नेपाल की बाढ़ में बहकर आई मछलियां बन रही आफत, बिहार में खाने-बेचने पर चेतावनी

नेपाल की बाढ़ के बाद गंडक नदी के जरिये बिहार तक आ गईं थाई मांगुर और अफ्रीकन कैटफिश जैसी आक्रामक प्रजातियों की मछलियां, जिन्‍हें पकड़ कर बाजारों में बेचा जा रहा है।

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  • प्रदूषित पानी से निकाली गई मछलियों को खाने से संक्रामक बीमारियों का खतरा

  • आक्रामक प्रजातियां स्थानीय मछलियों और जैव विविधता को पहुंचा सकती हैं नुकसान

  • मरी हुई बड़ी मछलियों को नदी से निकाल कर बाज़ार में बेच रहे मछुआरे

पिछले हफ्ते नेपाल में अचानक आई भीषण बाढ़ में सैकड़ों लोगों के मारे जाने व लापता होने की खबरों के साथ ही भारी मात्रा में सपत्ति के नुकसान ने हज़ारों परिवारों को बर्बाद कर दिया। इस बाढ़ से नेपाल को उसके कुल सकल घरेलू उत्‍पाद (GDP) के दसवें हिस्‍से जितना नुकसान होने का अनुमान जताया जा रहा है। ग्‍लेशियर झील के फटने से आई इस बाढ़ यानी  ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड यानी GLOF का असर सिर्फ आर्थिक नुकसान तक सीमित नहीं है। यह फ्लैश फ्लड (Flash flood) नदियों के पर्यावरणीय और पारिस्थितिक तंत्र को भी एक बड़ा झटका दे गई है। नदियों में भरा कीचड़ जहां जलीय जीवों और वनस्‍पतियों के लिए जानलेवा साबित हुआ है, वहीं  गंडक के रास्ते बिहार पहुंची बड़ी, घयल और आक्रामक प्रजातियों की मछलियां एक अलग मुसीबत बन गई हैं। बिहार की कुछ जगहों पर लोगों द्वारा इन्हें पकड़कर खाने और बाजार में बेचने की खबरों के सामने आने के बाद। बिहार सरकार ने सतर्कता बरतते हुए लोगों को ऐसी मछलियों के खाने और बेचने से बचने की सलाह दी है। साथ ही बाढ़ बहकर आई कई आक्रामक विदेशी प्रजातियों की मछलियों को स्‍थानीय नदी तंत्र में फैलने से रोकने की भी चिंता बढ़ती जा रही है। क्‍योंकि इन आक्रामक प्रजाति की मछलियों से स्थानीय मछलियों और जैव विविधता पर भी दबाव बढ़ने का खतरा पैदा हो गया है।

बाढ़ के साथ नदी में पहुंचीं बड़ी और अनजान मछलियां

नेपाल में आई बाढ़ से बिहार के पश्चिम चंपारण, गोपालगंज और आसपास के इलाकों में गंडक नदी में असामान्य और बड़ी मछलियां दिखाई देने की खबरें सामने आई हैं। कई मीडिया रिपोर्टों में बेहद बड़ी मछलियां पकड़े जाने का दावा किया गया है। जबकि कुछ रिपोर्टों में स्थानीय मछुआरों द्वारा भारी मात्रा में इन मछलियों को पकड़कर बाजार में लाने की बाते भी सामने आई हैं। 

अभी सबसे मजबूत रिपोर्ट थाई मांगुर और अफ्रीकन कैटफिश और गूंछ/गोंच कैटफिश (Bagarius bagarius) को लेकर है। इसे नेपाल के नारायणी-त्रिशूली नदी तंत्र की मूल प्रजातियों में दर्ज किया गया है। संयुक्त राष्ट्र के खाद्य और कृषि संगठन (FAO) की नदी सर्वेक्षण रिपोर्ट में इसे नेपाल की सबसे बड़ी कैटफिश में बताया गया है। जून से लेकर सितंबर तक नारायणी-त्रिशूली नदी तंत्र में इसकी मौजूदगी अधिक रहने की बात भी इस रिपोर्ट में कही गई है। इसी आधार पर हालिया मीडिया रिपोर्टों में नेपाल की बाढ़ के बाद बिहार के गंडक बेसिन में मिली बड़ी, असामान्य मछलियों को विशेषज्ञों ने गूंछ कैटफिश होने की संभावना जताई गई है। 

बिहार सरकार के डेयरी, मत्स्य एवं पशु संसाधन विभाग ने 31 अगस्त के आसपास जारी जनहित सलाह में लोगों से बाढ़ के पानी के साथ आई अज्ञात या असामान्य मछलियों को नहीं खाने, खरीदने या बेचने की अपील की है। सरकार ने कहा है कि बाढ़ के दौरान तालाबों, नदियों और जलाशयों की मछलियां पानी के साथ दूर तक फैल सकती हैं और इस दौरान उनका संपर्क गंदी नालियों, मृत जानवरों और सड़ने वाले जैविक पदार्थों से हो सकता है।

सरकार ने यह भी कहा है कि ऐसी परिस्थितियों में मछलियों के दूषित होने की संभावना रहती है और इनमें बैक्टीरिया, वायरस तथा फंगस जैसे रोगजनक मौजूद हो सकते हैं। जब तक बाढ़ का पानी स्थिर नहीं हो जाता और जलस्रोतों की स्थिति सामान्य नहीं होती, तब तक बाढ़ के पानी से पकड़ी गई अज्ञात मछलियों के सेवन से बचने की सलाह दी गई है।

<div class="paragraphs"><p>बिहार सरकार ने बाढ़ में बहकर आई मछलियों को खाने और बेचने से बचने के लिए लोगों को सोशल मीडिया पर एडवाइजरी जारी की।&nbsp;</p></div>

बिहार सरकार ने बाढ़ में बहकर आई मछलियों को खाने और बेचने से बचने के लिए लोगों को सोशल मीडिया पर एडवाइजरी जारी की। 

फोटो : X

सिर्फ बीमारी की नहीं, नदी की जैव विविधता की भी चिंता 

इस पूरे मामले का दूसरा और ज्यादा दीर्घकालिक पहलू नदी की जैव विविधता से जुड़ा है। यदि बाढ़ के साथ कोई विदेशी या आक्रामक मछली प्रजाति नए जलक्षेत्र में पहुंचती है और वहां उसका प्रजनन हो जाता है, तो वह स्थानीय प्रजातियों के लिए कड़ी प्रतिस्पर्धा और कई बार अस्तित्‍व के लिए संकट तक पैदा कर सकती है।

भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद यानी ICAR ने मई 2026 में आक्रामक विदेशी मछलियों पर राष्ट्रीय कार्यशाला आयोजित की थी। 21–22 मई 2026 को बैरकपुर में “Invasive Exotic Fishes in Freshwater Ecosystems: Status, Knowledge Gaps and Future Research Priorities” शीर्षक से आयोजित राष्ट्रीय कार्यशाला में अफ्रीकी कैटफिश, नाइल तिलापिया, कॉमन कार्प और सकरमाउथ आर्मर्ड कैटफिश जैसी प्रजातियों के प्रसार को भारतीय मीठे पानी की जैव विविधता के लिए गंभीर चिंता बताया गया। ICAR के मुताबिक इन प्रजातियों के स्थापित होने से जैव विविधता का क्षरण, आवास में बदलाव, पारिस्थितिक असंतुलन और मत्स्य आधारित आजीविका पर असर पड़ सकता है। यानी बाढ़ के साथ आई हर बाहरी मछली अपने आप में खतरा नहीं है, लेकिन यदि इनमें ऐसी विदेशी प्रजातियां हैं जो नए जलक्षेत्र में तेजी से स्थापित हो सकती हैं, तो स्थिति पर वैज्ञानिक निगरानी जरूरी हो जाती है।

अफ्रीकन कैटफिश का रिकॉर्ड क्यों चिंता बढ़ाता है

भारत में अफ्रीकन कैटफिश यानी Clarias gariepinus को लेकर पहले से पर्यावरणीय चिंताएं रही हैं। यह तेज वृद्धि, मजबूत जीवित रहने की क्षमता और विविध आहार के लिए जानी जाती है। भारतीय जलाशयों में किए गए अध्ययनों में इसके स्थानीय मछली समुदायों पर प्रतिकूल प्रभाव के संकेत मिले हैं।

केरल के करापुझा जलाशय पर किए गए एक अध्ययन में Clarias gariepinus के कारण मछलियों और क्रस्टेशियन पर प्रतिकूल प्रभाव पाया गया। अध्ययन में इसके साथ अन्य मछलियों के संसाधनों को लेकर 92 प्रतिशत तक निच ओवरलैप दर्ज किया गया, यानी यह स्थानीय जीवों के समान संसाधनों का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल कर सकती है।

केरल के मट्टुपेट्टी जलाशय पर हुए एक अन्य अध्ययन में अफ्रीकन कैटफिश में कैनिबलिज्म (Cannibalism) यानी अपनी ही प्रजाति के सदस्यों को खाने का व्यवहार भी दर्ज किया गया। अध्ययनकर्ताओं ने स्थानीय प्रजातियों के संभावित विस्थापन की आशंका जताई। इसके अलावा 2026 में प्रकाशित एक व्यापक समीक्षा में भी भारत में गैर-देशी मछलियों के प्रभावों का विश्लेषण किया गया है। इसमें अफ्रीकन कैटफिश सहित कुछ गैर-देशी प्रजातियों के स्थानीय जीवों पर शिकार और भोजन संबंधी प्रतिस्पर्धा के जरिए प्रतिकूल प्रभाव का उल्लेख है।

बाढ़ में आई मछली खाने में बीमारी का जोखिम क्यों?

बिहार सरकार की चेतावनी का सबसे तत्काल कारण स्वास्थ्य सुरक्षा है। बाढ़ का पानी सामान्य नदी के पानी जैसा नहीं रहता। इसमें सीवेज, नालियों का पानी, मृत पशु, कचरा और दूसरे प्रदूषक मिल सकते हैं। FAO की एक रिसर्च रिपोर्ट के अनुसार प्राकृतिक आपदाओं के दौरान बाढ़ का पानी सीवेज से लेकर विभिन्न रासायनिक प्रदूषकों तक को फैला सकता है और इससे खाद्य तथा जलजनित बीमारियों का जोखिम बढ़ जाता है।

विश्‍व स्‍वास्‍थ्‍य संगठन यानी WHO ने भी अपनी एक रिपोर्ट में बाढ़ के पानी के संपर्क में आए भोजन को असुरक्षित मानने की चेतावनी दी है। उसका कहना है कि बाढ़ के दौरान खाद्य पदार्थ रोग पैदा करने वाले सूक्ष्मजीवों और अन्य प्रदूषकों के संपर्क में आ सकते हैं।

इसलिए बाढ़ के पानी में रहने से मछली के संक्रमित होने की संभावना बढ़ सकती है, हालांकि ऐसा नहीं कहा जा सकता कि हर ऐसी मछली निश्चित रूप से संक्रामक होगी। मछली मरने के बाद यदि उसे उचित तापमान पर सुरक्षित तरीके से नहीं रखा जाए तो खराब होने की प्रक्रिया भी तेज हो सकती है। बिहार सरकार ने इसी व्यापक जोखिम को देखते हुए अज्ञात मछलियों को खाने से रोकने की सलाह दी है। रिपोर्टों के अनुसार ऐसी मछली खाने के बाद कुछ लोगों में उल्टी, दस्त, पेट दर्द, चक्कर और अन्य परेशानी की शिकायत भी सामने आई है।

भारत में आक्रामक मछली प्रजातियों की स्थिति

<div class="paragraphs"><p>बाढ़ में बहकर आई बड़े आकार की मछलियों को नदी से निकाल कर स्‍थानीय बाजारों में बिक्री के लिए ले जाया गया।&nbsp;</p></div>

बाढ़ में बहकर आई बड़े आकार की मछलियों को नदी से निकाल कर स्‍थानीय बाजारों में बिक्री के लिए ले जाया गया। 

फोटो : एक्‍स

"बड़ी मछली से बड़ी कमाई" के लालच ने बढ़ाया जोखिम 

बाढ़ के दौरान मछुआरों के लिए नदी में बड़ी संख्या में मछलियों का आ जाना आर्थिक अवसर जैसा दिखाई दे सकता है। गोपालगंज और गंडक क्षेत्र से ऐसी मछलियों को पकड़कर बेचने की खबरें और वीडियो भी सोशल मीडिया पर आए हैं। हालांकि इनमें निश्चित तौर पर मछली की प्रजाति, उसके स्रोत और उसके स्वास्थ्य की स्थिति की पुष्टि नहीं है। सामान्य परिस्थितियों में बाजार में आने वाली मछली की सप्लाई चेन, संरक्षण और खाद्य सुरक्षा की कुछ व्यवस्था होती है। इसके विपरीत, बाढ़ में नदी से सीधे निकली अज्ञात मछली के मामले में यह भरोसा नहीं रहता। इसीलिए बिहार सरकार ने लोगों से ऐसी मछलियों की खरीद-बिक्री से भी बचने को कहा है। किसी अज्ञात मछली को केवल उसके आकार, दिखने या ताजगी के आधार पर खाने योग्य मान लेना सुरक्षित नहीं है।

निष्‍कर्ष : घबराने की नहीं, जरूरत है निगरानी की

नेपाल से आई बाढ़ के साथ बड़ी संख्‍या में मछलियां और दूसरे जीव भी एक जलक्षेत्र से दूसरे जलक्षेत्र तक पहुंच गए हैं। इसलिए बाढ़ के बाद नदी तंत्र की निगरानी जरूरी हो गई है और यह निगरानी केवल जलस्तर और कटाव तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। खासकर, गंडक जैसी अंतरराष्ट्रीय नदी प्रणाली में मछलियों की प्रजातिगत पहचान, संख्या, उनके प्रजनन की स्थिति और स्थानीय मछली आबादी पर उनके प्रभाव का अध्ययन किया जाना जरूरी है। यदि कोई विदेशी आक्रामक प्रजाति मिलती है तो उसके फैलाव को शुरुआती स्तर पर रोकना ज्यादा आसान होता है। इससे घबराने की ज़रूरत नहीं है, बल्कि बाढ़ के दौरान नदी तंत्र की निगरानी करके काफी हद तक इस समस्‍या से निपटा जा सकता है। यह चिंता इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि भारत पहले से ही अपनी स्वदेशी मछलियों को बचाने के प्रयास कर रहा है। 2026 में ICAR-CIFRI ने गंगा और आर्द्रभूमियों में रोहू, कतला, मृगल, कालबासु और स्वदेशी कैटफिश जैसी प्रजातियों की बहाली के कार्यक्रम चलाए हैं।

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