मिर्ज़ापुर: पाबंदी के बावजूद गंगा किनारे अवैध खनन जारी, दुर्लभ कछुओं के प्रजनन स्थल पर गहराया खतरा
उत्तर प्रदेश के मिर्ज़ापुर जनपद में गंगा नदी के किनारे एक महत्वपूर्ण कछुआ संरक्षित क्षेत्र है, जिसे वाराणसी से स्थानांतरित करके प्रयागराज-मिर्ज़ापुर-भदोही क्षेत्र में गंगा नदी के 30 किमी के दायरे में बनाया गया है। यह क्षेत्र कछुओं की दुर्लभ प्रजातियों का निवास स्थान है, जिसे मिर्ज़ापुर कछुआ अभयारण्य के नाम से जाना जाता है। भारत में पायी जाने वाली कछुओं की 28 में से 15 प्रजातियां इस क्षेत्र में देखी जा सकती हैं, लेकिन सख्त निगरानी में कोताही के कारण इस क्षेत्र में रेत खनन बढ़ रहा है, जिसकी वजह से इन कछुओं का प्रजनन स्थल खतरे में है।
कछुआ अभयारणय में रहने वाले हजारों कछुए किस तरह अपनी जिंदगी से लड़ रहे हैं, और कैसे खनन के चलते इनका अस्तित्व खतरे में है, इसके जवाब इस ग्राउंड रिपोर्ट में मिलेंगे।
मिर्ज़ापुर का यह कछुआ अभयारण्य केवल कछुओं का घर नहीं है, बल्कि यह इलाका दुर्लभ घड़ियालों और डॉल्फिन मछलियों का भी है।
कछुओं की 15 प्रजातियां केवल यूपी में
टी.एस.ए. फाउंडेशन इंडिया के बायोलॉजिस्ट अरुणिमा सिंह और डॉ. शैलेंद्र सिंह द्वारा किए गए एक अध्ययन के अनुसार भारत में पायी जाने वाली कछुओं की 28 प्रजातियों में से 15 उत्तर प्रदेश में पायी जाती हैं। ये कछुए आम तौर पर यमुना, चंबल, गंगा, गोमती, घाघरा और गंडक नदी में पाये जाते हैं। इसके अलावा कुछ बड़े तालाबों और आर्द्रभूमियों में भी फ्रेश वॉटर कछुए पाए जाते हैं। 15 में से 10 प्रजातियां इंटरनेशनल यूनियन फॉर कंज़र्वेशन ऑफ नेचर (IUCN) की 'संकटग्रस्त' (Threatened) श्रेणियों में शामिल हैं। इस तरह जैव विविधता की दृष्टि से यह क्षेत्र बेहद महत्वपूर्ण है, लेकिन अवैध खनन के चलते यहां के कछुओं की विशेष प्रजाति अब खतरे में है।
अनुमान के मुताबिक इस क्षेत्र में करीब 5 से 10 हजार कछुए हो सकते हैं। वन विभाग ने फिलहाल कछुओं की आबादी के बारे में कोई डाटा जारी नहीं किया है। कछुओं की संख्या घटने का एक करण तस्करी भी है। 2023 की एक रिपोर्ट के अनुसार साल में करीब 6 हजार कछुए तस्करों के पास से बरामद हुए। वन विभा ने उन्हें वापस अभ्यारण्य में छोड़ दिया। हालांकि समय-समय पर कछुओं को नदी में छोड़ने की प्रक्रिया चलती रहती है।
गंगा किनारे कहां और कैसे फैला है मिर्ज़ापुर कछुआ अभयारण्य?
मिर्ज़ापुर का कछुआ अभयारण्य प्रयागराज में सिरसा के कोठारी गॉंव से शुरू होता है और भदोही के बारीपुर उपरहार गॉंव पर इसकी सीमा समाप्त होती है। यह पूरा क्षेत्र कछुआ अभयारण्य के दायरे में आता है। पहले यह कछुआ अभयारण्य वाराणसी में था, जो तीन वर्ष पूर्व डिनोटिफाई हुआ।
मिर्ज़ापुर में इस अभयारण्य को स्थापित करने की प्रक्रिया को योजनाबद्ध तरीके से सभी नियमों के दायरे में स्थापित किया जा सके इसके लिए शासन की ओर से प्रयागराज के जिलाधिकारी को नोडल अधिकारी बनाया गया। भदोही व मीरजापुर के जिलाधिकारी सदस्य सचिव तथा जिला वन अधिकारी (डीएफओ) सचिव बनाए गए। यह अभयारण्य प्रयागराज में लगभग 18 किमी और मीरजापुर व भदोही में छह-छह किमी के दायरे में फैला है।
मिर्ज़ापुर, सोनभद्र और चंदौली की सीमा पर स्थित है कछुआ अभयारण्य
यूपी मैप- इंडिया इंडिया, अभ्यारण्य मैप - इंडिया सैंड वॉच के सौजन्य से
वाराणसी से मिर्ज़ापुर क्यों स्थानांतरित किया गया कछुआ अभयारण्य?
भारतीय वन्यजीव संस्थान की एक रिपोर्ट (वर्ष 2016 में प्रकाशित) के अनुसार 1987 से 1992 के बीच वाराणसी में गंगा किनारे स्थित कछुआ अभयारण्य में 28,920 कछुए नदी में छोड़े गए। उसके बाद 2005-2006 के बीच 1549 कछुए और इसी प्रकार हर साल 1 से 2 हजार कछुए गंगा नदी में छोड़े जाते रहे। लेकिन फिर अचानक इस अभयारण्य को मिर्ज़ापुर शिफ्ट करने का फैसला लिया गया। दरअसल यह फैसला इसलिए लिया गया क्योंकि वाराणसी में तेजी से हुए विकास और यहां से निकलने वाले राष्ट्रीय जल मार्ग पर कार्गो की आवाजाही बढ़ गई। साथ ही काशी विश्वनाथ कॉरिडॉर बनने के बाद यहां मानवीय गतिविधियां बढ़ गईं, जिसका प्रभाव गंगा नदी के ईकोसिस्टम पर पड़ने लगा जो कछुओं के लिए अनुकूल हुआ करता था।
इस क्षेत्र से जब बड़े-बड़े कार्गो निकलते थे तब 150 डेसीबेल से अधिक की तरंगे उत्पन्न होतीं, जो कछुओं के लिए असहनीय थीं, धीरे-धीरे कछुओं ने यह जगह छोड़नी शुरू कर दी। सरकार ने इस पर ऐक्शन लिया और गार्गो की अधिकतम गति 5 किमी प्रति घंटा कर दी ताकि तरंगों की फ्रीक्वेंसी कम हो, लेकिन फिर भी कछुओं के लिए यह वातावरण अनुकूल नहीं रहा। यही कारण है कि सरकार ने कछुआ अभयारण्य को यहां से स्थानांतरित करने का फैसला लिया। वैज्ञानिकों के अनुसार जब कार्गो गुज़रता है तब पानी में तरंगों की गति हवा की तुलना में 10 गुनी अधिक होती है, जोकि कछुओं के लिए बर्दाश्त के बाहर हो जाती है।
मिर्ज़ापुर अभयारण्य में पाई जाने वाली दुर्लभ कछुआ प्रजातियां
भारत में कछुओं की 29 प्रजातियां पाई जाती हैं। उनमें से निम्न प्रजातियां गंगा नदी में ही मिलती हैं।
गंगा सॉफ्टशेल कछुआ (Ganges Softshell Turtle)
इंडियन फ्लैपशेल कछुआ (Indian Flapshell Turtle)
नॉर्थ इंडियन सॉफ्टशेल कछुआ (North Indian Softshell Turtle)
इंडियन रूफ्ड टर्टल (Indian Roofed Turtle)
रेड क्राउन रूफ्ड टर्टल (Red-crowned Roofed Turtle)
थ्री-स्ट्राइप्ड रूफ्ड टर्टल (Three-striped Roofed Turtle)
ब्राउन रूफ्ड टर्टल (Brown Roofed Turtle)
इंडियन टेंट टर्टल (Indian Tent Turtle)
ब्लैक सॉफ्टशेल कछुआ (Black Softshell Turtle)
असम रूफ्ड टर्टल (Assam Roofed Turtle)
इस कछुआ अभयारण्य में कछुओं की 6 प्रजातियां पायी जाती हैं। कछुआ की आबादी को आंकड़ों में दर्ज करने के लिए वन विभाग द्वारा एक सर्वे किया जा रहा है। सर्वे पूरा होने के बाद केवल कछुओं ही नहीं बल्कि यहां पायी जाने वाली डॉल्फिन मछलियों की संख्या भी पता चल जाएगी। सर्वे का पहला राउंड हो चुका है दूसरा राउंड फरवरी 2026 में शुरू होगा।
अरविंद यादव, प्रभागीय वन अधकारी, प्रयागराज
फ्रेश वॉटर कछुओं के लिए क्यों अहम है यह नम इलाका
गंगा की सफाई में कछुओं की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। इसलिए नमामि गंगे जैसे कार्यक्रमों में कछुआ संरक्षण को नदी की सेहत से जोड़ा गया है। कछुआ अभयारण्य से जैव विविधता बढ़ेगी और गंगा नदी का जल निर्मल होगा। इसी उद्देश्य से कछुआ वन्य जीव विहार के लिए गंगा नदी के दोनों ओर 30 किलोमीटर की लंबाई तक के तटों और उनकी सीमा से 10 किलोमीटर की परिधि तक के क्षेत्र को ईको सेंसिटिव जोन घोषित किया गया।
यही कारण है कि इस क्षेत्र पर खनन पर प्रतिबंध लगाया गया था। लेकिन खनन माफियाओं की मनमानी यहां के कछुओं के लिए खतरा बनती जा रही है। शोधकर्ताओं के अनुसार कछुए अंडे देने के लिए रेत में आते हैं और घंटों तक खुले आसमान में पड़े रहते हैं। इसी बीच मादा कछुए अंडे देती हैं। लेकिन रेत खनन की वजह से उनका ईकोसिस्टम बिगड़ जाता है और वे अंडे नहीं दे पातीं। यही कारण है कि जहां-जहां खनन की शिकायतें आयीं, वहां-वहां कछुओं की संख्या में गिरावट दर्ज हुई। बीते 30 वर्षों में 40 हजार से अधिक कछुए नदी में डाले गए हैं, फिर भी इनकी आबादी में गिरावट दर्ज हो रही है। यह संकेत है कि कछुओं को प्रजनन के लिए अनुकूल स्थान नहीं मिल पा रहा है।
मिर्ज़ापुर में गंगा नदी के किनारे कछुआ अभयारण्य क्षेत्र
फोटो - बृजेंद्र दुबे
वाइल्ड लाइफ कंज़रवेशन ट्रस्ट के प्रोग्राम लीड एवं जीवविज्ञानी तरुण नायर ने कहा, “मिर्ज़ापुर इलाके में खनन के क्या प्रभाव पड़ रहे हैं, उसके बारे में विशेष जानकारी नहीं है, लेकिन अगर कछुओं के प्राकृतिक वास की बात करें तो आम तौर पर, रेत खनन से उनके घोंसलों को नुकसान होता है, और प्रजनन स्थलों के खत्म होने और खराब होने से कछुओं के घोंसले बनाने पर असर पड़ता है। कई ताज़े पानी के कछुए घोंसला बनाने के लिए खास तौर पर रेत के टीलों और नदी के किनारे की खुली रेतीली जगहों पर निर्भर रहते हैं। ये रेत के टीले सही सब्सट्रेट (आधार), थर्मल प्रोफाइल (अंडों के अनुकूल गर्माहट), नमी, पोरसिटी (छिद्रता) और सामान्य पानी के लेवल से ऊपर ऊंचाई देते हैं, जहां मादा कछुए घोंसले खोदकर अंडे दे सकती हैं। ज़्यादा रेत खनन से ये रेत के टीले नष्ट हो जाते हैं या नीचे हो जाते हैं, जिससे घोंसला बनाने के लिए सही जगहों की कमी हो जाती है। ऐसे में कछुओं को ऐसी जगहों पर घोंसला बनाने के लिए मजबूर होना पड़ता है, जो बाढ़ या शिकार का ज़्यादा खतरा होता है।"
प्रतिबंध के बावजूद गंगा तट पर सक्रिय रेत खनन माफिया
मिर्ज़ापुर जनपद के सदर तहसील के 14 गांवों की सीमा से लगे क्षेत्रों में रेत खनन पूरी तरह प्रतिबंधित है। अवैध रेत खनन इस अभयारण्य के लिए एक बड़ी चुनौती है, जिसके खिलाफ वन विभाग कार्रवाई कर रहा है, लेकिन माफिया फिर भी सक्रिय रहते हैं। स्थानीय लोगों के अनुसार कछुआ अभयारण्य क्षेत्र के दायरे में आने वाली जगह पर प्रतिबंध है और पुलिस की निगरानी में है इसके बावजूद यहां पर चोरी-छिपे खनन होता रहता है।
खनन के बाद इस तरह के ढेर लगा कर छोड़ देते हैं लोग, मौका मिलते ही वाहनों से होती है सप्लाई
फोटो - बृजेंद्र दुबे
सदर तहसील के जिगना थाना क्षेत्र के गोगांव गांव के रहने वाले किसान बराती लाल ने बताया कि यहां पर कुछ लोग सुबह-सुबह नाव के जरिए गंगा नदी के बीच में रेत निकालने आ जाते हैं। जब वन विभाग और खनन विभाग के अधिकारी सख्ती करते है, तो कुछ दिन के लिए ये लोग गायब हो जाते हैं, लेकिन थोड़ी सी ढील पाते है, फिर से रेत खनन शुरू हो जाता है।
बराती लाल ने आगे बताया कि ये लोग कछुआ अभयारण्य की सीमा के अंदर घुस कर नाव पर रेत लादकर लाते हैं और दूरी पर इकट्ठा करते है, फिर ट्रैक्टर के माध्यम से बाजार ले जाकर बेच देते हैं। यह जगह प्रतिबंधित होने के बावजूद आये दिन खुदाई होती रहती है। ऐसे में यहां के कछुए कहां रह रहे होंगे पता नहीं। उन्होंने बताया कि गोगॉंव गॉंव के तट पर गंगा नदी में कछुओं के साथ मछलियां भी रहती हैं, हालांकि कभी-कभी घड़ियाल भी दिख जाते हैं।
नक्शे पर छुआ अभयारण्य क्षेत्र
नक्शा - इंडिया सैंड वॉच के सौजन्य से, जिसे रिया लोपेज़ ने डिज़ाइन किया है
गांवों की आजीविका और खनन पर निर्भरता
सदर तहसील के जिगना थाना क्षेत्र के गौरा गांव के रहने वाले व्यवसायी रूपेश कुमार 40 ने कछुआ सेंक्चुरी के बारे में बात करते हुए कहा, "रेत खनन गंगा के किनारे बसे लोग अपनी आजीविका चलाने के लिए करते आ रहे हैं। यह इलाका अब कछुआ सेंचुरी घोषित है, लेकिन पीढ़ियों से यहां के लोग नाव के माध्यम से गंगा से रेत निकालने का कारोबार चलाते आ रहा हैं। सच पूछिए तो क्षेत्र को प्रतिबंधित किए जाने के बाद यहां के लोगों को कोई नया काम नहीं मिला इसलिए अभी भी चोरी छिपे रेत निकाल कर ये अपना घर चला रहे हैं।”
रूपेश कुमार ने आगे बताया कि यहां की रेत लोगो की आजीविका का साधन है। यहां गंगा के किनारे के ज्यादातर लोग खनन और वाहन चलाकर अपना घर चलाते हैं। विभाग के लोग छापेमारी करते हैं तो कुछ दिन काम रुक जाता है। जब तक इन्हें आजीविका का कोई और साधन नहीं मिल जाता तब तक रेत खनन का काम पूरी तरह बंद नहीं होने वाला।
बाइक से मछली व अन्य जलीय जीव पकड़ने आते हैं लोग
फोटो - प्रकाश सिंह टिकैत
रेत खनन में लिप्त लोगों पर एफआईआर दर्ज
19 जून 2025 को अनिल कुमार यादव क्षेत्रीय वन अधिकारी मेजा रेंज प्रयागराज की तहरीर पर मिर्ज़ापुर के जिगना थाना में रेत के अवैध खनन को लेकर 15 लोगों के खिलाफ वन्य जीव संरक्षण और सार्वजनिक संपत्ति नुकसान निवारण अधिनियम के तहत एफआईआर दर्ज हुई। रिपोर्ट के अनुसार कछुआ अभ्यारण्य क्षेत्र में अवैध रेत खनन करने से कछुआ के प्राकृतवास को क्षति पहुंचाने और प्रतिबंधित संकट ग्रस्त कछुआ उनके बच्चों, अंडों को नष्ट करने का प्रयास करने का आरोप लगा।
इसके अलावा 09 मार्च 2025 और 13 अप्रैल 2025 को भी दो अलग-अलग मामले दर्ज हुए। पहले मामले में दीपक कुमार राजभर खनिज मुहर्रिर की तहरीर के आधार पर 45 लोगों के खिलाफ मामला दर्ज हुआ, जबकि दूसरे में 10 नामजद व एक दर्जन अज्ञात नाविकों पर सार्वजनिक संपत्ति नुकसान निवारण अधिनियम के तहत एफआईआर दर्ज हुई।
बाइक से मछली व अन्य जलीय जीव पकड़ने आते हैं लोग
फोटो - प्रकाश सिंह टिकैत
एन.जी.टी. ने लगायाी है बालू खनन पर रोक
गंगा नदी में भौगोलिक, जियोलजिकल, वनीय, क्षति को रोकने और यहां की जैव विविधता को बनाये रखने के उद्देश्य से नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल एनजीटी ने इसे प्रतिबंधित क्षेत्र घोषित किया और यहां किसी भी प्रकार के बालू खनन पर रोक लगा दी है। प्रतिबंध के बावजूद गोगॉंव में बालू से लदी बड़ी-बड़ी नावें पायी जाती हैं। 9 मार्च 2025 को उप जिलाधिकारी गुलाब चंद और खान अधिकारी जीतेन्द्र सिंह के नेतृत्व में छापेमारी के दौरान गंगा नदी से लगे हुए खेतों में रेत से भरे ट्रक, जेसीबी और हाइव जब्त किये गए।
नदी किनारे ट्रैक्टर व ट्रक के टायरों के निशान सबूत हैं यहां होने वाले खनन के
फोटो - बृजेंद्र दुबे
क्या कहते हैं वन अधिकारी?
अरविंद यादव प्रभागीय वन अधकारी प्रयागराज ने बातचीत में कहा कि,"कछुओ की संख्या घटने या बढ़ने के लिए नहीं, बल्कि उनकी सुरक्षा के लिए हम अवैध खनन पर नज़र रखते हैं। चूंकि रेत उनका प्रजनन स्थल है और कछुओ के रहने की जो जगह है उस पर कोई अवैध शिकार नहीं हो उसके लिए क्षेत्र की निगरानी की जाती है। कछुए अपना अंडा रेत में देते हैं इसलिए हमारा प्रयास रहता है कि उन्हें अनुकूल पारिस्थितिक मिल पाये।”
गंगा नदी के तट पर खनन पर पूछे गए सवाल पर वन अधिकारी ने कहा कि इस बात पर वे पूरी तरह आश्वस्त हैं कि प्रयागराज के तरफ गंगा में खनन नहीं होता है। उन्होंने कहा कि मिर्ज़ापुर की तरफ खनन की शिकयते बीच-बीच में आती हैं। उन मामलों में वे DFO मिर्ज़ापुर और DFO भदोही के सहयोग से उचित कार्रवाई करते हैं।
नौकाओं में कुछ इस तरह रेत भर कर ले जाते हैं लोग
फोटो - प्रकाश सिंह टिकैत
उन्होंने कहा कि अगर खनन प्रजनन एरिया में होगा तो कछुओ की संख्या में जरूर प्रभाव पड़ेगा। कछुओं को बचाने के लिए उनके प्रजनन केंद्र (प्राकृतिक आवास) के प्रोटेक्शन की व्यवस्था की जा रही है। उन्होंने बताया कि नदी के रेतीले तटों पर नियमित रूप से पुलिस प्रशासन, जिला प्रशासन, खनन विभाग, वन विभाग के अधिकारियों द्वारा गश्त की जाती है। शिकायत मिलने पर तत्काल कार्रवाई की जाती है।
कुल मिलाकर मिर्ज़ापुर क्षेत्र में स्थित कछुआ अभयारण्य में हो रहे रेत खनन को समय रहते नहीं रोका गया तो यहां रहने वाले कछुओं को अंडे देने के लिए अनुकूल रेतीला स्थान कभी नहीं मिलेगा और फिर चाहे 40 हजार कछुए और ही क्यों न पानी में छोड़ दें, इस अभयारण्य का अस्तित्व कभी नहीं बन पाएगा।
विशेष नोट- यह रिपोर्ट क्षेत्रीय पत्रकारिता फ़ैलोशिप 2025 के अंतर्गत लिखी गई है। सुरक्षा कारणों से रिपोर्ट में शामिल स्थानीय लोगों की पहचान गुप्त रखी गई है और उनके काल्पनिक नामों का प्रयोग किया गया है।

