एंटीबायोटिक प्रतिरोध केवल अस्पतालों या दवा उपयोग की समस्या नहीं है। पर्यावरण, विशेष रूप से जल तंत्र, अब इस संकट का एक सक्रिय हिस्सा बनता जा रहा है।
चित्र: विकीमीडिया कॉमन्स
नदियों और भूजल को दूषित कर रहीं एंटीबायोटिक दवाएं, कहां से पैदा हो रहा है यह खतरा?
आम तौर पर एंटीबायोटिक प्रतिरोध (एंटीमिक्रोबियल रेजिस्टेंस/ एएमआर) को अस्पताल और दवा के दुरुपयोग से जोड़कर देखा जाता है। लेकिन यह खतरा अब हमारे शहरों की नदियों, सीवेज और भूजल तक पहुंच चुका है।
हाल के शोध बताते हैं कि जल संकट, जो लंबे समय से मात्रा और उपलब्धता के संदर्भ में चर्चा में रहा है, अब धीरे-धीरे एक गंभीर स्वास्थ्य संकट का रूप ले रहा है, वो भी एंटीबायोटिक दवाओं की वजह से। रिपोर्ट इस बात की गवाही दे रहे हैं कि अब नालों और सीवेज का गंदा पानी न केवल बीमारियां फैला रहा है, बल्कि दवाओं को भी बेअसर बना रहा है।
एंटीबायोटिक प्रतिरोध: एक बढ़ता सार्वजनिक स्वास्थ्य जोखिम
विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) एंटीबायोटिक प्रतिरोध को वैश्विक स्वास्थ्य के लिए शीर्ष खतरों में शामिल करता है। इसका मतलब है कि अब कुछ बैक्टीरिया उन दवाओं से भी नहीं मरते, जो पहले काम करती थीं। ऐसे में साधारण संक्रमण भी मुश्किल और खतरनाक हो सकते हैं।
भारत जैसे देश में, जहां संक्रामक रोगों का बोझ पहले से अधिक है और एंटीबायोटिक का उपयोग कई बार बिना चिकित्सकीय सलाह के भी होता है, यह चुनौती और गंभीर रूप ले लेती है।
इस बहस में एक अहम पहलू अक्सर छूट जाता है, कि एंटीबायोटिक प्रतिरोध केवल अस्पतालों या दवा उपयोग की समस्या नहीं है। पर्यावरण, विशेष रूप से जल तंत्र, अब इस संकट का एक सक्रिय हिस्सा बनता जा रहा है।
हाल के वर्षों में दिल्ली, बेंगलुरु, हैदराबाद और पुणे जैसे बड़े शहरों में किए गए अध्ययनों से यह स्पष्ट हुआ है कि शहरी सीवेज, नालों और उपचारित अपशिष्ट जल में एंटीबायोटिक अवशेष और दवा-रोधी बैक्टीरिया मौजूद हैं।
दिल्ली के यमुना नदी और शहरी सीवेज से लिए गए नमूनों में एंटीबायोटिक अवशेष और प्रतिरोधी जीवाणु जीन की मौजूदगी पाई गई है, जिससे संकेत मिलता है कि शहर का सीवेज नेटवर्क एएमआर के प्रसार में एक गतिशील माध्यम बन रहा है।
शहरी जल निकायों में दवा अवशेषों की उपस्थिति बेंगलुरु-मैसूरु में भी पाई गई है, जो प्रतिरोध के विकास को बढ़ावा देने वाले पर्यावरणीय दबाव का संकेत देता है।
इसी तरह, हैदराबाद के खुले नालों, नदियों और झीलों के अध्ययन में भी प्रतिरोधी रोगजनकों और जीन की पहचान हुई है, जो दिखाता है कि अनुपचारित सीवेज पर्यावरण में एएमआर को फैला रहा है।
शहरी जल निकायों में दवा अवशेषों की उपस्थिति बेंगलुरु-मैसूरु में भी पाई गई है, जो प्रतिरोध के विकास को बढ़ावा देने वाले पर्यावरणीय दबाव का संकेत देता है।
ये सभी उदाहरण बताते हैं कि शहरी जल व्यवस्था अब केवल गंदा पानी ढोने वाली संरचना नहीं रह गई है, बल्कि वह एक ऐसे पारिस्थितिकी का निर्माण कर रही जहां बैक्टीरिया को दवाओं के खिलाफ मजबूत होने का अवसर मिलता है।
जब यही पानी नदियों, झीलों, सिंचाई प्रणालियों या भूजल के जरिए आगे बढ़ता है, तो एंटीबायोटिक प्रतिरोध का दायरा अस्पताल से निकलकर समुदाय और पर्यावरण तक फैल जाता है। इसलिए एएमआर को केवल चिकित्सा चुनौती के रूप में नहीं, बल्कि एक व्यापक जल-और-स्वास्थ्य संकट के रूप में देखने की जरूरत है।
सीवेज: दवा-रोधी बैक्टीरिया का अदृश्य प्रशिक्षण केंद्र
हाल के वर्षों में सामने आए वैज्ञानिक अध्ययनों से यह स्पष्ट होता जा रहा है कि शहरी सीवेज अब केवल स्वच्छता की चुनौती नहीं रह गया है, बल्कि यह एंटीबायोटिक-प्रतिरोधी बैक्टीरिया और प्रतिरोधी जीन के प्रसार का एक सक्रिय माध्यम बनता जा रहा है।
दिल्ली सहित कई भारतीय शहरों में किए गए शोध बताते हैं कि सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (एसटीपी) के कच्चे और उपचारित अपवाह दोनों में β-लैक्टम सहित कई प्रकार के एंटीबायोटिक-प्रतिरोधी बैक्टीरिया और उनके जीन मौजूद हैं।
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, घरेलू, अस्पताल और औद्योगिक अपशिष्ट में मौजूद दवा-अवशेष और जीवाणु मिलकर सीवेज में ऐसे हालात पैदा करते हैं जहां प्रतिरोधी बैक्टीरिया पनपते हैं। मौजूदा ट्रीटमेंट तकनीकें इन्हें पूरी तरह खत्म नहीं कर पाती।
इसी क्रम में प्रकाशित एक व्यापक समीक्षा अध्ययन यह दर्शाता है कि भारत के सीवेज, अस्पताल अपशिष्ट और नदी जल में एंटीबायोटिक अवशेष, दवा-रोधी बैक्टीरिया और एंटीबायोटिक-प्रतिरोधी जीन (एआरजी) की उपस्थिति दर्ज की गई है।
दिल्ली सहित कई भारतीय शहरों में किए गए शोध बताते हैं कि सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (एसटीपी) के कच्चे और उपचारित अपवाह दोनों में β-लैक्टम सहित कई प्रकार के एंटीबायोटिक-प्रतिरोधी बैक्टीरिया और उनके जीन मौजूद हैं।
शोधकर्ताओं का निष्कर्ष है कि अपर्याप्त अपशिष्ट जल उपचार और एंटीबायोटिक दवाओं का व्यापक व अनियंत्रित उपयोग, पर्यावरणीय स्तर पर एएमआर के प्रसार के प्रमुख कारणों में शामिल हैं।
उत्तर और मध्य भारत के सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट पर किए गए एक अन्य अध्ययन में यह भी पाया गया कि जैविक रूप से उपचारित सीवेज में भी प्रतिरोधी बैक्टीरिया और एआरजी की मात्रा उल्लेखनीय रूप से बनी रहती है, जिससे यह संकेत मिलता है कि उपचार प्रक्रिया के बाद भी जैविक जोखिम पूरी तरह समाप्त नहीं होते।
यह समस्या केवल सीवेज तक सीमित नहीं रहती। गंगा और गोमती जैसी नदियों के जल में मल्टी-ड्रग रेजिस्टेंट बैक्टीरिया और प्रतिरोधी जीन की पहचान इस बात की पुष्टि करती है कि शहरी सीवेज और उपचारित अपशिष्ट जल के माध्यम से एएमआर अब प्राकृतिक जल तंत्र में प्रवेश कर चुका है, जिससे यह संकट एक स्थानीय नहीं, बल्कि व्यापक सार्वजनिक स्वास्थ्य और जल-सुरक्षा का मुद्दा बनता जा रहा है।
नदियां और जलाशय: संक्रमण का फैलता नेटवर्क
पहले से ही औद्योगिक और घरेलू प्रदूषण का भार झेल रही भारत की कई नदियों के लिए एक नया, अदृश्य खतरा पैदा हो गया है जिसका नाम है दवा-रोधी बैक्टीरिया और उनके प्रतिरोधी जीन।
उदाहरण के लिए, यमुना नदी पर किए गए अध्ययनों में न केवल रसायनों और भारी धातुओं की उपस्थिति मिली है, बल्कि वहां एंटीबायोटिक-प्रतिरोधी जीन (एआरजी) और मल्टी-ड्रग प्रतिरोधी जीवाणु भी पाए गए हैं।
ऐसे प्रतिरोधी जीन का पानी में मौजूद होना बताता है कि नदी में बहते हुए जल तंत्र अब एएमआर के लिए एक जैविक संवाहक बन चुका है, जिससे यह सिर्फ पर्यावरणीय समस्या नहीं, बल्कि मानव और सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए सीधा जोखिम भी बनता जा रहा है।
इसी प्रकार, गोमती नदी के जल और तलछट में भी ऐसे बैक्टीरिया और प्रतिरोधी जीन की पहचान हुई है, जिनका संबंध एंटीबायोटिक उपयोग और अपशिष्ट जल के मिश्रण से देखा गया है।
जल प्रदूषण केवल रसायन नहीं, बल्कि जैविक खतरा भी है जिसे अकेले पारंपरिक जल उपचार और गुणवत्ता मानकों के ज़रिए नहीं सुलझाया जा सकता।
यह अध्ययन दिखाता है कि एएमआर जीन अब सिर्फ अपशिष्ट में नहीं, बल्कि हमारी नदियों और झीलों तक फैल चुका है, जो एक बड़ा स्वास्थ्य जोखिम है।
इन नदियों का पानी न केवल पीने या घरेलू उपयोग के लिये उपयोग होता है, बल्कि ग्रामीण इलाकों में सिंचाई के लिए भी प्रमुख स्रोत है। दूषित जल का उपयोग सब्जियां, फल और अन्य खाद्य फसलों की सिंचाई में होने पर एंटीबायोटिक अवशेष और प्रतिरोधी जीवाणु खाद्य श्रृंखला में प्रवेश कर सकते हैं।
यह क्रम अस्पताल या क्लीनिक की दीवारों से बाहर निकलकर सीधे खेत और रसोई तक फैलता है, जिससे व्यापक समुदाय पर इसका स्वास्थ्य प्रभाव पड़ सकता है और प्रतिरोधी संक्रमणों में वृद्धि और एंटीबायोटिक दवाओं की प्रभावशीलता में गिरावट आ सकती है।
यह नेटवर्क दिखाता है कि जल प्रदूषण केवल रसायन नहीं, बल्कि जैविक खतरा भी है जिसे अकेले पारंपरिक जल उपचार और गुणवत्ता मानकों के ज़रिए नहीं सुलझाया जा सकता।
सतही जल तंत्र में एएमआर का प्रसार दर्शाता है कि जल और स्वास्थ्य नीतियों को एकीकृत रूप से देखने की आवश्यकता है, जहां केवल पानी की उपलब्धता और रासायनिक गुणवत्ता तक सीमित जांच नहीं, बल्कि जैविक सुरक्षा और सार्वजनिक स्वास्थ्य परिणामों को भी प्राथमिकता देना ज़रूरी है।
भूजल: धीमा लेकिन गहरा असर
भूजल को अक्सर सतही प्रदूषण की तुलना में अपेक्षाकृत सुरक्षित माना जाता है, लेकिन हाल के शोध संकेत देते हैं कि यह सुरक्षा भ्रम भी बन सकती है। जब अनुपचारित या आंशिक रूप से उपचारित सीवेज और औद्योगिक अपशिष्ट लंबे समय तक जमीन में रिसते हैं, तो उनमें मौजूद एंटीबायोटिक अवशेष और प्रतिरोधी बैक्टीरिया/जीन भूजल तक पहुंच सकते हैं।
पटना के भूजल में कुछ एंटीबायोटिक-प्रतिरोधी जीन पाए गए हैं, जो शहरी नालों और सीवेज रिसाव के कारण पहुंचे। इसका मतलब है कि यह पानी सिर्फ रासायनिक रूप से ही नहीं, जैविक रूप से भी पूरी तरह सुरक्षित नहीं है।
सिर्फ रसायनात्मक प्रदूषण ही नहीं, बल्कि एंटीबायोटिक रेजिड्यूज़ का भूजल में लंबे समय तक बने रहना भी स्वास्थ्य के लिए चिंता का विषय है। भारत के दामोदर नदी बेसिन के भूजल पर किए गए विश्लेषण में 12 अलग-अलग एंटीबायोटिक दवाओं की उपस्थिति दर्ज की गई। इसमें रक्तावशोषित दवाओं जैसे एरिथ्रोमाइसिन और डॉक्सीसाइक्लिन शामिल हैं, जो यह दर्शाते हैं कि भूजल में एंटीबायोटिक अवशेष समय के साथ जमा और समृद्ध हो सकते हैं।
भारत के ग्रामीण इलाक़ों में, जहां बड़ी आबादी सीधे भूजल पर निर्भर है और जल शोधन की सुविधाएं सीमित हैं, यह खतरा और भी गंभीर हो जाता है। कई क्षेत्रों में हैंडपंप, ट्यूबवेल और बोरवेल से प्राप्त पानी न केवल रासायनिक संदूषण का सामना कर रहा है बल्कि अदृश्य जैविक जोखिमों का भी सामना कर रहा है, जो एएमआर को वर्तमान स्वास्थ्य संकट के रूप में स्थापित करता है।
यह स्थिति बताती है कि भूजल की पारंपरिक गुणवत्ता जांच में सिर्फ रसायनात्मक और बैक्टीरियल लेवल तक सीमित रहे बिना एंटीबायोटिक अवशेष और प्रतिरोधी जीन की निगरानी भी जरूरी है, ताकि स्थानीय समुदायों के स्वास्थ्य जोखिमों का सही आकलन किया जा सके।
कृषि और पशुपालन का जुड़ाव
एंटीबायोटिक प्रतिरोध को बढ़ाने में कृषि और पशुपालन की भूमिका को अब व्यापक रूप से मान्यता मिल रही है। पशुओं में रोगों की रोकथाम, वृद्धि बढ़ाने और उत्पादन सुधारने के लिए एंटीबायोटिक दवाओं का नियमित और व्यापक उपयोग किया जाता है। इससे ये द्रव पदार्थ पशु अपशिष्ट के साथ मिट्टी, जल स्रोतों और आसपास के पर्यावरण में मिल जाते हैं।
एक पर्यावरणीय समीक्षा शोध के मुताबिक, पशुपालन क्षेत्रों के आसपास एंटीबायोटिक-प्रतिरोधी जीन बड़ी मात्रा में पाए जा रहे हैं। ये जीन मुख्य रूप से पशुओं के अपशिष्ट, पानी और मिट्टी के जरिए पर्यावरण में फैलते हैं, जिससे अंततः इनके मानव स्वास्थ्य तक पहुंचने का खतरा बढ़ जाता है।
शहरी सीवेज, खेतों का अपशिष्ट और अस्पताल कचरा मिलकर ऐसा पानी और मिट्टी का पर्यावरण बनाते हैं, जिसमें बैक्टीरिया दवाओं के खिलाफ मजबूत हो जाते हैं।
भारत में खेती के क्षेत्र में भी शोध से यह संकेत मिलता है कि कृषि भूमि की मिट्टी और सिंचाई जल में एआरजी उपस्थित है, खासकर उन क्षेत्रों में जहां पशु अपशिष्ट, उर्वरक और फार्म वेस्ट वॉटर का उपयोग खेती के साथ जुड़ा होता है।
शहरी सीवेज, खेतों का अपशिष्ट और अस्पताल कचरा मिलकर ऐसा पानी और मिट्टी का पर्यावरण बनाते हैं, जिसमें बैक्टीरिया दवाओं के खिलाफ मजबूत हो जाते हैं।
एक अध्ययन ने महाराष्ट्र और पंजाब के कृषि भूमि और सिंचाई जल में tet, sul, bla, qnr जैसे एआरजी की उपस्थिति दर्ज की है जो बताता है कि प्रतिरोधी जीन मनुष्य और पशु दोनों स्रोतों से कृषि-जैविक चक्र में प्रवेश कर रहे हैं।
जब यही पानी या पशु अपशिष्ट नालों, नदियों और भूजल में बहकर अन्य जल स्रोतों तक पहुंचता है, तो प्रतिरोधी जीन जल-आधारित तंत्र में फैलते हैं और बैक्टीरिया को दवाओं के खिलाफ प्रशिक्षित करने की प्रक्रिया को मजबूत करते हैं।
परिणामस्वरूप, एआमआर का दायरा अस्पतालों और फार्म से निकलकर खेतों, पानी और खाद्य श्रृंखला के माध्यम से मानव तक फैलने लगता है। यह एक ऐसी कड़ी जो पारंपरिक जल स्वच्छता और सार्वजनिक स्वास्थ्य नीतियों में प्रचलित परीक्षणों से अक्सर छूट जाती है।
नीति और शासन: कहां है कमी?
भारत में जल, स्वास्थ्य और पर्यावरण से जुड़ी नीतियां अक्सर अलग-अलग खांचों में काम करती दिखाई देती हैं। जल जीवन मिशन जैसे कार्यक्रमों ने नल कनेक्शन के विस्तार पर ज़ोर दिया है, लेकिन जल गुणवत्ता, विशेष रूप से उभरते जैविक खतरों जैसे एंटीबायोटिक प्रतिरोध, पर निवेश और निगरानी अपेक्षाकृत सीमित रही है।
एनएपी-एएमआर योजना फिलहाल मुख्य रूप से मानव और पशु चिकित्सा पर केंद्रित है। जल और सीवेज प्रबंधन को अभी भी पर्याप्त ध्यान नहीं मिला है।
नतीजतन, नदियों, भूजल और खाद्य प्रणाली के ज़रिये समुदायों तक पहुंचने वाले एएमआर के पर्यावरणीय रास्ते नीतिगत ढांचे में हाशिये पर बने रहते हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक सीवेज उपचार मानकों को एएमआर के उभरते खतरे के अनुरूप अपडेट नहीं किया जाएगा और जल-स्वास्थ्य-पर्यावरण नीतियों को एकीकृत दृष्टिकोण से नहीं देखा जाएगा, तब तक यह संकट नियंत्रित होने के बजाय धीरे-धीरे और गहराता जाएगा।
समुदाय और पारदर्शिता की भूमिका
जल गुणवत्ता की निगरानी केवल प्रयोगशालाओं तक सीमित नहीं रह सकती। समुदायों को यह जानने का अधिकार है कि उनके नल से आने वाला पानी कितना सुरक्षित है, केवल रासायनिक मानकों के लिहाज से नहीं, बल्कि जैविक जोखिमों के संदर्भ में भी। पारदर्शी डेटा, नियमित निगरानी और स्थानीय स्तर पर जानकारी की उपलब्धता इस दिशा में महत्वपूर्ण कदम हो सकते हैं।
कुछ क्षेत्रों में फील्ड टेस्ट किट और सामुदायिक निगरानी के प्रयास शुरू हुए हैं, लेकिन एएमआर जैसे जटिल जोखिमों के लिए उन्नत परीक्षण और संस्थागत समर्थन की जरूरत है।
आगे की राह: जल को स्वास्थ्य नीति के केंद्र में लाना
एंटीबायोटिक प्रतिरोध से निपटना केवल नई दवाएं विकसित करने या दवा उपयोग को नियंत्रित करने तक सीमित नहीं होना चाहिए। यह समझना जरूरी है कि पानी, चाहे वह सीवेज हो, नदी हो या भूजल, इस संकट का अहम माध्यम बन चुका है।
ज़रूरत है
सीवेज प्लांटों में ऐसे तरीके अपनाएं जो एएमआर बैक्टीरिया को खत्म कर सकें।
जल और स्वास्थ्य नीतियों में बेहतर तालमेल हो।
खेती, पशुपालन और शहरी अपशिष्ट प्रबंधन को एक साथ देखें।
स्थानीय लोगों को यह जानकारी दें कि उनका पानी सुरक्षित है या नहीं।
जल संकट से स्वास्थ्य संकट की यह यात्रा धीमी लेकिन गहरी है। इसे समझना और समय रहते कदम उठाना, दोनों ही सार्वजनिक स्वास्थ्य और पर्यावरणीय सुरक्षा के लिए अनिवार्य हैं।

