पर्यावरण संरक्षण को हकीक़त की ज़मीन पर बढ़ावा देने के लिए भारतीय रेलवे बोर्ड 'ग्रीन ऑडिट' की व्यवस्था लागू करने जा रहा है। इसमें सभी रेलवे ज़ोनों को इस मद में खर्च किए गए धन का विवरण देना होगा।
फोटो : विकी कॉमंस
रेलवे के हर जोन में पर्यावरण संरक्षण के लिए किए गए कार्यों का होगा 'ग्रीन ऑडिट'
ट्रेनों के संचालन में कार्बन उत्सर्जन घटाने और ग्रीन एनर्जी का इस्तेमाल बढ़ाने पर जोर
सभी जोन को 22 जून तक देनी होगी पर्यावरण रिपोर्ट
बढ़ा-चढ़ा कर खर्च दिखाने के फर्जीवाड़े पर रेलवे बोर्ड कसेगा नकेल
देश के सबसे बड़े सरकारी विभाग रेलवे में हाल के वर्षों में पर्यावरण संरक्षण की कई पहलें शुरू हुई हैं। इनमें रेलवे की ज़मीनों और परिसरों में हरियाली को बढ़ावा देने से लेकर ईंधन और पानी की बचत और सौर ऊर्जा के इस्तेमाल जैसी चीजें शामिल हैं। इस सबके बावज़ूद पर्यावरण संरक्षण के मोर्चे पर कोई ठोस या बड़ा बदलाव नज़र नहीं आया है। पर्यावरणीय बजट का ज्यादातर हिस्सा "पेड़ लगाए गए", "स्वच्छता अभियान चला", या "सोलर पैनल लगाए" जैसी छोटी-मोटी चीजों पर ही खर्च हो रहा है और इसे भी काफी बढ़ा-चढ़ा कर दिखाया जा रहा है। रेल मंत्रालय इन दावों और तौर-तरीकों से संतुष्ट नहीं है। हाल के महीनों में रेलवे बोर्ड ने कई जोनों की धीमी प्रगति पर नाराजगी भी जताई थी। इसके बाद अब मंत्रालय ने फैसला लिया है कि अब हर जोन से उसके पर्यावरणीय खर्च और वास्तविक परिणामों का हिसाब देना होगा। इसके लिए अब रेलवे के हर जोन में पर्यावरण संरक्षण के लिए किए गए कार्यों का 'ग्रीन ऑडिट' किया जाएगा।
प्रकाशित होगी वार्षिक पर्यावरण स्थिरता रिपोर्ट
व्यापक स्तर पर ज़ोनवार किए जाने वाले इस 'ग्रीन ऑडिट' के चलते अब अधिकारी पर्यावरण के नाम पर हर साल करोड़ों रुपये पानी की तरह बहाने में अपनी मनमर्जी नहीं चला पाएंगे। अब ऑडिट करवा कर रेलवे बोर्ड वार्षिक पर्यावरण स्थिरता रिपोर्ट (Annual Environmental Sustainability Report) तैयार कर प्रकाशित करेगा। इसे लेकर रेलवे बोर्ड के निदेशक अजय झा ने देश के रेलवे के सभी जोन, उत्पादन इकाइयों और सार्वजनिक उपक्रमों से पर्यावरण संरक्षण के लिए किए गए कार्यों का पूरा ब्योरा मांगा है। ये रिपोर्ट और तस्वीरें 22 जून तक बोर्ड को भेजनी होंगी।
ट्रेनों का कार्बन उत्सर्जन कम करने पर ज़ोर
वार्षिक पर्यावरण स्थिरता रिपोर्ट से पर्यावरण सुधार के नाम पर जो बजट खर्च हो रहा है, जमीनी स्तर पर उसका क्या नतीजा है और जोन किस लक्ष्य तक पहुंचे हैं, यह स्पष्ट होगा। इससे खर्चों को लेकर पारदर्शिता बढ़ेगी साथ ही लोगों केा इस बात का पता चलेगा कि ट्रेनों से उनका सफर कितना पर्यावरण अनुकूल हो रहा है। इससे ट्रेनों और स्टेशनों पर सौर ऊर्जा का उपयोग, जल संरक्षण और कचरा प्रबंधन जैसे कामों को और रफ्तार मिलेगी। पर्यावरण संरक्षण के लिए चलाई जा रही नई ग्रीन योजनाओं से ट्रेनों का कार्बन उत्सर्जन में होने वाली कमी की जानकारी सामने आएगी।
कई रेलवे ज़ोनों में हुए हैं महत्वपूर्ण काम
रेलवे की हरित पहलों के अंतर्गत उसके विभिन्न ज़ोनों में हाल के दिनों में कई महत्वपूर्ण काम पूरे हुए हैं। मिसाल के तौर पर उत्तर मध्य रेलवे भारतीय रेल के 'मिशन 2030' (नेट जीरो कार्बन उत्सर्जन) के तहत यहां शत-प्रतिशत विद्युतीकरण का कार्य पूरा हो चुका है। जोन ने 18.60 मेगावाट क्षमता के सोलर प्लांट लगाए गए, जिससे नौ मिलियन यूनिट से अधिक बिजली (ग्रीन एनर्जी) का उत्पादन हुआ। साथ ही इससे आठ हजार मीट्रिक टन से अधिक कार्बन कम हुआ। इन कार्यों से कुल मिलाकर 5.69 करोड़ रुपये की बचत हुई है। इसे देखते हुए अब इस क्षमता को बढ़ाकर 30 मेगावाट करने और 27 हजार मीट्रिक टन कार्बन उत्सर्जन रोकने का नया लक्ष्य रखा गया है।
इसी तरह ऊर्जा दक्षता ब्यूरो द्वारा महाप्रबंधक कार्यालय परिसर की गंगा, पावर हाउस और सरस्वती बिल्डिंग को 'शून्य प्लस लेबल' का प्रमाणन प्राप्त हुआ है। साथ ही 45 एलएचबी रेकों को हेड आन जेनरेशन (एचओजी) तकनीक में बदलने से 52.17 करोड़ रुपये मूल्य के डीजल की बड़ी बचत हुई है। रेलेवे बोर्ड अब 'ग्रन ऑडिट' की व्यवस्था लागू कर ऐसे ही ठोस नतीजों का हिसाब हर जोन से मांग रहा है।
ग्रीन ऑडिट में क्या-क्या देखा जाएगा?
जोनल रेलवे को पर्यावरण से जुड़े विभिन्न कार्यों की जो विस्तृत रिपोर्ट रेलवे बोर्ड को देनी होगी उसमें यह बातें शामिल होंगी -
सौर ऊर्जा और अन्य नवीकरणीय ऊर्जा का उपयोग
ट्रेनों के संचालन में डीजल खपत में कमी
रेल मार्गों और स्टेशनों व परिसरों में वृक्षारोपण
जल संरक्षण और वर्षा जल संचयन के उपाय
प्लास्टिक और ठोस अपशिष्ट प्रबंधन
सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (STP) और जल पुनर्चक्रण (रिसायकलिंग)
बेहतर ऊर्जा दक्षता वाले उपकरणों का उपयोग
कार्बन उत्सर्जन कम करने के लिए किए गए पर्यावरण अनुकूल प्रयास
यह ऑडिट केवल गतिविधियों की संख्या नहीं, बल्कि उनपर खर्च की गई राशि और उसके परिणामों का भी आकलन कर सकता है।
'ग्रीन ऑडिट' शुरू होने के बाद अब पर्यावरण के नाम पर हर साल करोड़ों रुपये बहाने में अधिकारियों की मनमानी नहीं चलेगी।
फोटो : विकी कॉमंस
रेलवे बोर्ड को ग्रीन ऑडिट की जरूरत क्यों पड़ी?
मई 2026 में रेलवे बोर्ड ने सभी जोनों को पत्र लिखकर पर्यावरणीय परियोजनाओं की धीमी प्रगति पर चिंता जताई थी। बोर्ड ने कहा था कि पर्यावरण संबंधी योजनाओं को तय समय-सीमा में पूरा किया जाए। यानी यह ऑडिट कहीं न कहीं यह जांचने का भी माध्यम है कि इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए किए जा रहे प्रयास कितने प्रभावी हैं। और इसके लिए जोनों को जो पैसा दिया गया, उसका वास्तविक असर जमीन पर कितना दिख रहा है।
इसके अलावा, पिछले कुछ वर्षों में रेलवे ने हरित ऊर्जा, ऊर्जा दक्षता, जल संरक्षण, अपशिष्ट प्रबंधन और वृक्षारोपण जैसी पर्यावरणीय परियोजनाओं पर बड़े पैमाने पर निवेश किया है। ऐसे में केवल बजट खर्च हो जाना ही सफलता का पैमाना नहीं माना जा सकता। रेलवे बोर्ड अब यह जानना चाहता है कि जिन परियोजनाओं पर करोड़ों रुपये खर्च किए गए, उनसे वास्तव में कितना कार्बन उत्सर्जन कम हुआ, कितनी ऊर्जा की बचत हुई, कितने जल स्रोतों का संरक्षण हुआ और पर्यावरणीय लक्ष्यों की दिशा में कितनी ठोस प्रगति हुई। ग्रीन ऑडिट इसी वजह से एक जवाबदेही तंत्र (Accountability Mechanism) के रूप में उभर रहा है, जिसके जरिए विभिन्न जोनों के प्रदर्शन की तुलना भी की जा सकेगी और बेहतर कार्य करने वाले जोनों की पहचान भी हो सकेगी।
2030 तक विश्व का पहला ‘नेट-जीरो रेलवे’ बनने का है लक्ष्य
भारतीय रेलवे ने वर्ष 2030 तक नेट-जीरो कार्बन उत्सर्जन (Net Zero Carbon Emission) हासिल करने का महत्वाकांक्षी लक्ष्य तय किया है। यदि यह लक्ष्य निर्धारित समय पर पूरा हो जाता है, तो भारतीय रेलवे दुनिया के सबसे बड़े रेल नेटवर्कों में शामिल होने के साथ-साथ नेट-जीरो बनने वाले अग्रणी रेलवे तंत्रों में भी गिनी जाएगी। रेलवे का मानना है कि देश के कुल परिवहन क्षेत्र में रेल सबसे कम कार्बन उत्सर्जन वाला माध्यम है और इसे और अधिक पर्यावरण-अनुकूल बनाकर जलवायु परिवर्तन से निपटने में महत्वपूर्ण योगदान दिया जा सकता है।
इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए रेलवे कई मोर्चों पर एक साथ काम कर रही है। सबसे बड़ा कदम ब्रॉड गेज रेल मार्गों का शत-प्रतिशत विद्युतीकरण है, जिससे डीजल इंजनों पर निर्भरता लगभग समाप्त हो सके। इसके साथ ही रेलवे सौर और पवन ऊर्जा जैसी नवीकरणीय ऊर्जा के उपयोग को तेजी से बढ़ा रही है। रेलवे स्टेशनों, कोचिंग डिपो, कार्यशालाओं और खाली पड़ी भूमि पर सौर ऊर्जा संयंत्र लगाए जा रहे हैं, जबकि बड़े पैमाने पर हरित ऊर्जा खरीदने की भी योजना है। ऊर्जा दक्ष एलईडी प्रकाश व्यवस्था, जल पुनर्चक्रण संयंत्र, वर्षा जल संचयन, हरित भवनों का निर्माण और बड़े स्तर पर वृक्षारोपण जैसे उपाय भी इस रणनीति का हिस्सा हैं।
रेलवे अधिकारियों के अनुसार नेट-जीरो का अर्थ केवल उत्सर्जन कम करना नहीं है, बल्कि जितनी ग्रीनहाउस गैसें उत्सर्जित हों, उन्हें उतनी ही मात्रा में कम करने या अवशोषित करने की व्यवस्था भी विकसित करना है। ऐसे में अब रेलवे के विभिन्न जोनों में चल रही पर्यावरणीय परियोजनाओं का ग्रीन ऑडिट यह तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा कि 2030 के इस लक्ष्य की दिशा में वास्तविक प्रगति कितनी हुई है और किन क्षेत्रों में अभी सुधार की आवश्यकता है।
ग्रीन एनर्जी पर रेलवे का बड़ा दांव
रेलवे आने वाले वर्षों में बड़े पैमाने पर सौर और पवन ऊर्जा खरीदने तथा विकसित करने की योजना पर काम कर रहा है। 2026 में रिपोर्टें सामने आई थीं कि रेलवे लगभग 3 गीगावाट अतिरिक्त नवीकरणीय ऊर्जा परियोजनाओं पर निवेश की तैयारी कर रहा है, ताकि डीजल और पारंपरिक बिजली पर निर्भरता कम की जा सके।
रेलवे की योजना केवल हरित ऊर्जा के इस्तेमाल को बढ़ावा देने तक सीमित नहीं है, बल्कि वह स्वयं भी बड़े पैमाने पर नवीकरणीय ऊर्जा (Renewable Energy) उत्पादन क्षमता विकसित कर रही है। रेलवे स्टेशनों, कोच डिपो, वर्कशॉप और खाली पड़ी रेलवे भूमि पर सौर ऊर्जा संयंत्र स्थापित किए जा रहे हैं। रेलवे पहले ही कई गीगावाट क्षमता की सौर और पवन ऊर्जा परियोजनाओं के लिए समझौते कर चुकी है और आने वाले वर्षों में इस क्षमता को और बढ़ाने की तैयारी है। इसका उद्देश्य ट्रेनों के संचालन, स्टेशन परिसरों और रेलवे प्रतिष्ठानों की बिजली आवश्यकताओं को अधिकतम सीमा तक हरित ऊर्जा से पूरा करना है। विशेषज्ञों का मानना है कि भारतीय रेलवे देश के सबसे बड़े बिजली उपभोक्ताओं में से एक है, इसलिए यदि इसकी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा नवीकरणीय स्रोतों से पूरा होने लगे तो इससे राष्ट्रीय स्तर पर कार्बन उत्सर्जन में भी उल्लेखनीय कमी लाई जा सकती है।
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