धरती के पर्यावरणीय संतुलन को बनाए रखने के लिए हरियाली को बचाना ज़रूरी है। ग्रीन क्रेडिट इसी ओर उठाया गया एक नीतिगत कदम है।
फोटो : विकी कॉमंस
ग्रीन क्रेडिट : पर्यावरण संरक्षण को ज़मीनी स्तर पर बढ़ावा देने की एक नई पहल
दुनिया भर में तेजी से बढ़ रहे कार्बन उत्सर्जन और उसके चलते हो रही ग्लोबल वॉर्मिंग, जलवायु परिवर्तन और प्राकृतिक संसाधनों के क्षरण जैसी गंभीर समस्याओं ने आज दुनिया को अपने विकास के मॉडल पर नए सिरे से सोचने को मजबूर कर दिया है। साथ ही इसने आज हमें एक ऐसे आर्थिक मॉडल खोजने के लिए मजबूर किया है, जो विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच एक सटीक संतुलन बना सके। पर्यावरण को बचाने की इसी सोच से ग्रीन क्रेडिट (Green Credit) को जन्म दिया है। इसका मूल विचार यह है कि यदि कोई व्यक्ति, कंपनी या संस्था पर्यावरण संरक्षण के लिए सकारात्मक कार्य करती है, तो उसे प्रोत्साहित करने के लिए कुछ इस तरह से लाभान्वित या पुरस्कृत किया जाना चाहिए, जिससे कि अन्य लोग भी ऐसा करने के लिए प्रेरित हो। इसी के लिए ग्रीन क्रेडिट की शुरुआत की गई।
लोग अकसर ग्रीन क्रेडिट और कार्बन उत्सर्जन घटाने के लिए दिए जाने वाले कार्बन क्रेडिट को एक ही चीज समझ लेते हैं, पर ग्रीन क्रेडिट केवल कार्बन उत्सर्जन घटाने तक सीमित नहीं है। इसमें वृक्षारोपण, जल संरक्षण, सतत कृषि, अक्षय ऊर्जा, अपशिष्ट प्रबंधन और ऊर्जा दक्षता जैसे अनेक कार्य शामिल किए जा सकते हैं। भारत ने भी इस दिशा में कदम बढ़ाते हुए ग्रीन क्रेडिट प्रोग्राम (GCP) शुरू किया है। इसे पर्यावरणीय व्यवहार में परिवर्तन को प्रोत्साहित करने वाले एक नए आर्थिक उपकरण के रूप में देखा जा रहा है।
ग्रीन क्रेडिट क्या होता है?
ग्रीन क्रेडिट एक ऐसा प्रमाणित मूल्य है जो पर्यावरण के लिए किए गए सकारात्मक कार्यों के बदले दिया जाता है। उदाहरण के लिए यदि कोई संस्था निर्धारित मानकों के अनुसार वृक्षारोपण करती है या किसी जलाशय पुनर्जीवित करती है या ऊर्जा दक्षता को बढ़ाती है, तो उसे ग्रीन क्रेडिट प्राप्त हो सकता है।
सरल शब्दों में कहा जाए, तो यह पर्यावरणीय योगदान के लिए एक प्रकार का “रिवॉर्ड पॉइंट सिस्टम” है। जिस प्रकार कार्बन क्रेडिट में उत्सर्जन में कमी को मापा जाता है, वैसे ही ग्रीन क्रेडिट में व्यापक पर्यावरणीय लाभों आ आकलन कर उसे मान्यता दी जाती है।
कब और कैसे शुरू हुई यह अवधारणा?
ग्रीन क्रेडिट का विचार सीधे-सीधे किसी एक समय पर नहीं उभरा। इसकी जड़ें 1990 के दशक में विकसित हुए कार्बन क्रेडिट और उत्सर्जन व्यापार (Emission Trading) तंत्र में देखने को मिलती हैं। पहली बार 1997 के क्योटो प्रोटोकॉल (Kyoto Protocol) ने वैश्विक स्तर पर उत्सर्जन में कमी को आर्थिक मूल्य देने का ढांचा तैयार किया गया। बाद में यूरोप, अमेरिका और अन्य देशों में कार्बन बाजार विकसित हुए। आगे चलकर यह महसूस किया गया कि केवल कार्बन उत्सर्जन को घटाना ही पर्याप्त नहीं है। तेजी से बिगड़ते पर्यावरण को प्रभावी ढंग से सुधारने के लिए जैव विविधता संरक्षण, जल स्रोतों को रिचार्ज करने और भूमि के सुधार जैसी चीजों को भी आर्थिक प्रोत्साहन दिया जाना चाहिए। इसी सोच ने ग्रीन क्रेडिट, बायोडायवर्सिटी क्रेडिट और नेचर क्रेडिट जैसी अवधारणाओं को जन्म दिया। पिछले कुछ वर्षों में विश्व आर्थिक मंच (WEF), संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) और विभिन्न देशों की सरकारों ने प्रकृति-आधारित क्रेडिट तंत्रों पर जोर बढ़ाया है।
भारत में कब हुई ग्रीन क्रेडिट की शुरुआत
भारत सरकार ने अक्टूबर 2023 में ग्रीन क्रेडिट प्रोग्राम की अधिसूचना जारी की। यह कार्यक्रम पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986 के तहत शुरू किया गया। इसका उद्देश्य पर्यावरणीय गतिविधियों को प्रोत्साहित करना और उन्हें एक औपचारिक क्रेडिट तंत्र से जोड़ना है।
सरकार ने इसके लिए एक डिजिटल प्लेटफॉर्म विकसित किया है, जहां परियोजनाओं का पंजीकरण, सत्यापन और क्रेडिट जारी करने की प्रक्रिया की जाती है। प्रारंभिक चरण में इसका मुख्य फोकस वृक्षारोपण और भूमि पुनर्स्थापन पर रखा गया है।
ग्रीन क्रेडिट में सबसे पहला फोकस पेड़-पौधे लगाकर हरियाली बढ़ाने पर होता है।
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भारत में किन क्षेत्रों में लागू हो रहा है?
भारत में ग्रीन क्रेडिट कार्यक्रम को चरणबद्ध तरीके से विभिन्न क्षेत्रों में लागू किया जा रहा है। शुरुआती चरण में इसका फोकस वृक्षारोपण और भूमि सुधार पर है, लेकिन सरकार इसे कृषि, अक्षय ऊर्जा, ऊर्जा दक्षता, अपशिष्ट प्रबंधन और जल संरक्षण जैसे क्षेत्रों तक विस्तार देने की दिशा में काम कर रही है। इसका उद्देश्य पर्यावरण संरक्षण से जुड़े विविध कार्यों को एक औपचारिक प्रोत्साहन तंत्र से जोड़ना है। इसके लिए ग्रीन क्रेडिट को इन क्षेत्रों में लागू करने की योजना है -
1. वानिकी और वृक्षारोपण
यह ग्रीन क्रेडिट कार्यक्रम का पहला और सबसे प्रमुख क्षेत्र है। यदि कोई संस्था निर्धारित मानकों के अनुसार बंजर या क्षतिग्रस्त भूमि पर पौधरोपण करती है और उनकी जीवित रहने की दर सुनिश्चित करती है, तो उसे ग्रीन क्रेडिट मिल सकता है। इस पहल का उद्देश्य केवल पेड़ों की संख्या बढ़ाना नहीं, बल्कि ऐसे हरित क्षेत्र विकसित करना है जो लंबे समय तक कार्बन अवशोषण, मिट्टी संरक्षण और जैव विविधता संवर्धन में योगदान दें। विशेषज्ञों के अनुसार स्थानीय प्रजातियों के पौधों को प्राथमिकता देने से पारिस्थितिकी तंत्र अधिक मजबूत होता है और भूजल पुनर्भरण में भी मदद मिल सकती है। यदि वृक्षारोपण परियोजनाओं की नियमित निगरानी और रखरखाव सुनिश्चित किया जाए, तो वे ग्रीन क्रेडिट कार्यक्रम के सबसे प्रभावी घटकों में से एक बन सकती हैं।
2. कृषि क्षेत्र
कृषि क्षेत्र ग्रीन क्रेडिट कार्यक्रम के लिए सबसे संभावनाशील क्षेत्रों में से एक माना जा रहा है। पारंपरिक खेती में रासायनिक उर्वरकों, कीटनाशकों और अत्यधिक सिंचाई के कारण मिट्टी की गुणवत्ता और जल संसाधनों पर दबाव बढ़ा है। यदि किसान पर्यावरण-अनुकूल तकनीकों को अपनाते हैं तो न केवल उत्पादन की गुणवत्ता बेहतर हो सकती है, बल्कि प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण भी संभव है। विशेषज्ञों का मानना है कि भविष्य में सतत कृषि पद्धतियों को ग्रीन क्रेडिट तंत्र से जोड़कर किसानों को अतिरिक्त आर्थिक प्रोत्साहन दिया जा सकता है। इससे खेती को अधिक टिकाऊ और जलवायु-अनुकूल बनाने में कुछ इस प्रकार मदद मिलेगी -
रासायनिक खाद का उपयोग घटाना
जैविक खेती को बढ़ावा
कम पानी वाली सिंचाई
मिट्टी के कार्बन का संरक्षण
फसल अवशेष प्रबंधन
भविष्य में इन सभी पद्धतियों को ग्रीन क्रेडिट सिस्टम से जोड़ने की संभावनाएं हैं। यदि किसानों के पर्यावरणीय योगदान का वैज्ञानिक मूल्यांकन किया जाए तो उन्हें अतिरिक्त आय का स्रोत मिल सकता है। इससे कृषि क्षेत्र में टिकाऊ विकास और जलवायु-अनुकूल खेती को नई गति मिल सकती है।
3. सौर ऊर्जा और अक्षय ऊर्जा
रूफटॉप सोलर, सौर पार्क, पवन ऊर्जा और अन्य अक्षय ऊर्जा परियोजनाएं जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता कम करती हैं। ऐसे प्रोजेक्ट ग्रीन क्रेडिट या संबंधित पर्यावरणीय क्रेडिट ढांचे का हिस्सा बन सकते हैं। इनके माध्यम से कोयला और पेट्रोलियम आधारित ऊर्जा उत्पादन की आवश्यकता घटती है, जिससे ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में कमी आती है। भारत में तेजी से बढ़ रही सौर और पवन ऊर्जा क्षमता ऊर्जा संक्रमण को नई दिशा दे रही है। यदि इन परियोजनाओं के पर्यावरणीय लाभों का व्यवस्थित मूल्यांकन किया जाए, तो इन्हें ग्रीन क्रेडिट के माध्यम से अतिरिक्त आर्थिक प्रोत्साहन भी मिल सकता है।
4. इलेक्ट्रॉनिक और इलेक्ट्रिकल उपकरण
ऊर्जा दक्ष उपकरणों का निर्माण और उपयोग भी पर्यावरणीय लाभ देता है। भारत में BEE स्टार रेटिंग प्रणाली पहले से लागू है। भविष्य में ऊर्जा दक्षता सुधारों को ग्रीन क्रेडिट से जोड़ने की संभावना जताई जा रही है। उदाहरण के लिए, कम बिजली खपत वाले एयर कंडीशनर, रेफ्रिजरेटर, पंखे और एलईडी प्रकाश व्यवस्था बिजली की मांग को कम करने में मदद करते हैं। इससे बिजली उत्पादन पर दबाव घटता है और अप्रत्यक्ष रूप से कार्बन उत्सर्जन में कमी आती है। ऊर्जा दक्ष उपकरणों को बढ़ावा देने से उपभोक्ताओं के बिजली बिल कम हो सकते हैं और राष्ट्रीय स्तर पर ऊर्जा बचत के लक्ष्य हासिल करने में सहायता मिल सकती है।
5. अपशिष्ट प्रबंधन
ई-वेस्ट रीसाइक्लिंग, प्लास्टिक कचरा प्रबंधन और संसाधनों की पुनर्प्राप्ति करने वाली परियोजनाएं भी इस ढांचे का हिस्सा बन सकती हैं। इलेक्ट्रॉनिक कचरे से धातुओं और अन्य उपयोगी सामग्री की पुनर्प्राप्ति करने से प्राकृतिक संसाधनों के दोहन की आवश्यकता कम होती है। इसी तरह प्लास्टिक कचरे के पुनर्चक्रण से लैंडफिल पर दबाव घटता है और पर्यावरण प्रदूषण कम करने में मदद मिलती है। सर्कुलर इकोनॉमी की दिशा में काम करने वाली ऐसी परियोजनाएं भविष्य में ग्रीन क्रेडिट तंत्र के लिए महत्वपूर्ण आधार बन सकती हैं।
कार्बन क्रेडिट बनाम ग्रीन क्रेडिट
ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मिलेगा सहारा
ग्रीन क्रेडिट का एक कम चर्चित लेकिन महत्वपूर्ण पहलू ग्रामीण क्षेत्रों से जुड़ा है। वृक्षारोपण, जल संरक्षण और भूमि पुनर्स्थापन जैसी गतिविधियां स्थानीय स्तर पर रोजगार पैदा कर सकती हैं। यदि पंचायतों, किसान उत्पादक संगठनों (FPO) और स्वयं सहायता समूहों को इसमें शामिल किया जाए, तो यह पर्यावरण संरक्षण के साथ-साथ ग्रामीण आय बढ़ाने का माध्यम भी बन सकता है।
इसके अलावा ग्रीन क्रेडिट आधारित परियोजनाएं ग्रामीण क्षेत्रों में सामुदायिक भागीदारी को भी मजबूत कर सकती हैं। उदाहरण के लिए तालाबों का पुनर्जीवन, चरागाह विकास, जैविक खाद निर्माण और कृषि अवशेष (पराली) प्रबंधन जैसे कार्य स्थानीय लोगों को नियमित रोजगार उपलब्ध करा सकते हैं। यदि इन गतिविधियों के लिए ग्रीन क्रेडिट के रूप में आर्थिक प्रोत्साहन दिया जाए, तो गांवों में पर्यावरण संरक्षण केवल एक सरकारी योजना न रहकर हकीकत की ज़मीन पर लोगों के लिए आय सृजन का एक व्यावहारिक माध्यम बन सकता है। इससे पलायन में कमी आने, प्राकृतिक संसाधनों के बेहतर प्रबंधन और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को अधिक टिकाऊ बनाने में भी मदद मिल सकती है।
ग्रीन क्रेडिट से जुड़ी 10 महत्वपूर्ण बातें
हर पेड़ नहीं दिलाता ग्रीन क्रेडिट : ग्रीन क्रेडिट के लिए केवल पौधे लगाना पर्याप्त नहीं होता। कई योजनाओं में पौधों की जीवित रहने की दर, स्थानीय प्रजातियों का चयन और निगरानी भी महत्वपूर्ण मापदंड होते हैं।
स्थानीय प्रजातियों को अधिक महत्व : विशेषज्ञों के अनुसार देशी पेड़-पौधे स्थानीय पारिस्थितिकी के लिए अधिक उपयोगी होते हैं, इसलिए भविष्य में उनके लिए अलग मूल्यांकन मानक विकसित किए जा सकते हैं।
यह “प्रदूषण का लाइसेंस” नहीं : ग्रीन क्रेडिट का उद्देश्य प्रदूषण को सही ठहराना नहीं, बल्कि पर्यावरणीय सुधार को प्रोत्साहित करना है। इसलिए इसे केवल ऑफसेट तंत्र के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
जल संरक्षण भी ग्रीन क्रेडिट का हिस्सा : तालाब पुनर्जीवन, वर्षा जल संचयन और भूजल पुनर्भरण जैसी गतिविधियां केवल जल प्रबंधन नहीं, बल्कि व्यापक पर्यावरणीय लाभ भी देती हैं।
एक ही परियोजना कई लाभ दे सकती है : उदाहरण के लिए किसी जलाशय का पुनर्जीवन जल संरक्षण, जैव विविधता, कार्बन अवशोषण और स्थानीय रोजगार जैसे चारों क्षेत्रों में लाभ दे सकता है।
ड्रोन और सैटेलाइट से निगरानी संभव : आधुनिक तकनीक के जरिए वृक्षारोपण और भूमि पुनर्स्थापन परियोजनाओं की निगरानी अब ड्रोन और उपग्रह चित्रों से भी की जा सकती है।
ग्रीन रूप और ग्रीन बिल्डिंग : भविष्य में शहरी क्षेत्रों में ग्रीन रूफ और ग्रीन बिल्डिंग या ऊर्जा दक्ष भवनों (Energy-efficient buildings) को भी ग्रीन क्रेडिट ढांचे से जोड़ने की संभावना है।
सिर्फ सरकार नहीं, निजी क्षेत्र भी भागीदार : कंपनियां अपनी ESG रणनीतियों के तहत ग्रीन क्रेडिट परियोजनाओं में निवेश कर सकती हैं, जिससे पर्यावरणीय परियोजनाओं के लिए अतिरिक्त वित्त उपलब्ध हो सकता है।
ग्रामीण समुदायों के लिए नया अवसर : यदि ग्राम पंचायतों और स्वयं सहायता समूहों को इसमें शामिल किया जाए, तो पर्यावरण संरक्षण गतिविधियां स्थानीय आय सृजन का माध्यम बन सकती हैं।
“नेचर इकोनॉमी” की ओर कदम : दुनिया भर में प्राकृतिक संसाधनों को आर्थिक मूल्य देने की चर्चा बढ़ रही है। ग्रीन क्रेडिट उसी व्यापक “नेचर-पॉजिटिव इकोनॉमी” की दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रयोग माना जा रहा है।
निष्कर्ष : सही दिशा में देर से उठाया गया कदम
भारत की पर्यावरण नीति में ग्रीन क्रेडिट को देर से उठाया गया एक महत्वपूर्ण कदम कहा जा सकता है। दशकों तक विकास और पर्यावरण को अलग-अलग मुद्दों के रूप में देखा गया, जबकि वास्तविकता यह है कि दोनों एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हैं।
ग्रीन क्रेडिट कोअगर पारदर्शी सत्यापन प्रक्रिया, वैज्ञानिक ढंंग से आकलन और स्थानीय भागीदारी के साथ लागू किया जाता है, तो यह केवल पर्यावरणीय अभियान से कहीं आगे बढ़कर प्रकृति और पर्यावरण के प्रति लोगों के व्यवहार में बदलाव लाने का एक सशक्त माध्यम बन सकता है। हालांकि आने वाले समय में देश में इसकी सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि क्या ग्रीन क्रेडिट वास्तव को सरल और व्यावहारिक ढंग से लागू कर प्रकृति को आर्थिक व्यवस्था के केंद्र में लाया जाए और यह केवल एक और औपचारिक प्रमाणपत्र बनकर न रह जाए। ग्रीन क्रेडिट भारत के 2070 तक ‘नेट जीरो इमिशन' के जलवायु लक्ष्यों को हासिल करने का एक सशक्त माध्यम बन सकता है।
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