Gangua Nala Bhubaneswar
भुवनेश्‍वर शहर का कचरा ढोती गंगुआ नदी जो अब नाला बन गई हैफोटो - बृजेंद्र दुबे

गंगुआ नाला बनी भुवनेश्वर की 'गंधवती नदी' - बदबू, बीमारी, डर के साथ जी रहे लोग

भुवनेश्वर की गंगुआ नदी पूरे शहर के कचरे और सीवर का पानी ढोकर जब दया नदी से मिलती है तब संगम स्थल पर प्रदूषण का स्तर कई गुना बढ़ जाता है। लोग बदबूदार पानी, बीमारियों और डर के साथ जी रहे हैं। गंगुआ नदी का दूषित पानी जलीय जीवों और चि‍लीका झील के पारिस्थितिक तंत्र के लिए बड़ा खतरा बन गया है।
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भुवनेश्वर: सुबह के करीब 8 बजे थे, पुरी से आ रही ट्रेन भुवनेश्‍वर शहर में प्रवेश कर रही थी। तभी एक रेलवे पुल आया और साथ में आयी तेज़ दुर्गंध। यह दुर्गंध थी गंगुआ नदी के पानी की, जिसके दोनों छोर पर रह रहे लोग बदबूदार पानी और बीमारियों के डर के साथ वर्षों से जी रहे हैं। अब एक डर और भी है- कहीं नदी का पानी घर में आने वाले पाइप के जरिए घर तक न आ जाये और इंदौर जैसी घटना यहां भी घटित हो जाये। 

भुवनेश्‍वर शहर के बीच से निकलने वाली गंगुआ नदी की जिसका प्राचीन नाम गंधवती नदी है आज एक नाले का रूप ले चुकी है। सरकारी कागजों में भी इसे “नाला” घोषित कर दिया गया है। वैसे वास्ताविकता भी यही है- नदी के पास जाते ही आपको अनुभव हो जाएगा कि 11वीं सदी में जिस जलमार्ग का प्रयोग ब्रह्मेश्वर मंदिर के निर्माण में किया गया था, वह अब नदी नहीं रही।  

गंगुआ नदी शहर के पास स्थित चंदाका नामक वन क्षेत्र से निकलती है। इस क्षेत्र में इसका पानी निर्मल होता है, लेकिन जैसे-जैसे अलग-अलग धाराएं इसमें जुड़ती हैं, वैसे-वैसे इसका पानी काला पड़ने लगता है। शहर के अंदर प्रवेश करने के बाद इसमें केवल कचरा और काला पानी दिखाई देता है क्योंकि प्रति दिन 90 एम.एल.डी. (10 एम.एल.डी. = 1 करोड़ लीटर) सीवर का पानी और अपशिष्‍ट इस नदी में गिरते हैं। 

भुवनेश्‍वर शहर के अंदर से गुजरता गंगुआ नाला
भुवनेश्‍वर शहर के अंदर से गुजरता गंगुआ नालाफोटो- गूगल मैप

वन विभाग की रिपोर्ट के अनुसार गंगुआ नदी में 9 बड़े नालों का दूषित पानी मिलता है, जिसमें सबसे ज्यादा 28 एम.एल.डी. गंदा पानी घाटिकिया नाला से आता है। वहीं वाणीविहार नाले से करीब 16 एम.एल.डी. पानी रोज़ाना नदी में मिलता है। 

रिपोर्ट के अनुसार जो गंगुआ नदी में मिलने वाले पानी की बीओडी 73.44 t/d दर्ज हुई। भुवनेश्‍वर शहर से करीब 103 एम.एल.डी. गंदा पानी निकलता है जिसमें 90 एम.एल.डी. गंगुआ नदी में जाता है। 47.6 एम.एल.डी. केवल घरों से निकलने वाला अपशिष्‍ट होता है। वहीं 29.3 एम.एल.डी. में औद्योगिक अपशिष्‍ट और 30.35 एम.एल.डी. गंदा पानी अन्य स्रोतों से आता है। 

गंगुआ नदी के किनारे रहना: बदबू, डर और बीमारी के बीच ज़िंदगी

सुबह से शाम तक गंगुआ नदी के किनारे बसे इलाकों में एक ही शिकायत सुनाई देती है, तेज़ बदबू और बीमार पड़ने का डर। स्थानीय लोग कहते हैं कि गर्मी बढ़ते ही हालात और बिगड़ जाते हैं। नदी का पानी इतना गंदा है, कि इससे सिंचाई करने पर खेत में बोई सब्जियां बर्बाद हो जाती हैं, गाय-भैंसों को पिलाया तो बीमार पड़ जाती हैं। पानी का रंग इतना काला कि न तो यह नहाने के लायक और न ही कपड़े धोने के और तो और अन्य घरेलू कार्यों में भी इसका उपयोग नहीं किया जा सकता है। 

पानी की गुणवत्ता इतनी खराब की इसमें पायी जाने वाली मछलियां अक्सर मर जाती हैं। नदी में मछलियां केवल तभी तक दिखती हैं जब तक यह नदी वन क्षेत्र में हैं। शहर में आते ही मछलियां नहीं केवल कचरा मिलता है। दया नदी तक पहुंचते-पहुंचते नदी के पानी की गुणवत्ता इतनी खराब हो जाती है कि दया नदी में पायी जाने वाली मछलियों पर भी इसका प्रभाव पड़ता है।  

Gangua Nala
गंगुआ नदीफोटो - बृजेंद्र दुबे

लोगों को हो रहे किडनी और लीवर संबंधी रोग 

नदी किनारे रहने वाले कई परिवारों का कहना है कि पिछले कुछ वर्षों में पेट, त्वचा और किडनी से जुड़ी बीमारियाँ आम हो गई हैं। कुछ घरों में इलाज के खर्च ने पूरी आर्थिक हालत बिगाड़ दी है। दरअसल गंगुआ नदी का पानी दया नदी में मिलता है और दया नदी के किनारे बसे गॉंवों के लोग उसका पानी पीने व भोजन पकाने में इस्तेमाल करते हैं। 

दया सुरक्षा अभियान से जुड़े सामाजिक कार्यकर्ता शशिकांत प्रधान ने नदी के किनारे बसे लोगों के बारे में बात करते हुए बताया कि यहां किडनी और लीवर संबंधी रोग के तमाम मरीज हैं। दूषित पानी का असर लोगों के स्वास्थ्य पर भी गंभीर रूप से पड़ रहा है। किडनी और लीवर सिरोसिस का रोग, स्किन की बीमारियां यहां आम बात है। 

बीते वर्ष नईकुला पटना, नुआगांव, गड़सीगदा गांवों में कुल 6 लोगों की डायरिया से मौत हो गई। शशिकांत प्रधान का आरोप है गंगुआ नदी का दूषित पानी दया नदी में मिलता है, जिसकी वजह से दया नदी प्रदूषित हो रही है। इसके पानी को पीने से ही ये मौतें हुई हैं। 

अपने चाचा के साथ गुर्रई सेठी के बेटे बरूहन
अपने चाचा के साथ गुर्रई सेठी के बेटे बरूहन फोटो - बृजेंद्र दुबे

अपने चाचा के साथ गुर्रई सेठी के बेटे बरूहन

दरअसल जनवरी 2025 में दया नदी के दूषित पानी का प्रयोग करने से पुरी जिले के कनास ब्लॉक के नाइकुला पटना गांव में यह घटना हुई थी, जिसमें 55 वर्षीय गुर्रई सेठी और नुआगांव के 77 वर्षीय सरथा प्रधान की भी मौत हुई थी। 

सरथा प्रधान के बेटे रमेश प्रधान ने इस संबंध में मानवाधिकार आयोग में एक मुकदमा भी दर्ज कराया है जिसमें मुआवजे की मांग की गई है। रमेश ने बताया कि मुकदमे में हैजा दस्त की महामारी से हुई पिता के मौत का जिक्र है। उनका आरोप है दया नदी के दूषित पानी के उपयोग से ही पिता की मौत हुई है। 

वहीं गुर्रई सेठी के बेटे बरूहन सेठी ने बताया कि 18 जनवरी 2025 को दूषित पानी पीने की वजह उनकी मॉं गुर्रई सेठी की डायरिया से मौत हो गई। उन्‍होंने कहा, “हम लोगों को पीने के लिए स्वच्छ पानी नहीं मिलता है, इसलिए हम लोगों ने नदी का पानी इस्तेमाल किया। इसकी वजह से मॉं को डायरिया हो गया।” उन्होंने बताया कि उसी दौरान ब्लॉक के दो-तीन गॉंवों में लगभग सात लोगों की डायरिया से मौत हुई। 

Villagers at the bank of Daya River
दया नदी के दूषित पानी का उपयोग करते गॉंव के लोग फोटो - बृजेंद्र दुबे

बसुधा योजना: कागज़ों में पानी, ज़मीन पर कमी

सरकारी रिकॉर्ड में बसुधा योजना के तहत पानी की आपूर्ति दर्ज है, लेकिन ज़मीनी हालात इससे अलग दिखते हैं। कई मोहल्लों में लोगों को नियमित और पर्याप्त पानी नहीं मिल पा रहा। सेठी ने बताया कि गॉंव में बसुधा योजना के तहत पानी की सप्लाई आती है लेकिन गॉंव की आबादी को देखते हुए पर्याप्त नहीं है। पानी कम पड़ने पर लोग नदी का पानी भी उपयोग में लाने लगे, जिसकी वजह से डायरिया फैला। इस घटना के बाद सरकार ने टैंकर से पानी भेजना शुरू किया, लेकिन कुछ दिन बाद उसे भी बंद कर दिया गया। हलांकि अब अब फिर से सप्लाई का पानी मिल रहा है। 

ओडिशा सरकार की बसुधा योजना
बसुधा योजना सरकार द्वारा ग्रामीण इलाकों में सुरक्षित और निरंतर पीने के पानी की पाइपलाइन आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए शुरू की गई एक प्रमुख योजना है। इसका उद्देश्य है कि हर ग्रामीण घर तक सुरक्षित, स्वच्छ पानी पहुँचे, खासकर उन गांवों में जहाँ पीने के पानी की कमी बनी हुई है।‌ इसके तहत पीने और घरेलू उपयोग के लिए पानी का सीधा कनेक्शन घर तक दिया जाता है। यह योजना विशेष रूप से जल-संकट वाले और ग्रामीण इलाकों में लागू होती है, और इसका लक्ष्य है कि सभी ग्रामीण घर स्थायी रूप से सुरक्षित पानी से जुड़ें।

जब डायरिया से मौतों की घटना हुई तब प्रशासन में हड़कंप मच गया था। तत्कालीन जन स्वास्थ्य निदेशक डॉ. नीलकंठ मिश्रा ने इंडियन एक्सप्रेस को बताया कि गोपीनाथपुर और गडिसगोड़ा ग्राम चिकित्सालयों में डायरिया के तमाम मरीज आये। उनमें ज्यादातर की तबियत दया नदी का पानी पीने से खराब हुई थी। दरअसल नदी का पानी दया नदी के दूषित पानी के कारण गंदा हुआ है।

Daya River
नाइकुला पटना गांव में दया नदी का पानी उपयोग करते लोगफोटो - बृजेंद्र दुबे

गंगुआ नदी में गिरते नाले: सीवेज और औद्योगिक अपशिष्ट

शहर के कई नाले बिना किसी उपचार के सीधे गंगुआ नदी में गिरते हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि बारिश के दिनों में नदी का रंग और बदबू दोनों बदल जाते हैं। भुवनेश्‍वर शहर के 100 से अधिक नाले गंगुआ नदी में मिलते हैं। इनमें से अधिकांश नालों से अनुपचारित पानी कचरा समेत गंगुआ में आकर मिल जाता है। कुछ जगहों पर प्लास्टिक का कचरा रोकने के लिए जाल लगे हैं, लेकिन वो भी इतने कारगर नहीं हैं। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक केवल पॉंच जगहों पर ही पानी को उपचारित करने के लिए सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट लगे हैं। 

राज्य प्रदूषण नियंत्रण सेंट्रल बोर्ड ओडिशा के पर्यावरण विज्ञानी निरंजन मलिक के बताया कि गंगुआ नाला के पानी की 5 जगह से निगरानी की जाती है। इसमें हम बायलॉजिकल आक्सीजन डिमांड (BOD) और टोटल (TC) की जांच करते हैं। उन्‍होंने माना कि नदी के पानी में बी.ओ.डी. और टी.सी. दोनों ही रिपोर्ट में ज्यादा दर्ज हो रहा है।

पानी की गुणवत्ता जॉंच रिपोर्ट नगर निगम एवं जल शक्ति मंत्रालय को भेजी जाती है। अगस्त 2025 में 13 जगहों पर पानी की जॉंच की गई। 10 जगहों पर बी.ओ.डी. मानक से बहुत ज्यादा पाया गया। 5 सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट के बावजूद पानी में FC यानि फेकल कोलिफॉर्म अथवा फ्री क्लोरीन का स्तर भी बहुत अधिक पाया गया। इससे पता चलता है कि एसटीपी ज्यादा कारगर नहीं हैं। निरंजन मलिक ने बताया कि गंगुआ के ऊपर एक टास्क फोर्स भी बनाया गई है। जून 2027 तक इसकी सफाई को पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है।  

मछुआरों की टूटी आजीविका

कभी यहां लोग मछली पकड़कर गुज़ारा करते थे, वे आज दूसरी मज़दूरी ढूंढने को मजबूर हैं। उनका कहना है कि गंगुआ नदी के दूषित पानी में मछलियाँ या तो मर गई हैं या गायब हो चुकी हैं। इसी प्रभाव के कारण संगम क्षेत्र में मछलियों की संख्‍या निरंतर कम होती जा रही है। 

Daya River
संगम से ठीक पहले गंगुआ के पास उसके बारे में चर्चा करते हुए शशिकांत प्रधानफोटो - बृजेंद्र दुबे

सामाजिक कार्यकर्ता शशिकांत प्रधान पुरी जिले के रानीपाड़ा गांव, ब्लॉक कनास में रहते हैं। वे एक आरटीआई कार्यकर्ता भी हैं। उन्होंने बताया कि एक समय था जब मत्स्य पालन यहां लोगों की आजीविका का प्रमुख साधन था लेकिन धीरे-धीरे मत्स्य पालन भी खत्म हो रहा है। मत्स्य पालन से जुड़े ज्यादातर लोग पलायन कर केरल की तरफ चले गए। यहां सब्जी और धान की फसल उगाने वाले किसानों को नुकसान के सिवाय कुछ नहीं मिल रहा है।

पुजारियों की चिंता: नदी बनी नाला तो आस्था भी टूटी

नदी किनारे रहने वाले पुजारी बताते हैं कि कभी इस जलधारा से धार्मिक कर्मकांड जुड़े थे। अब बदबू और गंदगी के कारण नदी से सांस्कृतिक रिश्ता भी टूटता जा रहा है। इस संबंध में श्री लिंगराज महादेव मंदिर के सेवक शिव प्रसाद महापात्रा ने कहा, "ग्रंथों में लिंगराज मंदिर और गंधवती नदी के अटूट रिश्‍ते का वर्णन किया गया है। सरकार भले ही इसे नाला कहे लेकिन ग्रंथों में तो इसका नाम प्राचीन गंधवती नदी ही है। सच पूछिए तो वर्तमान समय में लोगों को इसका इतिहास पता ही नहीं है वे बस अपने घर के नाले को इस नदी में जोड़कर इसे नाला बनाने का काम कर रहे हैं।  

पौराणिक मान्यता है कि 12 वर्षों में एक बार भगवान लिंगराज गंधवती के तट पर स्थ‍ित बरुणेश्वर मंदिर में जाते थे। मंदिर में जाने से पूर्व वे गंधवती नदी में स्नान करते थे। एक समय था जब इसी मान्यता के चलते श्रद्धालु यहॉं स्नान करने आते थे। 
पुजारी शिवप्रसाद मोहापात्रा
पुजारी शिवप्रसाद मोहापात्राफोटो - बृजेंद्र दुबे

मंदिर के सेवक महापात्रा कहते हैं कि अब नदी का पानी स्नान करने के लायक नहीं बचा है, पानी इतना प्रदूषित है कि उसे सूंघने में परेशानी हो रही है। पानी दूषित हो गया है। जिसकी वजह से अब यह प्रथा बंद हो गई है। उन्‍होंने कहा, “पिछली जितनी भी सरकारें आयीं, सभी ने खोखले वादे किए। हम सरकार से गंगुआ नाले को फिर से गंधवती नदी बनाने की मांग कर रहे हैं।”

गंगुआ नदी को बचाने में जुटे सामाजिक कार्यकर्ता

शहर के कुछ सामाजिक कार्यकर्ता गंगुआ नदी को लेकर लगातार आवाज़ उठा रहे हैं। उनका कहना है कि अगर अभी कदम नहीं उठाए गए, तो हालात और गंभीर होंगे।

अपने अस्त‍ित्व की लड़ाई लड़ रही गंगुआ नदी को बचाने के लिए एक मुहिम शुरू की गई है। यह मुहिम सामाजिक कार्यकर्ता बिपिन मोहंती ने शुरू की है। नदी की दशा पर चर्चा करते हुए उन्‍होंने कहा,"गंगुआ नदी भुवनेश्वर की सबसे पुरानी और पवित्र नदियों में से एक है। यह एक समय ऐसा था क्षेत्र के चारों ओर बहकर मंदिरों, जंगलों, खेतों और बस्तियों को जीवन देती थी। लेकिन आज यह नदी एक नाला बन गई है।”

सामाजिक कार्यकर्ता बिपिन मोहंती
सामाजिक कार्यकर्ता बिपिन मोहंतीफोटो - बृजेंद्र दुबे

क्या कहती है वन विभाग की रिपोर्ट 

वन विभाग और अन्य एजेंसियों की रिपोर्ट में प्रदूषण और पारिस्थितिक क्षति की बात दर्ज है। लेकिन ज़मीन पर इन रिपोर्टों का असर सीमित दिखाई देता है। 2020-21 में गंगुआ नाला में प्रवाहित होने वाले दूषित पानी की जांच की गई थी। जांच के लिए भुवनेश्‍वर के मंचेश्‍वर, पालासुनी, गडा गोपीनाथ कॉलोनी, रसूलगढ़, झारपाड़ा, टंकपनी रोड और समंतरापुर से पानी के नमूने लिए गए। रिपोर्ट के अनुसार सभी नमूनों में बी.ओ.डी. का स्तर सामान्य से अधिक मिला। 

वन विभाग की रिपोर्ट में स्पष्‍ट रूप से लिखा है कि बी.ओ.डी. के अधिक होने का कारण अनुपचारित या अल्पउपचारित पानी के प्रवाह के कारण है। रिपोर्ट में यह भी लिखा है कि औद्योगिक इलाकों के अलावा जिन क्षेत्रों में घरों से निकलने वाले सीवर का डिस्चार्ज अधिक है, वहां बी.ओ.डी. सबसे ज्यादा पाया गया। 

सरकारी कागज़ों पर भी नदी से नाला बनीं गंधवती  

भुवनेश्वर की जीवन रेखा कही जाने वाली गंगुआ नदी अब एक प्रदूषित गंगुआ नाले में तब्दील हो चुकी है। पहले के सरकारी कागजों में गंगुआ को नदी का दर्जा प्राप्त था। लेकिन अब सरकारी दस्तावेज़ों में उसका जिक्र गंगुआ नाले के नाम से किया जाता है। 

नदी में शहर के नालों का मलबा, दुर्गंधयुक्त नालियों का कचरा, गंदा पानी, अपशिष्‍ट, कूड़े का ढेर फेंका जाता है। इस वक्त गंगुआ नदी अपने अस्तित्व से जूझ रही है। भुवनेश्वर का तेजी से शहरीकरण, नदी के दोनों ओर के क्षेत्रों में अतिक्रमण और औद्योगिक अपशिष्‍ट ने इसे एक जल निकासी मार्ग में बदल कर नाले का स्वरूप दे दिया गया है। 

सरकारी दस्तावेज़ों में गंधवती नदी को गंगुआ नाला दर्ज किया गया है। विशेषज्ञ मानते हैं कि नदी को नाला कहने से उसके संरक्षण की ज़िम्मेदारी भी कम हो जाती है। 

Jal Kund near Gauri Temple Bhubaneswar
गंगुआ नदी के तट पर स्‍थि‍त केदार गौरी मंदिर का दूषित जलकुंडफोटो - बृजेंद्र दुबे

 11वीं सदी की गंधवती: एक जल मार्ग, जो इतिहास था

इतिहासकार बताते हैं कि 11वीं सदी में इसी नदी के जलमार्ग से ब्रह्मेश्वर मंदिर के निर्माण में सामग्री लाई गई थी। जिस नदी ने कभी शहर को गढ़ा, वही आज अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है। उत्कल विश्‍वविद्यालय के शोधकर्ता डॉ. सदासिब प्रधान ने 2014 में ब्रह्मेश्‍वर मंदिर की वास्तुकला पर अपने शोध में गंगुआ नदी का जिक्र किया है। शोध के अनुसार कलिंग वास्तुकला पर आधारित इस मंदिर के निर्माण सन् 1060 में किया गया। इसमें तटीय क्षेत्रों में पाये जाने वाले खास तरह के बलुआ पत्थरों का इस्तेमाल किया गया। उस समय बड़े-बड़े पत्थरों को बैलगाड़‍ियों पर लाद कर निर्माण स्थल तक लाया जाता था। कच्चे मार्ग पर इस यात्रा में बहुत अधिक समय लगता था इसलिए गंगुआ नदी के जल मार्ग को चुना गया।  

पत्थरों को गंगुआ नदी में बड़ी नौकाओं पर रख कर लाया जाता और मंदिर से करीब 500 मीटर की दूरी पर तट पर उतार लिया जाता। नदी के जिस तट पर पत्थर उतारे गए, आज वहीं पर मेघेश्‍वर मंदिर बना हुआ है। मेघेश्‍वर के पास एक तालाब है जिसे ब्रह्मकुंड कहा जाता है और मंदिर के आसपास की बसाहट को ब्रह्मेश्वर पटाना कहते हैं। गंगुआ की संकरी धारा को पार करने पर सिसुपालगढ़ पहुँचा जा सकता है। शोध में बताया गया है कि एक समय यह गंगुआ नदी सिसुपालगढ़ की गढ़खाई के रूप में कार्य करती थी। 

गढ़खाई एक ओडिया शब्द है। प्राचीन मंदिरों और किलों के चारों ओर खाई खोद कर उसमें पानी भर दिया जाता था, ताकि इमारत को नुकसान पहुंचाने की नियत से आने वाले लोग या दुश्‍मन इमारत के करीब नहीं आ सकें। इसी खाई को गढ़खाई कहते हैं। ऐसी गढ़खाई जलदुर्गों में भी देखी जाती थी।  

चिलीका झील को दूषित कर रहा गंगुआ नदी का पानी 

गंगुआ नदी शहर के पास स्थित चंदाका नामक वन क्षेत्र से निकलती है। इसी जगह पर कलिंग का युद्ध लड़ा गया था। चांदका, दांपदा, खंडगिरि, भरतपुर और आसपास के गाँवों से 22 प्राकृतिक धाराएं मिलती हैं, तब जाकर गंगुआ नदी बनती है और आगे चलकर यह भुवनेश्‍वर शहर के अंदर से होते हुए अंततः दया नदी में मिल जाती है। दया नदी में मिलने से पहले यह नदी करीब 35 किलामीटर लंबा सफर तय करती है। 

दोनों नदियों का संगम भुवनेश्वर के पास, पीपील ब्लॉक के कंटी निजीगढ़ गांव में होता है। नदी तल (river bed) की औसत चौड़ाई करीब 30 मीटर है और इसका जलग्रह क्षेत्र करीब 75.6 वर्ग किमी है। गंगुआ नदी का पानी दया नदी में मिलने के बाद आगे जाकर चिलीका झील में पहुंचता है। सोचने वाली बात यह है कि भुवनेश्‍वर 10 बड़े सीवेज नाले और फैक्ट्रियों का पानी गंगुआ नदी में जाता है। इस दूषित पानी का अधिकांश हिस्सा अनुपचारित होता है जो आगे जाकर चिलीका झील को दूषित कर रहा है। 

चिलिका झील - रामसर आर्द्रभूमि स्थल
चि‍लीका झील ओडिशा में एक रामसर आर्द्रभूमि स्थल है, जहाँ मीठे पानी और खारे पानी का मिश्रण मिलता है। झील भारत की सबसे बड़ी खारे पानी (ब्रैकिश वॉटर) की झील है। यह झील अपनी जैव-विविधता, प्रवासी पक्षियों और पारंपरिक मछली पालन के लिए प्रसिद्ध है। साथ ही स्थानीय समुदायों की आजीविका के लिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण है।

टूट रहा गंगुआ नदी का प्राकृतिक जल चक्र  

यह नदी एक समय में भुवनेश्‍वर की जीवनरेखा थी। लेकिन तेज़ी से हो रहे शहरीकरण, अनियोजित विकास और प्रशासनिक लापरवाही के कारण यह नदी शहर के नाले में बदल चुकी है। नदी का नाला में बदल जाना ज्यादातर अनट्रीटेड सीवेज, औ‌द्योगिक कचरा और घरों से निकले वाले गंदे पानी की वजह से हुआ। 

बिपिन ने कहा, “अब सरकार भी इस पवित्र नदी को "नाला" मानती है।” उन्‍होंने बताया कि नदी किनारे अतिक्रमण, भुवनेश्वर के बढ़ते विस्तार और नदी के दोहन के कारण, जो धाराएँ कभी गंगुआ को जीवित रखने का कार्य करती थीं, अब वे धाराऍं भी नालों में बदल गई हैं या फिर सूख गई हैं, या फिर मिट्टी से पाट दी गई हैं। 

दया नदी जिसमें मिलता है गंगुआ नदी का दूषित पानी
दया नदी जिसमें मिलता है गंगुआ नदी का दूषित पानीफोटो - बृजेंद्र दुबे

इन धाराओं के टूटने से नदी का प्राकृतिक जलचक्र टूट चुका है। भुवनेश्वर शहर का लगभग 70% गंदा पानी बिना उपचार किए सीधे नदी में गिरता है, प्लास्टिक,घरेलू कचरा, धार्मिक सामग्री और निर्माण मलबा नदी को गंभीर रूप से प्रदूषित कर रहे हैं। उन्‍होंने बताया कि पानी की धाराएँ बंद होने और पानी का मार्ग रुकने से शहर में जलभराव बढ़ा है। पुराना भुवनेश्वर, लक्ष्मीसागर, सुन्दरपाड़ा, जगमोहन नगर क्षेत्रों में इसका असर दिखता है।

इस दिशा में सरकार के ऐक्शन की बात करें तो गंगुआ नदी के जीर्णोद्धार को लेकर सितंबर 2023 में अतिरिक्त मुख्‍य सचिव की अध्‍यक्षता में एक समीक्षा बैठक भी हुई। उसके बाद मुख्‍यमंत्री की अध्‍यक्षता में दिसंबर 2023 में एक और समीक्षा बैठक हुई। जल्द कार्य शुरू करने के दावे किए गए लेकिन फिलहाल जीर्णोद्धार का कार्य जमीन पर तो नहीं दिखाई दे रहा है। कहीं नदी के दोनों ओर अतिक्रमण आड़े आ रहा है तो कहीं स्थानीय लोग अढ़चनें डाल रहे हैं। 

गंगुआ नदी की कहानी सिर्फ एक जलधारा की नहीं, बल्कि प्रशासन, नीति और ज़मीनी हकीकत के बीच बढ़ती दूरी की कहानी है, जिसकी कीमत लोग अपनी सेहत और आजीविका से चुका रहे हैं। कुल मिलाकर यह नदी तब तक “काले पानी” की सज़ा भुगतती रहेगी, जब तक एक ठोस ऐक्शन प्लान ज़मीन पर साकार रूप नहीं ले लेगा। 

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