दिल्ली के चांदनी चौक जैसे घनी बसावट, कम हरियाली और ज़्यादा आबादी वाले इलाकों में ज़्यादा गर्मी महसूस होती है।
स्रोत : विकी कॉमंस
शहर के ‘गरीब’ इलाकों में क्यों पड़ती है ज्यादा गर्मी और ‘पॉश’ इलाकों में राहत?
ग्लोबल वॉर्मिंग दुनिया में गर्मी बढ़ा रही है। गर्मी ग्रामीण इलाकों की तुलना में शहरी इलाकों में ज़्यादा बढ़ रही है। यह बातें हाल के वर्षों में सामने आ चुकी हैं। गर्मी से जुड़ी एक हालिया रिसर्च में अब इससे भी आगे की एक परत खुली है। अध्ययन में पता चला है कि शहर के ‘पॉश’ इलाकों के मुकाबले ‘गरीब’ इलाकों में ज्यादा गर्मी पड़ती है। इसके चलते दुनिया भर के महानगरों में कम आय वाले लोगों को ज़्यादा गर्मी झेलनी पड़ रही है। हालांकि इसका इन इलाकों में रहने वाले लोगों की आर्थिक स्थिति से कोई लेना-देना नहीं है। न ही तापमान में यह अंतर मौसम की वजह से होता है। बल्कि, गर्मी में यह अंतर शहर के नगर नियोजन में असमानता की वजह से होता है।
“Systemic Inequalities in Heat Risk for Greater London” शीर्षक से लंदन में किए गए इस अध्ययन में पाया गया कि इंग्लैंड की राजधानी में रहने वाले कुछ लोगों को दूसरों की तुलना में ज़्यादा गर्मी झेलनी पड़ रही है। स्टडी में देखा गया कि अमीर लोगों की रिहाइश वाले शहर के पॉश इलाकों का तापमान कम आय वाले लोगों के इलाकों की तुलना में कई डिग्री कम था। ऐसा मौसम की वजह से नहीं, बल्कि शहर की बनावट की वजह से हो रहा था। करीब दर्ज़न भर स्वतंत्र शोधकर्ताओं की टीम द्वारा किए गए इस अध्ययन के मुताबिक लंदन से लेकर लॉस एंजलिस तक, मुंबई से लेकर मैक्सिको सिटी तक दुनिया भर के कई शहरों में तापमान में अंतर का ऐसा ही पैटर्न देखने को मिला। मतलब, सबसे ‘गरीब’ इलाके ज़्यादा गर्म, जबकि ‘अमीर’ इलाके अपेक्षाकृत ठंडे मिले। इस रिसर्च को करने वाले शोधकर्ताओं में रेबेका कोल, लॉरेन फर्ग्यूसन, क्लेयर हीविसाइड, पेनिनाह मुरागे, हेलेन एल. मैकइंटायर, जोनाथन टेलर, चार्ल्स एच. सिम्पसन, ऑस्कर ब्रूस, फिल साइमंड्स, माइकल डेविस और शाकूर हाजत शामिल थे। इस अध्ययन का वीडियो भी देखा जा सकता है-
‘अर्बन हीट आइलैंड’ की असली तस्वीर
शहरों में तापमान बढ़ने की घटना को वैज्ञानिक भाषा में अर्बन हीट आइलैंड इफेक्ट कहा जाता है। यह वह स्थिति है जब शहरों का तापमान आसपास के ग्रामीण इलाकों से ज्यादा हो जाता है। इस पर कई वर्षों से शोध हो रहा है। अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी NASA के अध्ययन के अनुसार कंक्रीट, डामर और ऊंची इमारतें दिनभर सूरज की गर्मी सोखती हैं और रात में धीरे-धीरे उसे छोड़ती हैं, जिससे शहर लंबे समय तक गर्म बने रहते हैं। प्राकृतिक जमीन, मिट्टी और पेड़-पौधे जहां धूप का एक हिस्सा परावर्तित करते हैं और बाकी ऊर्जा को वाष्पीकरण के जरिये ठंडा करने में इस्तेमाल करते हैं, वहीं पक्की सतहें गर्मी को जमा करती रहती हैं। यही वजह है कि शहरों में रात का तापमान भी ऊंचा बना रहता है और लोगों को राहत नहीं मिल पाती। रिसर्च यह भी बताती है कि यह हीट आइलैंड पूरे शहर में एक जैसा नहीं होता। शहर के भीतर भी छोटे-छोटे “हीट पॉकेट” बनते हैं, जो अक्सर कम आय वाले इलाकों में ज्यादा पाए जाते हैं। जिन मोहल्लों में पेड़ों की घनी छाया, पार्क, झील या खुले मैदान हैं, वहां सतही तापमान कम रहता है। इसके उलट, जहां टिन या कंक्रीट की छतें, संकरी गलियां, ज्यादा ट्रैफिक और कम हरियाली है, वहां गर्मी फंस जाती है। सैटेलाइट इमेजिंग और थर्मल मैपिंग से साफ दिखता है कि एक ही शहर में कुछ किलोमीटर की दूरी पर तापमान में कई डिग्री का अंतर हो सकता है। यानी अर्बन हीट आइलैंड सिर्फ शहर बनाम गांव की कहानी नहीं है, बल्कि शहर के भीतर भी असमानता की परतों को उजागर करता है।
लंदन से मुंबई तक मिला एक जैसा पैटर्न
ब्रिटेन में किए गए अध्ययन में शोधकर्ताओं ने सैटेलाइट डेटा, जमीन पर लगे तापमान सेंसर और जनगणना के आंकड़ों को मिलाकर विश्लेषण किया। इसमें पाया गया कि अमीर इलाकों में पेड़ों की संख्या, पार्क और खुले मैदानों जैसे हरित क्षेत्र यानी ग्रीन एरिया अधिक थे। इसके विपरीत 'गरीब' लोगों की रिहाइश वाले इलाकों में घनी बस्ती, कम हरियाली और मकानों व ज्यादा पक्की सतहों की भरमार देखने को मिली । अमेरिका में भी इसी तरह के निष्कर्ष सामने आए हैं। अमेरिका की Environmental Protection Agency यानी EPA ने भी अपनी एक रिपोर्ट में बताया है कि अमेरिका के कई शहरों में ऐतिहासिक रूप से उपेक्षित और नस्लीय आधार पर अलग किए गए इलाकों में तापमान ज्यादा पाया गया। इसी तरह साइंस डायरेक्ट में प्रकाशित अमेरिका की मशहूर Harvard University और Yale University के शोधकर्ताओं की रिपोर्ट में पुराने “रेडलाइन” किए गए मोहल्लों में पेड़ों की कमी और सतह का अधिक तापमान के कारण अधिक गर्मी की बात कही गई है।
शहरों के खुली बसावट और ग्रीन स्पेस वाले पॉश इलाकों में बेहतर नगर नियोजन और हरियाली के कारण तापमान में थोड़ी कमी रहती है।
स्रोत : विकी कॉमंस
भारत के महानगरों में भी है ऐसी ही स्थिति
अमीर और गरीब इलाकों की गर्मी में अंतर की यह स्थिति भारत के महानगरों में किए गए अध्ययनों में भी पाई गई है। देश की राजधानी नई दिल्ली में किए गए एक अध्ययन “Social Inequities in Urban Heat and Greenspace: Analyzing Climate Justice in Delhi, India” में कमोबेश ऐसी ही बातें सामने आई हैं। यह शोध ब्रूस सी. मिशेल, जयजीत चक्रवर्ती और प्रत्यूषा बसु ने International Journal of Environmental Research and Public Health और साइंस जर्नल रिसर्च गेट में प्रकाशित किया गया। इसमें डाटा-आधारित रूप से यह दिखाया गया है कि शहर के भीतर कम आय वाले/घन आबादी वाले इलाकों जैसे स्लम, घनी बस्ती वाले मोहल्लों में समृद्ध, हरियाली वाले इलाकों की तुलना में अधिक गर्मी पड़ती है। शोध ने लैंडसैट सैटेलाइट इमेज, तापमान मानचित्र, हरियाली सूचकांक (NDVI) और सामाजिक-आर्थिक डेटा का विश्लेषण किया है, और साबित किया कि जहां हरियाली कम और कंक्रीट अधिक है, वहां गर्मी का सामना ज्यादा करना पड़ता है, और वे इलाके गरीब समुदायों के करीब हैं। इस अध्ययन से पता चलता है कि यह एक जलवायु न्याय का मामला है, यानी तापमान में असमानता कई बार सिर्फ मौसम का विषय नहीं, बल्कि सामाजिक ढांचे का नतीजा भी होती है। इस अध्ययन का निचोड़ तीन बिंदुओं में इस प्रकार है-
कम आय वाले लोगों की बस्तियों वाले शहरी इलाकों में में हरियाली कम होने के कारण तापमान अधिक रहता है।
अमीर/पॉश कॉलोनियों में हरियाली, खुलेपन और कम आबादी होने के कारण तापमान कम रहता है।
यह असमानता सिर्फ आर्थिक नहीं, बल्कि भूमि उपयोग, हरियाली की उपलब्धता और नगर नियोजन व आबादी में अंतर का परिणाम है।
भारत के शहरों में भी यही कहानी दोहराई जा रही है। IIT Delhi और Indian Institute of Tropical Meteorology द्वारा किए गए अध्ययनों में पाया गया है कि दिल्ली, मुंबई और हैदराबाद जैसे शहरों में हरित क्षेत्र की कमी वाले इलाकों में तापमान अधिक पाया जाता है। मुंबई में भी तटीय और हरित इलाकों में तापमान अपेक्षाकृत कम पाया गया, जबकि घनी बस्तियों में ज्यादा गर्मी देखने को मिली। भारत मौसम विज्ञान विभाग और नीति आयोग की रिपोर्टें भी संकेत देती हैं कि हीट एक्शन प्लान बनाते समय शहर के भीतर असमान तापमान वितरण को ध्यान में रखना जरूरी है।
तापमान का अंतर कितना?
कई अंतरराष्ट्रीय अध्ययनों में शहरों के भीतर तापमान का अंतर 3 से 7 डिग्री सेल्सियस तक दर्ज किया गया है। अमेरिकी एजेंसियां National Oceanic and Atmospheric Administration (NOAA) और NASAकी रिपोर्टें बताती हैं कि हीट वेव के दौरान यही कुछ डिग्री का अंतर बेहद निर्णायक साबित हो सकता है। जब रात का तापमान भी ऊँचा बना रहता है और शरीर को ठंडा होने का मौका नहीं मिलता, तब हीट स्ट्रोक, डिहाइड्रेशन और हृदय संबंधी जोखिम तेजी से बढ़ते हैं। यानी तापमान का मामूली दिखने वाला अंतर सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए गंभीर परिणाम ला सकता है। अमेरिकी महानगर Los Angeles में किए गए सर्वेक्षण में पाया गया कि जिन इलाकों में पेड़ों की घनी छाया और हरित क्षेत्र अधिक थे, वहां तापमान आसपास की कंक्रीट और डामर से भरी बस्तियों की तुलना में लगभग 5 डिग्री तक कम था। यह फर्क सिर्फ थर्मामीटर का आंकड़ा नहीं, बल्कि जीवन की गुणवत्ता और सुरक्षा से जुड़ा हुआ है।
गर्मी के दिनों में लोग शरीर को ठंडा रखने के लिए राहत के उपाय ढूंढते हैं, ऐसे में नारियल पानी जैसी चीजों की बिक्री भी बढ़ जाती है।
स्रोत : विकी कॉमंस
पानी की खपत और भूजल स्तर में भी अंतर
कम आय और घनी आबादी वाले इलाकों में ज्यादा तापमान केवल स्वास्थ्य संकट नहीं, बल्कि जल संकट को भी गहरा करता है। घनी बस्ती वाले इलाकों में अधिक गर्मी के कारण पीने, नहाने, कपड़े धोने और ठंडक के लिए पानी की खपत बढ़ जाती है। इन इलाकों में आबादी घनत्व अधिक होने से प्रति वर्ग किलोमीटर जल मांग भी ज्यादा होती है। संयुक्त राष्ट्र की संस्था UN-Habitat ने अपनी रिपोर्ट World Cities Report 2022 में बताया है कि अनियोजित शहरीकरण और हरित व खुले क्षेत्रों की कमी जल सुरक्षा को प्रभावित करती है। इसी तरह World Resources Institute (WRI) की रिपोर्ट में कहा गया है कि कंक्रीट प्रधान और घने इलाकों में वर्षा जल का जमीन में समावेश कम होता है, जिससे भूजल रिचार्ज घटता है और सतही बहाव बढ़ता है। जब ज्यादा आबादी अधिक दोहन करती है और रिचार्ज के अवसर सीमित होते हैं, तो भूजल स्तर तेजी से गिरता है। इस तरह तापमान असमानता और जल संकट एक-दूसरे को मजबूत करते हुए शहरी गरीबों पर दोहरी मार डालते हैं। इस अध्ययन में कहा गया है कि:
शहरीकरण के कारण जीवित जल निकाय, हरित क्षेत्र और खुली सतहें घट रही हैं।
2000 से 2015 तक केवल 10 भारतीय शहरों में सतही जल स्रोतों का नुकसान लगभग 900 बिलियन लीटर रहा — यह पानी अगर उपलब्ध होता तो तेजी से बढ़ती शहरी मांग के लगभग 60 % हिस्से को पूरा कर सकता था।
जैसे-जैसे कंक्रीट और डामर जैसी Impervious सतहें बढ़ती हैं, वर्षा का पानी सीधे जमीन में नहीं समाता; इससे भूमिगत जल का रिचार्ज कम होता है और जल ताल (water table) गिरता है।
वहीं शहरी आबादी की बढ़ती जल मांग के खिलाफ उपलब्ध संसाधन तेजी से घट रहे हैं, जिससे शहरी गरीब इलाकों में भूजल तनाव और पानी की कमी दोनों गहरे स्तर पर दिख रहे हैं।
सेहत पर सीधा असर
गरीब लोंगों के इलाकों में अधिक गर्मी केवल एक असुविधा नहीं, बल्कि एक गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य से जुड़ा खतरा भी है। World Health Organization (WHO) की एक रिपोर्ट के अनुसार गर्मी और हीटवेव की मार दुनिया भर में हर साल हजारों मौतों के लिए जिम्मेदार होती है और जलवायु परिवर्तन के साथ इसकी तीव्रता और आवृत्ति दोनों बढ़ रही हैं। लंबे समय तक उच्च तापमान में रहने से शरीर की ताप-नियंत्रण प्रणाली पर दबाव पड़ता है। जब रात का तापमान भी कम नहीं होता, तो शरीर को ठंडा होने का अवसर नहीं मिलता और हीट स्ट्रोक, डिहाइड्रेशन, किडनी पर असर तथा हृदय संबंधी जटिलताओं का जोखिम बढ़ जाता है। कम आय वाले लोगों के इलाकों में स्थिति और गंभीर हो जाती है। वहां एयर कंडीशनर, कूलिंग सेंटर, पर्याप्त वेंटिलेशन या हरित छाया जैसी सुविधाएं सीमित होती हैं। टिन या कंक्रीट की छतें घरों को भट्ठी जैसा बना देती हैं। बुजुर्ग, बच्चे और पहले से बीमार लोग सबसे अधिक प्रभावित होते हैं। इस तरह तापमान की असमानता सीधे स्वास्थ्य असमानता में बदल जाती है। अत्यधिक गर्मी सिर्फ असुविधा नहीं, बल्कि स्वास्थ्य संकट भी है। World Health Organization के मुताबिक, हीट वेव हर साल हजारों लोगों की जान लेती है। कम आय वाले लोगों के पास एयर कंडीशनर, बेहतर वेंटिलेशन या ठंडे स्थानों तक पहुंच कम होती है। नतीजतन, हीट स्ट्रोक, डिहाइड्रेशन और हृदय संबंधी समस्याओं का खतरा बढ़ जाता है।
हालिया रिसर्च में शहर के अलग-अलग इलाकों के तापमान में अंतर का पैटर्न लंदन से लेकर दिल्ली-मुंबई तक देखने को मिला है।
स्रोत : विकी कॉमंस
असमानता की विरासत
शहरी इलाकों के तापमान में दिखने वाला यह अंतर किसी एक मौसम या एक दशक की देन नहीं है, बल्कि लंबे समय से चली आ रही नगर नियोजन नीतियों का परिणाम है। यानी यह दशकों से जारी एक विरासत के रूप में चला आ रहा है। बीते दशकों में कई शहरों में विकास का मॉडल कंक्रीट-केंद्रित रहा। इसमें चौड़ी सड़कें, विशाल पार्किंग स्थल, ऊंची इमारतों का निर्माण और भूमि का अधिकतम उपयोग किया गया यानी हरियाली के लिए खाली जगहें नहीं छोड़ी गईं। इस प्रक्रिया में हरित क्षेत्र, तालाब, खुले मैदान और प्राकृतिक जल निकासी तंत्र धीरे-धीरे कम होते गए। सस्ते आवास अक्सर सीमित और घनी जगहों पर बनाए गए, जहां न तो पर्याप्त पेड़ थे और न ही हवा के आवागमन की गुंजाइश। उपरोक्त अध्ययन बताते हैं कि जिन इलाकों में पेड़ों की छाया, पार्क, खुली मिट्टी और जल निकाय मौजूद हैं, वहां सतही तापमान स्वाभाविक रूप से कम रहता है क्योंकि वाष्पीकरण और छाया प्रभाव वातावरण को ठंडा करते हैं। इसके उलट, टिन की छतों, कंक्रीट की दीवारों और संकरी गलियों वाले घने इलाकों में गर्मी दिनभर जमा होती है और रात तक बनी रहती है। यही ऐतिहासिक असमानता आज “हीट इनइक्विटी” के रूप में सामने आ रही है।
समाधान : शहरों की प्लानिंग में करना होगा सुधार
विशेषज्ञों का मानना है कि इस समस्या का समाधान शहरों की प्लानिंग में सुधार करके किया जा सकता है। इसके अलावा “कूल रूफ” जैसे प्रयोग, वृक्षारोपण अभियान चलाकर ग्रीन बेल्ट तैयार करना, पार्कों का विस्तार, पानी के स्रोतों का संरक्षण और सड़कों के किनारे पेड़ लगाकर छायादार रास्तों का निर्माण करने जैसे कदम तापमान घटा सकते हैं। इसपर अमल करते हुए गुजरात की राजधानी अहमदाबाद में देश का पहला हीट एक्शन प्लान लागू किया गया था, जिसे बाद में अन्य शहरों ने भी अपनाया। शोध बताते हैं कि अगर किसी मोहल्ले में 10 प्रतिशत हरियाली बढ़ाई जाए तो स्थानीय तापमान में 1 से 2 डिग्री तक कमी लाई जा सकती है।
इस तरह, यह कहानी सिर्फ तापमान की नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय की भी है। जलवायु परिवर्तन का असर सब पर पड़ता है, लेकिन उससे निपटने की क्षमता सबकी बराबर नहीं होती। अमीर इलाकों में हरियाली, बेहतर निर्माण और संसाधनों की उपलब्धता उन्हें राहत देती है। वहीं गरीब इलाकों में गर्मी एक अतिरिक्त बोझ बन जाती है। उपरोक्त अध्ययन यह संकेत देते हैं कि अगर शहरों को भविष्य के लिए सुरक्षित बनाना है, तो सिर्फ कार्बन उत्सर्जन कम करना काफी नहीं होगा। नगर नियोजन में समानता, हरियाली का न्यायपूर्ण वितरण और कमजोर वर्गों की जरूरतों को प्राथमिकता देनी होगी। वास्तव में, गर्मी अब सिर्फ मौसम का मसला नहीं रही। यह शहरी नीति, सामाजिक न्याय और सार्वजनिक स्वास्थ्य का प्रश्न बन चुकी है। बड़ा सवाल यह है कि हमारे शहर इस असमान गर्मी को कम करने के लिए कितने तैयार हैं?
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