मौसमी/ऋतु प्रवास (Transhumance) क्या है? अर्थ, परिभाषा, प्रकार और महत्व

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मौसमी/ऋतु प्रवास (Transhumance) क्या है? अर्थ, परिभाषा, प्रकार और महत्व

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मौसमी या ऋतु प्रवास (Transhumance) पशुपालन की एक पारंपरिक पद्धति है, जिसमें पशुपालक मौसम और चरागाहों की उपलब्धता के अनुसार अपने पशुओं को वर्ष के अलग-अलग समय में एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाते है।

सरल शब्दों में, बेहतर चरागाह, पानी और अनुकूल जलवायु की तलाश में पशुओं के साथ मौसम के अनुसार किया जाने वाला नियमित स्थानांतरण मौसमी या ऋतु प्रवास कहलाता है। यह प्रथा विशेष रूप से पर्वतीय क्षेत्रों में प्रचलित है, जहां गर्मियों और सर्दियों में चरागाहों की स्थिति बदलती रहती है।

मौसमी/ऋतु प्रवास की परिभाषा

पशुपालकों द्वारा मौसम के अनुसार पशुओं को एक निश्चित क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र में ले जाकर चराने की परंपरागत प्रक्रिया को मौसमी या ऋतु प्रवास कहा जाता है। अंग्रेजी में इसे Transhumance कहा जाता है।

मौसमी/ऋतु प्रवास कैसे होता है?

यह प्रक्रिया मौसम के बदलाव के अनुसार संचालित होती है।

ग्रीष्मकाल में - पशुपालक अपने पशुओं को ऊंचे पर्वतीय चरागाहों की ओर ले जाते हैं। वहां तापमान कम और घास प्रचुर मात्रा में उपलब्ध होती है।

शीतकाल में - बर्फबारी और ठंड बढ़ने पर पशुओं को निचले मैदानी क्षेत्रों में लाया जाता है। यहां भोजन और पानी की उपलब्धता बनी रहती है।

मौसमी/ऋतु प्रवास के प्रकार

ऊर्ध्वाधर प्रवास - पर्वतीय क्षेत्रों में ऊंचाई के अनुसार होने वाला प्रवास।  उदाहरण - हिमालयी क्षेत्रों में ग्रीष्मकाल में ऊपरी चरागाहों और शीतकाल में निचले क्षेत्रों की ओर जाना।

क्षैतिज प्रवास - मैदानी क्षेत्रों में एक स्थान से दूसरे स्थान तक लंबी दूरी का प्रवास। उदाहरण - शुष्क क्षेत्रों में पानी और चारे की तलाश में पशुओं को दूसरे क्षेत्रों में ले जाना।

भारत में मौसमी/ऋतु प्रवास

भारत के कई क्षेत्रों में यह परंपरा आज भी प्रचलित है।

  • गुज्जर समुदाय - जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड

  • बकरवाल समुदाय - हिमालयी क्षेत्र

  • गद्दी समुदाय - हिमाचल प्रदेश

  • राजस्थान और गुजरात के कुछ पशुपालक समुदाय

मौसमी/ऋतु प्रवास का महत्व

  • पशुपालन में महत्व -

  • पशुओं को पर्याप्त चारा उपलब्ध होता है।

  • पशुओं का स्वास्थ्य बेहतर रहता है।

  • दुग्ध और ऊन उत्पादन में वृद्धि होती है।

  • चरागाहों का संतुलित उपयोग होता है।

  • आर्थिक महत्व -

  • पशुपालकों की आय में वृद्धि

  • पशुधन आधारित आजीविका को समर्थन

  • स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूती

पर्यावरण में मौसमी प्रवास की भूमिका

  • चरागाहों के अति-दोहन को रोकना

  • प्राकृतिक संसाधनों का संतुलित उपयोग

  • जैव विविधता संरक्षण में सहायता

  • पर्वतीय पारिस्थितिकी तंत्र को बनाए रखना

मौसमी/ऋतु प्रवास को प्रभावित करने वाले कारक

  • जलवायु परिवर्तन

  • चरागाहों की उपलब्धता

  • वर्षा की मात्रा

  • वन नीतियां

  • शहरीकरण

  • भूमि उपयोग में परिवर्तन

जलवायु परिवर्तन और मौसमी प्रवास

बदलती जलवायु, अनियमित वर्षा और घटते चरागाहों के कारण पारंपरिक ऋतु प्रवास प्रभावित हो रहा है। कई क्षेत्रों में पशुपालकों को पहले की तुलना में अधिक दूरी तय करनी पड़ रही है, जिससे उनकी आजीविका पर असर पड़ रहा है।

मौसमी/ऋतु प्रवास के उदाहरण

  • गर्मियों में हिमालय के बुग्यालों (ऊंचे घास के मैदानों) की ओर पशुओं का जाना।

  • सर्दियों में मैदानी क्षेत्रों में लौटना।

  • शुष्क क्षेत्रों में पानी और चारे की तलाश में पशुओं का स्थानांतरण।

मौसमी/ऋतु प्रवास के उपयोग

  • पशुपालन - पशुओं के लिए बेहतर चरागाह उपलब्ध कराने में।

  • आजीविका - पशुपालक समुदायों की आय बनाए रखने में।

  • पर्यावरण संरक्षण - प्राकृतिक संसाधनों के संतुलित उपयोग में।

  • सांस्कृतिक महत्व - पारंपरिक पशुपालक जीवनशैली और संस्कृति को संरक्षित रखने में।

मौसमी या ऋतु प्रवास पशुपालन की एक प्राचीन और टिकाऊ पद्धति है, जिसमें पशुपालक मौसम के अनुसार अपने पशुओं को विभिन्न चरागाहों तक ले जाते हैं। यह प्रणाली पशुधन के स्वास्थ्य, आजीविका, प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण और पारिस्थितिक संतुलन को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। बदलती जलवायु और आधुनिक चुनौतियों के बीच इस पारंपरिक ज्ञान और जीवनशैली का संरक्षण अत्यंत आवश्यक है।

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