तमिलनाडु के उत्तरी तट पर स्थित एन्नोर क्रीक आज यह दिखा रही है कि औद्योगिक विस्तार की दौड़ में तटीय पारिस्थितिकी और मछुआरा समुदायों की आजीविका किस मोड़ पर आ खड़ी हुई है।
चित्र: गूगल मैप
कंक्रीट के जंगल और सिमटते मैंग्रोव: एन्नोर के वेटलैंड्स पर गहराता संकट
जहां कभी ज्वार-भाटे के साथ जीवन की लहरें उठती थीं, आज वहां औद्योगिक मलबे और फ्लाई ऐश की चादर बिछी है। चेन्नई के उत्तर में स्थित एन्नोर क्रीक, जो कभी मैंग्रोव के घने जंगलों और मछुआरों की समृद्धि का प्रतीक थी, अब 'विकास' की एक ऐसी कहानी कह रही है जिसमें पारिस्थितिकी और आजीविका दोनों प्रभावित हो रही हैं। निरंतर होते औद्योगिक विस्तार और घटती आर्द्रभूमियों के बीच एन्नोर आज एक ऐसे पर्यावरणीय संकट का केंद्र बन गया है, जिसे अनदेखा करना भविष्य के लिए घातक साबित हो सकता है।
चेन्नई के उत्तर में बसा एन्नोर कभी मछुआरों, मैंग्रोव और खारे-मीठे पानी के मेल का इलाका था। यहां की क्रीक, समुद्र और आर्द्रभूमियां कभी स्थानीय आजीविका का आधार हुआ करती थीं। लेकिन औद्योगिक इकाइयों, बंदरगाह विस्तार और थर्मल पावर प्लांटों ने इस पूरे तटीय परिदृश्य को बदल दिया है।
औद्योगिक विस्तार और जल निकायों पर असर
एन्नोर, कई दशक से बड़े-बड़े औद्योगिक कारख़ाने, थर्मल पावर स्टेशन और रिफ़ाइनरी का मुख्य केंद्र रहा है। लेकिन पिछले चार-पांच दशकों में यहां उत्तर चेन्नई थर्मल पावर स्टेशन, एन्नोर थर्मल पावर स्टेशन जैसे कई रसायन और कृषि उद्योगों के अलावा छोटे-बड़े उद्योगों के विस्तार ने जल-प्रदूषण को गंभीर रूप दिया है।
विभिन्न अध्ययन और नागरिक समूहों की रिपोर्टों में यह उल्लेख किया गया है कि फ्लाई ऐश और गर्म अपशिष्ट जल के निस्तारण की व्यवस्था को लेकर गंभीर चिंताएं रही हैं।
इंटरनेशनल कलेक्टिव इन सपोर्ट फिशवर्कर्स (ICSF) ने अपनी रिपोर्ट में संकेत दिया है कि अनियोजित औद्योगिक विस्तार ने एन्नोर की पारिस्थितिकी को गंभीर नुकसान पहुंचाया है। मैंग्रोव क्षेत्र घटे हैं और जल में प्रदूषक तत्वों की मात्रा बढ़ी है।
इस रिपोर्ट के अनुसार एन्नोर के वेटलैंड का आकार 1996 में लगभग 855.69 हेक्टेयर था, जो 2022 तक घटकर केवल 277.92 हेक्टेयर रह गया है। इसी दौरान मैंग्रोव की परत लगभग 68.72 हेक्टेयर से घटकर 33.74 हेक्टेयर हो गई है। इन घटते हुए वेटलैंड और मैंग्रोव के साथ ही कई मछलियों और समुद्री जीवों की संख्या में भी गिरावट दर्ज की गई है।
एन्नोर के वेटलैंड का आकार 1996 में लगभग 855.69 हेक्टेयर था, जो 2022 तक घटकर केवल 277.92 हेक्टेयर रह गया है।
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स्थानीय मछुआरों का कहना है कि सफेद झींगा, काली झींगा, समुद्री तलछट मछलियों के साथ ही कुछ स्थानीय नाम वाली मछलियों की विभिन्न प्रजातियां पहले यहां प्रचुर मात्रा में पाई जाती थीं। लेकिन मछलियों की कई पारंपरिक प्रजातियां अब बहुत कम दिखाई देती हैं या उनका व्यापारिक स्तर पर पकड़ा जाना लगभग बंद हो गया है।।
इसी संदर्भ में अधिकारियों ने भी चिंता जतायी है। तमिल नाडु वेटलैंड अथॉरिटी के सदस्य सचिव दीपक श्रीवास्तव का कहना है कि एन्नोर क्रीक और आसपास के वेटलैंड का संरक्षण ज़रूरी है क्योंकि इसका सीधा असर पानी की सुरक्षा और स्थानीय जीवन पर पड़ता है। उन्होंने कहा कि मछुआरों से बातचीत के बाद चुनिंदा स्थानों पर मिट्टी निकालने (dredging) जैसी योजनाएं चलायी जाएंगी ताकि पारिस्थितिकी में सुधार हो सके।
उपलब्ध आंकड़े और रिपोर्टें संकेत देती हैं कि औद्योगिक विस्तार और अपशिष्ट प्रबंधन की चुनौतियों का असर एन्नोर के जल तंत्र और स्थानीय आजीविका पर पड़ा है।
एन्नोर क्रीक और आसपास के वेटलैंड का संरक्षण ज़रूरी है क्योंकि इसका सीधा असर पानी की सुरक्षा और स्थानीय जीवन पर पड़ता है। इसलिए स्थानीय मछुआरों से बातचीत के बाद चुनिंदा स्थानों पर मिट्टी निकालने (dredging) जैसी योजनाएं चलायी जाएंगी ताकि पारिस्थितिकी में सुधार हो सके।
दीपक श्रीवास्तव, सचिव, तमिल नाडु वेटलैंड अथॉरिटी
तेल रिसाव और आजीविका पर चोट
जनवरी 2017 में एन्नोर तट के पास दो जहाज़ों की टक्कर के बाद समुद्र में तेल फैल गया। शुरुआती आकलनों में इसे सीमित बताया गया, लेकिन कुछ ही दिनों में तेल एन्नोर क्रीक और आसपास के तटीय हिस्सों तक पहुंच गया।
मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, हजारों मछुआरा परिवार प्रभावित हुए, कई दिनों तक नावें समुद्र में नहीं जा सकीं और जाल तेल से भर जाते थे।
स्थानीय मछुआरों का कहना है कि तेल केवल सतह तक सीमित नहीं था, बल्कि तलछट में भी जम गया, जिससे मछलियों की उपलब्धता महीनों तक प्रभावित रही। यद्यपि मुआवज़े की घोषणा हुई, समुदायों के अनुसार आय और संसाधनों की क्षति की पूरी भरपाई नहीं हो सकी। यह घटना दर्शाती है कि औद्योगिक गतिविधियों और तटीय पारिस्थितिकी के बीच संतुलन कितना नाज़ुक है।
एन्नोर में समस्या सिर्फ समुद्र या क्रीक के पानी तक सीमित नहीं है। आसपास की बस्तियों में रहने वाले लोग पिछले कई सालों से यह शिकायत करते रहे हैं कि उनके घरों में आने वाला भूजल पहले जैसा नहीं रहा।
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भूजल भी सुरक्षित नहीं
एन्नोर में समस्या सिर्फ समुद्र या क्रीक के पानी तक सीमित नहीं है। आसपास की बस्तियों में रहने वाले लोग पिछले कई सालों से यह शिकायत करते रहे हैं कि उनके घरों में आने वाला भूजल पहले जैसा नहीं रहा।
दी कारवां की ग्राउंड रिपोर्ट के अनुसार, स्थानीय निवासियों का कहना है कि कई जगहों पर हैंडपंप या बोरवेल से निकले पानी में बदबू आती है। पानी का रंग बदल गया है, और कभी-कभी पानी की सतह पर तेल जैसा पदार्थ तैरता दिखाई देता है। रिपोर्ट में यह भी दर्ज है कि लोगों में त्वचा संबंधी, एलर्जी और पेट से जुड़ी समस्याओं कि शिकायत बढ़ गई है।
एक अध्ययन में एन्नोर औद्योगिक क्षेत्र के आसपास के भूजल में टोटल डिसॉल्वड सॉलिडस (टीडीएस), इलेक्ट्रिकल कंडक्टीविटी और कुछ भारी धातुओं के स्तर मानक सीमा से अधिक पाए गए। अध्ययन ने संकेत दिया कि औद्योगिक अपशिष्ट और राख के निस्तारण का असर भूजल पर पड़ रहा है।
इसके अलावा, साइंटिफिक रिपोर्ट्स में प्रकाशित 2025 के एक शोध में पाया गया कि एन्नोर मुहाना (एसचुअरी) क्षेत्र में तलछट और जल नमूनों में क्रोमियम, निकेल और जिंक जैसी धातुओं की उपस्थिति चिंताजनक स्तर पर पहुंच चुकी है। हालांकि, यह अध्ययन मुख्यतः तटीय और सतही जल पर केंद्रित है, लेकिन वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि लंबे समय तक ऐसा प्रदूषण भूजल पर भी असर डाल सकता है।
एन्नोर औद्योगिक क्षेत्र के आसपास के भूजल में टोटल डिसॉल्वड सॉलिडस (टीडीएस), इलेक्ट्रिकल कंडक्टीविटी और कुछ भारी धातुओं के स्तर मानक सीमा से अधिक पाए गए।
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स्थानीय लोगों का भी कहना है कि पहले वे बिना सोचे समझे बोरवेल का पानी पी लेते थे, लेकिन अब कई परिवार पीने के लिए टैंकर या पैकेज्ड पानी पर निर्भर हो गए हैं। इसका सीधा असर घरेलू खर्च पर पड़ता है।
नीति और नियोजन की चुनौतियां
एन्नोर में जल-संकट और पारिस्थितिक क्षरण का प्रश्न केवल प्राकृतिक कारणों तक सीमित नहीं है। इस क्षेत्र में तटीय विनियमन क्षेत्र (CRZ) नियम, प्रदूषण नियंत्रण दिशानिर्देश और न्यायालयों के आदेश लागू हैं। फिर भी विभिन्न रिपोर्टों और नागरिक अभियानों से यह संकेत मिलता है कि इनके प्रभावी क्रियान्वयन में गंभीर चुनौतियाँ बनी हुई हैं।
सेव एन्नोर क्रीक अभियान की एक समीक्षा के अनुसार, तमिलनाडु सरकार की 22 परियोजनाओं में से अधिकांश में अनुपालन अधूरा पाया गया। समीक्षा में आर्द्रभूमि संरक्षण, प्रदूषण नियंत्रण, अपशिष्ट प्रबंधन और ड्रेज़िंग जैसी श्रेणियों में प्रगति अपेक्षा से कम बताई गई है।
रिपोर्टों में यह भी उल्लेख है कि फ्लाई ऐश प्रबंधन, औद्योगिक अपशिष्ट निपटान और उत्सर्जन निगरानी की व्यवस्था को मजबूत करने की ज़रूरत है। तमिलनाडु प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (TNPCB), राज्य तटीय क्षेत्र प्रबंधन प्राधिकरण और अन्य संबंधित विभागों के बीच बेहतर समन्वय और पारदर्शिता की जरूरत रेखांकित की गई है।
तमिलनाडु सरकार की 22 परियोजनाओं में से अधिकांश में अनुपालन अधूरा पाया गया। समीक्षा में आर्द्रभूमि संरक्षण, प्रदूषण नियंत्रण, अपशिष्ट प्रबंधन और ड्रेज़िंग जैसी श्रेणियों में प्रगति अपेक्षा से कम बताई गई है।
CRZ-1 जैसे संवेदनशील तटीय क्षेत्रों में ठोस कचरे के डंपिंग और अन्य गतिविधियों को लेकर राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) द्वारा निर्देश दिए गए हैं। हालांकि, नागरिक समूहों का कहना है कि इन निर्देशों के पूर्ण और सतत अनुपालन को सुनिश्चित करने के लिए निगरानी तंत्र को और सशक्त बनाने की आवश्यकता है।
इन उदाहरणों से स्पष्ट होता है कि नियम और नीतियां मौजूद हैं, लेकिन उनका प्रभाव इस बात पर निर्भर करता है कि उन्हें किस हद तक संस्थागत समन्वय, पारदर्शिता और जवाबदेही के साथ लागू किया जाता है। एन्नोर का अनुभव यह संकेत देता है कि तटीय पारिस्थितिकी की सुरक्षा के लिए नीति-स्तर के प्रावधानों को जमीनी अमल से जोड़ना अत्यंत आवश्यक है।
एन्नोर का अनुभव यह संकेत देता है कि तटीय पारिस्थितिकी की सुरक्षा के लिए नीति-स्तर के प्रावधानों को जमीनी अमल से जोड़ना अत्यंत आवश्यक है।
चित्र: गूगल मैप
क्या हैं समाधान
एन्नोर की पारिस्थितिक बहाली के लिए केवल आंशिक सुधार नहीं, बल्कि ठोस नीतिगत और सामुदायिक हस्तक्षेप की ज़रूरत है:
मैंग्रोव और आर्द्रभूमि का वैज्ञानिक पुनर्स्थापन: तटीय पारिस्थितिक तंत्र को प्राकृतिक ढंग से पुनर्जीवित करने के लिए बड़े पैमाने पर मैंग्रोव बहाली, ज्वारीय प्रवाह (tidal flow) की बहाली और आर्द्रभूमि की सीमाओं का स्पष्ट चिह्नीकरण किया जाना चाहिए।
उदाहरण के लिए, तमिल नाडु वन विभाग और तमिल नाडु वेटलैंड मिशंस जैसी संस्थाओं को दीर्घकालिक, पारदर्शी और समुदाय-आधारित योजना बनानी चाहिए।
सीआरज़ेड और प्रदूषण नियंत्रण नियमों का पारदर्शी एवं प्रभावी अनुपालन: तमिल नाडु प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड द्वारा उद्योगों की नियमित, सार्वजनिक और रियल-टाइम निगरानी अनिवार्य की जानी चाहिए। उत्सर्जन डेटा और निरीक्षण रिपोर्टें सार्वजनिक डोमेन में उपलब्ध हों, ताकि जवाबदेही सुनिश्चित हो सके।
औद्योगिक अपशिष्ट प्रबंधन की सुनिश्चित व्यवस्था: थर्मल पावर प्लांट्स और अन्य उद्योगों के लिए फ्लाई ऐश और रासायनिक अपशिष्ट के सुरक्षित निपटान की सख़्त व्यवस्था लागू की जाए। अपशिष्ट रिसाव की स्थिति में ‘पोल्यूटर पेज़’ सिद्धांत को प्रभावी ढंग से लागू किया जाना चाहिए।
समुदाय आधारित निगरानी तंत्र: मछुआरा समुदाय, स्थानीय निवासियों और नागरिक समूहों को निगरानी और शिकायत-प्रक्रिया में औपचारिक भूमिका दी जाए। जल गुणवत्ता की सामुदायिक मॉनिटरिंग और सोशल ऑडिट जैसी पहलें पारदर्शिता को मजबूत कर सकती हैं।
डेटा पारदर्शिता और सार्वजनिक सूचना तंत्र: जल गुणवत्ता, औद्योगिक उत्सर्जन और फ्लाई ऐश प्रबंधन से जुड़े निगरानी आंकड़ों को एक समेकित सार्वजनिक डिजिटल पोर्टल पर नियमित रूप से उपलब्ध कराया जाए। साथ ही, पारदर्शी ऑनलाइन शिकायत-निवारण प्रणाली विकसित कर जवाबदेही और सामुदायिक भागीदारी सुनिश्चित की जाए।
एन्नोर का मामला केवल एक क्रीक या एक औद्योगिक क्षेत्र की कहानी नहीं है, बल्कि यह हमारे विकास मॉडल की परीक्षा है। जब तक पर्यावरणीय नियमों को कागज़ से जमीन पर नहीं उतारा जाएगा और स्थानीय समुदायों को निर्णय-प्रक्रिया में भागीदार नहीं बनाया जाएगा, तब तक सुधार अधूरा रहेगा। पानी, पारिस्थितिकी और आजीविका, तीनों को साथ लेकर चलने वाली नीतियां ही टिकाऊ भविष्य का रास्ता खोल सकती हैं।
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