औपनिवेशिक दौर में भी जब चीनी मिलों की स्थापना शुरू हुई, उसके बाद भी कई दशकों तक ग्रामीण इलाकों, खासकर पूर्वांचल में कोल्हू से गन्ना पेरने की परंपरा बरकरार रही। उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध में बड़े पैमाने पर मिलों के आने के बावजूद देसी गुड़ उत्पादन ग्रामीण अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा बना रहा।
उत्तर प्रदेश के गोरखपुर के पास चौरी गांव में रखा पत्थर का एक पुराना कोल्हू।
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धीमी पेराई से पोषण का रिश्ता
आधुनिक क्रशर मशीनें गन्ने को तेज दबाव से कुचलती हैं। इससे अधिक रस तो निकलता है, लेकिन अत्यधिक गर्मी और ऑक्सीकरण के कारण रस में मौजूद सूक्ष्म पोषक तत्व नष्ट हो जाते हैं। इसके विपरीत पत्थर के कोल्हू में धीमी गति से पेराई होने के कारण रस में झाग कम बनता था और ऑक्सीकरण की प्रक्रिया सीमित रहती थी।
गुड़ के पोषण मूल्य के बारे में प्रकाशित रिपोर्ट बताती है कि पारंपरिक तरीके से बने गुड़ में आयरन, कैल्शियम और सूक्ष्म खनिज अपेक्षाकृत अधिक मात्रा में सुरक्षित रह सकते हैं। देसी कोल्हू से निकले रस में रासायनिक क्लैरिफायर या सल्फर का उपयोग नहीं होता था, जिससे गुड़ का रंग भले थोड़ा गहरा हो, पर उसका स्वाद और गुण अधिक प्राकृतिक होते थे। ग्रामीण बुजुर्ग भी बताते हैं कि पत्थर के कोल्हू का गुड़ पेट के लिए हल्का और स्वाद में अधिक संतुलित होता था। उसमें धुएं की हल्की सुगंध और गन्ने की मौलिक मिठास बरकरार रहती थी।
गुड़ में आयरन से लेकर मैग्नीशियम तक खनिज
वैज्ञानिक अध्ययनों में यह पाया गया है कि पारंपरिक तरीके से तैयार किया गया गुड़, जिसे शोध में नॉन-सेंट्रीफ्यूगल शुगर कहा जाता है, केवल सुक्रोज का स्रोत नहीं है बल्कि इसमें अनेक सूक्ष्म खनिज भी मौजूद रहते हैं। PMC/NCBI में प्रकाशित शोध के अनुसार 100 ग्राम गुड़ में आयरन की मात्रा लगभग 10 से 13 मिलीग्राम तक दर्ज की गई है, जो दैनिक आवश्यकता का महत्वपूर्ण हिस्सा पूरा कर सकती है। इसके अलावा इसमें कैल्शियम लगभग 40 से 100 मिलीग्राम, फास्फोरस 20 से 90 मिलीग्राम और मैग्नीशियम 70 से 90 मिलीग्राम तक पाया गया है। यही नहीं, पोटैशियम की मात्रा भी उल्लेखनीय रूप से अधिक होती है, जो शरीर के इलेक्ट्रोलाइट संतुलन के लिए जरूरी है।
शोध यह भी बताता है कि चूंकि गुड़ को पारंपरिक ढंग से बिना रिफाइनिंग और बिना सेंट्रीफ्यूज प्रक्रिया के तैयार किया जाता है, इसलिए गन्ने के रस में मौजूद खनिज और कुछ फाइटोकेमिकल तत्व अपेक्षाकृत सुरक्षित रहते हैं। इसके विपरीत परिष्कृत चीनी बनाने की प्रक्रिया में अधिकांश खनिज अलग हो जाते हैं और अंतिम उत्पाद लगभग शुद्ध सुक्रोज बनकर रह जाता है। यही कारण है कि गुड़ को केवल मिठास का विकल्प नहीं, बल्कि एक न्यूट्रास्यूटिकल यानी पोषण और स्वास्थ्य दोनों का स्रोत माना जाता है।
ग्रामीण इलाकों में सर्दियों के मौसम में गुड़ के सेवन की परंपरा केवल स्वाद के कारण नहीं थी, बल्कि आयरन और ऊर्जा पूर्ति के कारण भी थी। शोध में यह भी संकेत मिलता है कि गुड़ में मौजूद सूक्ष्म खनिज रक्त निर्माण, पाचन क्रिया और मेटाबॉलिज्म को सहारा दे सकते हैं। हालांकि यह भी ध्यान रखना जरूरी है कि गुड़ में कैलोरी अधिक होती है, इसलिए इसका सेवन संतुलित मात्रा में ही लाभकारी है।
ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ थे गुड़ के कोल्हू
पूर्वांचल के जिलों में गुड़ केवल एक मीठा खाद्य पदार्थ नहीं था, बल्कि विनिमय का माध्यम भी था। वास्तव में गुड़ सदियों तक यहां की ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ था। किसान अपनी उपज का एक हिस्सा गुड़ के रूप में सुरक्षित रखते थे। शादी-ब्याह, त्यौहार और मेहमाननवाजी में गुड़ का विशेष महत्व था। उत्तर प्रदेश के कृषि विभाग की वेबसाइट पर उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार (https://upagripardarshi.gov.in) राज्य देश के प्रमुख गन्ना उत्पादक क्षेत्रों में शामिल है।
उत्तर प्रदेश कृषि विभाग के आंकड़े बताते हैं कि प्रदेश का पूर्वी हिस्सा पारंपरिक रूप से छोटे किसानों पर आधारित रहा है, जहां देसी गुड़ उत्पादन की मजबूत परंपरा रही। कोल्हू आधारित उत्पादन में पूंजी निवेश कम था। बैल, स्थानीय पत्थर और श्रम ही मुख्य संसाधन थे। इससे किसान आत्मनिर्भर रहते थे और बाजार के उतार-चढ़ाव से अपेक्षाकृत सुरक्षित रहते थे।
चौरी-चौरा में मिला गन्ना पेरने वाला कोल्हू इसी दौर की की गवाही देता है। गोरखपुर के चौरी-चौरा क्षेत्र में रखा पुराना पत्थर का कोल्हू केवल कृषि इतिहास का हिस्सा नहीं, बल्कि स्वतंत्रता आंदोलन की स्मृतियों से भी जुड़ा इलाका है। चौरी चौरा का नाम 1922 की ऐतिहासिक घटना के कारण पूरे देश में जाना जाता है। आज भी गांवों में कहीं-कहीं ऐसे कोल्हू मिल जाते हैं, जिन पर काई जमी है और जिनकी धुरी जंग खा चुकी है। वे इस बात के मौन साक्षी हैं कि कभी यहां बैलों की टापों की आवाज और उबलते रस की खुशबू गूंजती थी।
पत्थर के कोल्हू से निकले गन्ने के रस को लोहे के कड़ाहों में पका कर बनाया जाता है मीठा गुड़।
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मशीनों का आगमन और परंपरा का क्षरण
बीसवीं सदी के मध्य से ग्रामीण भारत में कृषि का यंत्रीकरण तेज़ी से बढ़ने लगा। डीजल इंजन से चलने वाले क्रशर और बाद में बिजली आधारित मशीनों ने गन्ना पेराई की रफ्तार को कई गुना बढ़ा दिया। जहां पत्थर के कोल्हू में बैलों की चाल के साथ धीरे-धीरे रस निकलता था, वहीं मशीनें कुछ ही घंटों में कई किसानों का गन्ना पेर देती थीं। समय की बचत और अधिक उत्पादन ने किसानों को आकर्षित किया। धीरे-धीरे परंपरागत कोल्हू प्रतिस्पर्धा में पीछे छूटने लगे।
इसी दौर में चीनी मिलों का जाल भी फैलने लगा। मिलों ने गन्ने की सीधी खरीद, तौल की पर्ची और अपेक्षाकृत सुनिश्चित भुगतान का भरोसा दिया। बड़े बाजार से जुड़ाव और सरकारी नीतिगत समर्थन ने किसानों को मिलों की ओर मोड़ दिया। इसका परिणाम यह हुआ कि गांवों में गुड़ बनाने की सामुदायिक परंपरा कमजोर पड़ने लगी।
छोटे पैमाने पर चलने वाले कोल्हू बंद होने लगे तो उससे जुड़े कारीगर, लोहार, बैलगाड़ी चालक और अस्थायी मजदूर भी प्रभावित हुए। स्थानीय हाट-बाजार, जहां ताजा गुड़ बिकता था, उनकी रौनक घटने लगी। इस बदलाव ने केवल एक तकनीक को नहीं बदला, बल्कि ग्रामीण सामाजिक-आर्थिक ताने-बाने को भी धीरे-धीरे संकुचित कर दिया।
पर्यावरण के लिहाज से टिकाऊ था कोल्हू मॉडल
आज जब कार्बन उत्सर्जन और ऊर्जा संकट की चर्चा होती है, तब पत्थर का कोल्हू एक टिकाऊ मॉडल की तरह सामने आता है। इसमें जीवाश्म ईंधन की आवश्यकता नहीं थी। बैल आधारित ऊर्जा चक्र प्राकृतिक था और स्थानीय संसाधनों पर आधारित था। कोल्हू की संरचना भी पर्यावरण अनुकूल थी। स्थानीय खदानों से निकला पत्थर, गांव के लोहार द्वारा बनाई गई धुरी और किसान के अपने बैल—इन सबके मेल से तैयार यह तंत्र पूरी तरह ग्रामीण आत्मनिर्भरता पर आधारित था। उत्पादन प्रक्रिया में किसी रासायनिक क्लैरिफायर या कृत्रिम संरक्षक का इस्तेमाल नहीं होता था। गन्ने का रस सीधे कड़ाह में जाता और प्राकृतिक ईंधन से पकता। इससे न तो जल स्रोत प्रदूषित होते थे और न ही रासायनिक अपशिष्ट बनता था।
गन्ने की पेराई के बाद बचने वाला रेशा, जिसे बगास कहा जाता है, व्यर्थ नहीं जाता था। यही बगास कड़ाह के नीचे ईंधन के रूप में जलता और गुड़ तैयार करता। इस तरह खेत से निकला हर हिस्सा किसी न किसी रूप में उपयोग हो जाता था। जब बगास जलकर राख बनता, तो वह फिर खेत में खाद के रूप में लौट आता। यह चक्र मिट्टी की उर्वरता को बनाए रखने में सहायक होता था। आधुनिक अर्थशास्त्र में जिसे सर्कुलर इकोनॉमी कहा जाता है, उसकी सहज और स्वाभाविक मिसाल गांवों में पहले से मौजूद थी। यह एक प्रकार का सर्कुलर इकोनॉमी मॉडल था, जिसे आज आधुनिक शब्दावली में समझाया जाता है।
गांव के बूढ़े-बुजुर्ग आज भी कोल्हू से बने दानेदार और मज़ेदार गुण के स्वाद को याद करते हैं।
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क्या फिर लौट सकता है पत्थर का कोल्हू?
देश में ऑर्गेनिक उत्पादों की बढ़ती मांग इस परंपरा को पुनर्जीवित करने का अवसर दे सकती है। आज शहरी बाजार में देसी घानी का तेल और पत्थर की चक्की का आटा प्रीमियम कीमत पर बिक रहा है। उसी तरह पत्थर के कोल्हू का गुड़ भी विशिष्ट पहचान बना सकता है। इसके लिए जरूरी है कि इसे केवल पुरानी तकनीक के रूप में नहीं, बल्कि विरासत और स्वास्थ्य से जुड़े उत्पाद के रूप में प्रस्तुत किया जाए। यदि मिर्जापुर और जौनपुर के कारीगरों को प्रशिक्षण और बाजार समर्थन मिले, तो यह शिल्प फिर से जीवित हो सकता है। आज देश में हस्तशिल्प और पारंपरिक तकनीकों को बढ़ावा देने के लिए विभिन्न योजनाएं चल रही हैं। यदि पत्थर के कोल्हू निर्माण और देसी गुड़ उत्पादन को भी इन योजनाओं से जोड़ा जाए, तो यह स्थानीय रोजगार और सांस्कृतिक पहचान दोनों को सशक्त कर सकता है।
गांवों में मौजूद पुराने कोल्हुओं का दस्तावेजीकरण, संग्रहालयों में प्रदर्शन और ग्रामीण पर्यटन से जोड़ना भी एक पहल हो सकती है। विंध्य क्षेत्र की खदानों से लेकर खेतों तक की यह कहानी केवल अतीत की स्मृति नहीं, बल्कि भविष्य की संभावनाओं का संकेत भी है।
मिठास जो इतिहास में नहीं, भविष्य में भी चाहिए
मिर्जापुर-जौनपुर के पत्थर के कोल्हू केवल ईख पेरने की तकनीक नहीं थे, वे प्रकृति के साथ तालमेल, सामुदायिक श्रम और स्थानीय आत्मनिर्भरता के प्रतीक थे। आज जब दुनिया फिर से ऑर्गेनिक और प्राकृतिक जीवनशैली की ओर लौट रही है, तब यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या हम अपनी उन जड़ों को पहचान पाएंगे, जिन्हें हमने विकास की दौड़ में पीछे छोड़ दिया। शायद समय आ गया है कि चौरी के खेत में पड़े उस शांत कोल्हू को केवल स्मारक न रहने दिया जाए, बल्कि उसे फिर से घुमाया जाए, ताकि उसकी धीमी लय के साथ हमारे गांवों की खोई हुई मिठास भी लौट सके।
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