डूंगरपुर के ग्रमीणों की कोशिशों ने गुम हो चुकी मोरन नदी को इस तरह दी नई जिंदगी
कभी जीवनरेखा थी मोरन, फिर हो गई गायब
राजस्थान का डूंगरपुर जिला, जहां पहाड़, जंगल और आदिवासी संस्कृति प्रकृति के साथ घुली-मिली सी नज़र आती है। मोरन नदी कभी यहां केवल पानी की धारा नहीं थी, बल्कि खेती, पशुपालन और पीने के पानी का आधार थी। इस तरह यह स्थानीय जीवन की धुरी हुआ करती थी। पर समय के साथ हालात बदले। अतिक्रमण, कैचमेंट क्षेत्र में बस्तियों की बसावट, जंगलों की कटाई और जल संरक्षण पर ध्यान न दिए जाने के चलते धीरे-धीरे मोरन नदी सिकुड़ती चली गई। फिर, एक दौर ऐसा आया, जब यह नदी पूरी तरह सूख गई और लोग इसे “मरी हुई नदी” यानी डेड रिवर कहने लगे। अब सरकारी नक्शों और रिकॉर्ड में तो इसका नाम था, पर ज़मीन पर कोई बहाव नहीं रहा।
खडगदा गांव से उठी एक आवाज़
मोरन नदी के कई वर्षों तक 'गुमशुदा' रहने के बाद इसके पुनर्जीवन की कहानी शुरू हुई। यह काम सरकार की किसी संरक्षण योजना से नहीं, बल्कि डूंगरपुर के एक छोटे से गांव खडगदा से एक जन-अभियान के रूप में शुरू हुआ। कथावाचक और सामाजिक कार्यकर्ता कमलेश भाई शास्त्री ने जब गांव के बुज़ुर्गों से मोरन के पुराने बहाव, घाटों और जलस्रोतों की बातें सुनीं, तो उन्हें एहसास हुआ कि सदियों से बह रही यह नदी खुद ब खुद नहीं मरी है, बल्कि उसे बहने से रोक दिया गया है। इसी समझ ने उनके मन में एक संकल्प को जन्म दिया।
शास्त्री जी ने ठान लिया कि यदि नदी कभी यहां बहती थी, तो फिर से बह सकती है और हम इसकी धारा को वापस लाकर रहेंगे। उन्होंने इस कार्य के लिए खासतौर पर रामकथा का आयोजन कर 1.75 करोड़ रुपये का फंड जुटाया, जिससे नदी को पुनर्जीवित करने का काम शुरू किया गया। इस अभियान की शुरुआत 22 फरवरी 2025 को समुदाय के युवाओं के स्वैच्छिक कार्य के साथ की गई, जिसमें बुजुर्ग और महिलाएं भी शामिल हुईं। नदी के पुनर्जीवन से जुड़े कामों पर अबतक करीब 2.5 करोड़ रुपये खर्च किए जा चुके हैं।
जनजातीय स्मृति में ज़िंदा थी नदी
डूंगरपुर का यह इलाका भील जनजाति की बहुलता वाला क्षेत्र है। इसलिए नदी यहां केवल जलस्रोत नहीं, बल्कि सांस्कृति का एक अटूट हिस्सा होती है। नदी की घारा के सूख जाने पर भी स्थानीय बुज़ुर्गों की यादों में वह बह रही थी। उनको सबकुछ याद था कि किस मोड़ पर नदी चौड़ी होती थी, कहां से छोटी धाराएं इसमें मिलती थीं और किन स्थानों पर उन लोगों को साल भर पानी भरा मिलता था। बुजुर्गों के इसी जनजातीय ज्ञान को आधार बनाकर कमलेश भाई शास्त्री ने लोगों को समझाया कि नदी को पुनर्जीवित करना कोई असंभव काम नहीं है। ज़रूरत है, तो सिर्फ संकल्प, सामूहिक इच्छाशक्ति और परिश्रम करने की।
जागरूकता से आंदोलन तक
लोगों से अनौपचारिक बातचीत और चर्चाओं से शुरू हुआ यह प्रयास जल्द ही बैठकों और सभाओं के ज़रिये सामूहिक संवाद तक पहुंच गया। गांव की चौपालों में चर्चाओं का आयोजन कर लोगों को यह समझाया गया कि मोरन नदी के सूखने का मतलब सिर्फ पानी का खत्म होना नहीं, बल्कि खेती, रोज़गार और भविष्य पर संकट है। धीरे-धीरे यह बातें लोगों को समझ में आने लगीं और नदी को बचाने का संकल्प एक जन-अभियान व आंदोलन में बदल गया। ग्रामीणों ने तय किया कि वे नदी के पुराने बहाव के इलाकों को पहचानेंगे और उसे फिर से बहने का रास्ता व सांस लेने की जगह देंगे।
प्रशासन का सहयोग बना टर्निंग पॉइंट
जब ग्रामीणों की कोशिशें ज़मीन पर दिखने लगीं, तब स्थानीय प्रशासन भी इस पहल से जुड़ गया। डूंगरपुर जिला प्रशासन ने इसे केवल एक गांव का प्रयोग मानकर नहीं, बल्कि जल संरक्षण का एक सार्वजनिक प्रयास मानकर समर्थन दिया। गांववासियों की इस कोशिश के बाद राज्य सरकार ने डीपीआर बनाने की घोषणा की। इससे इस अभियान को लोगों के श्रमदान के साथ ही तकनीकी मार्गदर्शन, आर्थिक संसाधन और मनरेगा जैसे कार्यक्रमों की छत्रछाया मिल गई। इससे ग्रामीणों का हौसला और बढ़ा और वो दुगने-चौगुने उत्साह के साथ मोरन नदी की विलुप्त धाराओं को वापस लाने के लिए काम करने लगे।
क्या-क्या किया गया मोरन को ज़िंदा करने के लिए
मोरन नदी को पुनर्जीवित करने के लिए कोई जटिल या हाई-टेक तकनीकें नहीं अपनाई गईं। यहां मुख्य रूप से स्थानीय समुदाय के पारंपरिक ज्ञान, सामूहिक श्रम और जल संरक्षण की पारंपरिक विधियों से ही काम लिया गया। इसके तहत मोटे तौर पर यह काम किए गए-
सबसे पहले नदी के पुराने बहाव मार्ग से अतिक्रमण हटाया गया और गंदगी को साफ़ किया गया।
जेसीबी और पोकलैंड मशीनों से मोरन नदी के मार्ग की खुदाई कर को 500 फीट चौड़ा और 25 फीट गहरा किया गया।
पानी जमा करने के लिए छोटे-छोटे चेक डैम और मिट्टी के स्टॉप डैम बनाए गए।
जल भंडारण के लिए नदी के कैचमेंट एरिया में कंटूर ट्रेंच और मेडबंदी की गई।
वर्षा जल को रोकने के लिए नालों के किनारे मेड़ या तटबंधनुमा अस्थायी संरचनाएं बनाई गईं। इनके ज़रिये नदी में करीब 40 करोड़ लीटर पानी सहेजने का काम किया गया।
इसके अलावा यहां 65x45 फीट का एक 80 फीट गहरा कुआं बनाया गया, जिसकी जल भंडारण क्षमता 55 लाख लीटर है। यह कुआं सार्वजनिक इस्तेमाल के लिए उपलब्ध है।
इन उपायों ने शुरुआती वर्षों में बारिश के पानी को यूं ही बह जाने से रोक कर धीरे-धीरे जमीन में उतारने दिया, जिससे भूजल स्तर में सुधार आया और नदी को पुनर्जीवित करने का एक सतत आधार मिला। भूजल का स्तर सुधरने के बाद बारिश का पानी ज़मीन की सतह पर फिर से नदी का रूप लेकर बहने लगा।
बारिशें, पहली धारा और मोरन का पुनर्जन्म
कई वर्ष तक चले इन प्रयासों के बाद धीरे-धीरे बारिश के पानी ने ही मोरन नदी को फिर से साक्षात बहते हुए दिखाई देने का सुखद दृश्य प्रस्तुत किया, जो यहां के लोगों के लिए किसी उत्सव से कम नहीं था। सूखी पड़ी नदी की तलहटी में बहती पानी की पतली धारा इस बात का संकेत थी कि लोगों के सामूहिक प्रसास से खुश होकर रूठी हुई मोरन नदी एक बार फिर उनके चीज लौट आई है। अगले मानसून में यह धारा और मजबूत हुई। जहां कभी केवल रेत उड़ती थी, वहां अब पानी की धाराएं हिलोरें मारने लगीं। लोगों ने इसे “मोरन का पुनर्जन्म” कहा।
खेती और रोज़गार में लौटी रौनक
मोरन नदी के बहाव का सीधा असर गांव की खेती पर पड़ा। जिन खेतों में पानी के अभाव में बमुश्किल केवल एक ही फसल हो पा रही थी, वहां नदी के पानी की बदौलत अब तकरीबन साल भर मिट्टी में खेती लायक नमी बनी रहने लगी। इसे देख किसानों ने दूसरी फसल की हिम्मत की।
नदी के वापस लौटने से किसानों के पशुओं के लिए भी पानी की उपलब्धता बढ़ी। साथ ही जनजातीय समाज की महिलाओं का जीवन भी आसान हुआ, क्योंकि उनको अब पीने के पानी के लिए घर से बहुत दूर नहीं जाना पड़ रहा था। इस तरह नदी की धाराओं के लौटने का यह बदलाव सिर्फ भौगोलिक नहीं, बल्कि आर्थिक और सामाजिक स्तर पर भी देखने को मिला।
नदी के साथ लौटी जैव विविधता और भरोसा
पानी लौटते ही मोरन के किनारे जीवन भी लौटने लगा। छोटे पक्षी, कीड़े-मकोड़े और मेंढक फिर से दिखाई देने लगे। मछलियां तैरती दिखने लगीं और कुछ जगहों पर मछलियों के अंडे भी दिखे, जो इस बात का संकेत थे कि नदी का इकोसिस्टम धीरे-धीरे खुद को ठीक कर रहा है।
इस तरह स्थानीय लोगों के प्रयासों से सिर्फ एक नदी नहीं, बल्कि उसका पूरा इको सिस्टम और पूरा पर्यावरणीय चक्र वापस लौट आया। इस पूरी प्रक्रिया ने ग्रामीणों को यह विश्वास दिलाया कि पर्यावरण संरक्षण केवल सेमिनारों और अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों में बताया जाने वाला एक ग्लोबल एजेंडा नहीं, बल्कि उनके अपने हित की बात है।
इसका फ़ायदा सीधे तौर पर उन्हें खुद भी मिलना है। इसलिए मोरन नदी अब सिर्फ पानी की धारा नहीं, बल्कि सामूहिक प्रयास और भरोसे की प्रतीक बन गई है। गांव के लोग खुद इसकी निगरानी और देखभाल करते हैं, ताकि अतिक्रमण या लापरवाही दोबारा इस नदी के लिए ख़तरा न बनने पाए।
मोरन जैसे कुछ और उदाहरण
मोरन नदी की कहानी अकेली नहीं है। देश के अलग-अलग हिस्सों में स्थानीय प्रयासों से नदियों और जलस्रोतों को नई ज़िंदगी मिली है। इसके कुछ प्रमुख उदाहरण इस प्रकार हैं-
अरवरी नदी, राजस्थान
राजस्थान के अलवर जिले की अरवरी नदी कभी पूरी तरह सूख चुकी थी। 1980 के दशक में तरुण भारत संघ और स्थानीय ग्रामीणों ने मिलकर पारंपरिक जोहड़, नाड़ी और छोटे चेक डैम बनाए। इन संरचनाओं का उद्देश्य नदी को बांधना नहीं, बल्कि बारिश के पानी को रोककर जमीन में उतारना था। इसका असर कुछ ही वर्षों में दिखने लगा। भूजल स्तर बढ़ा और अरवरी नदी दोबारा बहने लगी। आज अरवरी को देश की उन दुर्लभ नदियों में गिना जाता है, जिन्हें समुदाय ने अपने प्रयासों से बारहमासी बनाया है। इस प्रक्रिया में “अरवरी संसद” जैसी स्थानीय जल पंचायतों ने नदी प्रबंधन में अहम भूमिका निभाई।
पैनसेमल क्षेत्र, मध्य प्रदेश
मध्य प्रदेश के बड़वानी जिले का पैनसेमल इलाका आदिवासी बहुल और पहाड़ी क्षेत्र है, जहां कभी छोटी नदियां और नालियां साल भर बहती थीं। जंगलों की कटाई और अनियंत्रित खेती के चलते ये जलधाराएं सूखने लगीं। स्थानीय आदिवासी समुदायों ने गैर-सरकारी संगठनों की मदद से छोटे जल संरक्षण ढांचे जैसे स्टॉप डैम, मेड़बंध और कंटूर ट्रेंच बनाए। इन प्रयासों से बारिश का पानी तेजी से बहकर जाने के बजाय जमीन में समाने लगा। नतीजा यह हुआ कि सूखी नालियां दोबारा बहने लगीं और इलाके में पीने के पानी व खेती की स्थिति में सुधार हुआ।
साबरमती की सहायक नदियां, गुजरात
गुजरात में साबरमती नदी की कई छोटी सहायक नदियां और धाराएं तेजी से खत्म हो रही थीं। इन नदियों के कैचमेंट क्षेत्रों में अतिक्रमण, खनन और जल निकासी की अनदेखी ने हालात बिगाड़ दिए थे। स्थानीय समुदायों और कुछ स्वयंसेवी संगठनों ने मिलकर कैचमेंट सुधार, वृक्षारोपण और पारंपरिक जल संरचनाओं के पुनर्निर्माण का काम शुरू किया। इन प्रयासों से सहायक नदियों में मौसमी बहाव लौटने लगा, जिससे साबरमती के मुख्य प्रवाह को भी अप्रत्यक्ष रूप से सहारा मिला। यह उदाहरण दिखाता है कि मुख्य नदी को बचाने के लिए उसकी छोटी धाराओं को ज़िंदा रखना कितना ज़रूरी है।
खाम नदी, औरंगाबाद , महाराष्ट्र
महाराष्ट्र के औरंगाबाद (अब छत्रपति संभाजीनगर) शहर से गुजरने वाली खाम नदी कभी शहर की पहचान हुआ करती थी, लेकिन शहरीकरण और सीवेज के दबाव ने इसे नाले में बदल दिया। लंबे समय तक खाम को “मरी हुई नदी” माना जाता रहा। हाल के वर्षों में स्थानीय प्रशासन, सामाजिक संगठनों और नागरिक समूहों ने मिलकर खाम नदी के पुनर्जीवन की पहल की। नदी से अतिक्रमण हटाने, सीवेज ट्रीटमेंट और किनारों पर हरित पट्टी विकसित करने जैसे कदम उठाए गए। हालांकि, खाम की पूरी बहाली अभी बाकी है, लेकिन कई हिस्सों में पानी का ठहराव और प्राकृतिक बहाव लौटना यह संकेत देता है कि शहरी नदियों को भी इच्छाशक्ति और सही योजना से दोबारा ज़िंदा किया जा सकता है।
नीति से पहले नीयत की ज़रूरत
इन सभी उदाहरणों में एक समानता देखने को मिलती है कि गायब हो चुकी नदियों को फिर से जिंदा करने के लिए सरकार से पहले समाज आगे आया। मोरन नदी का पुनर्जीवन यह भी दिखाता है कि जल संकट का समाधान सिर्फ बड़े बांधों या महंगी योजनाओं में नहीं है। स्थानीय भूगोल को समझकर, छोटे और टिकाऊ हस्तक्षेप ज़्यादा असरदार हो सकते हैं। प्रशासन का सहयोग तब सार्थक होता है, जब समाज खुद पहल करे। साथ ही मोरन नदी की वापसी हमें यह भी सिखाती है कि नदियां खुद नहीं मरती हैं, बल्कि हम उन्हें मार देते हैं। इसलिए हम अगर चाहें तो उन्हें फिर जिंदा भी कर सकते हैं। इसके अलावा यह कहानी बताती है कि जल संरक्षण कोई एक दिन का अभियान नहीं, बल्कि निरंतर निभाई जाने वाली एक सामूहिक जिम्मेदारी है। एक छोटा सा गांव अगर अपनी सूखी नदी लौटा सकता है, तो देश के दूसरे हिस्सों में मर चुकी नदियों को वापस लाना मुमकिन है। ज़रूरत है तो बस एक ऐसे कदम की, जो मोरन नदी के किनारे वहां के लोगों ने उठाया गया था।

