सुबनसिरी पर जब एक बड़ा जलाशय बनेगा तो उसका असर केवल जल-प्रवाह पर नहीं पड़ेगा।
चित्र: arunachalobserver.org
1,720 मेगावाट बनाम 23 लाख पेड़: क्या सुबनसिरी परियोजना नदी प्रबंधन की परीक्षा है?
हाल ही में पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEFCC) की विशेषज्ञ मूल्यांकन समिति (EAC) ने अरुणाचल प्रदेश में प्रस्तावित 1,720 मेगावाट क्षमता वाली सुबनसिरी अपर जलविद्युत परियोजना को सैद्धांतिक स्वीकृति दी है।
यह परियोजना सुबनसिरी बेसिन में प्रस्तावित है, जो आगे चलकर ब्रह्मपुत्र में मिलती है। आधिकारिक दस्तावेज़ों के अनुसार इसके कारण लगभग 23 लाख पेड़ों पर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष प्रभाव पड़ सकता है।
यह स्वीकृति केवल एक परियोजना की प्रगति नहीं है; यह उत्तर-पूर्व भारत में नदी प्रबंधन, बाढ़ नियंत्रण, जैव विविधता और जलवायु जोखिम के बीच संतुलन की एक व्यापक परीक्षा भी है।
नदी केवल पानी का स्रोत नहीं, एक जीवित तंत्र
सुबनसिरी नदी, जो आगे चलकर ब्रह्मपुत्र में मिलती है, अपने साथ पहाड़ों की तलछट, जंगलों की जैविक संपदा और सैकड़ों समुदायों की आजीविका लेकर चलती है।
नदी पर जब एक बड़ा जलाशय बनता है, तो उसका असर केवल जल-प्रवाह पर नहीं पड़ता।
तलछट का प्रवाह बदलता है।
मछलियों के प्रवास मार्ग बाधित होते हैं।
नीचे के मैदानी इलाक़ों में बाढ़ के पैटर्न बदल सकते हैं।
केन्द्रीय जल आयोग (CWC) और असम राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के आंकड़ों के अनुसार, ब्रह्मपुत्र बेसिन देश के सबसे अधिक बाढ़-प्रभावित नदी क्षेत्रों में से एक है। कई वर्षों में असम में 30 से 40 लाख तक लोग बाढ़ से प्रभावित हुए हैं, और लाखों हेक्टेयर कृषि भूमि जलमग्न हुई है।
आर्थिक क्षति का अनुमान हज़ारों करोड़ रुपये तक पहुंचता रहा है। ऐसे में ऊपरी धारा में बनने वाले बड़े जलाशयों की भूमिका केवल ऊर्जा उत्पादन तक सीमित नहीं रह जाती, वे बाढ़ नियंत्रण और जोखिम प्रबंधन का भी हिस्सा बन जाते हैं।
बाढ़ नियंत्रण को अक्सर बांधों का एक सकारात्मक पक्ष माना जाता है। लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि यदि जलाशय प्रबंधन पारदर्शी और समन्वित न हो, तो अचानक पानी छोड़े जाने पर नीचे के इलाकों में बाढ़ का खतरा बढ़ सकता है।
सुबनसिरी बांध का निर्माण अंतिम चरण में है, लेकिन निचले इलाक़ों में रहने वाले लोगों की आशंकाएं बनी हुई हैं। स्थानीय संगठनों का मानना है कि जब तक विशेषज्ञ समिति की सुरक्षा सिफारिशें पूरी तरह लागू नहीं होतीं और समुदाय की चिंताओं का समाधान नहीं होता, तब तक परियोजना को आगे बढ़ाने पर सावधानी बरती जानी चाहिए।
सरजित मोरान, असम जातीयताबादी युवा छात्र परिषद
जलवायु परिवर्तन और “स्वच्छ ऊर्जा” का तर्क
हाइड्रो पावर को अक्सर “ग्रीन” या “स्वच्छ ऊर्जा” कहा जाता है। दरअसल, कोयला आधारित संयंत्रों की तुलना में इससे कम कार्बन उत्सर्जन होता है। केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण (CEA) की रिपोर्ट कहती है कि भारत में कुल स्थापित विद्युत क्षमता में बड़े जल विद्युत (हाइड्रोपॉवर) की हिस्सेदारी लगभग 10.6 फ़ीसद है, जिसमें करीब 46,928 मेगावॉट क्षमता शामिल है।
भारत ने 2030 तक 500 गीगावाट गैर-जीवाश्म ईंधन आधारित क्षमता हासिल करने का लक्ष्य रखा है, जिसमें सौर, पवन, जल (hydro), बायो ऊर्जा और न्यूक्लियर शामिल हैं।
भारत 2030 तक कुल 500 GW गैर-जीवाश्म विद्युत क्षमता हासिल करने के लक्ष्य पर आगे बढ़ रहा है, जिसमें सौर, पवन, जल, बायो-एनर्जी और नाभिकीय ऊर्जा स्रोत शामिल हैं।
संतोष सरंगी, सचिव, नवीन और नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय
लेकिन जलवायु परिवर्तन स्वयं नदियों के प्रवाह को अनिश्चित बना रहा है:
हिमनदों के पिघलने की दर बदल रही है।
वर्षा के पैटर्न अस्थिर हो रहे हैं।
चरम वर्षा घटनाएं (extreme rainfall events) बढ़ रही हैं।
IPCC की छठी आकलन रिपोर्ट (AR6) के अनुसार दक्षिण एशिया में अत्यधिक वर्षा की घटनाओं की आवृत्ति और तीव्रता में वृद्धि दर्ज की गई है। इसका मतलब है कि जलाशयों की डिज़ाइन और सुरक्षा मानकों को भी जलवायु जोखिम के अनुरूप बदले जाने की ज़रूरत है।
ऐसे परिदृश्य में बांधों की डिज़ाइन और सुरक्षा मानकों की समीक्षा अनिवार्य हो जाती है। ‘Probable Maximum Flood (PMF)’ जैसे मानकों को अब पारंपरिक वर्षा पैटर्न के आधार पर नहीं, बल्कि बदलते जलवायु जोखिम को ध्यान में रखकर पुनः परिभाषित करने की आवश्यकता है।
वर्ष 2021 में लागू डैम सेफ्टी अधिनियम (Dam Safety Act) ने निगरानी और समन्वय की व्यवस्था तो बनाई है, लेकिन सवाल यह है कि क्या जलवायु-जनित अनिश्चितताओं को पूरी तरह परियोजना अनुमोदन प्रक्रिया में शामिल किया जा रहा है?
अगर वर्षा का वितरण अनियमित है, तो क्या जलाशय अपनी अनुमानित क्षमता के अनुसार काम कर पाएंगे? या फिर इससे नई तरह की आपदाओं का जन्म होगा।
नदी प्रबंधन: टुकड़ों में नहीं समग्रता में
समस्या अक्सर परियोजना-विशिष्ट आकलन में होती है। पर्यावरण प्रभाव आकलन (EIA) आमतौर पर एक परियोजना के दायरे में सीमित रह जाता है। लेकिन नदी बेसिन एक जीवित, परस्पर जुड़ा हुआ तंत्र है।
ब्रह्मपुत्र बेसिन में पहले से संचालित और प्रस्तावित कई जलविद्युत परियोजनाओं के संचयी प्रभाव (cumulative impact) का समग्र आकलन अभी भी एक जटिल और आंशिक रूप से अधूरा क्षेत्र बना हुआ है।
जब एक ही नदी तंत्र में क्रमिक रूप से कई जलाशय निर्मित होते हैं, तो तलछट प्रवाह, पारिस्थितिकी और बाढ़ के पैटर्न पर उनका संयुक्त प्रभाव किसी एक परियोजना के आकलन से कहीं अधिक व्यापक हो सकता है।
उदाहरण के तौर पर, पिछले कुछ वर्षों में असम के निचले इलाक़ों में अचानक जलस्तर वृद्धि की घटनाओं ने जलाशय संचालन और समन्वय तंत्र को लेकर सार्वजनिक बहस को तेज़ किया है।
असम के मैदानी इलाक़ों में रहने वाले लोग हर साल बाढ़ से जूझते हैं। अगर ऊपरी धारा में जलाशयों का निर्माण होता है, तो उसका असर नीचे तक जाता है। इसलिए नदी बेसिन प्रबंधन की नीति को बनाते समय इन बिंदुओं का ध्यान रखा जाना चाहिए:
अंतरराज्यीय समन्वय
डेटा साझेदारी
वास्तविक समय (real-time) जल प्रबंधन के साथ जोड़ने की व्यवस्था
जल शक्ति मंत्रालय की ‘राष्ट्रीय जल नीति 2012’ समेकित नदी बेसिन प्रबंधन (IRBM) की वकालत करती है। लेकिन अब तक अधिकांश परियोजनाओं को अलग-अलग स्वीकृत मिलने की प्रवृत्ति देखी जा रही है। ब्रह्मपुत्र बोर्ड की भूमिका भी इसी संदर्भ में महत्वपूर्ण हो जाती है, क्योंकि उसे बेसिन-स्तर पर योजना और समन्वय का दायित्व सौंपा गया है।
इसके अलावा, सवाल यह भी है कि क्या हम स्थानीय समुदायों को निर्णय-प्रक्रिया में पर्याप्त स्थान दे पा रहे हैं?
निचले असम में कई स्थानीय संगठनों और छात्र समूहों ने समय-समय पर जलाशय प्रबंधन और अचानक जल-मुक्ति की आशंकाओं को लेकर चिंता जताई है। उनके अनुसार केवल तकनीकी आश्वासन पर्याप्त नहीं है; वास्तविक समय डेटा साझेदारी, सार्वजनिक चेतावनी तंत्र और पारदर्शी संचालन प्रोटोकॉल आवश्यक हैं।
जब तक स्थानीय समुदायों को जल प्रबंधन तंत्र का सक्रिय भागीदार नहीं बनाया जाता, तब तक विश्वास की कमी बनी रह सकती है। साथ ही स्थानीय और सामुदायिक ज्ञान की मदद से तैयार की गई नीति उस क्षेत्र विशेष के लिए अधिक प्रभावी हो सकती है, क्योंकि कागज पर बनी नीतियों और ज़मीनी हक़ीक़त में अक्सर बड़ा अंतर होता है।
जैव विविधता और स्थानीय पारिस्थितिकी
उत्तर-पूर्व भारत जैव विविधता का हॉटस्पॉट है। घने वन, दुर्लभ वन्यजीव, और नदी-आधारित पारिस्थितिकी यहां की पहचान हैं। लगभग 23 लाख पेड़ों पर संभावित प्रभाव केवल एक सांख्यिकीय तथ्य नहीं है। यह उन नदी-तटीय और पहाड़ी वनों की संरचना में बदलाव का संकेत है, जो हाथी मार्गों (elephant corridors), पक्षी प्रवास और नदी-आधारित पारिस्थितिकी तंत्र का हिस्सा रहे हैं। बड़े पैमाने पर वन कटाव मिट्टी के क्षरण और तलछट की मात्रा बढ़ाता है, जिससे जलाशयों की दीर्घकालिक क्षमता भी प्रभावित हो सकती है।
वनों के कटाव के कई दुष्परिणाम होते हैं। भारी मात्रा में पेड़ों के काटे जाने से:
मिट्टी का क्षरण बढ़ता है,
तलछट की मात्रा बढ़ती है
और अंततः जलाशयों की उम्र में कमी होती है
वन सर्वेक्षण की साल 2023 की रिपोर्ट के अनुसार उत्तर-पूर्व भारत देश के कुल वन क्षेत्र का लगभग 25 फ़ीसद हिस्सा समेटे हुए है। ऐसे में बड़े पैमाने पर वन भूमि के उपयोग परिवर्तन का प्रभाव केवल स्थानीय नहीं, राष्ट्रीय पारिस्थितिकी पर भी पड़ता है।
लगभग 23 लाख पेड़ों पर संभावित प्रभाव केवल एक सांख्यिकीय तथ्य नहीं है। यह उन नदी-तटीय और पहाड़ी वनों की संरचना में बदलाव का संकेत है, जो हाथी मार्गों (elephant corridors), पक्षी प्रवास और नदी-आधारित पारिस्थितिकी तंत्र का हिस्सा रहे हैं।
कागज़ पर “प्रतिपूरक वनीकरण (compensatory afforestation) एक बेहतर समाधान लगता है। लेकिन क्या किसी दूसरे राज्य में लगाए गए पेड़, उसी पारिस्थितिक तंत्र की भरपाई कर सकते हैं जो नदी किनारे सदियों से विकसित हुआ था? इसलिए यह सवाल केवल क्षतिपूर्ति का नहीं बल्कि पर्यावरणीय न्याय का भी बन जाता है।
आगे की राह: संतुलित विकास की रूपरेखा
ऊर्जा की बढ़ती मांग से इंकार नहीं किया जा सकता। उत्तर-पूर्व के जल संसाधन भारत की ऊर्जा सुरक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। किंतु विकास और संरक्षण को विरोधी ध्रुवों की तरह देखने के बजाय समेकित दृष्टि अपनाना आवश्यक है। नीतिगत स्तर पर निम्नलिखित कदम प्रासंगिक हो सकते हैं:
समेकित नदी बेसिन प्रबंधन को परियोजना स्वीकृति का अनिवार्य ढांचा बनाया जाए।
जलवायु जोखिम आकलन को डिजाइन और सुरक्षा मानकों में औपचारिक रूप से शामिल किया जाए।
संचयी प्रभाव अध्ययन को पारदर्शी और सार्वजनिक डोमेन में उपलब्ध कराया जाए।
वास्तविक समय डेटा साझेदारी और सामुदायिक भागीदारी सुनिश्चित की जाए।
बड़े बांधों के साथ-साथ विकेंद्रीकृत और छोटे जल-ऊर्जा विकल्पों पर भी समानांतर विचार किया जाए।
जब सुबनसिरी की धारा ब्रह्मपुत्र में मिलती है, तो वह अपने साथ केवल पानी नहीं लाती, वह उन फ़ैसलों का परिणाम भी साथ लाती है जो पहाड़ों या मैदानों में बैठकर लिए जाते हैं। नदी को मेगावाट में मापना आसान है, लेकिन उसका मूल्य जैव विविधता, आजीविका और सांस्कृतिक स्मृति में निहित है।
सवाल इसलिए केवल 1,720 मेगावाट का नहीं है। सवाल यह है कि क्या भारत अपनी नदियों के साथ ऐसा विकास मॉडल चुन सकता है जो ऊर्जा सुरक्षा के साथ पारिस्थितिक संतुलन और सामाजिक विश्वास, तीनों को साथ लेकर चले।
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