श्रीनगर समेत जम्मू-कश्‍मीर की 9 जगहों पर हीटवेव, जानिए कैसे प्रभावित हो सकते हैं झरने व अन्य जलस्रोत?

श्रीनगर समेत जम्मू-कश्‍मीर की 9 जगहों पर हीटवेव, जानिए कैसे प्रभावित हो सकते हैं झरने व अन्य जलस्रोत?

जम्मू-कश्‍मीर में जो तपिश जून के मध्‍य में आनी चाहिए थी, वो मई में ही आ चुकी है। जून को सोच कर लोगों में अभी से भय है। ऊपर से बढ़ती गर्मी के कारण यहां के तमाम झरनों और अन्य जल स्रोतों अभी से संकट मंडराने लगा है।
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वर्ष 2026 में गर्मी का यह मौसम एक के बाद एक रिकार्ड तोड़ रहा है। पहले अप्रैल में हीटवेव की घटनाओं का चढ़ता ग्राफ और फिर मई महीने में तमाम शहरों में तापमान 45 के पार पहुंचा। बढ़ती गर्मी का असर अब जम्मू-कश्‍मीर की वादियों तक पहुंच गया है। 20 मई को श्रीनगर में 30.7 डिग्री और जम्मू में तापमान 42 डिग्री सेल्सियस तापमान दर्ज हुआ। दोनों ही शहर धीरे-धीरे अपने ऑल टाइम हाई तापमान की ओर बढ़ते दिखाई दिये। श्रीनगर और जम्मू के साथ-साथ राज्य के 9 जिलों में हीटवेव का प्रकोप जारी है।

इस बढ़ते तापमान ने केवल जन-जीवन को प्रभावित किया है, बल्कि घाटी में बहने वाले झरनों और पीने के पानी पर चिंता बढ़ा दी है।  

जम्मू-कश्‍मीर के विभिन्न जिलों में 10 साल का तापमान रिकॉर्ड 

भारतीय मौसम विज्ञान विभाग के अनुसार इस साल मई में सबसे अधिक 30.7 डिग्री तापमान दर्ज हुआ। जबकि मई 2025 में 34.4°C दर्ज किया गया था। पिछले वर्ष मई का महीना बीते 10 वर्षों में सबसे गर्म था। हालोकि श्रीनगर में मई माह में सबसे अधिक तापमान 1968 में दर्ज हुआ था। तब यहां पारा 36.4 डिग्री पहुंच गया था। 

2016-2024 के बीच दर्ज सभी अधिकतम तापमानों से अधिक है। इससे पहले पिछले दशक में सबसे अधिक तापमान 32.7°C (2024) और 31.9°C (2016) रहा था। चिंताजनक बात यह है कि श्रीनगर का मई माह का दीर्घकालिक औसत अधिकतम तापमान (24.7°C) से लगभग 10 डिग्री सेल्सियस अधिक रहा है।

<div class="paragraphs"><p>जम्मू-कश्‍मीर में तपती धूप में खाली पड़े रेलवे स्टेशन&nbsp;</p></div>

जम्मू-कश्‍मीर में तपती धूप में खाली पड़े रेलवे स्टेशन 

फोटो - पीआईबी 

श्रीनगर के निवासी व वरिष्‍ठ पत्रकार वाहिद भट्ट ने इंडिया वाटर पोर्टल से बातचीत में बताया कि आम तौर पर इतनी गर्मी जून के मध्‍य में पड़ती है। यहां के लोगों को इतनी गर्मी सहने की आदत नहीं है इसलिए लोग परेशान हैं। बीते एक सप्ताह में तो केवल दिन नहीं बल्कि रातें भी गर्म थीं। कल बहुत अधिक गर्मी के बाद जब बारिश हुई तो अचानक ह्यूमिडिटी बढ़ गई और पसीने वाली गर्मी शुरू हो गई। 

घाटी के अन्य शहरों में भी बढ़ा पारा

मौसम विभाग के अनुसार जब किसी पहाड़ी क्षेत्र का तापमान 30 डिग्री के पार पहुंच जाता है तब वहां हीटवेव दर्ज कर ली जाती है। श्रीनगर क्षेत्र के अन्य केंद्रों की बात करें तो काज़ीगुंड (अनंतनाग जिले में मौसम का स्टेशन) और पुलवामा जिले में स्थित कोनीबल में पारा 30 डिग्री के पार जा चुका है। वहीं कुपवाड़ा (28.3) और कोकेरनाग (29.2) हीटवेव के करीब पहुंच चुके हैं। कोकेरनाग अनंतनाग जिले में स्थित एक स्टेशन है।  

वहीं जम्मू संभाग में सभी केंद्र हीटवेव की न्यूनतम सीमा को पार कर चुके हैं। जम्मू में 42 डिग्री, बनिहाल (रामबन) में 31, बटोटे में 30.6, रियासी जिले के कटरा में 39 डिग्री, भदरवाह में 30.4 और कठुआ में 43.8 डिग्री सेल्सियस दर्ज हुआ।   

 2016 से 2025 में अधिकतम और न्यूनतम तापमान 

यदि पिछले दस वर्षों के आंकड़ों को देखें तो स्पष्ट दिखाई देता है कि कश्मीर घाटी के अधिकांश स्टेशनों में मई के अधिकतम तापमान 30°C से ऊपर पहुंचने लगे हैं। अधिकांश जगहों का तापमान सामान्य से 5 डिग्री अधिक है। पारंपरिक रूप से ठंडे माने जाने वाले क्षेत्रों, जैसे पहलगाम, गुलमर्ग और बनिहाल में भी तापमान लगातार ऊंचे स्तर छू रहा है। कई स्थानों पर तापमान अपने सर्वकालिक रिकॉर्ड के करीब पहुंच चुका है। सामान्य अधिकतम तापमान और वास्तविक तापमान के बीच का अंतर लगातार बढ़ रहा है।

इस चार्ट में आप विभिन्न जगहों पर तापमान के ट्रेंड को देख सकते हैं -

जम्मू-कश्‍मीर में बढ़ती गर्मी के संभावित प्रभाव

जलवायु वैज्ञानिक लंबे समय से चेतावनी देते रहे हैं कि हिमालय वैश्विक औसत की तुलना में अधिक तेजी से गर्म हो रहा है। जम्मू-कश्मीर के हालिया तापमान आंकड़े इसके स्पष्‍ट सबूत हैं। इनके प्रभाव इस प्रकार हैं- 

  • ग्लेशियरों और हिमनदों पर दबाव बर्फ के तेजी से पिघलने की संभावना बढ़ेगी। शुरुआती महीनों में नदियों में अधिक जल प्रवाह और बाद में जल उपलब्धता में कमी आ सकती है। हाल

  • बढ़ते तापमान की वजह से झेलम और चिनाब बेसिन के जल चक्र पर असर पड़ सकता है।

  • बागवानी और कृषि की बात करें तो सेब, चेरी, अखरोट और खुबानी जैसी फसलों को आवश्यक "चिलिंग आवर्स" कम मिल सकते हैं। फलों की गुणवत्ता और उत्पादन प्रभावित हो सकता है।

  • समय से पहले फूल आने और बाद में मौसम की मार से नुकसान का खतरा बढ़ सकता है।

  • झरनों और छोटे जल स्रोतों का प्रवाह घट सकता है। ग्रामीण इलाकों में पेयजल संकट बढ़ सकता है। भूजल पुनर्भरण प्रभावित हो सकता है।

  • ऊंचाई वाले क्षेत्रों की वनस्पतियों और जीव-जंतुओं के आवास बदल सकते हैं। कुछ प्रजातियों को और ऊंचे इलाकों की ओर पलायन करना पड़ सकता है।

झरनों और पेयजल स्रोतों पर बढ़ता संकट

जम्मू-कश्मीर में 6,553 गॉंव हैं जहां 3,300 से अधिक मीठे पानी के झरने व जलधाराएं हैं। अधिकांश गॉंव पीने के पानी के लिए इन्हीं प्राकृतिक जल स्रोतों पर निर्भर हैं। लेकिन बीते दो दशकों में आधी से अधिक जलधाराएं या तो सूख चुकी हैं या फिर छोटी हो गई हैं। 

इस बारे में वाहिद भट्ट ने बताया कि दूर-दराज़ के गॉंवों में जलधाराएं तेजी से प्रभावित हो रही हैं। श्रीनगर के मनगुंड गॉंव का उदाहरण देते हुए उन्‍होंने कहा, “मैं हाल ही में मनगुंड गॉंव गया था। वहां लोगों से बातचीत में पता चला कि तीन स्प्रिंग ऐक्टिव थे अब एक ही एक्टिव है। इसमें भी पानी बहुत कम है। जो धाराएं सूख भी जाती थीं वहां पहले अप्रैल के मध्‍य में पानी आना शुरू हो जाता था लेकिन अब मई में भी पानी नहीं है।”

<div class="paragraphs"><p>जम्मू-कश्‍मीर&nbsp;&nbsp;</p></div>

जम्मू-कश्‍मीर  

फोटो - पीआईबी 

रीचार्ज नहीं हो पा रहे भूजल के स्रोत 

जम्मू-कश्मीर में हजारों गांवों की पेयजल व्यवस्था प्राकृतिक झरनों पर निर्भर है। पिछले कुछ वर्षों में कई झरनों के जल प्रवाह में कमी दर्ज की गई है। बढ़ता तापमान इस समस्या को और गंभीर बना सकता है। सर्दियों में कम बर्फबारी और गर्मियों में तेज बर्फ पिघलने से भूजल पुनर्भरण यानी ग्राउंड वाटर रिचार्ज प्रभावित होता है।

ऊंचे तापमान के कारण मिट्टी से वाष्पीकरण बढ़ता है, जिससे झरनों को पोषित करने वाली भूमिगत नमी कम हो जाती है। कई मौसमी झरने समय से पहले सूख रहे हैं, जिससे ग्रामीण इलाकों में पेयजल संकट गहरा सकता है। डायलॉग अर्थ में प्रकाशित एक अध्‍ययन के अनुसार कश्‍मीर निरंतर गर्म हो रहा है, जिसकी वजह से यहां के जल स्रोत प्रभावित हो रहे हैं। 1980 से लेकर अब तक राज्य के औसत तापमान में 0.8 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि हुई है। वर्ष 2000 के बाद से गर्मी के दिन पहले से अधिक गर्म हुए हैं। 

अध्‍ययन के अनुसार जलवायु परिवर्तन की वजह से सर्दियों में बर्फबारी कम हो रही है और बीते दो दशकों में  ग्लेशियर 15 प्रतिशत तक सिकुड़ गए हैं। इस वजह से गर्मी का मौसम आते ही प्राकृतिक झरने तेज़ गति से सूख जाते हैं।

हिमालय से निकलने वाली नदियों पर कैसे पड़ रहा है बढ़ते तापमान का असर?

लखनऊ के जय नारायण पीजी कॉलेज में प्रोफेसर व इंदिरा गांधी ओपन यूनिवर्सिटी के काउंसिलर डॉ. चांटिया ने इंडिया वाटर पोर्टल से बातचीत में बताया कि चूंकि सभी नदियों का प्रमुख स्रोत भूजल होता है और तापमान बढ़ने की वजह से भूजल रिचार्ज धीमा पड़ जाता है और इसके कारण कारण आने वाले समय में हिमालय से निकलने वाली सभी नदियों का प्रवाह कम हो जाएगा। उन्होंने कहा कि जब-जब नदियों के प्रवाह में कमी आती है तब तब उसका असर उसके तटों पर बसी मानव सभ्‍यता पर पड़ता है। 

जम्मू-कश्‍मीर में रह रहे लोगों पर कैसे होगा बढ़ते तापमान का असर?

डॉ. आलोक चांटिया एक मानवशास्त्री हैं। उन्होंने बताया कि तापमान का सीधा असर मनुष्‍य के शरीरिक और मा‍नसिक व्यवहार पर भी पड़ता है। आम तौर पर जो लोग मैदानी इलाकों में रहते हैं, उनका शरीर अधिक तापमान को कुछ हद तक झेलने में सक्षम होता है, लेकिन पहाड़ी क्षेत्रों में रहने वाले लोगों के लिए 30 से 40 डिग्री का तापमान असहनीय हो जाता है। शरीर का अंतरिक तापमान जो 37 डिग्री सेल्सियस रहता है वे शरीर की थर्मोस्‍टेट के कारण संतुलित रहता है, लेकिन हीटवेव के कारण जो गलन ऊष्‍म बढ़ती है उसकी तपिश के कारण डीहाइड्रेशन की प्रक्रिया तेज़ हो जाती है जिससे शरीर में पानी की न्यूनतम क्षमता को पूरा करना मुश्किल हो जाता है। ऐसे में स्‍वास्थ्‍य संबंधी परेशानियां बढ़ सकती हैं।

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