(क) नलकूप सिंचाई परियोजना :
जनपद इटावा में सिंचाई साधनों की समुचित व्यवस्था हेतु नहर सिंचाई की पूरक व्यवस्था के रूप में नलकूपों का निर्माण कराया जा रहा है। जनपद इटावा में नलकूपों की संख्या 36972 है, जिसमें बढ़पुरा एवं चकरनगर विकासखंडों में क्रमश: 1735 एवं 441 नलकूप अवस्थित हैं। अर्थात कह सकते हैं कि जो नलकूप उपलब्ध हैं सिंचाई हेतु पर्याप्त नहीं है। दूसरी तरफ इन विकासखंडों में (चकरनगर, बढ़पुरा, महेवा, जसवंतनगर) का अधिकांश भाग असमतल (बीहड़) है, फसल सूख जाती है। अत: यहाँ की कृषि मुख्यत: नलकूप सिंचाई पर निर्भर है। जिस वर्ष वर्षा ठीक से नहीं होती, फसल सूख जाती है। अत: इस स्थिति के निदान के लिये नलकूपों का निर्माण आवश्यक हो जाता है।
जनपद इटावा में सरकार द्वारा किसानों को लघु सिंचाई के साधनों के विकास हेतु अनेक सुविधायें प्रदान की जा रही हैं। जिनका लाभ उठाकर अधिक से अधिक नलकूपों का निर्माण करके सिंचाई की समस्या का समाधान किया जा सकता है।
1. जल संसाधन विकास-संवर्धन :
वर्षा जल को सर्वप्रथम मृदा प्रोफाइल में ही अधिकाधिक मात्रा में अवशोषित होने का अवसर प्रदान किया जाता है। भूमिगत जल में वृद्धि के लिये परकोलेशन तालाब बनाये जाते हैं। जल संसाधन विकास वास्तव में अन्य जल विभाजक विकास कार्यक्रम के लिये उत्प्रेरक का कार्य करता है।
मेड़बंदी, बेदकाएँ, भूमि समतलीकरण, घास दार जलमार्ग (Gressy Water Ways), अवरोधक, बंध, नाला-बंदी, समोच्च खत्तियों का प्रयोग अपरदन नियंत्रण तथा अन्य विशेष समस्याओं जैसे भू-स्खलन, खंडहर सुधार व अतिरिक्त जल की नियंत्रित निकासी आदि के लिये किया जाता है। साथ ही इससे नमी का संरक्षण होने से पैदावार वृद्धि में मदद मिलती है।
3. जल प्रबंध व जल निकास :
जहाँ कहीं आवश्यकता हो वहाँ भूमि समतलीकरण, जल वितरण व्यवस्था का नियोजन, नालियों को पक्का करना, उचित जल निकास की व्यवस्था करना, आवश्यक होता है। जिससे कम पानी में ही ज्यादा क्षेत्र की सिंचाई की जा सके। पानी का समान वितरण हो तथा आवश्यकता से अधिक जल को नियोजित ढंग से बाहर निकाला जा सके।
4. फसल सुधार कार्यक्रम :
इसका उद्देश्य मृदा अपरदन को निर्धारित सीमा के अंदर रखते हुए फसल की पैदावार में वृद्धि करना है। इसके लिये विभिन्न उपाय काम में लाये जाते हैं। जैसे समोच्च खेती, मिश्रित फसलें, जुताई में कमी आदि।
5. वानिकी :
इसके अंतर्गत पंचायत व सरकारी भूमि में वन विकास, उपचारित व बंजर भूमि में वनीकरण सामाजिक व कृषि वानिकी, बागवानी, कृषि बागवानी, चारागाह विकास आदि कार्यक्रम आते हैं।
6. पशुधन, मुर्गी पालन एवं मत्स्य पालन :
उन्नत नस्ल के अधिक दूध देने वाले पशुओं को उपलब्ध कराना व उनके लिये चारा उगाने की व्यवस्था/तालाबों में मछली पालन व मुर्गी पालन आदि कार्यक्रम हैं। इसके अलावा रेशम के कीड़े पालन आदि के विकास की संभावनाओं पर भी ध्यान देना।
7. जल विभाजक योजना में संपूर्ण लागत व उसका वर्गीकरण तथा लाभ :
लागत अनुपात को सम्मिलित किया जाना चाहिए साथ ही उन दूरगामी लाभों का भी उल्लेख होना चाहिए जिनसे अप्रत्यक्ष लाभ प्राप्त हो रहे हों।
(क) छत से प्राप्त वर्षा जल का संचयन :
शहरी क्षेत्रों में इमारतों की छतों एवं पक्के क्षेत्रों से प्राप्त वर्षा का जल जो बेकार चला जाता है उसका उपयोग जल भृतों को पुनर्भरित करने में किया जा सकता है। वर्षा जल संचयन की प्रणाली को इस तरह से अभिकल्पित करने की आवश्यकता है जिससे वह संचयन करने के साथ पुनर्भरण प्रणाली के लिये अधिक स्थान न घेरे। छतों से प्राप्त वर्षा जल के भंडारण तथा संचयन करने की कुछ तकनीकों का विवरण निम्नलिखित है।
1. पुनर्भरण पिट द्वारा छत से प्राप्त वर्षा जल का संचयन :
यह तकनीकी लगभग 100 वर्ग मीटर क्षेत्रफल वाली छत के लिये उपयुक्त होती है। इसका निर्माण जलोढ़ क्षेत्र के छिछले जल भृतों को पुनर्भरित करने के लिये होता है। पुनर्भरण पिट किसी भी शक्ल या आकार का हो सकता है। यह सामान्यत: एक से दो मीटर चौड़ा दो से तीन मीटर गहरा एवं दो से तीन मीटर लंबा बनाया जाता है। इसमें फिल्टर के लिये शिलाखंड व बोल्डर (4 से 20 सेंटीमीटर), बजरी (5 से 10 मिली मीटर) व माटी रेत (1.5 से 2 मिली मीटर) क्रमवार नीचे से ऊपर की ओर भरा जाता है। कम क्षेत्रफल वाली छत के लिये ईंटों के टुकड़ों व कंकड़ का उपयोग भी किया जा सकता है। छत से जल निकासी के स्थान पर जाली लगाई जाती है ताकि पत्ते व अन्य ठोस पदार्थ को पिट में जाने से रोका जा सके। जमीन पर एक गाद-निस्तारण कक्ष बनाया जाता है। जो महीन कण वाले पदार्थों को पुनर्भरण पिट की तरफ जाने से रोक सके।
पुनर्भरण पिट के ऊपरी परत यानि ऊपरी रेत को समय-समय पर साफ किया जाता है, ताकि पुनर्भरण गति बनी रह सके। गाद निस्तारण कक्ष से पहले वर्षा जल को बाहर जाने के लिये एक उपमार्ग की व्यवस्था की जाती है। जिससे प्रथम वर्षा उपरांत गंदा जल पिट में न जा सके इसे चित्र क्रमांक 10.2 में दर्शाया गया है। अध्ययन क्षेत्र में इस विधि का प्रयोग अभी तक नहीं किया जा सका है।
2. पुनर्भरण खाई (ट्रैन्च) द्वारा छत से प्राप्त वर्षा जल का संचयन :
पुनर्भरण खाई 200 से 300 वर्ग मीटर वाली छत के भवन के लिये उपयुक्त है। जहाँ जमीन के नीचे का भेद्यस्तर छिछली गहराई में उपलब्ध हो वहाँ पुनर्भरण खाई जल की उपलब्धता के अनुसार 0.5 से 1 मीटर चौड़ी 1 से 1.5 मीटर गहरी तथा 10 से 20 मीटर तक लंबी हो सकती है। यह खाई शिलाखंड, बजरी एवं मोटी रेत से क्रमानुसार नीचे से ऊपर की ओर भरा जाता है। जिसे चित्र क्रमांक-2 में दर्शाया गया है। अपवाह के साथ वाली गाद मोटी रेत पर जमा हो जाती है जिसे समय-समय पर खरोच कर निकाल दिया जाता है। छत से जल निकलने वाले पाइप के अगले हिस्से में जाली लगाई जाती है। ताकि पत्तों या अन्य ठोस पदार्थों को खाई में जाने से रोका जा सके। छत से निकलने वाले जल को एक गाद निस्तारण कक्ष या संग्रहण कक्ष से गुजारा जाता है। ताकि सूक्ष्म पदार्थों को खाई में जाने से रोका जा सके। पहली वर्षा के गंदे उपवहित जल को संग्रहण कक्ष में जाने से रोकने के लिये पहले एक उपमार्ग की व्यवस्था की जाती है।
अध्ययन क्षेत्र में अभी तक (Roof Top Rain Water Harvesting) तकनीक का शुभारंभ नहीं हो सका है, लेकिन ‘‘ई. बजाहत अली उस्मानी’’ के एक प्रोजेक्ट के अनुसार जनपद इटावा में 139737 पक्के मकानों को 50 प्रतिशत अनुदान की सुविधा देकर मकान मालिकों द्वारा स्वयं ‘रूफ टॉप रेन वाटर हार्वेस्टिंग’ से आच्छादित करने का प्रस्ताव रखा गया है। 1310 ग्रामीण स्कूल, 105 अस्पताल, 188 आंगनवाड़ी केंद्रों, 189 पंचायत घरों पर सरकारी संस्थाओं द्वारा ‘रूफ टॉप रेन वाटर हार्वेस्टिंग’ से आच्छादित करने का प्रस्ताव है, जनपद के 13974 कच्चे आवासों को इस चरण में आच्छादित किया जायेगा। अत: इस प्रोजेक्ट को अमली जामा पहनाने में कामयाबी मिल सकी तो, पुनर्भरण की गति को तीव्र किया जा सकता है।
(ख) सतही वर्षा जल संचयन :
ग्रामीण क्षेत्रों में वर्षा जल संचयन वाटर शेड को एक इकाई के रूप में लेकर करते हैं। आमतौर पर वर्षा जल को संचालित करने के लिये सतही फैलाव की तकनीकी अपनाई जाती है क्योंकि ऐसी प्रणाली के लिये जगह प्रचुरता में उपलब्ध होती है के साथ पुनर्भरित जल की मात्रा भी अधिक होती है। ढलानों नदियो-नालों के माध्यम से व्यर्थ जा रहे जल को बचाने के लिये विभिन्न तकनीकों को अपनाया जा सकता है। जिसका विवरण नीचे प्रस्तुत किया जा रहा है।
1. गली प्लग :
गली प्लग का निर्माण स्थानीय पत्थर चिकनी मिट्टी व झाड़ियों का उपयोग कर वर्षा ऋतु में पहाड़ों के ढलान से छोटे कैचमेंट में बहते हुए नालों एवं जल धाराओं के आर-पार किया जाता है। यह मिट्टी और नमी के संरक्षण में मदद करता है।
2. टंका :
यह राजस्थान व गुजरात के इलाकों में वर्षा जल के संग्रह के लिये बनाये जाते हैं। यह जमीन के अंदर गोलाकार आकृति का टैंक होता है, जिसकी दीवारें चिकनी मिट्टी से पुती होती हैं। और जिसमें छोटे कैचमेंट से वर्षा जल एकत्रित किया जाता है। यह एकत्रित जल मुख्यत: पीने के लिये उपयोग किया जाता है।
3. परिरेखा कंटूर बाँध :
परिरेखा कंटूर बाँध समान ऊँचाई वाले परिरेखा के चारों-ओर ढलान वाली भूमि पर बनाये बाँध को कहते हैं। जिसमें मॉनसून के अपवाहित जल को रोका जा सके। यह वाटर शेड में लंबे समय तक मृदा नमी को संरक्षित रखने की एक बहुप्रभावी पद्धति है। यह कम वर्षा वाले क्षेत्रों के लिये उपयुक्त है। जहाँ वार्षिक वर्षा 800 मिमी से भी कम होती है। बाँध के बीच की दूरी इस प्रकार दी जाती है कि बहता हुआ जल कटाव वेग प्राप्त न कर सके। दो बंध के बीच की दूरी क्षेत्र के ढलान एवं मृदा की पारगम्यता पर निर्भर करती है। परिरेखा बाँध को चित्र रेखा क्रमांक-4 में दर्शाया गया है।
4. चेक डैम :
चेक डैम का निर्माण स्थाई एवं अस्थाई संरचना के रूप में किया जाता है। स्थाई संरचना के रूप में चेक डैम का निर्माण स्थानीय पत्थरों, ईंटों एवं सीमेंट से किया जाता है। अस्थाई चेक डैम बनाने के लिये लकड़ी खुले पत्थरों व सूखे पत्थरों की चिनाई की जाती है अथवा गेबियन संरचना एवं लोहे के तारों में पत्थरों को बाँधकर अस्थाई चेक डैम का निर्माण किया जाता है।
(क) स्थाई चेक डैम :
इस चेक डैम का निर्माण अति सामान्य ढाल वाली छोटी जलधाराओं व नालों पर किया जाता है। चेक डैम बनाने वाले चयनित स्थान पर पारगम्य स्तर की पर्याप्त मोटाई होनी चाहिए। चेक डैम की ऊँचाई सामान्यत: 2 मीटर से कम होती है। और इन संरचनाओं में संचित जल अधिकांशत: नालों के प्रभाव क्षेत्र में सीमित रहता है। निचले क्षेत्र की तरफ जलकुशन बनाये जाते हैं ताकि अत्यधिक जल के बहने से जमीन में गड्ढ़े न बन पायें। और मिट्टी के कटाव को रोका जा सके। जलधारा के अधिकांश अपवाह का उपयोग करने के लिये इस तरह के चेक डैमों की एक श्रृंखला का निर्माण किया जाता है ताकि संबंधित क्षेत्र में बड़े पैमाने पर जल का पुनर्भरण हो सके। इस तरह के बाँधों का निर्माण जनपद के कुछ बीहड़ क्षेत्रों में किया गया है।
(ख) अस्थाई चेक डैम :
अस्थाई चैक डैम का निर्माण जलधाराओं के बहाव को संरक्षित रखने, जलधाराओं के त्रियक अनुभाग को कम करने, गाद के कुछ हिस्सों को रोकने एवं मृदा की नमी को बनाये रखने के लिये किया जाता है। जल धाराओं पर छोटे अस्थाई बाँधों का निर्माण स्थानीय रूप में उपलब्ध शिलाखंडों को लोहे के तारों की जालियों में बाँधकर तथा उसे जल धारा के किनारों पर स्थिरक एंकर कर दिया जाता है। इस तरह की संरचना को गेवियन संरचना कहते हैं, जिसकी ऊँचाई लगभग आधा मीटर होती है। और यह सामान्यत: 10 मीटर से कम चौड़े नालों पर बनायी जाती है। जलधारा की गाद शिलाखंडों के बीच जम जाने से उसमें वनस्पति उग आती है जो बाँध को अपारगम्य बना देती है। यह वर्षा के अपवहित सतही जल को अधिक समय तक रोक कर जल को भूमि में पुनर्भरित होने में मदद करता है। गेवियन संरचना को चित्र क्रमांक 5 में दर्शाया गया है।
नाले के आर-पार उथली खाई खोदकर दोनों ओर एस्बेस्टस सीट के बीच के स्थान को चिकनी मिट्टी से भरे सीमेंट बैगों को ढलवा क्रम में लगा दिया जाता है।
अस्थाई चेक डैम का निर्माण स्थानीय रूप से उपलब्ध खुले पत्थरों द्वारा भी किया जाता है। यह रख-रखाव के कम खर्च में लंबी अवधि तक बना रहता है। इस संरचना का निर्माण जलधाराओं के अपवाह वेग को कम करने के लिये किया जाता है। जो कैचमेंट के ऊपरी हिस्सों के लिये ज्यादा प्रभावी है। नाले के आधार को एक समान 0.3 मीटर गहराई तक खोदकर उसमें नीव स्तर से 20-30 सेमी आकार वाले शिलाखंडों के टुकड़ों को एक दूसरे से जोड़कर भर दिया जाता है। बड़े आकार के शिला खंडों को डैम के बीच रखा जाता है। और दो शिलाखंडों के बीच का स्थान छोटे शिलाखंडों से भर दिया जाता है। इस डैम की ऊँचाई लगभग 1.0 मीटर होती है। और डैम के बीच में एक उत्पलव स्पिलवे बना दिया जाता है जिससे अतिरिक्त अपवाह जल का प्रवाह कम हो सके। इसे चित्र क्रमांक 6 में दर्शाया गया है।
(5) भूमिगत जल बांध या उपसतही डाईक :
भूमिगत बाँध या उपसतही डाइक नदी के आर पार एक प्रकार का उपसतही अवरोधक होता है, जो आधार बहाव की गति को कम कर देता है। और जल को भूमि सतह के नीचे ऊपरी क्षेत्र में जमा करता है। जो जलमृत के सूखे भाग को संतृत्प करने में मदद करता है। इस डाइक के निर्माण के लिये स्थल का चयन उस स्थान पर किया जाता है जहाँ अपारगम्य स्तर छिछली गहराई में हों और संकरे निकास चौड़ी खाई में हों। नाले की पूर्ण चौड़ाई में 1-2 मीटर चौड़ी अभेद्य सतह तक एक खाई खोदी जाती है। खाई को चिकनी मिट्टी या ईट/ कंकरीट की दीवार से जल स्तर के 0.5 मीटर नीचे तक भर दिया जाता है। डाइक की सतहों को पूर्ण रूप से अप्रवेश्यता सुनिश्चित करने के लिये 3000 पी. एस. आई. की पीवीसी चादर जिसकी टियरिंग शक्ति 400 से 600 गेज हो अथवा कम घनत्व वाली 200 गेज की पॉलीथीन फिल्म का प्रयोग किया जाता है। चूँकि इसमें जल का संचयन जलभृत से होता है इसलिये जमीन का जलप्लावन रोका जा सकता है। जलाशय के ऊपर की जमीन को बाँध बनाने के पश्चात प्रयोग में लाया जा सकता है इससे जलाशय में वाष्पीकरण द्वारा नुकसान नहीं होता। अध्ययन क्षेत्र इस तरह की संभावनाओं से भरा हुआ है। लेकिन शासन द्वारा अभी तक इस दिशा में कोई कार्य नहीं किया गया है।
(6) परिस्त्रण टैंक (परकोलेशन टैंक) :
परिस्त्रण टैंक कृत्रिम रूप से सृजित सतही जल संरचना है, जिसमें सतही अपवाह परिस्त्रवित होकर भूमि जल भंडार का पुनर्भरण करता है। यह टैंक अत्यंत पारगम्य भूमि पर बनाया जाता है जहाँ भूमि जलप्लावित रहती है। इसका उद्देश्य भूमि जल भंडार का पुनर्भरण करना है। इसका निर्माण यथासंभव अत्यधिक दरार वाली कच्ची चट्टानों जो सीध में नीचे बहने वाली जल धारा तक फैली हो, की जाती है। परिस्त्रवण टैंक का आकार टैंक तल के संस्तर की परिस्त्रवण क्षमता के अनुसार निर्धारित किया जाता है। सामान्यत: इसकी अभिकल्पना 0.1 से 0.5 मिलियन घन मीटर के भंडार के लिये होती है। जिसमें सामान्यत: 3 से 4.5 मीटर का टैंक में जमा जल का शीर्ष रहे। यह चारों ओर से मिट्टी के तटबंधों से घिरे रहते हैं जिनमें केवल उत्पलव मार्ग के लिये चिनाई की गयी संरचना होती है। जिससे अतिरिक्त जल निचले क्षेत्र में प्रवाहित होता है। इसे चित्र क्रमांक 7 में दर्शाया गया है।
7. नाला बंड
नाला (एक प्राकृतिक जलधारा) बंड एक कृत्रिम संरचना है जिसका निर्माण अपवाह के वेग को कम करने, भूमि जल का पुनर्भरण करने और मिट्टी की संतृप्तता को बढ़ाने के लिये नाले के आर पार किया जाता है। इसमें नाला बंड के ऊपरी क्षेत्र में जल का अस्थाई जमाव हो जाता है और अतिरिक्त जल उत्पलव मार्ग द्वारा निचले क्षेत्र में निकल जाता है। जल को ऊपरी क्षेत्र में जमा करने से जल भूमि के आंतरिक सतह तक परिस्त्रिवित करने लगता है और प्राकृतिक जल धारा के मार्ग संरक्षण या मार्ग में गाद कम जमा होने लगती है इसलिये इसका अभिकल्प ऐसा होता है ताकि जल क्षरण वेग प्राप्त करने से पहले ही नाले के निचले बंड के जल से मिल जाये। नाला बंड उपयुक्त अन्तराल पर जलधारा के मार्गों पर बनाया जाता है। इसे चित्र क्रमांक 8 में दर्शाया गया है। ई. बजाहत अली उस्मानी के एक प्रोजेक्ट के अनुसार जनपद में 8 बड़े नाले हैं। यदि इन नालों पर नियंत्रण किया जाये तो सिंचाई क्षेत्र एवं जल स्तर दोनों में वृद्धि संभव है।
(ग) भूजल का कृत्रिम पुनर्भरण :
भूजल का कृत्रिम पुनर्भरण वह प्रक्रिया है जिसमें भूमि जल से जलाशयों का भंडारण प्राकृतिक स्थिति में भंडारण का दर अधिक होता है। भूजल का कृत्रिम पुनर्भरण निम्नलिखित तरीकों से किया जा सकता है।
1. कुओं द्वारा पुनर्भरण :
इस प्रक्रिया में खेतों से प्राप्त जल को चालू या बंद पड़े कुओं में सफाई या गाद निस्तारण कक्ष के पश्चात एक पाइप द्वारा डाला जाता है। जिससे जल जमीन के अंदर पुनर्भरित हो सके। जीवाणु संदूषण को नियंत्रित रखते के लिये समय-समय पर क्लोरीन भी डाली जाती है।
2. पुनर्भरण शाफ्ट :
यह अबाधित जलभृत जिसके ऊपर कम पारगम्य स्तर हो के पुनर्भरण के लिये सबसे उपयुक्त और सबसे कम लागत वाली तकनीक है। शाफ्ट का अंतिम सिरा ऊपरी अपारगम्य स्तर के नीचे अधिक पारगम्य स्तर में होता है। इसका व्यास सामान्यत: दो मीटर से अधिक होता है। यह जरूरी नहीं है कि इसका अंतिम सिरा जमीन के अंदर जलस्तर को छूता हो शाफ्ट को पहले बोल्डर फिर अंत में मोटी रेत से क्रमानुसार नीचे से ऊपर की ओर भरा जाता है। इस तरह की पुनर्भरण संरचनाएँ ग्रामीण टैंकों के लिये काफी उपयुक्त होती है। जहाँ छिछली चिकनी मिट्टी की परत जलमृत के रिसाव होने में बाधक होती है। तालाब में पुनर्भरण शाफ्ट का ऊपरी सिरा टैंक के तल स्तर से ऊपर एवं पूर्ण आपूर्ति स्तर के आधे तक रखा जाता है। जिसे बोल्डर बजरी एवं मोटी रेत द्वारा पुन: भर दिया जाता है। संरचना की मजबूती के लिये ऊपरी एक दो मीटर गहराई वाले भाग में ईंटों एवं सीमेंट मिश्रित मसाले से चिनाई की जाती है। इसे चित्र क्रमांक 10 में दर्शाया गया है।
इटावा जनपद में जल संसाधन की उपलब्धता, उपयोगिता एवं प्रबंधन, शोध-प्रबंध 2008-09 (इस पुस्तक के अन्य अध्यायों को पढ़ने के लिये कृपया आलेख के लिंक पर क्लिक करें।) | |
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