बाराबंकी की भगहर झील पर महादेवा इको टूरिज्म स्थल के काम पर एनजीटी के आदेश से रोक लग गई है।
स्रोत : फ्रीपिक
बाराबंकी की झीलें अब नहीं बनेंगी पार्क, 'दिखावटी-विकास' पर हुई पर्यावरण की जीत !
उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से सटे बाराबंकी जिले की एक दर्ज़न झीलों को सौंदर्यीकरण और पर्यटन के नाम पर पार्क बनाने के प्रोजेक्ट को राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण यानी NGT ने रोक दिया है। वन विभाग की अनुमति के बिना ही शुरू किए गए साढ़े तीन करोड़ रुपये के इस प्रोजेक्ट पर रोक को प्रकृति प्रेमी पर्यटन और 'दिखावटी-विकास' पर पर्यावरण की जीत के रूप में देख रहे हैं। हालांकि, इस मामले में अभी नया मोड़ आ सकता है, क्योंकि एनजीटी की रोक के बाद अब प्रशासन नए सिरे से प्रस्ताव तैयार कर रहा है, जिसे 9 मार्च को होने वाली अगली सुनवाई में ट्रिब्यूनल के सामने पेश किया जा सकता है।
वन विभाग की मंज़ूरी बिना ही शुरू कर दिया काम
सौंदर्यीकरण और पर्यटन को बढ़ावा देने के नाम पर झीलों के आसपास की जमीन पर पार्क बनाने के मामले पर एनजीटी की प्रधान पीठ ने सख्ती दिखाई है। वेटलैंड्स में कंक्रीट निर्माण की शिकायतों पर एनजीटी की प्रधान पीठ के सख्त रुख के बाद जिले की 12 प्रमुख झीलों के वेटलैंड पर प्रस्तावित योजनाओं पर रोक लग गई है।
गौरतलब है कि एक दर्जन झीलों के इर्द गिर्द निर्माण की योजना को वन विभाग से बिना अनुमोदन के इस प्रोजेक्ट को शासन को भेज दिया गया। शासन से स्वीकृति मिलने और बजट मिलने के साथ ही निर्माण कार्य भी शुरू हो गया। इसमें भगहर झील के वेटलैंड क्षेत्र को महादेवा इको टूरिज्म स्थल के रूप में विकसित करने के लिए पर्यटन विभाग ने करीब साढ़े तीन करोड़ रुपये का प्रोजेक्ट तैयार किया, जिसका निर्माण कार्य भी शुरू हो गया।
वेटलैंड क्षेत्र में शुरू किया गया यह निर्माण कार्य एनजीटी के आदेशों और वेटलैंड्स नियमों का उल्लंघन करके किया जा रहा था। एनजीटी में इसकी शिकायत जाने के बाद अब प्रोजेक्ट पर निर्माण रोक दिया गया है। अब मामले की जांच कर रिपोर्ट एनजीटी को भेजी जाएगी। आगामी 9 मार्च को एनजीटी में अगली सुनवाई होनी है। उधर, प्रशासनिक स्तर पर अब इस प्रस्ताव को बदलकर ने नए सिरे से तैयार कराने की कवायद शुरू की गई है। एनजीटी की अगली सुनवाई के बाद इसपर आगे का निर्णय लिया जाएगा।
बाराबंकी की 12 प्रमुख झीलों पर एक नज़र
महर्षि भृगु की तपोस्थली मानी जाने वाली भगहर झील जलकुंभी की चपेट में आकर बदहाल हो रही है।
स्रोत : विकी कॉमंस
जिले में हैं कुल 401 वेटलैंड
हालिया मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक बाराबंकी जिले में कुल 401 वेटलैंड चिन्हित हैं, जिनमें से 12 प्रमुख माने जाते हैं। इनमें सरायबरई, सराही, भगहर, नटकौली, चकौरा, भितरी, बनगांवा, खुर्दमऊ, बैनाटीकहार, सलारपुर, कमरावां और सादुल्लापुर शामिल हैं। खास बात यह है कि इन 1ृ2 में से आठ बड़ी झीलों को उत्तर प्रदेश राज्य आर्द्र भूमि प्राधिकरण की तकनीकी समिति से हरी झंडी मिल चुकी है, जबकि हरख ब्लॉक की कमरावां झील को एक जिला-एक वेटलैंड के रूप में चुना गया है।
बीते पांच वर्षों से इन वेटलैंड्स के सुंदरीकरण के नाम पर अलग-अलग प्रस्ताव तैयार किए गए हैं। इसी कड़ी में 84 हेक्टेयर क्षेत्रफल वाली भगहर झील को पर्यटन परियोजना के तहत 3.5 करोड़ रुपये की स्वीकृति दी गई है। वन विभाग की मजूरी के बिना ही करीब दो साल पहले यानी 2024 में झील के भीतर आठ मीटर चौड़ी परिधि में पाथवे के निर्माण का काम शुरू कर दिया गया। यहीं से विवाद ने जन्म लिया।
झांसी के पर्यावरण कार्यकर्ता बीएल भास्कर व नरेंद्र कुशवाहा ने इस मामले में एनजीटी में याचिका दायर कर शिकायत की। याचिका में आरोप लगाया गया कि सौंदर्यीकरण की आड़ में वेटलैंड में स्थायी कंक्रीट निर्माण कर भूजल स्रोत को नष्ट किया जा रहा है। लगभग साल भर की सुनवाइयों के बाद एनजीटी ने प्रतिवादी विभागों को तत्काल प्रभाव से निर्माण रोकने का निर्देश दिया, जिसके बाद वेटलैंड्स से जुड़े सभी प्रस्ताव ठंडे बस्ते में चले गए हैं।
घाघरा और गोमती नदी भी बाराबंकी से होकर गुज़रती हैं। बहराइच सीमा पर घाघरा नदी पर बने एल्गिन ब्रिज से नदीतट का खूबसूरत नज़ारा दिखता है।
स्रोत : विकी कॉमंस
मैं बचपन से देख रहा हूं, बाराबंकी में कई ऐसी झीलें थीं, जो अब सिकुड़ गई हैं। बीते 30 वर्षों में यहां के वेटलैंड करीब 60 प्रतिशत तक सिकुड़ गए। तालाबों और झीलों के सूखने से यहां की आब-ओ-हवा में काफी फर्क पड़ा है। पहले गर्मियों में हम झीलों के किनारे जाकर बैठते थे, तो राहत महसूस होती थी, अब वातावरण बिलकुल बदल गया है। ऐसे में अगर बचे हुए वेटलैंड पर कॉन्क्रीट की चादर बिछ गई तो ये तालाब नहीं स्वीमिंग पूल कहलाएंगे। कॉन्क्रीट पर किए गए विकास से सबसे ज्यादा प्रभावित भूजल पर पड़ रहा है। यहां कई इलाकों में पानी का लेवल बहुत नीचे चला गया है। अगर तालाब और झीलें अपने प्राकृतिक रूप में रहेंगी तो भूजल स्तर भी संतुलिंत रहेगा। वैसे भी बाराबंकी कृषि प्रधान जिला है और हमारे लिए पानी की एक-एक बूंद हमारी आजीविका से जुड़ी है।
दानिश सिद्दीकी, एडवोकेट एवं सामाजिक कार्यकर्ता, बाराबंकी
विदेशी पंछियों का ठिकाना बनीं बाराबंकी की झीलें
बाराबंकी की कमरावां झील हाल के वर्षों में विदेशी प्रवासी पक्षियों का एक बड़ा आश्रय स्थल बनकर उभरी है। अब यहां सिर्फ स्थानीय ही नहीं, हजारों की संख्या में मेहमान प्रवासी पक्षी पहुंचने लगे हैं। इस साल ऑस्ट्रेलिया, डेनमार्क, साइबेरिया, जापान और तिब्बत जैसे देशों से हजारों पक्षी पहुंचे हैं। झील के शांत वातावरण में आजकल नॉर्दर्न पिनटेल, गडवाल, कॉमन टील, मलार्ड और नकटा जैसे विदेशी प्रवासी पक्षियों का जमावड़ा लगा है। इनके साथ ही भारतीय मूल के सारस, बगुले और काली चील जैसे स्थानीय पक्षी भी यहां बड़ी संख्या में देखे जा रहे हैं।
वन विभाग के मुताबिक जिले के वेटलैंड्स में साइबेरियन पिंटेल, शॉवलर, गार्गेनी और बेखुर बतख सहित लगभग 12 प्रजातियों के प्रवासी पक्षी देखे गए हैं। इन वेटलैंड्स में प्रवासी पक्षियों को पर्याप्त भोजन और सुरक्षित वातावरण मिलता है। ये पक्षी दिसंबर से फरवरी तक यहां रहते हैं और फिर अपने मूल स्थानों पर लौट जाते हैं। यही कारण है कि वे हर साल इन झीलों में वापस आते हैं।
हरख ब्लॉक के पाटमऊ गांव में स्थित कमरावां झील लगभग 29.37 हेक्टेयर में फैली हुई है। बाराबंकी मुख्यालय से मात्र 12 किलोमीटर है की दूरी पर स्थित यह झील अपनी प्राकृतिक जैव विविधता (Biodiversity) के लिए यह क्षेत्र प्रसिद्ध है। यह झील कमरावां, पाटमऊ, रसूलपुर और मुहम्मदाबाद गांवों से घिरी हुई है। अब इसे औपचारिक रूप से वेटलैंड का दर्जा दिलाने की कवायद तेज कर दी गई है। ऐसा होने पर यह झील देश के पर्यावरण व पर्यटन नक्शे पर जगह पाने के साथ ही बाराबंकी जिले को एक नई ग्लोबल पहचान दे सकती है।
उत्तर प्रदेश सरकार की ‘वन डिस्ट्रिक्ट वन वेटलैंड’ योजना के तहत इस झील को वेटलैंड के के रूप में एक बड़े पर्यटन केंद्र के तौर पर विकसित करने की कार्य योजना शासन को भेजी गई है। इससे न केवल पर्यावरण का संतुलन मजबूत होगा, बल्कि स्थानीय पर्यटन और रोजगार को भी बढ़ावा मिलेगा। आने वाले समय में कमरावां झील जिले की पहचान को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी। वन विभाग ने झील के भीतर मिट्टी के कृत्रिम टीले बनाकर पक्षियों के लिए 'सेफ जोन' तैयार किया है।
बबाराबंकी की 12 प्रसिद्ध झीलों को सुंदरीकरण करके पर्यटन स्थल बनाने की तैयारी है, जबकि इनमें फैलती जलकुंभी को हटाने पर ध्यान नहीं दिया जा रहा है।
स्रोत : विकी कॉमंस
महर्षि भृगु की तपोस्थली भगहर झील जलकुंभी की चपेट में
बाराबंकी जनपद के फतेहपुर वन रेंज में स्थित पौराणिक और धार्मिक आस्था का केंद्र महर्षि भृगु की तपोस्थली भगहर झील जलकुंभी की चपेट में फंसकर अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रही है। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक झील में भारी मात्रा में फैली जलकुंभी ने न केवल इसके प्राकृतिक सौंदर्य को नष्ट कर दिया है, बल्कि इसमें रहने वाले जलीय जीवों के लिए भी खतरा पैदा कर दिया है। स्थिति की गंभीरता को देखते हुए क्षेत्र की कई ग्राम पंचायतों के ग्राम प्रधानों ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को प्रार्थना पत्र भेजकर तत्काल हस्तक्षेप की मांग की है। पत्र में ग्राम प्रधानों ने कहा है कि भगहर झील, जो वर्तमान में महादेवा इको गार्डन के नाम से जानी जाती है, पौराणिक काल से आस्था का प्रमुख केंद्र रही है। मान्यता है कि इसी स्थल पर महर्षि भृगु ने कठोर तपस्या की थी। झील की देखरेख और नियमित सफाई के अभाव में इसका पानी पूरी तरह दूषित हो चुका है। जलकुंभी के कारण डेंगू, मलेरिया सहित अन्य संचारी रोगों का खतरा तेजी से बढ़ रहा है। इतना ही नहीं, झील का पानी अब मवेशियों के पीने योग्य भी नहीं बचा है, जिससे ग्रामीणों को भारी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है।
राज्य वेटलैंड प्राधिकरण ने पिछले साल दी क्लीन चिट
21 मई 2025 को नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल के आदेश पर की गई जांच में सभी झीलें वेटलैंड नियम, 2017 के अनुरूप पाई गई थीं। डाउन टू अर्थ के मुताबिक राज्य वेटलैंड प्राधिकरण ने 24 सितंबर 2025 को एनजीटी को सौंपी अपनी रिपोर्ट में बताया था कि बाराबंकी जिले की 12 आर्द्रभूमियों (वेटलैंड्स) पर न तो किसी प्रकार का अवैध कब्जा है और न ही स्थाई निर्माण किया गया है। इसमें खासतौर पर 12 आर्द्रभूमियों का जिक्र है, जिनमें भगहर, चकौरा, वनगांव, भितरी, बैनाटिकहर, कमरावा, सरायबरई, नटौली, खुडमऊ, सादुल्लापुर, सलारपुर और सराही शामिल थीं।
शिकायतों की पड़ताल के लिए तीन सदस्यीय समिति बनाई गई थी, जिसमें सम्बंधित तहसील के उपजिलाधिकारी (एसडीएम), खंड विकास अधिकारी (बीडीओ) और क्षेत्रीय वन अधिकारी शामिल थे।
रिपोर्ट में बताया गया कि 2018 में सरायबरई आर्द्रभूमि पर कुछ निर्माण कार्य किए गए थे। इनमें वन्यजीव संरक्षण, प्रवासी पक्षियों के आवास को बेहतर बनाने और इको-टूरिज्म को बढ़ावा देने के लिए एक पुलिया मार्ग, दो झोपड़ियां और पक्षियों के लिए मिट्टी का टीला बनाया गया था। इन संरचनाओं का 2023 में नवीनीकरण किया गया। हालांकि, रिपोर्ट ने साफ किया कि सरायबरई झील के जलमग्न हिस्से को भरकर किसी प्रकार का निर्माण नहीं किया गया था।
इसके अलावा जांच में इस झील की जलभराव वाली जमीन पर कब्जे या निर्माण का कोई सबूत भी नहीं मिलने की बात भी रपोर्ट में कही गई थी। इसी तरह, अन्य झीलों में भी कहीं पर जलभराव वाले हिस्से को पाटने या कब्जा करने का सबूत नहीं मिला था। जांच में सभी झीलें वेटलैंड (संरक्षण एवं प्रबंधन) नियम, 2017 के अनुरूप पाई गईं।
जांच में यह भी सामने आया कि भितरी झील का मौसमी उपयोग और भगहर झील के पास इको-टूरिज्म गतिविधियां जरूर हो रही हैं। हालांकि रिपोर्ट में स्पष्ट किया गया है कि ये गतिविधियां अनुमेय क्षेत्रों तक सीमित हैं और झीलों की पारिस्थितिक प्रकृति को कोई नुकसान नहीं पहुंचातीं।
बाराबंकी की कमरावां झील हाल के वर्षों में विदेशी प्रवासी पक्षियों का एक बड़ा आश्रय स्थल बनकर उभरी है।
स्रोत : विकी कॉमंस
बाराबंकी क्यों प्रसिद्ध है
उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से सटे बाराबंकी जिले को ‘पूर्वांचल के प्रवेश द्वार’ के रूप में भी जाना जाता है, जिसे कई संतों और साधुओं की तपस्या स्थली होने का गौरव प्राप्त है। इस जिले के नामकरण की कई प्राचीन कथाएं प्रचलित हैं। बाराबंकी जिले की आधिकारिक वेबसाइट पर दी गई जानकारी के मुताबिक इनमें सबसे लोकप्रिय प्रचलन यह है कि, ‘भगवान बारह’ के पुनर्जन्म की पावन भूमि है। इस जगह को ‘बानह्न्या’ के रूप में जाना जाने लगा, जो समय के साथ दूषित होकर बाराबंकी हो गया। जिला का मुख्यालय दरियाबाद में 1858 ई. तक था, जिसे बाद में 1859 ई. में नवाबगंज में स्थानांतरित कर दिया गया था, जो बाराबंकी का दूसरा लोकप्रिय नाम भी है।
जैसा कि मान्यता है, प्राचीन समय में यह जिला सूर्यवंशी राजाओं द्वारा शासित राज्य का हिस्सा था, जिसकी राजधानी अयोध्या थी। राजा दशरथ और उनके प्रसिद्ध पुत्र, भगवान राम इस वंश के थे। गुरु वशिष्ठ उनके कुलगुरू थे, और उन्होंने ‘सतरिख’ में राजवंश के युवा राजकुमारों को उपदेश एवं शिक्षा दी, इसे शुरू में ‘सप्तऋषि’ के नाम से जाना जाता था। यह जिला चंद्रवंशी राजाओं के शासनकाल में बहुत लंबे समय तक रहा था। महाभारत युग के दौरान, यह ‘गौरव राज्य’ का हिस्सा था और भूमि के इस हिस्से को कुरुक्षेत्र नाम से जाना जाता था। पांडव ने अपनी मां कुंती के साथ, अपने राज्य निर्वासन का कुछ समय घाघरा नदी के तट पर व्यतीत किया था।
‘पारिजात’ विश्व का अद्वितीय वृक्ष, ‘कुन्तेश्वर महादेव मंदिर’, और उसका अत्यंत प्राचीन शिवलिंग, घाघरा के पावन तट पर कुन्तेश्वर (किंतूर), बाजार धरम मंडी (धमेडी), प्रसिद्ध लोधेश्र्वर महादेव का शिवलिंग इत्यादि, सबूत है, कि यह क्षेत्र महाभारत काल के दौरान भी, पांच हजार साल पहले एक महत्वपूर्ण स्थान था। उपलब्ध ऐतिहासिक दस्तावेजों के अनुसार, 1030 ई. में इस क्षेत्र पर महमूद ग़ज़नी के भाई सय्यद सालार मसूद ने हमला किया था। उसी शताब्दी में मदीना के कुतुबुद्दीन गाहा ने हिंदू रियासतों पर कब्जा किया, जिससे मुस्लिम प्रभुत्व स्थापित हो गया। महान मुगल सम्राट अकबर के शासनकाल में इस जिले को अवध और मानिकपुर की सरकारों के अधीन विभाजित किया गया था।
कई राजाओं और राजकुमारों ने अंग्रेजों के शासन का इस जिले में विस्तार के विरोध में अंग्रेजों से कई युद्ध किये। ब्रिटिश राज के दौरान, कई राजा अपनी आजादी के लिए लड़े और ऐसा करते हुए इन महान क्रांतिकारियों ने अपना बलिदान दिया। राजा बलभद्र सिंह चहलारी ने लगभग 1000 क्रांतिकारियों के साथ ब्रिटिश शासन से स्वतंत्रता के लिए अपना जीवन बलिदान किया। भारतीय स्वतंत्रता के पहले युद्ध की आखिरी लड़ाई दिसंबर 1858 ई. में इस जिले में हुई थी मध्य उन्नीसवीं सदी के दौरान क्रांतिकारियों का अंतिम मोर्चा ‘भिटौली’ में था, जो मजबूत ब्रिटिश सेनाओं के समक्ष असफल साबित हुआ। भिटौली मोर्चा पीछे छोड़कर आजादी के कट्टरपंथियों ने बेगम हजरत महल, नाना साहब के संग स्वतंत्रता संग्राम जारी रखने के लिए नेपाल के क्षेत्र में प्रवेश किया।
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