पानी मानव जीवन, स्वास्थ्य और गरिमा की बुनियादी ज़रूरत है। भारत में सुरक्षित पेयजल केवल आम लोगों के स्वास्थ्य के लिए ही ज़रूरी नहीं है बल्कि यह मानव जीवन के विभिन्न पहलुओं से भी जुड़ा हुआ है।
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हर घर सुरक्षित पेयजल पहुंचाने के लिए कैसे काम कर रहा है भारत?
पानी मानव जीवन, स्वास्थ्य और गरिमा की बुनियादी ज़रूरत है। भारत में सुरक्षित पेयजल केवल आम लोगों के स्वास्थ्य के लिए ही ज़रूरी नहीं है बल्कि यह मानव जीवन के विभिन्न पहलुओं से भी जुड़ा हुआ है। साफ़ पानी की उपलब्धता से डायरिया जैसी बीमारी कम हो सकती है, बच्चों के जीवित और स्वस्थ रहने की संभावना बढ़ जाती है, स्वास्थ्य सुविधाओं पर पड़ने वाला बोझ में कमी आती है और पूरे समुदाय के जीवन को बेहतर बनाने में मदद मिलती है।
भारत के पेयजल परिदृश्य में लगातार बनी रहने वाली गहरी चुनौतियां
हालांकि, भारत आज भी पानी की कमी, उसकी गुणवत्ता और लोगों तक उसकी पहुंच जैसी कई आपस में जुड़ी समस्याओं से जूझ रहा है। मात्रा की बात करें तो देश के अनेक हिस्सों में मौसम के अनुसार पानी की कमी बनी रहती है। मानसून के बाद नदियों और सतही जल स्रोतों में पानी घटने लगता है, जबकि उत्तर-पश्चिमी, प्रायद्वीपीय और देश के अन्य कई क्षेत्रों में भूजल स्तर तेज़ी से नीचे जा रहा है।
गुणवत्ता के स्तर पर भी स्थिति चिंताजनक ही है। कई जगहों पर पानी में आर्सेनिक, फ्लोराइड, नाइट्रेट, लवणता और भारी धातुओं जैसे प्रदूषक पाए जाते हैं। इसके साथ ही सूक्ष्मजीवों से होने वाला प्रदूषण भी अक्सर देखने को मिलता है।
पानी तक पहुंच भी अब भी एक समान नहीं है। NSSO (76वें दौर) के अनुसार, भारत में केवल लगभग 20 फ़ीसद घरों तक पाइप से पानी की सुविधा पहुंच पाई है, जबकि ग्रामीण क्षेत्रों के करीब 43 फ़ीसद परिवार अब भी भूजल स्रोतों, जैसे हैंडपंप और ट्यूबवेल आदि पर निर्भर हैं। इतना ही नहीं, लगभग 48.6 फ़ीसद ग्रामीण और 28 फ़ीसद शहरी परिवारों को पूरे साल एक बेहतर और दूषण-मुक्त पेयजल स्रोत उपलब्ध नहीं हो पाता।
संविधान, कानून और अंतरराष्ट्रीय प्रतिबद्धताएं इस बात की ज़रूरत को बढ़ा देती हैं कि इस दिशा में तुरंत नीति स्तर पर कदम उठाए जाएं। अनुच्छेद 21 (दाएं से बाएं) की अदालतों द्वारा की गई व्याख्या से यह स्पष्ट है कि साफ़ पानी उपलब्ध करवाने की ज़िम्मेदारी राज्य की होती है। उदाहरण के तौर पर सुभाष कुमार बनाम बिहार राज्य और नर्मदा बचाओ आंदोलन बनाम भारत संघ जैसे मामलों में यह बात स्थापित हुई है। इसके साथ ही, भारत ने सतत विकास लक्ष्यों, (खासकर एसडीजी 6), के तहत सभी लोगों को स्वच्छ जल और स्वच्छता उपलब्ध कराने का संकल्प भी लिया है।
संविधान, कानून और अंतरराष्ट्रीय प्रतिबद्धताएं इस बात की ज़रूरत को बढ़ा देती हैं कि इस दिशा में तुरंत नीति स्तर पर कदम उठाए जाएं। अनुच्छेद 21 (दाएं से बाएं) की अदालतों द्वारा की गई व्याख्या से यह स्पष्ट है कि साफ़ पानी उपलब्ध करवाने की ज़िम्मेदारी राज्य की होती है।
इसकी प्रतिक्रिया में, सरकार ने साल 2019 में जल जीवन मिशन (JJM) की शुरुआत की। इस मिशन का उद्देश्य प्रत्येक ग्रामीण परिवार को तय गुणवत्ता वाले पानी के साथ घरेलू नल कनेक्शन (FHTC) उपलब्ध कराना है। इस दिशा में काफ़ी तेज प्रगति भी हुई। साल 2019 में जहां इसकी पहुंच लगभग 17 फ़ीसद थी, वहीं 2025 की शुरुआत तक यह बढ़कर 80 फ़ीसद से अधिक ग्रामीण परिवारों तक पहुंच चुकी है।
बावजूद इसके, ज़मीन पर योजना को हर जगह समान रूप से लागू करने, पानी की गुणवत्ता पर लगातार नज़र रखने, जल स्रोतों को लंबे समय तक सुरक्षित बनाए रखने, पानी की नियमित और भरोसेमंद आपूर्ति सुनिश्चित करने और हर परिवार तक बराबरी से इसकी पहुंच सुनिश्चित करने जैसी अहम चुनौतियां अब भी बनी हुई हैं। पेयजल का संकट केवल स्वास्थ्य तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका असर आर्थिक मजबूती, लैंगिक समानता, सामाजिक न्याय और पर्यावरणीय टिकाऊपन पर भी पड़ता है।
भारत में पेयजल के स्रोत
भारत में पीने के पानी की आपूर्ति मुख्य रूप से भूजल और सतही जल स्रोतों से होती है। भूजल के लिए लोग हैंडपंप, ट्यूबवेल, बोरवेल और कुओं पर निर्भर रहते हैं, जबकि सतही स्रोतों में नदियां, तालाब, झीलें और छोटे जलस्रोत शामिल हैं।
राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण कार्यालय (NSSO) के 76वें दौर के अनुसार, ग्रामीण क्षेत्रों के लगभग 43 फ़ीसद परिवार हैंडपंप और ट्यूबवेल जैसे भूजल स्रोतों पर निर्भर हैं। इसके अलावा कई परिवार पानी के लिए सार्वजनिक नलों, कुओं या साझा जल कनेक्शनों का उपयोग करते हैं। हालांकि, घरों तक पाइप से पानी की पहुंच अभी भी सीमित है। लगभग हर पांच परिवारों में से केवल एक परिवार के घर तक नल से पानी पहुंचता है।
एक बड़ी समस्या यह भी है कि अधिकांश परिवारों को पूरे साल सुरक्षित और प्रदूषण-मुक्त जल स्रोत उपलब्ध नहीं हो पाता। उदाहरण के लिए, ग्रामीण क्षेत्रों में लगभग आधे और शहरी क्षेत्रों में एक-चौथाई से अधिक परिवारों को या तो भरोसेमंद स्वच्छ पानी की नियमित उपलब्धता नहीं मिलती, या फिर पानी के लिए उन्हें असुरक्षित स्रोतों पर निर्भर रहना पड़ता है।
इसलिए पानी तक पहुंच को केवल जल स्रोत की मौजूदगी या उपलब्धता से नहीं समझा जाना चाहिए। बल्कि इसके घर के पास या घर के भीतर उपलब्धता, नियमित उपलब्धता, तथा सुरक्षित और भरोसेमंद होना भी उतना ही महत्त्वपूर्ण है।
भारत में पेयजल की गुणवत्ता और मानक
भारत में पीने के पानी की गुणवत्ता तय करने के लिए मुख्य मानक BIS 10500:2012 है, जिसे इंडियन स्टैंडर्ड फॉर ड्रिंकिंग वॉटर स्पेसिफिकेशन कहा जाता है। इसमें पानी की भौतिक, रासायनिक और जैविक गुणवत्ता के लिए अलग-अलग मानक तय किए गए हैं। साथ ही कई मामलों में स्वीकार्य सीमा और यह भी बताया गया है कि यदि कोई दूसरा जल स्रोत उपलब्ध न हो, तो “अधिकतम कितनी सीमा तक पानी का उपयोग” किया जा सकता है।
केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) के अनुसार, पानी की जांच में pH, धुंधलापन (टर्बिडिटी), कुल घुले ठोस पदार्थ (TDS), कठोरता, फ्लोराइड, आर्सेनिक, नाइट्रेट, आयरन, क्लोराइड, भारी धातु और सूक्ष्मजीवों जैसे कई मानकों को देखा जाता है।
वैश्विक स्तर पर, विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की ड्रिंकिंग वॉटर क्वालिटी गाइडलाइंस भी इन मानकों के लिए दिशा-निर्देश देती हैं। इनमें आर्सेनिक, फ्लोराइड, सीसा, नाइट्रेट जैसे प्रदूषकों की सुरक्षित सीमाएं तय की गई हैं। NCBI के अनुसार, ये मानक स्वास्थ्य जोखिम, पानी को साफ करने की तकनीकी क्षमता और जांच की व्यावहारिकता को ध्यान में रखकर तय किए जाते हैं।
केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) के अनुसार, पानी की जांच में pH, धुंधलापन (टर्बिडिटी), कुल घुले ठोस पदार्थ (TDS), कठोरता, फ्लोराइड, आर्सेनिक, नाइट्रेट, आयरन, क्लोराइड, भारी धातु और सूक्ष्मजीवों जैसे कई मानकों को देखा जाता है।
चुनौतियां एवं प्रदूषण
भारत की पेयजल व्यवस्था के सामने पानी की मात्रा (कमी) और गुणवत्ता (प्रदूषण), दोनों तरह की कई चुनौतियां हैं, जो अक्सर एक-दूसरे से जुड़ी हुई भी होती हैं।
पानी की गुणवत्ता के प्रमुख मानकों को समझना
सुरक्षित पेयजल सुनिश्चित करने के लिए पानी के कई भौतिक, रासायनिक और सूक्ष्मजीवी मानकों पर ध्यान देना जरूरी होता है। इनमें से हर एक का असर स्वास्थ्य, स्वाद और पानी के रोज़मर्रा के उपयोग पर अलग-अलग तरीके से पड़ता है।
कोलीफॉर्म बैक्टीरिया और ई. कोलाई, जैसे सूक्ष्मजीवी प्रदूषण, भारत में डायरिया जैसी बीमारियों के बड़े कारणों की सूची में शामिल हैं और तुरंत स्वास्थ्य जोखिम पैदा करते हैं।
लंबे समय तक आर्सेनिक के संपर्क में रहने से त्वचा पर घाव, कैंसर और हृदय संबंधी समस्याएं हो सकती हैं।
फ्लोराइड की अधिक मात्रा और लंबे समय तक इसके सेवन से दांत में फ्लोरोसिस की हल्की समस्या से लेकर अस्थि फ्लोरोसिस जैसी गंभीर समस्या हो सकती है।
नाइट्रेट और नाइट्राइट खास तौर पर शिशुओं के लिए बेहद खतरनाक होते हैं। इससे ब्लू बेबी सिंड्रोम जैसी गंभीर स्थिति पैदा हो सकती है, साथ ही अन्य स्वास्थ्य समस्याएं भी हो सकती हैं।
TDS, नामक की मात्रा, कठोरता, क्लोराइड और आयरन पानी के स्वाद और उसके रोज़मर्रा के उपयोग को प्रभावित करते हैं। नमक की अधिक मात्रा उच्च रक्तचाप से जूझ रहे लोगों के लिए विशेष रूप से नुकसानदायक हो सकती है।
सीसा, कैडमियम और क्रोमियम जैसी भारी धातुएं कम मात्रा में मौजूद होने पर भी धीरे-धीरे शरीर पर विषैले प्रभाव डाल सकती हैं।
प्रदूषण और पानी तक पहुंच की चुनौतियां कैसे सामने आती हैं?
ये सभी मानक आखिरकार घरों और समुदायों के सामने वास्तविक चुनौतियों के रूप में सामने आते हैं।
भूजल में रासायनिक प्रदूषण: उत्तर प्रदेश के नगला चांदी पर आधारित बियोंड दी टैप (Beyond the Tap) की एक केस स्टडी में पाया गया कि वहां के भूजल में TDS लगभग 3748 मिलीग्राम प्रति लीटर, कठोरता लगभग 1030 मिलीग्राम प्रति लीटर और क्लोराइड लगभग 1129 मिलीग्राम प्रति लीटर था। ये सभी स्तर BIS 10500 के तय मानकों से काफी अधिक थे।
मौसमी कमी और उसका बोझ: पानी की मौसमी कमी आज भी ग्रामीण समुदायों के लिए बड़ी समस्या बनी हुई है, खासकर सूखे महीनों में। कई परिवारों को अब भी दूर के स्रोतों से पानी लाने में समय खर्च करना पड़ता है और मेहनत करनी पड़ती है। हालांकि जल जीवन मिशन (JJM) की प्रगति से कई जगह स्थिति में सुधार हुआ है, फिर भी दूरदराज़ और हाशिए पर रहने वाले समुदाय अब भी पीछे हैं। हाशिए पर रहने वाले समुदाय अब भी पीछे हैं।
समान पहुंच का सवाल: पानी तक समान पहुंच में अब भी बहुत अधिक असमानता है। आदिवासी, आर्थिक रूप से कमजोर परिवार और बड़े परिवार तथा कम शिक्षित परिवार अक्सर ही बेहतर जल सुविधाओं से वंचित रह जाते हैं। इंडिया वॉटर पोर्टल के WASH facilities विश्लेषण के अनुसार, अनुसूचित जनजाति के केवल लगभग आधे परिवारों को ही बेहतर जल और स्वच्छता सेवाओं की सुविधा मिल पाती है।
बोतलबंद पानी को लेकर चिंताएं: शहरों में बोतलबंद और पैकेज्ड पानी का उपयोग तेजी से बढ़ रहा है और लगभग 12 फ़ीसद शहरी परिवार इस पर निर्भर हैं। लेकिन छोटे स्तर की कंपनियों पर निगरानी कमजोर होने के कारण इसकी गुणवत्ता, सुरक्षा और पर्यावरण पर पड़ने वाले असर को लेकर चिंताएं बनी हुई हैं।
निगरानी और अनुपालन: कहां हैं कमियां
जल जीवन मिशन के तहत यह अनिवार्य किया गया है कि ग्रामीण क्षेत्रों की सभी पाइप जलापूर्ति योजनाओं को BIS 10500 के पेयजल मानकों को पूरा करना है।
केंद्रीय भूजल बोर्ड (CGWB) भूजल की गुणवत्ता की निगरानी करता है और आर्सेनिक, फ्लोराइड, भारी धातुओं तथा अन्य प्रदूषकों से जुड़े आंकड़े राज्य सरकारों के साथ साझा करता है। फिर भी कई बस्तियां अब तक जांच से बाहर हैं, और उपलब्ध आंकड़े अक्सर पुराने या अधूरे होते हैं।
कई बार स्रोत पर पानी को शुद्ध कर दिए जाने के बाद भी ग्रामीण क्षेत्रों के वितरण नेटवर्क में समस्याएं बनी रहती हैं। बिना लाइनिंग वाली पाइपलाइनें, रिसाव और जलापूर्ति में बार-बार रुकावट के कारण पानी दोबारा दूषित हो सकता है। इसके अलावा, परिवार अक्सर पानी को असुरक्षित बर्तनों में जमा या संग्रहित करते हैं, जिससे प्रदूषण का खतरा और बढ़ जाता है।
योजनाओं को लागू करने में आने वाली चुनौतियां
कई जगह नल कनेक्शन उपलब्ध होने के बावजूद पानी की आपूर्ति नियमित नहीं होती या तय मात्रा में पानी नहीं मिल पाता।
कई बार पानी की गुणवत्ता तय मानकों से नीचे रह जाती है। इसका कारण या तो रासायनिक प्रदूषण का ठीक से उपचार न होना होता है, या फिर वितरण के दौरान सूक्ष्मजीवी प्रदूषण का मिल जाना।
बुनियादी ढांचे की देखभाल, खासकर पाइपलाइन, पंप और जल शोधन संयंत्रों का रखरखाव, हर जगह एक जैसा नहीं है।
कुछ राज्यों में फंड में मिले पैसों के उपयोग में देरी, संसाधनों का पूरा इस्तेमाल न होने और तकनीकी क्षमता की कमी जैसी समस्याएं भी सामने आती हैं।
इन चुनौतियों के बावजूद जल जीवन मिशन की उपलब्धियां काफी महत्वपूर्ण रही हैं। 2019 में जहां केवल लगभग 17 फ़ीसद ग्रामीण परिवारों के पास पाइप से पानी की सुविधा थी, वहीं 2025 तक यह पहुंच बढ़कर करीब 80 फ़ीसद तक पहुंच गई है।
घरेलू स्तर पर सुरक्षित पेयजल के उपाय
सरकारी योजनाएं जहां बुनियादी ढांचे और नीतियां तैयार करती हैं, वहीं कई बार परिवारों को यह सुनिश्चित करने के लिए अपने स्तर पर भी कुछ उपाय अपनाने पड़ते हैं कि पानी वास्तव में सुरक्षित हो।
उबालना: यह सबसे पुराना और आसान तरीका है। पानी को कुछ मिनट तक उबालने से इसमें उपस्थित अधिकांश रोगाणु, जैसे बैक्टीरिया और वायरस, नष्ट हो जाते हैं। किसी बीमारी के फैलने के समय या जब पानी के दूषित होने की आशंका हो, यह तरीका खास तौर पर उपयोगी होता है। हालांकि इसमें ईंधन और समय दोनों लगते हैं, और भारी धातुओं, फ्लोराइड या आर्सेनिक जैसे रासायनिक प्रदूषकों की उपस्थिति की समस्या इससे दूर नहीं हो पाती है।
कीटाणुशोधन/क्लोरीनीकरण: क्लोरीन की गोलियों या ब्लीच की तय मात्रा के उपयोग से पानी में मौजूद सूक्ष्मजीवों को प्रभावी तरीक़े से खत्म किया जा सकता है। यह अपेक्षाकृत सस्ता और आसान उपाय है। हालांकि कई बार इसकी गंध, स्वाद और अवशेष को लेकर लोग इसका इस्तेमाल करने से बचते हैं। सही मात्रा और सही तरीके से इसका उपयोग बहुत जरूरी है।
फिल्ट्रेशन तकनीकें
सिरेमिक / कैंडल फिल्टर: तलछट और कुछ सूक्ष्मजीवों को हटाने में उपयोगी।
रेत / बायो-सैंड फिल्टर: जहां पानी में धुंधलापन या गंदलापन अधिक हो, वहां कारगर होता है।
एक्टिवेटेड कार्बन फिल्टर: पानी के स्वाद, रंग और कुछ कार्बनिक रसायनों को बेहतर बनाने में मददगार।
आरओ और यूवी सिस्टम: ये कई रासायनिक प्रदूषकों को हटाने और सूक्ष्मजीवों को नष्ट करने में प्रभावी होते हैं। आरओ TDS और फ्लोराइड कम करने में उपयोगी है, लेकिन इसमें पानी की बर्बादी होती है और यह महंगा होता है। यूवी सिस्टम को बिजली और नियमित रखरखाव की जरूरत होती है।
सरल जांच और जागरूकता
फ्लोराइड, आर्सेनिक, नाइट्रेट या बैक्टीरिया की मौजूदगी जानने के लिए पोर्टेबल टेस्ट किट का उपयोग किया जा सकता है।
पानी के रंग, गंध और स्वाद पर नियमित रूप से ध्यान देना भी जरूरी है।
पानी को हमेशा साफ और ढके हुए बर्तनों में रखना चाहिए, ताकि वह दोबारा दूषित न हो।
अगर पानी को लेकर जरा भी संदेह हो, तो पीने से पहले उसे उबालना या फिल्टर करना बेहतर है।
व्यवहार और लागत से जुड़ी बातें
कम आय वाले परिवारों के लिए उन्नत फिल्ट्रेशन सिस्टम महंगे साबित हो सकते हैं। ऐसे में सब्सिडी या सामुदायिक जल शोधन प्रणालियां मददगार हो सकती हैं। इसके साथ ही व्यवहार में बदलाव, जैसे खुले में शौच रोकना और स्वच्छता सुधारना, जल स्रोतों के प्रदूषण को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। स्कूल और सामुदायिक समूह जागरूकता फैलाने में मदद कर सकते हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
घर पर पानी की जांच कैसे करें?
आप पोर्टेबल या फील्ड टेस्ट किट की मदद से पानी में बैक्टीरिया, फ्लोराइड, नाइट्रेट और आर्सेनिक जैसे प्रदूषकों की जांच कर सकते हैं। ये किट स्थानीय स्वास्थ्य विभाग, गैर-सरकारी संस्थाओं या निजी विक्रेताओं से मिल जाती हैं।
अगर अधिक सटीक जांच करानी हो, जैसे भारी धातुओं या विस्तृत सूक्ष्मजीवी विश्लेषण के लिए, तो पानी का नमूना साफ बर्तन में लेकर किसी मान्यता प्राप्त सरकारी या निजी प्रयोगशाला में भेजा जा सकता है। नमूना लेते समय साफ-सफाई, सुरक्षित भंडारण और सही परिवहन का ध्यान रखना जरूरी है।
अगर मेरे घर का नल का पानी दूषित हो या तय मानकों पर खरा न उतरे, तो मुझे क्या करना चाहिए?
सबसे पहले इसकी सूचना अपने स्थानीय जलापूर्ति विभाग या नगर निगम को दें। जल जीवन मिशन के तहत राज्यों के लिए BIS 10500 के अनुसार पानी की गुणवत्ता की निगरानी करना अनिवार्य है।
इस बीच, घर पर पानी को उबालकर पिएं या फिल्ट्रेशन / कीटाणुशोधन के तरीकों का उपयोग करें।
आप स्थानीय उपभोक्ता मंच से भी संपर्क कर सकते हैं, और यदि गंभीर प्रदूषण लगातार बना हुआ है, तो हाई कोर्ट में जनहित याचिका (PIL) दायर कर सकते हैं या राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड से संपर्क कर सकते हैं।
अगर मेरे घर का नल का पानी दूषित हो या तय मानकों पर खरा न उतरे, तो मुझे क्या करना चाहिए?
सबसे पहले, इसकी सूचना अपने स्थानीय जलापूर्ति विभाग या नगर निगम को दें। जल जीवन मिशन के तहत राज्यों के लिए BIS 10500 के अनुसार पानी की गुणवत्ता की निगरानी करना अनिवार्य है।
इस बीच, घर पर पानी को उबालकर पिएं या फिल्ट्रेशन / कीटाणुशोधन के तरीकों का उपयोग करें।
आप स्थानीय उपभोक्ता मंच से भी संपर्क कर सकते हैं, और यदि गंभीर प्रदूषण लगातार बना हुआ है, तो हाई कोर्ट में जनहित याचिका (PIL) दायर कर सकते हैं या राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड से संपर्क कर सकते हैं।
पीने के पानी में प्रमुख प्रदूषकों की अनुमेय सीमाएं क्या हैं?
BIS/WHO के तहत कुछ प्रमुख सीमाएं इस प्रकार हैं:
आर्सेनिक: WHO की गाइडलाइन के अनुसार इसकी सीमा 0.01 mg/L है; जबकि वैकल्पिक स्रोत न होने की स्थिति में BIS मानक 0.05 mg/L तक की अनुमति देता है। NCBI
फ्लोराइड: आम तौर पर क्षेत्र के अनुसार इसकी सीमा लगभग 1.0 से 1.5 mg/L होती है।
नाइट्रेट: BIS के अनुसार इसकी सीमा लगभग 45 mg/L है।
pH सीमा: 6.5 से 8.5; जबकि TDS की स्वीकार्य सीमा लगभग 500 mg/L है। वैकल्पिक स्रोत न होने पर इसमें कुछ छूट दी जा सकती है।
असुरक्षित पेयजल की आपूर्ति करने या जल स्रोतों को प्रदूषित करने पर क्या दंड हैं?
जल (प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण) अधिनियम, 1974 और पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986 जैसे कानूनों के तहत दंड, जुर्माना और कुछ मामलों में प्रदूषण फैलाने वाले उद्योगों को बंद करने का प्रावधान है। अदालतों ने भी कई मामलों में राज्य सरकारों को आवश्यक निर्देश दिए हैं। हालांकि, इन कानूनों का पालन और इन पर कार्रवाई अक्सर कमजोर होती है। कुछ मामलों में नागरिकों द्वारा किए गए मुकदमों ने प्रशासन को सुधार के कदम उठाने पर मजबूर किया है।
पानी में खारापन, कड़वाहट या अजीब गंध / स्वाद क्यों आता है?
यह पानी में लवणता (क्लोराइड की मात्रा) की अधिकता, उच्च TDS, कुछ खनिजों जैसे आयरन, सल्फर, मैंगनीज की मौजूदगी, या कभी-कभी सूक्ष्मजीवों की वृद्धि का संकेत हो सकता है। कड़वे स्वाद का कारण फ्लोराइड की अधिक मात्रा या कुछ भारी धातुओं की उपस्थिति हो सकती है। अगर आपको ऐसे बदलाव महसूस हों, तो पानी की जांच कराएं। ज़रूरत के अनुसार आरओ, एक्टिवेटेड कार्बन या अन्य फिल्टर का उपयोग करें।
पानी की कमी या जलापूर्ति बाधित होने पर क्या करना चाहिए?
पानी को हमेशा साफ और ढके हुए बर्तनों में सुरक्षित रखें।
जहां संभव हो, वर्षा जल संचयन का उपयोग करें।
पानी के उपयोग में प्राथमिकता तय करें, सबसे पहले पीने के लिए पानी सुरक्षित रखें।
सामुदायिक स्तर पर साझा जल टैंकरों या सार्वजनिक जल स्रोतों का उपयोग करें, साथ ही उनकी सुरक्षा और गुणवत्ता की निगरानी भी सुनिश्चित करें।
स्थानीय प्रशासन से बेहतर और नियमित जलापूर्ति की मांग करें, क्योंकि जल जीवन मिशन जैसी योजनाओं के तहत पर्याप्त और नियमित जलापूर्ति एक कानूनी और नीतिगत लक्ष्य है।
भारत की पेयजल चुनौती केवल बुनियादी ढांचे या तकनीक का सवाल नहीं है। यह उन लोगों के जीवन से जुड़ा मुद्दा है, जिनकी रोजमर्रा की जिंदगी इस बात पर निर्भर करती है कि उनके नलों से क्या बह रहा है।
स्थानीय स्तर पर निगरानी को मजबूत करना, पारदर्शिता बढ़ाना और सभी के लिए समान पहुंच सुनिश्चित करना इस चुनौती को एक अवसर में बदल सकता है। सुरक्षित पानी कोई विलासिता नहीं, बल्कि स्वास्थ्य और गरिमा की बुनियाद है, और भारत की नीतियों में इस तात्कालिकता को स्पष्ट रूप से दिखना चाहिए।
इस लेख का हिन्दी अनुवाद डॉ कुमारी रोहिणी ने किया है।
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