इस साल सुपर अलनीनो के चलते भारत के कई इलाकों में मानसून की वर्षा की भारी कमी देखने को मिल रही है। कुछ इलाकों में सूखे की स्थिति भी देखने को मिल सकती है।
स्रोत: विकी कॉमंस
सुपर अलनीनो से शुरुआत में ही लड़खड़ाई मानसून की रफ्तार, 15 जून तक देश में 32% कम बारिश
सुस्त चाल के कारण इस बार अबतक कर्नाटक और आंध्र प्रदेश से आगे नहीं बढ़ पाया है मानसून। आमतौर पर 15 जून तक महाराष्ट्र को पार कर एमपी तक पहुंच जाता है।
इस साल सुपर अलनीनो के खतरे के बीच मानसून की रफ्तार शुरुआत से ही लड़खड़ाती दिख रही है। मौसम विभाग के आंकड़ों के मुताबिक इस साल तीन दिन देरी से 4 जून को केरल पहुंचे मानसून की रफ्तार काफी धीमी रही है और पिछले एक सप्ताह से यह कर्नाटक और आंध्र प्रदेश से आगे नहीं बढ़ पाया है। आमतौर पर 15 जून तक मानसून महाराष्ट्र को पार कर गुजरात और मध्य प्रदेश तक पहुंच जाता है।
62.1 मिमी के मुकाबले केवल 42.4 मिलीमीटर बारिश हुई
उत्तर भारत में हालांकि प्री-मानसून बारिश के चलते गर्मी से राहत मिली है, जबकि मध्य भारत समेत देश के बड़े भू-भाग में अब भी मानसून की बारिश का इंतजार है। भारतीय मौसम विभाग (IMD) के अनुसार 1 जून से 15 जून के बीच देश में केवल 42.4 मिलीमीटर बारिश दर्ज की गई है, जो इस अवधि में होने वाली सामान्य बारिश 62.1 मिमी के मुकाबले 32 फीसदी कम है। इसमें भी काफी योगदान उत्तर भारत में हुई मानसून-पूर्व बारिश का है। इस तरह मानसूनी बारिश का वास्तविक आंकड़ा 30 फीसदी से भी कम बैठता है। सुपर अलनीनो के कारण मानसून की रफ्तार थमने से मध्य, पूर्वी और दक्षिण भारत के कई इलाके बारिश की कमी से जूझ रहे हैं।
यही रफ्तार रही तो 40% तक की कमी की संभावना
IMD की ओर से जारी हालिया उपग्रह चित्रों में मानसून की सक्रियता में कमी साफ नजर आ रही है। चिंता की बात यह है कि फिलहाल मानसून की प्रगति लगभग रुक सी गई है। इस कारण अगले सप्ताह तक देश भर में बारिश में कमी बढ़कर -40% तक हो सकती है। दक्षिणी, मध्य और पूर्वी भारत के बड़े हिस्सों में बादलों की कमी है, जबकि सामान्य तौर पर इस समय मानसूनी बादलों का व्यापक विस्तार दिखाई देता है। हाल के दिनों में मानसून ने कर्नाटक, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश और महाराष्ट्र के जिन हिस्सों में आगे बढ़ा है, वहां भी व्यापक वर्षा नहीं हो पा रही है। आईएमडी के वर्षा विचलन मानचित्र में मध्य भारत, दक्षिण भारत और पूर्वी भारत के विशाल क्षेत्र में सामान्य से कम तथा अत्यधिक कम वर्षा की स्थिति दिखाई गई है।
मौसम विज्ञान विभाग द्वारा जारी रेन मैप के अनुसार जून में देश में मानसूनी वर्षा की स्थिति इस प्रकार रही।
स्रोत : आईएमडी
वर्ष 2026 जलवायु परिवर्तन और मौजूदा भू-राजनीतिक परिस्थितियों के बीच भारत के लिए बड़ी परीक्षा साबित हो सकता है। देश में बढ़ती भीषण गर्मी चिंता का विषय है और जुलाई-अगस्त तक अलनीनो का प्रभाव भी दिखाई देने की आशंका है। अत्यधिक तापमान की वजह से मॉनसून के पैटर्न में जो परिवर्तन हो रहा है उससे उर्वरक संकट पैदा हो सकता है और कृषि उत्पादन कम होने पर महंगाई बढ़ सकती है।
देविंदर शर्मा, फूड पॉलिसी एनालिस्ट
18 जून के बाद वेस्टर्न डिस्टर्बेंस से बढ़ सकती है रफ्तार
मौसम विभाग के अनुसार अगले 4-5 दिनों में मानसून के मध्य अरब सागर के कुछ और हिस्सों, महाराष्ट्र, कर्नाटक के बाकी हिस्सों, तेलंगाना, ओडिशा, झारखंड, बिहार, और छत्तीसगढ़ के कुछ हिस्सों में आगे बढ़ने की संभावना है। इस बीच, पश्चिमी यूपी, दिल्ली, हरियाणा और राजस्थान में प्री-मानसून बारिश के चलते गर्मी से कुछ राहत मिली है। मौसम विभाग का अनुमान है कि 18 जून से एक नया वेस्टर्न डिस्टर्बेंस उत्तर-पश्चिम भारत में मानसून की स्थिति को प्रभावित कर सकता है। इससे कम दबाव का क्षेत्र बनने पर मानसून की रफ्तार में कुछ तेजी आने की उम्मीद है।
खरीफ फसल को सुपर अलनीनो के प्रभाव से बचाने की रणनीति पर नई दिल्ली में अधिकारियों के साथ बैठक करते केंद्रीय कृषि व किसान कल्याण मंत्री शिवराज चौहान।
फोटो : पीआईबी
खरीफ फसल को अलनीनो की मार से बचाने की जिलेवार रणनीति तैयार कर रहा कृषि मंत्रालय
सुपर अलनीनो के प्रभाव से खरीफ फसल बचाने के लिए केंद्र सरकार के कृषि मंत्रालय ने अपनी रणनीति को अंतिम रूप देना शुरू कर दिया है। इसके तहत जिलेवार रणनीति तैयार की जा रही है। केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण तथा ग्रामीण विकास मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने बीते मंगलवार को कृषि भवन में आयोजित उच्चस्तरीय साप्ताहिक कृषि समीक्षा बैठक में देशभर की तैयारियों का विस्तृत जायजा लिया। बैठक में कम वर्षा वाले जिलों के लिए अग्रिम कंटिंजेंसी प्लान तैयार करने पर विशेष जोर दिया गया।
बैठक में चौहान ने अधिकारियों को निर्देश दिए कि जिन जिलों में कम बारिश या वर्षा की असमानता की आशंका है, उनकी पहले से पहचान कर राज्य सरकारों के साथ मिलकर फसलवार बचाव की रणनीति तैयार की जाए। कृषि मंत्री ने जल संरक्षण, नमी प्रबंधन, अंतरफसली खेती (इंटरक्रॉपिंग) और वैकल्पिक फसल पैटर्न को बढ़ावा देने की आवश्यकता पर ज़ोर देते हुए कहा कि प्रत्येक जोखिमग्रस्त जिले के लिए जिला स्तर पर अलग और व्यावहारिक रणनीति तैयार की जानी चाहिए।
उन्होंने देश के ऐसे 9-10 राज्यों पर विशेष ध्यान देने के निर्देश दिए जहां सुपर अलनीनो का प्रभाव अपेक्षाकृत अधिक पड़ सकता है। इसके तहत इन राज्यों के चिन्हित जिलों में जिला प्रशासन, कृषि विभाग, कृषि विज्ञान केंद्र (केवीके) और अन्य विस्तार तंत्र के साथ समन्वित बैठकें आयोजित की जाएंगी तथा किसानों के बीच व्यापक जागरूकता अभियान चलाया जाएंगे।
फ्लेम यूनिवर्सिटी, पुणे के प्रोफेसर डॉ. अंजल प्रकाश के अनुसार, यदि मानसून सामान्य से कम (दीर्घकालिक औसत का केवल 90%) रहता, तो यह भारत की जल सुरक्षा के लिए गंभीर चुनौती बन सकता है। इससे भूजल पुनर्भरण कम होगा, जलाशयों का स्तर घटेगा, पेयजल और सिंचाई पर दबाव बढ़ेगा तथा जल संकट से जूझ रहे शहरों की स्थिति और खराब हो सकती है। चूंकि भारत की 52% खेती वर्षा पर निर्भर है और 40% खाद्य उत्पादन मानसून से प्रभावित होता है, इसलिए इसका असर किसानों की आजीविका, खाद्य सुरक्षा और जलविद्युत उत्पादन पर भी पड़ेगा। इस चुनौती से निपटने के लिए वर्षा जल संचयन, भूजल पुनर्भरण, जलाशयों और नहरों का आधुनिकीकरण, सूक्ष्म सिंचाई (ड्रिप और स्प्रिंकलर), कम पानी वाली फसलों को बढ़ावा, फसल बीमा, उपचारित अपशिष्ट जल के पुनः उपयोग तथा डेटा-आधारित विकेंद्रीकृत जल प्रबंधन जैसी रणनीतियों को तत्काल लागू करना आवश्यक है।
खेती में पानी की कमी से निपटने वाली तकनीकों पर ज़ोर
बैठक में खरीफ 2026 के फसलवार लक्ष्य, बुवाई की प्रगति और राज्यवार तैयारियों की भी समीक्षा की गई। बारिश की कमी होने पर भी उत्पादन बनाए रखने के लिए वैज्ञानिक खेती, उपयुक्त किस्मों के चयन, मल्चिंग, नमी संरक्षण और अंतरफसली खेती जैसे उपायों को व्यापक स्तर पर अपनाने पर जोर दिया गया।
बैठक में जलाशयों में जल भंडारण, उर्वरकों की उपलब्धता और राज्यवार स्टॉक की स्थिति पर भी चर्चा हुई। कृषि मंत्री ने कहा कि राष्ट्रीय स्तर पर उर्वरकों की पर्याप्त उपलब्धता है और मानसून की प्रगति के साथ राज्यों एवं जिलों तक आपूर्ति व्यवस्था को और सुदृढ़ किया जाएगा। उन्होंने अधिकारियों को वर्षा में कमी वाले क्षेत्रों में अग्रिम आपूर्ति सुनिश्चित करने के निर्देश भी दिए।
दलहन आत्मनिर्भरता मिशन की समीक्षा करते हुए कृषि मंत्री ने कहा कि सरकार अरहर, उड़द और मूंग जैसी प्रमुख दालों में देश को आत्मनिर्भर बनाने के लिए प्रतिबद्ध है। इसके लिए राज्यों के सहयोग से क्षेत्र विस्तार, बेहतर बीज उपलब्धता, फसल चक्र प्रबंधन और तकनीकी मार्गदर्शन पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है।Maharashtra
देश में इस साल (2026) हुई मानसूनी वर्षा की तालिका।
फोटो : आईएमडी
महाराष्ट्र में 75% कम बारिश, कपास पर संकट
महाराष्ट्र में 1 से 16 जून के बीच सामान्य से 75 फीसदी कम बारिश दर्ज होने से खरीफ सीजन को लेकर किसानों और सरकार की चिंता बढ़ गई है। कई जिलों में तापमान 42 डिग्री सेल्सियस से ऊपर पहुंच गया है और लू जैसी परिस्थितियां बनी हुई हैं। सुपर अलनीनो के कार कमजोर पड़े मानसून के कारण खरीफ सीजन की कपास की फसल पर सबसे ज़्यादा असर पड़ने की आशंका नज़र आ रही है। सामान्य से काफी कम वर्षा होने से धान, सोयाबीन, कपास और दलहन जैसी प्रमुख खरीफ फसलों की बुवाई प्रभावित होने की आशंका है।
किसानों को "जल्दबाजी न करने" की सलाह
मंगलवार को राज्य मंत्रिमंडल के समक्ष प्रस्तुत फसल स्थिति समीक्षा रिपोर्ट के अनुसार, राज्य सरकार ने किसानों को फसल बुवाई में "जल्दबाजी न करने" की सलाह दी है। कम बारिश को देखते हुए किसानों से पर्याप्त और लगातार वर्षा होने तक इंतजार करने को कहा गया है। क्योंकि शुरुआती हल्की बारिश के आधार पर की गई बुवाई बाद में लंबे शुष्क अंतराल की स्थिति में फसलों को नुकसान पहुंचा सकती है।
राज्य सरकार पहले भी किसानों को आगाह कर चुके हैं कि प्री-मानसून की छिटपुट बारिश को मानसून की स्थायी और पर्याप्त बारिश नहीं माना जाना चाहिए। विशेष रूप से विदर्भ, मराठवाड़ा और मध्य महाराष्ट्र के कई हिस्सों में मानसून की प्रगति धीमी बनी हुई है। हाल के दिनों में कुछ स्थानों पर बारिश हुई है, लेकिन अधिकांश क्षेत्रों में मिट्टी में पर्याप्त नमी नहीं बन पाई है।
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