क्या है भारत में नीली अर्थव्यवस्था को मज़बूती देने वाला डीप ओशन मिशन?
भारत तीन ओर से समुद्र से घिरा एक प्रायद्वीपीय देश है। करीब 7,517 किलोमीटर लंबी तट-रेखा और 1,300 से अधिक द्वीप इसमें शामिल हैं। समुद्र से न केवल भारत की भौगोलिक पहचान जुड़ी हुई है, बल्कि यह उसके आर्थिक और पारिस्थितिक तंत्र का भी अहम हिस्सा है। इसे मज़बूत करने के लिए भारत सरकार ने 2021 में दो चरणों वाले डीप ओशन मिशन की शुरुआत की। पांच वर्ष की अविध और 4,077 करोड़ रुपये के निवेश वाला यह महत्वाकांक्षी मिशन हाल ही में अपने पहले चरण की समाप्ति के बाद अब दूसरे चरण में पहुंच गया है।
डीप ओशन मिशन एक बार फिर से खबरों में आया, जब बीते माह 5-6 अगस्त, 2025 को दो भारतीय जलयात्रियों ने फ्रांस के समुद्री अनुसंधान संस्थान आईएफआरईएमईआर के सहयोग से फ़्रांसीसी पनडुब्बी नॉटाइल में सवार होकर अटलांटिक महासागर में 5,002 मीटर की गहराई तक समुद्र में सात घंटे का गोता लगाया।
केंद्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी राज्य मंत्री जितेंद्र सिंह ने एक कार्यक्रम में दो भारतीय जलयात्रियों वैज्ञानिक राजू रमेश और कमांडर जतिंदर पाल सिंह (सेवानिवृत्त) की इस ऐतिहासिक उपलब्धि की घोषणा की। इसके साथ, भारत अब आधा दर्ज़न से भी कम देशों के उस विशिष्ट समूह में शामिल हो गया है, जिन्होंने समुद्र में इतनी गहराई तक जाने का साहस किया है।
गोता अभियान राष्ट्रीय महासागर प्रौद्योगिकी संस्थान (एनआईओटी), चेन्नई की टीम की देखरेख में संपन्न हुआ। इस टीम का नेतृत्व डॉ. रमेश सेतुरामन ने किया, इसके अन्य सदस्यों में पलानीअप्पन, डॉ. डी. सत्यनारायणन और जी. हरिकृष्णन शामिल रहे। सात घंटे के अभियान के दौरान गोता लगाने से पहले की तैयारियों, संचालन, उत्प्लावन प्रबंधन, नमूना संग्रह और ध्वनिक संचार प्रोटोकॉल में महत्वपूर्ण अनुभव प्राप्त किया।
मंत्री जितेंद्र सिंह ने कहा कि यह रिकॉर्ड-तोड़ गोता भारत के समुद्रयान मिशन के तहत प्रारंभिक कार्य की प्रस्तावना है, जिसका उद्देश्य 2027 तक भारत में विकसित पनडुब्बी मत्स्य-6000 में तीन जलयात्रियों को 6,000 मीटर की गहराई तक भेजना है। इससे पहले भारतीय वैज्ञानिकों ने साल 1997 और 2002 में क्रमशः एल्विन (अमेरिका) और नौटाइल (फ्रांस) पनडुब्बियों में 3,800 मीटर और 2,800 मीटर तक गोता लगाया था।
‘समुद्रयान’ परियोजना और मत्स्य-6000 पनडुब्बी
डीप ओशन मिशन के तहत चलाई जा रही समुद्रयान परियोजना के अंतर्गत समुद्र में अन्वेषण, शोध और सर्वेक्षण के कामों के लिए पोतों, पनडुब्बियों और अन्य मरीन उपकरणों का विकास किया जा रहा है। पीआईबी की ओर से दी गई जानकारी के मुताबिक, मिशन के दूसरे चरण में साल 2026 तक समुद्रयान मिशन के तहत भारत स्वदेश निर्मित मत्स्य-6000 पनडुब्बी के ज़रिये मध्य हिंद महासागर में समुद्र तल में 6,000 मीटर की गहराई तक पहुंचने की तैयारी कर रहा है।
इसके लिये एक चालक दल को प्रशिक्षित करने के साथ ही, पनडुब्बी के परीक्षण का काम तेज़ी से चल रहा है। मत्स्य-6000 गहरे समुद्र में चलने वाली एक छोटी पनडुब्बी है, जिसे तीन सदस्यों के दल को समुद्र की गहराई में ले जाने के लिये डिज़ाइन किया गया है। इतनी गहराई में 6,000 बार तक के दबाव को झेलने के लिये इसका डिज़ाइन गोलाकार रखा गया है और इसका निर्माण बेहद मजबूत टाइटेनियम मिश्रधातु (एलॉय) से किया गया है। इसका व्यास 2260 मिमी और दीवार की मोटाई 80 मिमी है, जिसे 6000 बार दबाव और -3°C तक के न्यूनतम तापमान को झेलने के लिए डिज़ाइन किया गया है।
पनडुब्बी के निर्माण में भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के द्रव प्रणोदन प्रणाली केंद्र (एलपीएससी) द्वारा विकसित एक विशेष वेल्डिंग प्रक्रिया से किया गया है, जिसे उच्च-भेदन इलेक्ट्रॉन बीम वेल्डिंग (ईबीडब्ल्यू) कहा जाता है। वेल्डिंग की इस प्रक्रिया को 700 परीक्षणों के बाद पूरा किया जा सका है।
गहरे समुद्र के भारी दबाव में भी मज़बूती के साथ टिके रहने के लिए पनडुब्बी की वेल्डिंग की गुणवत्ता का परीक्षण बहुत उन्नत तकनीकों द्वारा किया गया है। पनडुब्बी के कई परीक्षण जनवरी-फरवरी 2025 में एलएंडटी शिपयार्ड, कट्टुपल्ली पोर्ट, चेन्नई में किए गए। इन परीक्षणों में पावर और कंट्रोल सिस्टम, फ़्लोटेशन और स्थिरता, आगे और पीछे की ओर गति, नेविगेशन और संचार क्षमताओं से लेकर सुरक्षा तंत्र तक की गहन जांच की गई।
यह पनडुब्बी सामान्य स्थितियों में 12 घंटे और आपात स्थिति में 96 घंटे तक समुद्र के भीतर रह सकती है। यह पनडुब्बी उच्च-घनत्व वाली लीथियम पॉलीमर बैटरी, पानी के भीतर संचार की सुविधा, आपातकालीन बचाव तंत्र, और चालक दल की सुरक्षा और स्वास्थ्य निगरानी के लिए बायो-वेस्ट जैसी उन्नत प्रणालियों से लैस है। डीप ओशन मिशन में 6,000 मीटर की गहराई का लक्ष्य पॉलीमेटेलिक नोड्यूल और सल्फाइड जैसे मूल्यवान संसाधनों की उपस्थिति के कारण रखा गया है, क्योंकि सामान्यत: ये 3,000 से 5,500 मीटर की गहराई के बीच पाए जाते हैं।
मिशन से भारत को मिल सकती है ऊर्जा सुरक्षा
डीप ओशन मिशन के हालिया परीक्षण की एक ख़ासियत यह भी रही, कि इसके तहत वैज्ञानिकों ने हाल ही में अंडमान के निकट हिंद महासागर में 1,173 मीटर की गहराई से 100 किलोग्राम से अधिक कोबाल्ट-रिच पॉलीमेटेलिक नोड्यूल इकट्ठा किए। यह भविष्य में गहरे समुद्र में खनन की दिशा में एक प्रतीकात्मक, लेकिन काफ़ी महत्वाकांक्षी कदम माना जा रहा है। क्योंकि, भारत अगर अपने समुद्री क्षेत्र में मौजूद पॉलीमेटेलिक नोड्यूल के भंडार के महज़ 10% हिस्से का दोहन करने में भी सफल होता है, तो अगले 100 साल तक देश की ऊर्जा संबंधी आवश्यकताओं को पूरा कर सकता है।
पॉलीमेटेलिक नोड्यूल गोल या अंडाकार आकार की खनिजों के डिपॉज़िट होते हैं, जो समुद्र तल पर हजारों-लाखों साल में धीरे-धीरे जमा होते हैं। इनमें तांबा, निकल, कोबाल्ट और मैंगनीज़ जैसी कीमती धातुएं पाई जाती हैं, जो अक्षय ऊर्जा उपकरणों और बैटरी निर्माण में इस्तेमाल होती हैं। खासतौर पर, कोबाल्ट और निकल लिथियम-आयन बैटरियां बनाने के लिए ज़रूरी हैं। इस लिहाज़ से पॉलीमेटेलिक नोड्यूल भविष्य की ग्रीन एनर्जी की रीढ़ माने जा रहे हैं।
भारत के पास भारतीय महासागर के लगभग 75,000 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में इन नोड्यूल की खोज और दोहन का अंतरराष्ट्रीय अधिकार है। इसके अलावा अंतरराष्ट्रीय समुद्र तल प्राधिकरण (आईएसए) ने अतिरिक्त 10,000 वर्ग किमी का क्षेत्र भी भारत को दिया है, जिसमें वह संसाधनों का अन्वेषण और दोहन कर सकता है।
मध्य हिंद महासागर बेसिन पॉलीमेटेलिक मैंगनीज नोड्यूल (पीएमएन) की खोज का काम भारत इस मिशन के साथ ही शुरू कर चुका है। इसके लिए अनुसंधान पोत सागरनिधि का उपयोग करते हुए दिसंबर 2022 में हिन्द महासागर में 14 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र का सर्वेक्षण किया गया। इस सर्वेक्षण में 5,271 मीटर की गहराई पर पीएमएन समृद्ध क्षेत्रों का पता लगाया जा चुका है।
साथ ही पॉलीमेटेलिक नोड्यूल वितरण और गहरे समुद्र की जैव विविधता का आकलन करने के लिए 1.0x 0.5 किलोमीटर क्षेत्र का विस्तृत मानचित्रण किया गया, जिससे भविष्य के पीएमएन भंडारों की खोज और संसाधन मानचित्रण की नींव रखी गई।
अनुमान है कि इस क्षेत्र में अरबों टन नोड्यूल मौजूद हैं, जिनसे खनिज आत्मनिर्भरता हासिल करने के साथ-साथ भारत की ऊर्जा सुरक्षा भी सुनिश्चित की जा सकती है। इस खोज ने न केवल भारत की वैज्ञानिक क्षमताओं को सिद्ध किया है, बल्कि ब्लू इकोनॉमी को गति देने और वैश्विक ऊर्जा संक्रमण में योगदान देने की नई संभावनाएं भी खोल दी हैं।
मिशन के क्या हैं लक्ष्य
भारत के डीप ओशन मिशन के पीछे सरकार का लक्ष्य समुद्रों की अपार संभावनाओं को पहचानते हुए उन्हें देश के आर्थिक विकास के लिए उपयोग में लाने का है। यह मिशन सरकार के 'न्यू इंडिया' के विचार का समर्थन करता है, जो ब्लू इकोनॉमी को आर्थिक विकास के दस प्रमुख क्षेत्रों में से एक मानता है।
केंद्र सरकार के पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के मुताबिक इस मिशन के ज़रिये 2030 तक नीली अर्थव्यवस्था को 100 अरब से ऊपर ले जाकर देश की अर्थव्यवस्था के प्रमुख क्षेत्रों में शामिल करना है। फिलहाल देश के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में ब्लू इकोनॉमी का करीब 5% का योगदान है, जिसे साल 2030 तक बढ़ा कर 10% से आगे ले जाने का लक्ष्य है।
करीब चार साल पहले 16 जून 2021 को कैबिनेट की मंज़ूरी के बाद 7 सितंबर 2021 को शुरू हुए पांच साल के इस प्रोजेक्ट की अवधि 2021 से 2026 तक है। परियोजना को दो चरणों में बांटा गया है। इसका पहला चरण 2021-2024 तक चला, जिसका बजट 2,823.4 करोड़ रुपये का था। अब 2025 में इसका दूसरा चरण शुरू हो गया है, जिसका बजट 1253.6 करोड़ रुपये का है।
अंतरराष्ट्रीय कानूनों के तहत भारत को लगभग 23,72,298 वर्ग किलोमीटर का विशाल समुद्री क्षेत्र आर्थिक, वैज्ञानिक और सामरिक गतिविधियों आवंटित किया गया है। भारत अभी इसके 10% का उपयोग भी नहीं कर पाया है। समुद्र की गहराई में छिपी खनिज संपदाओं में तेल-गैस कीमती व दुर्लभ धातुएं, बहुमूल्य पत्थर, खनिज, गैस हाइड्रेट और ऊर्जा संसाधन देश की आर्थिक ज़रूरतों को पूरा करने में सहायक हो सकते हैं।
इसे देखते हुए सरकार का उद्देश्य इस मिशन के ज़रिए समुद्री संसाधनों का वैज्ञानिक और पर्यावरण अनुकूल तरीकों से दोहन करना है, ताकि देश ऊर्जा सुरक्षा, खाद्य सुरक्षा और खनिज आत्मनिर्भरता की दिशा में आगे बढ़ सके। साथ ही, महासागरीय शोध कार्यों को बढ़ावा देकर भारत को दुनिया के उन चुनिंदा देशों की श्रेणी में लाना है, जिनके पास गहरे समुद्र में खोज की आधुनिकतम तकनीक हो।
इन लक्ष्यों में ग्लोबल वॉर्मिंग और महासागरों के बढ़ते जलस्तर व तापमान से हो रहे जलवायु परिवर्तन के समाधान खोजने की चुनौती भी शामिल है। इस तरह डीप ओशन मिशन वैज्ञानिक, आर्थिक और पर्यावरणीय दृष्टि से भारत के भविष्य की नई दिशा तय करने वाला प्रयास है।
डीप ओशन मिशन का एक बड़ा उद्देश्य महासागर पारिस्थितिकी तंत्र को बेहतर ढंग से समझना और उसका संरक्षण करना है। समुद्र की अतल गहराइयों में आज भी ऐसे अनेक ऐसे जीव हैं, जिनके बारे में वैज्ञानिकों को बहुत कम जानकारी है। कई जीवों व वनस्पतियों को तो आजतक देखा या पहचाना तक नहीं गया है।
इन जीवों का अध्ययन न केवल जैव विविधता की दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि इससे चिकित्सा और औद्योगिक क्षेत्रों में भी नई खोजें संभव हैं, क्योंकि इन जीवों से ऐसी चीजें व जानकारियां मिल सकती हैं, जो कई बीमारियों के इलाज में या अन्य क्षेत्रों में उपयोगी हो सकती हैं। इसके अलावा, डीप ओशन मिशन जलवायु परिवर्तन, समुद्र स्तर वृद्धि, महासागरीय अम्लता, सागरों द्वारा कार्बन का अवशोषण (कार्बन कैप्चर) और समुद्री धाराओं के बदलाव का अध्ययन कर तटीय क्षेत्रों की बेहतर तैयारी में मदद करेगा।
मिशन का महत्व
डीप ओशन मिशन भारत को महासागरीय अनुसंधान, समुद्री प्रौद्योगिकी और मरीन इंजीनियरिंग में अग्रणी देशों की श्रेणी में लाने की क्षमता रखता है। इससे भारत को अंतरराष्ट्रीय समुद्र तल प्राधिकरण (आईएसए) जैसे ग्लोबल मंचों पर और अधिक मज़बूती से अपनी उपस्थिति दर्ज़ कराने का अवसर मिलेगा।
साथ ही, यह मिशन ब्लू इकोनॉमी को गति देगा, जिसके अंतर्गत गहरे समुद्र में खनन, मरीन बायो-टेक्नॉलजी, अपतटीय ऊर्जा (ऑफशोर एनर्जी) और समुद्री पर्यटन जैसी गतिविधियां शामिल हैं। विशेष रूप से डीप-सी टूरिज्म यानी गहरे समुद्र में पर्यटन गतिविधिायों जैसे नए क्षेत्र बड़ी संख्या में रोजगार और उद्यमिता के नए अवसर खोल सकते हैं, जिससे स्थानीय समुदायों को सीधा लाभ पहुंचेगा।
संयुक्त राष्ट्र ने 2021 से 2030 को "सतत विकास के लिए महासागर विज्ञान का दशक" घोषित किया है। इस संदर्भ में डीप ओशन मिशन भारत को वैश्विक ज़िम्मेदारी और नेतृत्व के मामले में अगली पंक्ति में ला सकता है। यह न केवल भारत को वैज्ञानिक और तकनीकी रूप से सशक्त बनाएगा, बल्कि गहरे समुद्र में रिसर्च व इनोवेशन से भारत को वैश्विक समुद्री संसाधनों के प्रबंधन में भी एक दमदार भागीदार बना सकता है। इस प्रकार, यह मिशन भारत के लिए विज्ञान, अर्थव्यवस्था, पर्यावरण और रोजगार जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में परिवर्तनकारी भूमिका निभाने वाला कदम साबित हो सकता है।
चुनौतियां, जोखिम और चिंताएं
डीप ओशन मिशन से जहां आर्थिक और वैज्ञानिक मोर्चे पर देश के लिए नई संभावनाओं के नए द्वार खुलने की उम्मीद है, वहीं इसके साथ कुछ पर्यावरणीय जोखिम और चिंताएं भी जुड़ी हैं, जिन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। मिशन की पहली चुनौती समुद्र तल की गहराई का भारी-भरकम दबाव है।
डीप ओशन में लगभग 10,000 किलोग्राम प्रति वर्ग मीटर जितना उच्च दबाव स्थितियों को काफ़ी कठिन बना देता है। इतने दबाव में उपकरणों का टिके रहना और काम कर पाना काफ़ी मुश्किल होता है। ऐसी कठोर परिस्थितियों के लिये बेहद मज़बूत पदार्थों से बने और सावधानी से डिज़ाइन किये गए उपकरणों की ज़रूरत होती है। ऐसा न होने पर इलेक्ट्रॉनिक्स तथा उपकरण खराब हो सकते हैं या दबाव न झेलपाने के कारण सिकुड़ या पिचक सकते हैं।
इसके अलावा, समुद्र तल की नरम एवं दलदलीय सतह पर पनडुब्बी या रिसर्च व्हीकल की लैंडिंग करना भी काफ़ी चुनौतीपूर्ण काम है। लैंडिंग करने के बाद समुद्र तल से सामग्री निकालने और उसे हज़ारों मीटर ऊंपर सतह पर पंप करने के लिये भारी मात्रा में ऊर्जा यानी बिजली की ज़रूरत पड़ती है, जिसका प्रबंध इतनी गहराई में कर पाना काफ़ी मुश्किल होता है।
किसी आपात स्थिति में या तकनीकी खराबी होने पर भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ सकता है, क्योंकि विद्युत चुंबकीय तरंगों को इतनी गहराई तक भेज पाना और समुद्र तल में इन तरंगों का ठीक से काम कर पाना भारी दबाव और पानी के खारेपन जैसी स्थितियों के कारण मुश्किल होता है। इसीलिए, कई बार रिमोट सेंसिंग उपकरण या दूर से संचालित किये जाने वाले वाहन और रोबोट गहरे महासागरों में ठीक से काम नहीं कर पाते हैं।
कई बार इसके चलते सबमरीन में सवार लोगों को जान तक गंवानी पड़ती है। इसकी मिसाल 18 जून 2023 को 'टाइटन' पनडुब्बी के उत्तरी अटलांटिक महासागर में डूबने की घटना के रूप में देखने को मिल चुकी है। दशकों पहले समुद्र में डूबे मशहूर टाइटैनिक जहाज के मलबे को देखने गई ओशनगेट कंपनी की यह पनडुब्बी भारी दबाव के कारण अपने ही भीतर फट गई (इम्प्लोजन) थी, जिससे उसमें सवार सभी पांच लोगों की मौत हो गई।
गहरे समुद्र में दृश्यता (विजिबिलिटी) का बहुत सीमित होना भी एक बड़ी चुनौती है। अंतरिक्ष अनुसंधानों में टेलीस्कोप या दूरबीनों के ज़रिये जहां हज़ारों-लाखों किलोमीटर दूर तक देखा जा सकता है, वहीं समुद्र की गहराई में कुछ मीटर दूर तक देखना भी मुश्किल होता है, क्योंकि प्राकृतिक प्रकाश समुद्र जल के भीतर केवल कुछ मीटर तक ही प्रवेश कर पाता है। डीप ओशन मिशन की अन्य चुनौतियों में तापमान भिन्नता, संक्षारण (कोरोज़न) और पानी का खारापन जैसी चीज़ें भी शामिल हैं, जो गहरे समुद्र में अन्वेषण को और जटिल बना देती हैं।
मिशन से जुड़ी चिंताओं की बात करें, तो पहली चिंता पॉलीमेटेलिक नोड्यूल या हाइड्रोथर्मल सल्फाइड निकालने के लिए गहरे समुद्र में खनन से तल की मिट्टी, चट्टानें और वनस्पतियों सहित जीव और सूक्ष्मजीव प्रभावित होंगे। तल पर रहने वाले जीवों के प्राकृतिक आवास बर्बाद हो सकते हैं। खनन से कई तरह की अशुद्धियां और धूल के बादल उठ कर समुद्र के ऊपरी हिस्से में या सतह तक आ सकते हैं, जो ऊपरी ईकोसिस्टम को खराब कर सकते हैं।
खनन में इस्तेमाल होने वाले उपकरणों, रोबोट और सबमरीन की आवाज़ और रोशनी से गहरे समुद्र के संवेदनशील जीवों को गंभीर नुकसान पहुंच सकता है। इसके अलावा यदि खनन में कोई विषैले रसायन या खतरनाक धातुएं (हैवी मैटल्स) निकल सकती हैं या फिर जैव संचय (बायो एक्यूमुलेशन) के डिस्टर्ब होने से समुद्री खाद्य शृंखला में समस्याएं हो सकती हैं।
महासागरों द्वारा भारी मात्रा में अवशोषित की गई कार्बनडाई ऑक्साइड (CO₂) समुद्री तल पर ‘ब्लैक कार्बन’ के रूप में लंबे समय से संग्रहित हो रही है। यदि खनन या अन्य मानव गतिविधियों से यह जमा कार्बन क्षतिग्रस्त हो जाए, तो यह सागर की सतह पर आ कर वापस वातावरण में जा सकता है। साथ ही, इससे सागरों में होने वाली कार्बन सीलिंग यानी कार्बन को सोखने की क्षमता में भी कमी आ सकती है।
गहरे समुद्र के खनिजों और जीवों में कुछ प्रकार के रेडियोधर्मी या विषैले तत्वों का जमा होने की भी संभावना है, जिनको छेड़ा जाना पर्यावरणीय दृष्टि से खतरनाक हो सकता है। हालांकि इन विषयों पर अभी व्यापक अध्ययन चल रहा है और प्रयास किया जा रहा है कि इनके बारे में पर्याप्त जानकारियां प्राप्त करने के बाद ही पूरी सतर्कता के साथ समुद्र की गहराई में कोई भी गतिविधि शुरू की जाए।


