गुरुग्राम में भूजल दोहन 200% से ज्यादा: शहर की पानी की जरूरत कैसे पूरी होगी?

गुरुग्राम में भूजल दोहन 200% से ज्यादा: शहर की पानी की जरूरत कैसे पूरी होगी?

एकाभिषेक | CC BY-SA 3.0 | विकिमीडिया कॉमन्स

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Summary
  • गुरुग्राम में सालाना उपलब्ध भूजल संसाधन के मुकाबले भूजल दोहन दोगुने से भी अधिक रहा है।

  • केंद्रीय भूजल बोर्ड के आकलन में गुरुग्राम जिले में भूजल दोहन का स्तर 213 प्रतिशत से अधिक दर्ज किया गया है।

  • हरियाणा जल संसाधन एटलस के अनुसार गुरुग्राम जिले का औसत प्री-मानसून भूजल स्तर वर्ष 2000 में करीब 15.7 मीटर नीचे था, जो 2024 में करीब 30 मीटर नीचे पहुंच गया।

  • भूजल पर दबाव कम करने के लिए बोरवेल नियंत्रण के साथ सतही जलापूर्ति, वर्षा जल संचयन, ट्रीटेड पानी के इस्तेमाल और तालाबों व प्राकृतिक जल निकासी क्षेत्रों के संरक्षण पर भी काम करना होगा।

गुरुग्राम तेजी से फैलता शहर है। नई आवासीय सोसायटियों, दफ्तरों और निर्माण के साथ पानी की मांग भी बढ़ी है। गुरुग्राम की पानी की जरूरत का एक हिस्सा सतही जल स्रोतों से पूरा होता है, जबकि भूजल का इस्तेमाल भी लंबे समय से होता रहा है।

गुरुग्राम में जमीन से निकाले जा रहे पानी की मात्रा सालाना उपलब्ध भूजल संसाधन से काफी अधिक है। इसी आधार पर जिले के संबंधित आकलन क्षेत्रों को अतिदोहित श्रेणी में रखा गया है।

केंद्रीय भूजल बोर्ड (CGWB) के 2022 के भूजल संसाधन आकलन में गुरुग्राम जिले की सालाना भूजल निकासी करीब 42,819 हेक्टेयर-मीटर और भूजल दोहन का स्तर 213.14 प्रतिशत दर्ज किया गया। इसका मतलब है कि सालाना निकासी योग्य भूजल संसाधन के मुकाबले वास्तविक निकासी दोगुने से भी अधिक थी। यह आंकड़ा 2022 के आकलन का है। 2024 के वर्गीकरण में भी गुरुग्राम के संबंधित सभी आकलन क्षेत्र अतिदोहित श्रेणी में हैं।

भूजल दोहन 200 प्रतिशत होने का क्या मतलब है?

भूजल दोहन के आंकड़े को समझना जरूरी है। हर साल बारिश, नहरों, सिंचाई और दूसरी प्रक्रियाओं से कुछ पानी जमीन के अंदर जाता है। हर साल भूजल में जितना पानी दोबारा जुड़ता है, उसमें से जितनी मात्रा सुरक्षित रूप से निकाली जा सकती है, उसे सालाना निकासी योग्य भूजल संसाधन कहा जाता है।

CGWB के अनुसार भूजल दोहन का स्तर निकालने के लिए सालाना भूजल निकासी की तुलना सालाना निकासी योग्य भूजल संसाधन से की जाती है। 70 प्रतिशत तक का स्तर सुरक्षित (Safe), 70 से 90 प्रतिशत तक अर्ध-संकटग्रस्त (Semi-critical), 90 से 100 प्रतिशत तक संकटग्रस्त (Critical) और 100 प्रतिशत से अधिक अतिदोहित (Over-exploited) माना जाता है।

इसलिए गुरुग्राम में 200 प्रतिशत से अधिक दोहन का मतलब यह नहीं है कि जमीन के नीचे मौजूद सारा पानी एक साल में खत्म हो गया। इसका अर्थ है कि हर साल जितना भूजल दोबारा उपलब्ध होता है, उसके मुकाबले जमीन से कहीं ज्यादा पानी निकाला जा रहा है। अगर लंबे समय तक पानी का दोहन रिचार्ज से ज्यादा रहे, तो भूजल स्तर नीचे जा सकता है। ऐसे में पानी पहले की तुलना में अधिक गहराई पर मिलने लगता है।

2000 से 2024 के बीच भूजल स्तर में बड़ा बदलाव

गुरुग्राम में भूजल की स्थिति को केवल एक साल के दोहन के आंकड़े से नहीं समझा जा सकता। पिछले दो दशक से अधिक के भूजल स्तर के आंकड़े भी यही तस्वीर दिखाते हैं।

हरियाणा जल संसाधन एटलस 2025 के अनुसार जिले में प्री-मानसून औसत भूजल स्तर वर्ष 2000 में जमीन से लगभग 15.68 मीटर नीचे था। 2010 में यह 24.40 मीटर और 2020 में 29.72 मीटर नीचे दर्ज किया गया। 2024 में मानसून से पहले औसत भूजल स्तर जमीन से करीब 30.07 मीटर नीचे दर्ज किया गया। ये राज्य के भूजल सेल के प्रारंभिक (provisional) आंकड़े हैं।

मानसून के बाद के आंकड़ों में भी यही लंबी अवधि का बदलाव दिखाई देता है। साल 2000 में गुरुग्राम का औसत पोस्ट-मानसून भूजल स्तर करीब 15.33 मीटर था, जबकि 2024 में यह लगभग 29.30 मीटर नीचे दर्ज हुआ। मानसून से पहले और बाद, दोनों समय के आंकड़े बताते हैं कि गुरुग्राम में लंबे समय से भूजल स्तर नीचे जाने का दबाव बना हुआ है।

गुरुग्राम जिले के सभी आकलन क्षेत्र अतिदोहित

जिले की समस्या केवल पुराने गुरुग्राम शहर तक सीमित नहीं है। हरियाणा जल संसाधन प्राधिकरण के ब्लॉक-वार वर्गीकरण में फर्रुखनगर, पटौदी, सोहना, गुरुग्राम और गुरुग्राम अर्बन सभी अतिदोहित श्रेणी में दर्ज हैं।

इससे पता चलता है कि भूजल संकट केवल पुराने गुरुग्राम तक सीमित नहीं है। जिले के दूसरे हिस्सों में भी दोहन ज्यादा है। शहरी और निर्माण क्षेत्र के विस्तार के साथ पानी की जरूरत भी बढ़ रही है। लेकिन जिन इलाकों में भूजल पहले से अतिदोहित है, वहां नई मांग को लगातार बोरवेल से पूरा करना टिकाऊ समाधान नहीं है।

केवल बोरवेल बंद करना समाधान क्यों नहीं?

बिना अनुमति भूजल दोहन पर नियंत्रण जरूरी है। HWRA के अनुसार उद्योगों, हाउसिंग सोसायटियों और कई व्यावसायिक व संस्थागत इकाइयों को भूजल निकालने के लिए अनुमति लेनी होती है। इसमें अस्पताल, स्कूल, होटल और मॉल भी शामिल हैं। अनुमति के लिए यह भी बताना होता है कि पानी की जरूरत कितनी है और वर्षा जल संचयन व जल प्रबंधन की क्या व्यवस्था की गई है।

लेकिन केवल भूजल निकालने पर रोक लगा देने से शहर की पानी की मांग समाप्त नहीं होती। अगर किसी आवासीय क्षेत्र, निर्माण स्थल या उद्योग को भूजल इस्तेमाल नहीं करना है, तो उसके लिए दूसरा भरोसेमंद स्रोत भी होना चाहिए।

इसलिए गुरुग्राम की जल व्यवस्था में सवाल केवल यह नहीं है कि कितना भूजल निकाला जा रहा है। उतना ही महत्वपूर्ण सवाल यह है कि उसकी जगह पानी कहां से आएगा।

ट्रीटेड पानी भूजल पर दबाव कम कर सकता है

एक बड़ा विकल्प सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट से निकलने वाले साफ किए गए पानी का दोबारा इस्तेमाल है। निर्माण, बागवानी और कुछ औद्योगिक कामों में पीने योग्य पानी के बजाय मानक के अनुसार साफ किए गए ट्रीटेड पानी का इस्तेमाल किया जा सकता है।

हरियाणा की एकीकृत जल संसाधन कार्ययोजना 2025-27 में गुरुग्राम जिले के अलग-अलग हिस्सों में ट्रीटेड पानी के दोबारा इस्तेमाल के लक्ष्य तय किए गए हैं। योजना के अनुसार 2025-27 के दौरान गुरुग्राम ब्लॉक में ट्रीटेड पानी के दोबारा इस्तेमाल से 98 करोड़ लीटर, गुरुग्राम अर्बन में 27 करोड़ लीटर और पटौदी में 55 करोड़ लीटर पानी बचाने का लक्ष्य है। अगर पीने के अलावा दूसरे कामों में ट्रीटेड पानी का इस्तेमाल बढ़ाया जाए, तो निर्माण, बागवानी और कुछ औद्योगिक कामों के लिए भूजल पर निर्भरता कम की जा सकती है।

वर्षा जल संचयन की भूमिका

गुरुग्राम में समस्या केवल पानी की कमी की नहीं है। मानसून के दौरान शहर में जलभराव की समस्या भी सामने आती है। बारिश के पानी का सही प्रबंधन केवल जलभराव कम करने के लिए नहीं, भूजल रिचार्ज बढ़ाने के लिए भी जरूरी है। जहां जमीन और जलभृत की स्थिति उपयुक्त हो, वहां बारिश के पानी को जमीन के भीतर पहुंचाकर भूजल बढ़ाने में मदद मिल सकती है।

HWRA की गाइडलाइन के अनुसार छत से बारिश का पानी सहेजने की व्यवस्था बनाते समय स्थानीय भूजल स्थिति और जलभृत (aquifer) की प्रकृति को ध्यान में रखना चाहिए।

केवल रेनवाटर हार्वेस्टिंग संरचना बनाना पर्याप्त नहीं है। उसकी नियमित सफाई और रखरखाव के साथ यह भी देखना जरूरी है कि बारिश का पानी वास्तव में जमीन के भीतर पहुंच रहा है या नहीं।

तालाब और खुले क्षेत्र भी भूजल व्यवस्था का हिस्सा हैं

शहरों में भूजल की चर्चा अक्सर बोरवेल और रिचार्ज पिट तक सीमित रह जाती है। तालाब, जोहड़, प्राकृतिक निचले क्षेत्र और खुले भूभाग बारिश के पानी को कुछ समय रोकने और जमीन में उतरने का मौका दे सकते हैं। इसलिए तालाब, जोहड़ और खुले जल क्षेत्र केवल सौंदर्यीकरण की जगह नहीं हैं। ये शहर की जल व्यवस्था का भी हिस्सा हैं।

तेजी से बढ़ते शहर में कंक्रीट और पक्की सतह बढ़ने से बारिश के पानी के जमीन में उतरने की जगह कम हो सकती है। इसलिए पुराने तालाबों और जोहड़ों की बहाली को केवल सौंदर्यीकरण की परियोजना नहीं माना जाना चाहिए। तालाबों के साथ उनके जलग्रहण क्षेत्र और उनमें पानी पहुंचाने वाले प्राकृतिक रास्तों को बचाना भी जरूरी है।

GMDA OneMap में पानी की पाइपलाइन, सीवर, ड्रेनेज और जलग्रहण क्षेत्रों की अलग-अलग GIS परतें उपलब्ध हैं। इससे शहर की पानी, सीवर और जल निकासी व्यवस्था को एक साथ समझने में मदद मिल सकती है।

गुरुग्राम को किस तरह की जल रणनीति चाहिए?

गुरुग्राम की भूजल समस्या का कोई एक समाधान नहीं है। भूजल पर निर्भरता कम करने के लिए कई उपाय साथ-साथ करने होंगे। इनमें सतही जलापूर्ति, ट्रीटेड पानी का इस्तेमाल और वर्षा जल संचयन शामिल हैं। निर्माण, उद्योग और बागवानी जैसे कामों में ट्रीटेड पानी का इस्तेमाल बढ़ाना और वर्षा जल संचयन संरचनाओं का नियमित रखरखाव जरूरी है।

तालाबों, जोहड़ों, प्राकृतिक नालों और खुले रिचार्ज क्षेत्रों को बचाना भी इसी रणनीति का हिस्सा होना चाहिए। नई परियोजनाओं को मंजूरी देते समय उनके पानी के स्रोत को भी देखना जरूरी है। यह भी आकलन होना चाहिए कि उनसे भूजल पर कितना अतिरिक्त दबाव पड़ेगा।

हरियाणा जल संसाधन एटलस 2025 के अनुसार गुरुग्राम में जलोढ़ मिट्टी और क्वार्टजाइट चट्टानों से जुड़े अलग-अलग तरह के जलभृत पाए जाते हैं। इनमें पानी के दोबारा भरने की दर एक जैसी नहीं है। इसलिए एक ही तरह की भूजल रिचार्ज व्यवस्था हर इलाके में समान रूप से कारगर नहीं हो सकती।

गुरुग्राम के लिए चुनौती केवल गिरते भूजल स्तर को रोकना नहीं है। चुनौती यह है कि तेजी से बढ़ते शहर की पानी की जरूरत ऐसी व्यवस्था से पूरी की जाए जिसमें जमीन से निकाले जाने वाले पानी और वापस जमीन तक पहुंचने वाले पानी के बीच संतुलन बने।

200 प्रतिशत से अधिक भूजल दोहन का आंकड़ा इसी असंतुलन की ओर इशारा करता है। गुरुग्राम की जल सुरक्षा के लिए इन उपायों को अलग-अलग नहीं देखा जा सकता। भूजल, सतही जल, ट्रीटेड पानी, वर्षा जल संचयन, तालाब और प्राकृतिक जल निकासी सब एक-दूसरे से जुड़े हैं।

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