सुप्रीम कोर्ट में करीब चार दशक से चल रहा था पर्यावरणविद् एमसी मेहता का केस, जिसे बंद करके अब नए केस के रूप में लिस्‍ट किया गया है। 

सुप्रीम कोर्ट में करीब चार दशक से चल रहा था पर्यावरणविद् एमसी मेहता का केस, जिसे बंद करके अब नए केस के रूप में लिस्‍ट किया गया है। 

स्रोत : विकी कॉमंस

सुप्रीम कोर्ट में बंद हुई ‘पर्यावरण की सबसे बड़ी लड़ाई' की फाइल, जानिए क्‍या है 41 साल पुराना एमसी मेहता केस

मेहता का केस बंद होने के बाद एक नए स्‍वत: संज्ञान केस 'एनसीआर में वायु प्रदूषण के मुद्दे पर पुनर्विचार' के रूप में सुप्रीम कोर्ट में जारी रहेगी सुप्रीम कोर्ट में पर्यावरण मामलों की कानूनी लड़ाई
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सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में 41 साल पहले 1985 में प्रख्‍यात पर्यावरणविद एमसी मेहता की ओर से दाखिल एनसीआर वायु प्रदूषण संबंधी याचिका की सुनवाई को औपचारिक रूप से बंद कर दिया है। ‘पर्यावरण की सबसे बड़ी लड़ाई' के नाम से मशहूर इस केस के तहत करीब चार दशक से वाहनों की आयु, सीएनजी जैसे मुद्दों पर सुनवाई चल रही थी। अब कोर्ट ने इस केस को खत्‍म कर इसे स्वतः संज्ञान के तहत 'एनसीआर में वायु प्रदूषण के मुद्दे पर पुनर्विचार' (Re: Issues of Air Pollution in the National Capital Region) शीर्षक से एक नया केस दर्ज (re-captioned) करने का निर्देश दिया है। इस तरह एमसी मेहता केस को बंद किए जाने के बावजूद नया मामला दर्ज (re-captioned) करके दिल्ली-NCR के प्रदूषण पर कानूनी लड़ाई जारी रहेगी। 

क्‍यों बंद हुआ केस कोर्ट ने क्‍या कहा ? 

कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि यह मुद्दा 1985 में उठाया गया था, 1990 के दशक में इसमें तेजी आई, जिसमें नए मानक लागू किए गए और वाहनों की आयु सीमा तय करने तथा अन्य कई जरूरी उपाय किए गए। अधिकांश मामलों में समय-समय पर अदालत द्वारा सुनवाई कर आवश्यक निर्देश भी जारी किए गए। पक्षकारों की सुनवाई के बाद अब यह उचित समय है कि 1985 की मूल रिट याचिका से उत्पन्न कार्यवाही का निस्तारण किया जाए। यह मुद्दा हाल का नहीं है, इसलिए याचिका को उचित रूप से पुनः नामित किया जाना चाहिए।

इस तरह चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अगुवाई वाली बेंच ने आदेश देते हुए साफ कर दिया कि अब इस पुराने मामले में कोई भी नई अर्जी स्वीकार नहीं की जाएगी। 

<div class="paragraphs"><p>‘भारत का ग्रीन एवेंजर’ के रूप में जाने जाने वाले&nbsp;एमसी मेहता पेशे से वकील और एक उत्साही पर्यावरणविद् हैं।</p></div>

‘भारत का ग्रीन एवेंजर’ के रूप में जाने जाने वाले एमसी मेहता पेशे से वकील और एक उत्साही पर्यावरणविद् हैं।

स्रोत : फेसबुक

कौन हैं एमसी मेहता 

एमसी मेहता पेशे से वकील और शौक से उत्साही पर्यावरणविद हैं। उनका लक्ष्य भारत के पर्यावरण को प्रदूषण मुक्त और स्वस्थ बनाना है। मेहता एकमात्र सुप्रीम कोर्ट के वकील हैं जिन्होंने प्रदूषण फैलाने वाले भारतीय उद्योगों के खिलाफ आवाज उठाई और उनके विरुद्ध जीत हासिल की। इसलिए उन्‍हें ‘भारत का ग्रीन एवेंजर’ के नाम से भी जाना जाता है। ​​उन्होंने जम्मू विश्वविद्यालय से राजनीति विज्ञान एवं कानून में स्नातकोत्तर की पढ़ाई पूरी की और जम्मू-कश्मीर उच्च न्यायालय में अपनी प्रैक्टिस शुरू की।

गोल्डमैन पर्यावरण पुरस्कार के विजेता एमेहता वर्तमान में एमसी मेहता पर्यावरण फाउंडेशन के साथ काम कर रहे हैं , जो एक गैर सरकारी संगठन है जो पर्यावरण वकीलों के लिए प्रशिक्षण कार्यक्रम प्रदान करता है और पर्यावरण न्याय के लिए कई अभियान चलाता है। एक पर्यावरणविद् के रूप में एम सी मेहता की यात्रा 1980 के दशक की शुरुआत में आरंभ हुई, जब उन्होंने गंगा नदी के प्रदूषण के संबंध में उच्चतम न्यायालय में एक जनहित याचिका (PIL) दायर की। पर्यावरण संबंधी मुकदमों में उनकी पहल जनहित याचिकाओं के रूप में हुई, जिसकी कानूनी प्रक्रिया किसी भी नागरिक को लोकहित में मामला दायर करने की अनुमति देती है। अपनी कई चर्चित जनहित याचिकाओं के माध्यम से वह विभिन्न पर्यावरणीय मुद्दों पर कानूनी कार्रवाई करवाने और जवाबदेह सुनिश्चित कराने में सक्षम रहे हैं। इस तरह मेहता ने सामाजिक एवं पर्यावरण संबंधी न्याय के लिये जनहित याचिका को  कानूनी प्रणाली के एक कारगर उपाय के रूप में उपयोग की एक बेहतरीन मिसाल कायम की है। हालांकि, उनका यह काम काफी चुनौतियों और जद्दोजहद भरा रहा है। इस वीडियो के ज़रिये आप पर्यावरणीय विषयों पर उनकी सोच और कानूनी लड़ाई के बारे में जान सकते हैं : 

मेहता ने बीते दशकों में पर्यावरण से जुड़े कई मुकदमे लड़े हैं, जिनमें से कुछ का विवरण इस प्रकार है -  

ओलियम गैस रिसाव मामला (1985)

यह मामला भोपाल गैस त्रासदी के एक साल बाद 1985 में एमसी मेहता और भारत सरकार के बीच हुआ था। मेहता ने मांग की थी कि दिल्ली के एक भीड़भाड़ वाले इलाके में स्थित श्रीराम फूड एंड फर्टिलाइज़र इंडस्ट्री को बंद कर दिया जाए, क्‍योंकि  इस उद्योग से पेट्रोलियम गैस (ओलियम) का रिसाव हुआ था। याचिका में कहा गया था कि इस कारखाने की लोकेशन के कारण लोगों के जीवन के लिए खतरनाक जोखिम है। केस की सुनवाई के बाद  7 और 24 दिसंबर को कोर्ट ने सहायक कारखाना आयुक्त और कारखाना निरीक्षक को कारखाना अधिनियम (1948) के तहत संयंत्र को बंद करने के दो आदेश जारी किए।

एंटॉप हिल मामला (1985)

पर्यावरण न्यायशास्त्र से जुड़ा एक महत्वपूर्ण प्रकरण माना जाता है। इसमें प्रसिद्ध पर्यावरण वकील M. C. Mehta ने Antop Hill क्षेत्र में खतरनाक और प्रदूषण फैलाने वाले उद्योगों के संचालन को चुनौती दी थी। उनका तर्क था कि बई के मध्य-पूर्वी हिस्से में स्थित घनी आबादी वाले एंटॉप हिल इलाके में ऐसे उद्योग लोगों के स्वास्थ्य, जल-वायु गुणवत्ता और जीवन के अधिकार को नुकसान पहुंचा रहे हैं। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने पर्यावरण संरक्षण और नागरिकों के जीवन के मौलिक अधिकार को प्राथमिकता देते हुए सख्त रुख अपनाया। अदालत ने खतरनाक इकाइयों को बंद करने या उन्हें आबादी से दूर स्थानांतरित करने के निर्देश दिए। यह फैसला भारत में “सतत विकास” सानी सस्‍टेनेबल डेवलपमेंट और “प्रदूषक भुगतान करे” जैसे सिद्धांतों को मजबूत करने वाला एक अहम उदाहरणमाना जाता है।  

ताज ट्रेपेज़ियम केस (1986)

मेहता ने 1984 में ताजमहल का दौरा किया और देखा कि ताजमहल का सफेद संगमरमर पीला पड़ रहा है। इसे देखते हुए उन्‍होंने 1986 में सर्वोच्च न्यायालय में भारत सरकार को प्रतिवादी बनाते हुए एक रिट याचिका दायर की। यह केस  ताज ट्रेपेज़ियम केस के नाम से मशहूर हुआ। अपनी याचिका में उन्‍होंने कोर्ट को बताया कि ताज महल का रंग वायु  प्रदूषण के कारण पीला पड़ रहा है। ऐसा हवा में मौजूद सल्फर डाइऑक्साइड और ऑक्सीजन जैसी प्रदूषक गैसों के उत्सर्जन से अम्लीय वर्षा होने के कारण हो रहा है। इसके परिणामस्वरूप, ताजमहल के आसपास के थर्मल पावर स्टेशनों को बंद करने और सल्फर डाइऑक्साइड के उत्सर्जन को 50% तक कम करने के उपाय किए गए। साथ ही ताजमहल के 10,400 वर्ग किलोमीटर में फैले ट्रेपेज़ियम क्षेत्र का निर्माण इसे प्रदूषण से बचाने के लिए किया गया। न्यायालय ने 292 उद्योगों को कोयले/कोक के बजाय प्रोपेन जैसे सुरक्षित ईंधन का उपयोग करने या उद्योग को स्थानांतरित करने का आदेश दिया।

गंगा प्रदूषण मामला (1988)

एमसी मेहता ने संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत 1988 में सर्वोच्च न्यायालय में एक जनहित याचिका दायर कर कोर्ट को बताया कि गंगा नदी में भारी मात्रा में घरेलू कचरे के साथ औद्योगिक कचरा भी बहाया जा रहा है, जो नदी को प्रदूषित कर रहा है। इसलिए नदी का संरक्षण अत्यंत आवश्यक है। न्यायालय ने अपने आदेश में कानपुर नगर पालिका को पूर्णतः विफल बताया और उससे पर्याप्त जल निकासी और सीवेज ट्रीटमेंट की व्यवस्था के लिए कार्रवाई करने का निर्देश दिया। न्यायालय ने नदी के सांस्कृतिक एवं धार्मिक महत्त्व पर ज़ोर देते हुए प्रदूषण को नियंत्रित करने तथा गंगा की गुणवत्ता में सुधार के लिये कई निदेश जारी किए। कोर्ट ने यह भी कहा कि शवों और अधजले शवों को गंगा नदी में फेंकने की प्रथा को शीघ्र समाप्त किया जाना चाहिए।

स्टोन क्रशिंग यूनिट केस (1992)

मेहता ने ने हरियाणा में बड़े पैमाने पर चल रही स्टोन क्रशिंग यूनिट्स के खिलाफ जनहित याचिका दायर की थी। आरोप था कि ये इकाइयाँ बिना पर्याप्त पर्यावरणीय अनुमति और सुरक्षा उपायों के संचालित हो रही थीं, जिससे आसपास के इलाकों में धूल प्रदूषण, जल स्रोतों का क्षरण और लोगों के स्वास्थ्य पर गंभीर प्रभाव पड़ रहा था। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने पर्यावरण संरक्षण को प्राथमिकता देते हुए कई स्टोन क्रेशरों को बंद करने या स्थानांतरित करने के निर्देश दिए। साथ ही, जो इकाइयाँ चल सकती थीं, उनके लिए कड़े प्रदूषण नियंत्रण मानक, हरित पट्टी विकसित करने और नियमित निगरानी जैसे उपाय अनिवार्य किए गए। यह फैसला औद्योगिक गतिविधियों और पर्यावरण संतुलन के बीच संतुलन स्थापित करने की दिशा में महत्वपूर्ण माना गया। 

तमिलनाडु बाल श्रम केस (1996)

मेहता ने यह मुकदमा माचिस फैक्ट्रियों के साथ-साथ अन्य खतरनाक फैक्ट्रियों में बाल श्रम पर रोक के लिए दायर किया था इसलिए इसे बाल श्रम मामले के नाम से भी जाना जाता है। इस केस के चलते उच्चतम न्यायालय ने माचिस फैक्ट्रियों के साथ-साथ अन्य खतरनाक फैक्ट्रियों में बाल श्रम की निगरानी हेतु एक समिति का गठन किया। इस समिति ने बाल श्रम के कारण होने वाली घातक दुर्घटनाओं को रोकने के लिये कई सिफारिशें की। समिति ने सिफारिश की कि तमिलनाडु राज्य को यह सुनिश्चित करने के लिये निदेशित किया जाना चाहिये कि बच्चों को आतिशबाजी कारखानों में काम न करने दिया जाए। समिति ने 6 घंटे काम करने, बच्चों को केवल पैकिंग कार्य में नियोजित करने, विश्राम की सुविधा, बच्‍चों की शिक्षा और बीमा आदि की भी सिफारिश की।

मेहता बनाम कमलनाथ व अन्य (1996–1997) 

भारत के पर्यावरण कानून का एक ऐतिहासिक मामला है। इसमें पर्यावरण कार्यकर्ता मेहता ने आरोप लगाया कि मध्‍य प्रदेश के उद्योगपति कमल नाथ, जोकि केंद्रीय मंत्री भी रहे, उनसे जुड़ी एक निजी कंपनी ने व्‍यास नदी के किनारे अवैध निर्माण और नदी की धारा मोड़कर पर्यावरण को नुकसान पहुंचाया। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने “पब्लिक ट्रस्ट डॉक्ट्रिन” लागू करते हुए कहा कि नदियां और प्राकृतिक संसाधन जनता की संपत्ति हैं, सरकार केवल उनकी संरक्षक है। कोर्ट ने पर्यावरणीय क्षति की भरपाई और क्षेत्र को बहाल करने के निर्देश दिए। इस केस में उच्चतम न्यायालय द्वारा ‘अनुकरणीय क्षति’ के सिद्धांत को पहली बार लागू किया गया। न्यायालय ने "प्रदूषक भुगतान सिद्धांत" को लागू करते हुए कहा कि न्यायालय पर्यावरण को प्रदूषित करने के लिये भुगतान किये जाने वाले नुकसान के अलावा अनुकरणीय क्षति भी लगाएगा ताकि यह दूसरों के लिये किसी भी तरह से प्रदूषण न फैलाने के लिये एक निवारक के रूप में कार्य कर सके। 

दिल्ली स्मारक मामला (1998)

इसे दिल्ली वाहन प्रदूषण मामला के नाम से भी जाना जाता है। यह मुकदमा दिल्ली में वाहन प्रदूषण की बढ़ती समस्या के समाधान के लिये दायर किया गया था। उच्चतम न्यायालय ने राजधानी में वाहनों के उत्सर्जन पर लगाम लगाकर वायु प्रदूषण को कम करने के लिये कंप्रेस्‍ड नेचुरल गैस (CNG) के उपयोग को बढ़ावा देने और सार्वजनिक परिवहन में सुधार करने के निदेश जारी किये। इसके बाद दिल्‍ली में डीजल से चलने वाली बसों की जगह CNG बसों के संचालन की व्‍यवस्‍था शुरू हुई। 

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