पानी से भरे खेत में पारंपरिक विधि से धान की रोपाई करते श्रमिक।
फोटो :इंडिया वाटर पोर्टल
क्या धरती को सुखा रही चावल की खेती, प्लेनेटरी बाउंड्रीज के वैज्ञानिक अध्ययन में खुलासा
धान उगाने के लिए पीने योग्य पानी के अत्यधिक दोहन से भारत सहित दुनिया के कई इलाकों में गहरा रहा है जल संकट।
ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन और रासायनिक खाद व दवाओं के उपयोग से मिट्टी की गुणवत्ता खराब होने जैसी वजहों से धान की खेती की पद्धतियां पृथ्वी की पर्यावरणीय सहनशक्ति को पार कर चुकी हैं।
चावल दुनिया भर में अरबों लोगों के लिए सिर्फ रोजाना का भोजन नहीं है, बल्कि यह विश्व की एक बड़ी आबादी के लिए खाद्य सुरक्षा का आधार, एक सांस्कृतिक विरासत और लाखों किसानों की आजीविका का साधन भी है। लेकिन, एक ताजा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर किए गए एक हालिया शोध अध्ययन ने चावल की खेती को लेकर गंभीर चेतावनी जारी की है। Can We Produce Rice Without Harming Our Planet? यानी 'क्या हम अपने ग्रह को नुकसान पहुंचाए बिना चावल उगा सकते हैं?' शीर्षक से प्रकाशित रिसर्च रिपोर्ट में कहा गया है कि वर्तमान चावल उत्पादन पद्धतियां पृथ्वी की पर्यावरणीय सहनशक्ति को पार कर चुकी हैं। ‘प्लेनेटरी बाउंड्रीज' (Planetary Boundaries) की अगुवाई में एक अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिकों के समूह द्वारा संयुक्त रूप से किए गए इस अध्ययन की रिपोर्ट का कहना है कि आधुनिक धान की खेती अब ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन, मीठे पानी के अत्यधिक दोहन और पोषक तत्व प्रदूषण की सबसे बड़ी वजहों में शामिल हो गई है।
अध्ययन का मुख्य आधार
'प्लेनेटरी बाउंड्रीज फ्रेमवर्क' के तहत किए गए इस शोध अध्ययन का मुख्य आधार तैयार करने में स्टॉकहोम रेजिलिएंस सेंटर (Stockholm Resilience Centre) और प्रो. जोहान रॉकस्ट्रॉम (Johan Rockstrom) की मुख्य भूमिका रही है। अध्ययन के अनुसार एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के करोड़ों लोग इसे अपना मुख्य आहार मानते हैं। चावल उत्पादन से जुड़ी गतिविधियां पृथ्वी के नौ प्रमुख पर्यावरणीय आयामों को प्रभावित कर रही हैं। खासकर धान उगाने में भारी मात्रा में मीठे पानी का उपयोग, इसके कारण सूक्ष्म जीवों व जैव विविधता का ह्रास, मिट्टी के पोषक चक्र पर भारी दबाव और जलवायु परिवर्तन जैसे दुष्प्रभाव देखने को मिल रहे हैं।
चावल से पोषण की भारी कीमत
एशिया महाद्वीप में चावल आधी आबादी यानी 50% लोगों का मुख्य भोजन है। बढ़ती जनसंख्या और बदलते खान-पान की आदतों के कारण चावल की मांग लगातार बढ़ रही है। नतीजतन, बड़े पैमाने पर धान की खेती हो रही है, जिसमें रासायनिक उर्वरक, कीटनाशक और लगातार सिंचाई का भारी इस्तेमाल हो रहा है।
अध्ययन में आगे कहा गया है कि धान की खेती अब पर्यावरण के लिए 'महंगा सौदा' बन गई है। खासतौर पर बाढ़ वाले खेतों में लगातार पानी भरने से मिट्टी में ऑक्सीजन की कमी हो जाती है। इससे एनारोबिक बैक्टीरिया सक्रिय होते हैं और बड़ी मात्रा में मीथेन गैस निकलती है। मीथेन कार्बन डाइऑक्साइड से 80 गुना अधिक गर्मी रोकने वाली गैस है, जो अल्पकालिक जलवायु परिवर्तन में बहुत बड़ी भूमिका निभाती है।
इसके अलावा, सिंचाई के लिए हर साल अरबों घन मीटर मीठा पानी इस्तेमाल होता है, जो कई इलाकों में भूजल स्तर को तेजी से नीचे ला रहा है। रासायनिक उर्वरकों (नाइट्रोजन और फॉस्फोरस) के अत्यधिक उपयोग से नदियों, झीलों और समुद्र में पोषक तत्वों का रिसाव बढ़ा है, जिसके कारण 'डेड जोन' बन रहे हैं, जहां जलीय जीवन लगभग खत्म हो चुका है।
पर्यावरण की सीमाओं के अंदर रहकर ही हम भविष्य की पीढ़ियों को पर्याप्त भोजन और स्वस्थ ग्रह दे सकते हैं। क्योंकि ये सीमाएं 'मानवता के लिए सुरक्षित कार्यक्षेत्र' हैं। अगर चावल उत्पादन की वर्तमान गति और तरीके जारी रहे तो जलवायु लक्ष्यों को हासिल करना और जैव विविधता बचाना बेहद मुश्किल हो जाएगा।
प्रोफेसर जोहान रॉकस्ट्रॉम (प्लेनेटरी बाउंड्रीज के प्रमुख शोधकर्ता)
धान की खेती में अपनाई जाने वाली कृषि पद्यतियों के कारण दुनिया के कई इलाकों में मिट्टी की उवर्रता भी खराब हो रही है।
फोटो : इंडिया वाटर पोर्टल
FAO के अनुसार : दुनिया का लगभग 90% चावल एशिया में पैदा और खाया जाता है। एशिया में करीब 2.4 अरब लोगों का मुख्य भोजन चावल है। बांग्लादेश, लाओस, म्यांमार, कंबोडिया जैसे कई एशियाई देशों में लोगों को 50% से अधिक कैलोरी चावल से ही प्राप्त होती है।
समस्याएं गंभीर, लेकिन समाधान भी मौजूद
शोधकर्ताओं ने अपने अध्ययन में स्पष्ट किया है कि चावल की खेती के प्रतिकूल पर्यावरणीय प्रभावों के बावजूद इसे बंद करने या उत्पादन घटाने की जरूरत नहीं है। क्योंकि समस्या धान की फसल में नहीं, बल्कि उसकी खेती में इस्तेमाल की जा रही पुरानी और गैर-टिकाऊ पद्धतियों (Unsustainable practices) में है। शोधकर्ताओं ने अपनी रिपोर्ट में इसके कई व्यावहारिक और साक्ष्य-आधारित समाधान सुझाए हैं-
वैकल्पिक गीला-सूखा सिंचाई पद्यति (Alternate Wetting and Drying - AWD)
धान के खेतों को पूरे मौसम लगातार पानी से भरा रखने के बजाय कुछ दिनों तक पानी भरना और फिर 3–5 दिनों तक खेत को आंशिक रूप से सूखने देना वैकल्पिक गीला-सूखा सिंचाई कहलाता है। शोध के अनुसार सिंचाई के लिए 15–30 प्रतिशत तक कम पानी की जरूरत पड़ती है। जिससे जल संकट वाले क्षेत्रों में यह तकनीक काफी उपयोगी साबित हो सकती है। साथ ही इससे खेतों में ऑक्सीजन का स्तर बढ़ता है, जिससे मीथेन पैदा करने वाले सूक्ष्मजीव कम सक्रिय होते हैं। परिणामस्वरूप मीथेन उत्सर्जन में 30–50 प्रतिशत तक कमी लाई जा सकती है।
सटीक उर्वरक प्रबंधन (Precision Nutrient Management)
शोध के मुताबिक धान की खेती में अकसर आवश्यकता से अधिक रासायनिक उर्वरकों का इस्तेमाल किया जाता है। इससे मिट्टी की गुणवत्ता तो प्रभावित होती ही है साथ में जल प्रदूषण भी होता है। क्योंकि खोतों की मिट्टी में मौजूद अतिरिक्त नाइट्रोजन वर्षा या सिंचाई के पानी के साथ बहकर नदियों, झीलों और भूजल तक पहुंच जाती है। शोधकर्ताओं का सुझाव है कि मिट्टी परीक्षण के आधार पर सही मात्रा, सही समय और सही तरीके से उर्वरक दिए जाएं। इससे फसल की उत्पादकता बनाए रखते हुए नाइट्रोजन की बर्बादी, जल प्रदूषण और नाइट्रस ऑक्साइड जैसे ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में भी कमी लाई जा सकती है।
उन्नत बीज और क्रॉप ब्रीडिंग (Improved Varieties and Crop Breeding)
वैज्ञानिक जीन इंजीनियरिंग से उन्नत बीज और क्रॉप ब्रीडिंग की तकनीक का इस्तेमाल कर ऐसी धान की नई किस्में विकसित करने पर काम कर रहे हैं जो कम पानी में भी अच्छी पैदावार दें, सूखा और गर्मी सहन कर सकें (Climate-resilient) तथा रोगों के प्रति अधिक प्रतिरोधी हों। इसके साथ ही पोषण की दृष्टि से बेहतर किस्मों के विकास पर भी जोर दिया जा रहा है। ऐसी उन्नत किस्में जलवायु परिवर्तन के बढ़ते प्रभावों के बीच किसानों की आय और खाद्य सुरक्षा दोनों को मजबूत बनाने में मदद कर सकती हैं।
सटीक कृषि प्रौद्योगिकी (Precision Agriculture)
ड्रोन, सेंसर, सैटेलाइट इमेजिंग, जीपीएस और डेटा एनालिटिक्स जैसी आधुनिक तकनीकों की मदद से खेत की वास्तविक जरूरत के अनुसार पानी, उर्वरक और कीटनाशकों का उपयोग किया जा सकता है। इससे संसाधनों की अनावश्यक बर्बादी रुकती है, उत्पादन लागत घटती है और पर्यावरण पर पड़ने वाला दबाव भी कम होता है। डिजिटल कृषि तकनीक किसानों को समय पर निर्णय लेने और बेहतर फसल प्रबंधन में भी सहायता करती है।
समग्र फसल प्रबंधन (Integrated Crop Management)
शोधकर्ताओं का मानना है कि केवल सिंचाई या उर्वरक प्रबंधन ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि खेती की पूरी प्रणाली को अधिक टिकाऊ बनाना होगा। इसके लिए फसल विविधीकरण यानी धान के साथ अन्य फसलों का समावेश, जैविक खाद और हरी खाद का अधिक उपयोग, फसल अवशेषों का वैज्ञानिक प्रबंधन तथा मिट्टी के जैविक कार्बन और स्वास्थ्य को बेहतर बनाने वाली तकनीकों को अपनाना आवश्यक है। इससे मिट्टी की उर्वरता लंबे समय तक बनी रहती है, रासायनिक इनपुट पर निर्भरता घटती है और खेती जलवायु परिवर्तन के प्रति अधिक लचीली बनती है।
कश्मीर में बढ़ते जल संकट और जलवायुु परिवर्तन के कारण बांडीपोरा ज़िले में अजस गांव के 38 वर्षीय किसान याकूब नबी डार धीरे-धीरे धान की खेती से दूर हो गए हैं।
कम पानी में अधिक उपज देने वाली SRI विधि
पर्यावरण को ज्यादा नुकसान पहुंचाए बगैर बेहतर उत्पादन देने वाली धान की खेती की एक उन्नत तकनीक एसआरआई विधि (System of Rice Intensification) है। यह एक ऐसी वैज्ञानिक पद्धति है, जिसका उद्देश्य कम पानी, कम बीज और कम संसाधनों का उपयोग करके अधिक उत्पादन प्राप्त करना है। इस तकनीक का विकास 1980 के दशक में मेडागास्कर में हुआ था और आज भारत सहित कई देशों में इसे जल संरक्षण और टिकाऊ कृषि के प्रभावी विकल्प के रूप में अपनाया जा रहा है।
पारंपरिक धान की खेती में खेतों को पूरे मौसम पानी से भरा रखा जाता है और अपेक्षाकृत बड़े पौधों को पास-पास रोपा जाता है। इसके विपरीत, SRI विधि में 8–15 दिन के युवा पौधों को अधिक दूरी (आमतौर पर 25×25 सेंटीमीटर) पर लगाया जाता है, जिससे प्रत्येक पौधे को पर्याप्त धूप, हवा और पोषक तत्व मिलते हैं। इसके अलावा खेतों को लगातार जलमग्न रखने के बजाय वैकल्पिक गीला-सूखा (Alternate Wetting and Drying) सिंचाई अपनाई जाती है। इससे जड़ों का बेहतर विकास होता है और मिट्टी में ऑक्सीजन की मात्रा भी बनी रहती है।
इस पद्धति से 30–50 प्रतिशत तक पानी की बचत, कम बीज की आवश्यकता और कई क्षेत्रों में 15–30 प्रतिशत या उससे अधिक उपज वृद्धि दर्ज की गई है। साथ ही खेतों में लगातार जलभराव न होने के कारण मीथेन गैस का उत्सर्जन भी कम होता है, जिससे यह जलवायु के अनुकूल खेती पद्धति मानी जाती है। विशेषज्ञों के अनुसार, बढ़ते जल संकट और जलवायु परिवर्तन के दौर में SRI विधि धान उत्पादन को टिकाऊ बनाने का एक महत्वपूर्ण विकल्प बनकर उभरी है, हालांकि इसकी सफलता के लिए किसानों को उचित प्रशिक्षण और समय पर तकनीकी मार्गदर्शन भी आवश्यक है।
निष्कर्ष : भविष्य की संभावनाएं
इस रिसर्च में शामिल शोधकर्ताओं का मानना है कि चावल उत्पादन (धान की खेती) का सुरक्षित भविष्य खेती का विस्तार करने या रासायनिक उर्वरक और दवाओं व कीटनाशकों के उपयोग से उत्पादन बढ़ाने में नहीं, बल्कि खेती की नुकसानदेह पद्धतियों में क्रांतिकारी बदलाव लाने में छिपा है। इसके लिए सरकारों, कृषि वैज्ञानिकों, किसानों और नीति-निर्माताओं को मिलकर काम करना होगा। भारत, चीन, बांग्लादेश, इंडोनेशिया और वियतनाम जैसे प्रमुख चावल उत्पादक देशों में इन नई तकनीकों को बड़े पैमाने पर अपनाने की जरूरत है। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर समय रहते सही कदम उठाए गए तो चावल न सिर्फ अरबों लोगों को पेट भरने वाला भोजन बना रहेगा, बल्कि पर्यावरण संरक्षण में भी सहायक साबित होगा।
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