मानसून से पहले घटते जलाशय स्तर भारत की जल सुरक्षा और नदी बेसिन प्रबंधन पर गंभीर सवाल खड़े कर रहे हैं।

मानसून से पहले घटते जलाशय स्तर भारत की जल सुरक्षा और नदी बेसिन प्रबंधन पर गंभीर सवाल खड़े कर रहे हैं।

चित्र: usplash.com

मानसून से पहले खाली हुए देश के बड़े बांध, क्या केवल बारिश के भरोसे है भारत?

CWC के ताज़ा आंकड़े: बांधों में जमा गाद, बीमार नदी बेसिन और बेलगाम भूजल दोहन से गहराया देश का प्री-मानसून जल संकट।
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  • 30 अप्रैल से 14 मई 2026 के बीच देश के 166 प्रमुख जलाशयों का जल स्तर 38.72% से घटकर 34.45% पर आ गया, यानी महज़ दो हफ्तों में 8 BCM पानी कम हुआ है।

  • राष्ट्रीय स्तर पर पानी की उपलब्धता पिछले साल से बेहतर दिखने के बावजूद, कृष्णा बेसिन में उपयोगी जल भंडारण घटकर केवल 19.31% रह गया है।

  • पेड़ों की कटाई और खनन के चलते भाखड़ा बांध (गोविंद सागर) जैसे बड़े जलाशयों की वास्तविक जल भंडारण क्षमता में लगभग 26% तक की भारी कमी आ चुकी है।

दक्षिण में बारिश शुरू हो चुकी है लेकिन अभी भी देश के अधिकांश हिस्सों में लोग बारिश का बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं। खेत, शहर, उद्योग और जलविद्युत परियोजनाएं आसमान की ओर टकटकी लगाए हुए हैं। वैसे तो यह मंज़र हर साल देखने को मिलता है, लेकिन इस वर्ष मानसून का यह इंतज़ार सामान्य नहीं है।

सामान्य इसलिए नहीं क्योंकि देश भर के जलाशयों में पानी का स्तर तेज़ी से गिर रहा है। केंद्रीय जल आयोग (CWC) के अनुसार 30 अप्रैल 2026 को देश के 166 प्रमुख जलाशयों में कुल 71.082 बिलियन क्यूबिक मीटर (BCM) पानी उपलब्ध था। यह मात्रा उनकी कुल भंडारण क्षमता का महज़ 38.72 फ़ीसद थी, जो अगले दो हफ्तों के भीतर ही घटकर 34.45 फ़ीसद पर आ गई। 

यानी केवल 14 दिनों में देश के जल भंडारण क्षमता में लगभग 8 BCM की कमी आई है। यह गिरावट उस समय दर्ज की गई जब मानसून अभी शुरू भी नहीं हुआ था।

महज़ दो हफ्तों में गंगा बेसिन के जलाशयों का भंडारण करीब 50 फ़ीसद से घटकर 43.34 फ़ीसद रह गया। गोदावरी बेसिन में यह 36.52 फ़ीसद और नर्मदा बेसिन में 34.96 फ़ीसद पर आ गया। सबसे चिंताजनक स्थिति कृष्णा बेसिन की रही, जहां उपलब्ध जल भंडारण घटकर केवल 19.31 फ़ीसद रह गया।

नदी बेसिनों और राज्यों में मानसून से पहले पानी की कमी  

राष्ट्रीय स्तर पर तस्वीर पहली नज़र में उतनी चिंताजनक नहीं दिखती। केंद्रीय जल आयोग की जलाशय भंडारण निगरानी प्रणाली (RSMS) के 14 मई 2026 के आंकड़ों के अनुसार देश के 166 प्रमुख जलाशयों में 63.232 BCM पानी उपलब्ध था। जो पिछले वर्ष की समान अवधि (56.002 BCM) और दीर्घकालिक औसत (51.052 BCM) दोनों से अधिक था। इसका मतलब है कि समस्या केवल पानी की कुल उपलब्धता की नहीं है।

राष्ट्रीय स्तर के आंकड़े संतोषजनक दिखाई देते हैं। लेकिन कई नदी बेसिन और राज्यों में मानसून से पहले ही पानी की कमी महसूस होने लगती है। इससे पता चलता है कि जल सुरक्षा केवल जलाशयों में जमा पानी पर निर्भर नहीं करती। बल्कि यह भी महत्वपूर्ण है कि पानी कहाँ उपलब्ध है, उसका इस्तेमाल किस गति से हो रहा है और किस क्षेत्र तक उसकी पहुंच है।

दूसरे शब्दों में, राष्ट्रीय स्तर के अपेक्षाकृत संतोषजनक आंकड़े भी स्थानीय और क्षेत्रीय जल संकट को छिपा सकते हैं। यही कारण है कि जलाशयों की कुल स्थिति के साथ-साथ नदी बेसिन स्तर पर विश्लेषण आवश्यक हो जाता है।

प्री-मानसून अवधि में जलाशयों का स्तर घटना सामान्य प्रक्रिया है। लेकिन सवाल यह है कि क्या वर्तमान स्तर पुराने औसत के अनुरूप हैं या उनसे नीचे जा रहे हैं। यदि लगातार कई वर्षों तक जलाशय सामान्य से कम स्तर पर पहुंच रहे हैं, तो यह जल प्रबंधन और जलवायु परिवर्तन दोनों की ओर संकेत करता है।

यह स्थिति केवल एक मौसमी उतार-चढ़ाव नहीं, बल्कि भारत की जल सुरक्षा से जुड़ी गहरी संरचनात्मक समस्याओं का संकेत है। अक्सर जल संकट को बारिश की कमी या कमजोर मानसून का नतीजा माना जाता है। लेकिन अहम सवाल यह है कि हर साल मानसून का पानी जमा करने वाले ये जलाशय बारिश से पहले ही इतनी तेजी से खाली क्यों हो जाते हैं?

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संकट केवल जलाशयों का नहीं, पूरे नदी बेसिन का है

केंद्रीय जल आयोग के आंकड़े बताते हैं कि समस्या किसी एक बांध या राज्य तक सीमित नहीं है। महज़ दो हफ्तों में गंगा बेसिन के जलाशयों का भंडारण करीब 50 फ़ीसद से घटकर 43.34 फ़ीसद रह गया। गोदावरी बेसिन में यह 36.52 फ़ीसद और नर्मदा बेसिन में 34.96 फ़ीसद पर आ गया। सबसे चिंताजनक स्थिति कृष्णा बेसिन की रही, जहां उपलब्ध जल भंडारण घटकर केवल 19.31 फ़ीसद रह गया।
कृष्णा, गोदावरी और कावेरी जैसे दक्षिणी नदी बेसिन लंबे समय से उच्च जल मांग वाले क्षेत्र रहे हैं। यहां सिंचाई परियोजनाओं का व्यापक विस्तार हुआ है और कई बड़े शहर भी इन्हीं नदी प्रणालियों पर निर्भर हैं। 

गर्मियों में खेती, पेयजल और उद्योगों के लिए पानी की मांग बढ़ जाती है। इस मांग को पूरा करने के लिए जलाशयों से लगातार पानी निकाला जाता है। नतीजतन मानसून से पहले उनका जल भंडारण तेजी से घटने लगता है।

इसके साथ ही इन बेसिनों में वर्षा का वितरण भी लगातार अधिक अनिश्चित होता जा रहा है। कई क्षेत्रों में कम दिनों में अत्यधिक वर्षा और लंबे शुष्क अंतराल की प्रवृत्ति देखी जा रही है। नतीजतन, बारिश के पानी का बड़ा हिस्सा तेज़ी से बह जाता है और जलाशयों तथा भूजल भंडारों को अपेक्षित लाभ नहीं मिल पाता। 

इसलिए जलाशयों में दिखाई देने वाली कमी को केवल मौसमी घटना मानना सही नहीं होगा। कई नदी बेसिनों में पानी की मांग बढ़ रही है। बारिश का स्वरूप भी बदल रहा है। साथ ही, पानी को सहेजने की प्राकृतिक क्षमता कमजोर पड़ रही है। इन सबका असर मिलकर जल संकट को और गहरा बना सकता है।

यही वह बिंदु है जहां भारत की जल नीति अक्सर चूक जाती है। हम जल संकट को बांधों और जलाशयों की समस्या के रूप में देखते हैं। जबकि वास्तव में यह नदी बेसिनों के स्वास्थ्य से जुड़ा प्रश्न है। 

कई नदी बेसिनों में नदियों का प्राकृतिक प्रवाह बाधित हो चुका है। साथ ही, कैचमेंट एरिया में बढ़ते कंक्रीटीकरण ने पानी के जमीन में समाने की क्षमता को कम किया है। ऐसे में जल संकट केवल बारिश की कमी का नहीं, बल्कि नदी बेसिनों के बिगड़ते स्वास्थ्य का भी संकेत है।
किसी एक जलाशय का खाली होना एक स्थानीय समस्या है। लेकिन जब पूरे नदी बेसिन में पानी की कमी दिखने लगे, तो स्थिति गंभीर हो जाती है। इसका असर खेती, पेयजल, बिजली उत्पादन, मत्स्य संसाधनों और नदी पारिस्थितिकी सभी पर पड़ता है। 

जलाशयों में कमी का असर केवल आंकड़ों तक सीमित नहीं रहता। कई क्षेत्रों में सिंचाई के लिए उपलब्ध पानी घट सकता है, शहरों और कस्बों की पेयजल आपूर्ति प्रभावित हो सकती है तथा जलविद्युत परियोजनाओं के उत्पादन पर भी दबाव बढ़ सकता है। इसका प्रभाव अंततः किसानों, शहरी आबादी और स्थानीय अर्थव्यवस्था तक पहुंचता है।

दक्षिण भारत: आने वाले संकट की चेतावनी

देश के दक्षिणी राज्यों की स्थिति विशेष रूप से गंभीर दिखाई देती है। अप्रैल के अंत में ही दक्षिण भारत के 36 जलाशयों में जल स्तर 40 फ़ीसद से नीचे पहुंच चुका था। 

तमिलनाडु का वैगई जलाशय अपने सामान्य भंडारण के केवल 12.47 फ़ीसद पर पहुंच गया था। अलीयार जलाशय में भी पानी का स्तर काफी नीचे (21.25 फ़ीसद) पहुंच चुका था। वहीं, केरल का पेरियार जलाशय का स्तर भी सामान्य से नीचे दर्ज किया गया।

दक्षिण भारत का अनुभव बताता है कि जलाशय आधारित जल सुरक्षा की भी अपनी सीमाएं हैं। यहां दशकों से बड़े बांधों और जलाशयों का विकास हुआ है, फिर भी क्षेत्र बार-बार जल संकट का सामना करता है। इसका कारण केवल वर्षा की कमी नहीं, बल्कि जल मांग का लगातार बढ़ना, भूजल पर बढ़ती निर्भरता और जलागम क्षेत्रों का क्षरण भी है।

जब जलाशय खाली होते हैं, भूजल पर बढ़ता है दबाव

जलाशयों में कमी का सीधा असर भूजल पर पड़ता है। जैसे-जैसे सतही जल स्रोत कमजोर पड़ते हैं, किसानों और शहरों की भूमिगत जल पर निर्भरता बढ़ जाती है। विश्व बैंक और विभिन्न अंतरराष्ट्रीय अध्ययनों के अनुसार भारत दुनिया का सबसे बड़ा भूजल उपयोगकर्ता है। 

देश की सिंचाई व्यवस्था का बड़ा हिस्सा और ग्रामीण पेयजल की महत्वपूर्ण जरूरतें भूजल पर निर्भर हैं। यही कारण है कि जब जलाशयों और नदियों में पानी घटता है, तो उसका दबाव सीधे भूमिगत जल भंडारों पर पड़ता है। कई क्षेत्रों में भूजल का दोहन उसकी प्राकृतिक भरपाई की तुलना में अधिक तेजी से हो रहा है, जिससे जल संकट और गहरा सकता है।

केंद्रीय भूजल बोर्ड (CGWB) समय-समय पर चेतावनी देता रहा है कि देश के अति-दोहित ब्लॉक (Over-exploited blocks) में भूजल स्तर लगातार नीचे जा रहा है। पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, दिल्ली और दक्षिण भारत के कुछ क्षेत्रों में यह समस्या विशेष रूप से गंभीर है। विशेषज्ञों के अनुसार सतही जल और भूजल एक-दूसरे से जुड़े हैं। इनका अलग-अलग प्रबंधन जल संकट को और बढ़ा सकता है।

हाल के वर्षों में बेंगलुरु, चेन्नई और हैदराबाद जैसे शहर गंभीर जल संकट से जूझते दिखे हैं। इससे साफ़ होता है कि जलाशयों और भूजल पर बढ़ता दबाव अब केवल ग्रामीण क्षेत्रों तक सीमित नहीं रह गया है। तेजी से बढ़ती आबादी, पानी की बढ़ती मांग और सीमित जल स्रोतों के कारण कई शहर भी जल सुरक्षा की चुनौती का सामना कर रहे हैं।

जल विशेषज्ञ लंबे समय से कहते रहे हैं कि "नदी, जलाशय और भूजल एक ही जल चक्र के परस्पर जुड़े हिस्से हैं।" इसलिए किसी एक स्रोत पर पड़ने वाला दबाव अंततः दूसरे स्रोतों में भी दिखाई देता है। जलाशयों में पानी घटने पर लोग भूजल का अधिक उपयोग करने लगते हैं। इससे भूमिगत जल भंडारों पर दबाव बढ़ता है और पानी का संकट और गंभीर हो जाता है।

क्या समस्या केवल कम बारिश है?

आमतौर पर जल संकट के समय पूरा ध्यान मानसून पर केंद्रित हो जाता है। लेकिन जलवायु परिवर्तन ने इस समीकरण को जटिल बना दिया है। अब समस्या केवल यह नहीं है कि कितनी बारिश होती है, बल्कि यह भी है कि बारिश कब और कैसे होती है। 

भारतीय मौसम विभाग (IMD), पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय और विभिन्न शोध अध्ययनों से संकेत मिलता है कि देश के अनेक हिस्सों में वर्षा का स्वरूप बदल रहा है। 

भारत सरकार की Assessment of Climate Change over the Indian Region रिपोर्ट के अनुसार देश में अत्यधिक वर्षा की घटनाएं बढ़ रही हैं। 1950 से 2015 के बीच इनमें लगभग 75 फ़ीसद वृद्धि दर्ज की गई। वहीं, कई क्षेत्रों में सूखे की घटनाएं भी अधिक व्यापक हुई हैं।

Journal of Geophysical Research: Atmospheres में प्रकाशित एक अध्ययन भी इसी ओर संकेत करता है। इसके अनुसार भारतीय मानसून के दौरान अत्यधिक वर्षा और लंबे शुष्क अंतराल की घटनाएं बढ़ रही हैं। यानी बारिश का वितरण पहले की तुलना में अधिक असंतुलित होता जा रहा है।

ऐसी परिस्थितियों में बारिश की कुल मात्रा सामान्य रहने पर भी जल उपलब्धता और जल भंडारण प्रभावित हो सकते हैं।

गोविंद सागर जलाशय (भाखड़ा बांध) की भंडारण क्षमता में लगभग 26 फ़ीसद की कमी दर्ज की गई है, जबकि कर्नाटक के अलमट्टी जलाशय में भी गाद जमाव के कारण क्षमता घटने की सूचना सामने आई है।

गाद से भरते जलाशय और सिकुड़ती क्षमता

भारत के अधिकांश बड़े जलाशयों के सामने एक कम चर्चित लेकिन गंभीर समस्या गाद जमाव (सिल्टेशन) की है। इन इलाकों में पेड़ों की कटाई, खनन और सड़क निर्माण के कारण बड़ी मात्रा में मिट्टी बहकर नदियों के साथ जलाशयों तक पहुंच जाती है। यह मिट्टी धीरे-धीरे जलाशयों में जमा होती रहती है।

गाद जमा होने का सबसे बड़ा असर जलाशयों की वास्तविक भंडारण क्षमता पर पड़ता है। जलाशय कागज़ों में जितने बड़े दिखाई देते हैं, समय के साथ उनमें उतना पानी संग्रहित नहीं हो पाता। 

केंद्रीय जल आयोग (CWC) द्वारा तैयार Compendium on Sedimentation of Reservoirs in India में भी यह रेखांकित किया गया है कि गाद जमाव जलाशयों की उपयोगी भंडारण क्षमता को लगातार कम करता है। जल शक्ति मंत्रालय ने संसद में बताया था कि जलाशयों में गाद जमना एक स्वाभाविक प्रक्रिया है, लेकिन इससे उनकी भंडारण क्षमता और उनसे मिलने वाले लाभ प्रभावित होते हैं। 

अध्ययनों से यह भी संकेत मिलता है कि देश के अनेक बड़े जलाशय अपनी मूल डिजाइन क्षमता का एक हिस्सा खो चुके हैं। उदाहरण के लिए, गोविंद सागर जलाशय (भाखड़ा बांध) की भंडारण क्षमता में लगभग 26 फ़ीसद की कमी दर्ज की गई है, जबकि कर्नाटक के अलमट्टी जलाशय में भी गाद जमाव के कारण क्षमता घटने की सूचना सामने आई है।

इसका असर केवल पानी के भंडारण तक सीमित नहीं रहता। जब जलाशयों की क्षमता घटती है, तो सूखे के समय उपलब्ध पानी कम हो जाता है, बाढ़ नियंत्रण की क्षमता कमजोर पड़ती है और जलविद्युत उत्पादन भी प्रभावित हो सकता है।

दूसरे शब्दों में, समान वर्षा होने पर भी पहले जितना पानी संग्रहित नहीं हो पाता। इसलिए जल सुरक्षा की चर्चा में जलाशयों की संख्या के साथ-साथ उनकी वास्तविक क्षमता पर भी ध्यान देना आवश्यक है।

इसलिए केवल नए बांध बनाना पर्याप्त नहीं है। आवश्यकता मौजूदा जलाशयों की क्षमता को पुनर्जीवित करने, इन क्षेत्रों के संरक्षण और नदी तंत्र के पुनर्स्थापन की है।

किसी भी नदी या जलाशय की सेहत उसके कैचमेंट एरिया पर निर्भर करती है। कैचमेंट एरिया वह क्षेत्र होता है जहां गिरने वाला वर्षा जल नदियों, झीलों और जलाशयों तक पहुंचता है। यदि इस क्षेत्र में जंगलों की कटाई हो, खनन बढ़े या भूमि का अत्यधिक दोहन होने लगे, तो वर्षा का पानी जमीन में समाने के बजाय तेजी से बह जाता है।

इसका असर कई स्तरों पर दिखाई देता है। एक तरफ भूजल का पुनर्भरण कम हो जाता है, दूसरी तरफ मिट्टी बहकर नदियों और जलाशयों में पहुंचने लगती है। यही मिट्टी आगे चलकर गाद के रूप में जमा होती है और जलाशयों की भंडारण क्षमता घटाती है। इसीलिए जल विशेषज्ञ लंबे समय से इस बात पर जोर देते रहे हैं कि जल सुरक्षा की शुरुआत केवल बांधों से नहीं, बल्कि उनके कैचमेंट एरिया की सुरक्षा से होती है।

दूसरे शब्दों में, यदि कैचमेंट एरिया स्वस्थ नहीं हैं तो अच्छी बारिश भी लंबे समय तक पानी की उपलब्धता सुनिश्चित नहीं कर सकती। पानी को रोकने, जमीन में उतारने और नदियों तक संतुलित रूप से पहुंचाने में कैचमेंट एरिया की भूमिका उतनी ही महत्वपूर्ण है जितनी किसी बड़े जलाशय की।

तेलंगाना में मिशन काकतीय के तहत हजारों पारंपरिक तालाबों को पुनर्जीवित किया गया। इससे स्थानीय जल उपलब्धता बढ़ाने और भूजल रिचार्ज को बेहतर बनाने में मदद मिली।

समाधान: बांध से आगे बढ़कर बेसिन प्रबंधन की ओर

भारत की जल सुरक्षा को मजबूत करने के लिए पांच प्रमुख कदम आवश्यक हैं:

  • जलाशयों का नियमित डी-सिल्टेशन और क्षमता आकलन।

  • कैचमेंट एरिया ट्रीटमेंट और बड़े पैमाने पर वनीकरण।

  • तालाबों, झीलों और आर्द्रभूमियों जैसी विकेंद्रीकृत जल संरचनाओं का पुनर्जीवन।

  • भूजल और सतही जल का एकीकृत प्रबंधन।

  • नदी बेसिन आधारित जल शासन को नीति का आधार बनाना।

देश के विभिन्न हिस्सों में ऐसे उदाहरण भी मौजूद हैं जो बताते हैं कि स्थानीय स्तर पर किए गए प्रयास जल सुरक्षा को मजबूत बना सकते हैं। राजस्थान के अलवर जिले में समुदायों द्वारा जोहड़ों और पारंपरिक जल संरचनाओं के पुनर्जीवन से कई सूखी पड़ चुकी नदियों और जल स्रोतों में फिर से पानी दिखाई देने लगा। 

तेलंगाना में मिशन काकतीय के तहत हजारों पारंपरिक तालाबों को पुनर्जीवित किया गया। इससे स्थानीय जल उपलब्धता बढ़ाने और भूजल रिचार्ज को बेहतर बनाने में मदद मिली। ऐसे उदाहरण बताते हैं कि जल संकट का समाधान केवल बड़े बांधों और नई परियोजनाओं में नहीं, बल्कि स्थानीय जल प्रणालियों को मजबूत करने में भी है।

केंद्रीय जल आयोग के आंकड़े स्पष्ट संकेत देते हैं कि जल संकट केवल वर्षा की अनिश्चितता का परिणाम नहीं है। यह जल प्रबंधन की उन सीमाओं का भी परिणाम है जो दशकों से जमा होती रही हैं। 

मानसून इस साल भी आएगा और संभव है कि अधिकांश जलाशय फिर भर जाएं। लेकिन अगर हर साल मानसून से पहले जलाशय खाली होने लगें और नदियों का प्रवाह घटता रहे, तो यह हमारे जल शासन पर सवाल खड़ा करता है। और तब समस्या बारिश की नहीं, जल प्रबंधन की मानी जानी चाहिए।

भारत की जल सुरक्षा का भविष्य बादलों में नहीं, बल्कि उसके नदी बेसिनों, कैचमेंट एरिया और स्थानीय जल प्रणालियों के पुनर्जीवन में निहित है।

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