बारिश का स्‍तर मापने का सर्वाधिक प्रचलित उपकरण यह बेलनाकार वर्षामापी है, जबकि भूजल रिचार्ज स्‍ट्रक्‍चर के ज़रिये ज़मीन के भीतर जाने वाले वर्षा जल को मापने के लिए फ्लो मीटर का इस्‍तेमाल किया जाता है।

बारिश का स्‍तर मापने का सर्वाधिक प्रचलित उपकरण यह बेलनाकार वर्षामापी है, जबकि भूजल रिचार्ज स्‍ट्रक्‍चर के ज़रिये ज़मीन के भीतर जाने वाले वर्षा जल को मापने के लिए फ्लो मीटर का इस्‍तेमाल किया जाता है।

फोटो : विकी कॉमंस

जयपुर में लगे ‘फ्लो मीटर’ वाले भूजल रिचार्ज स्‍ट्रक्‍चर : ज़मीन में बारिश का कितना पानी गया, चल जाएगा पता

‘कैच द रेन' अभियान के जरिये वर्षा जल संरक्षण की तस्वीर बदलने की कोशिश, भूजल स्‍तर बढ़ने पर जयपुर वासियों को जल संकट से मिल सकती है निजात
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मानसून की बारिश का पूरे देश को बेसब्री से इंतज़ार रहता है। आम लोगों को जहां यह मई-जून की तपती गर्मी से निजात देती है, वहीं किसानों को खरीफ की बुवाई के लिए इससे पानी मिलता है। इसके अलावा बारिश हमारे नदी, तालाबों और झीलों जैसे जलस्रोतों और ज़मीन के भीतर मौजूद जलभृदों (एक्‍वीफर) को रिचार्ज कर भूजल के स्‍तर को सुधारने का काम भी करती है। इसीलिए मानसून को भूजल रिचार्ज का एक सुनहरा अवसर भी माना जाता है। इसी को देखते हुए सरकार इन दिनों कैच द रेन (Catch the Rain) अभियान पर जोर दे रही है, ताकि वर्षा जल का संचय कर भूजल स्रोतों का ज्‍़यादा से ज्‍़यादा पुनर्भरण किया जा सके। ऐसी ही एक महत्‍वपूर्ण पहल आजकल देश के जल संकट से जूझते राज्‍य राजस्‍थान की राजधानी जयपुर में देखने को मिल रही है। 

राजस्थान की राजधानी जयपुर में प्रयोग के तौर पर फ्लो मीटर युक्त भूजल पुनर्भरण (ग्राउंडवॉटर रिचार्ज) संरचना स्थापित की गई है। AMRUT 2.0 योजना के तहत 'शैलो एक्वीफर मैनेजमेंट' (Shallow Aquifer Management) प्रोजेक्ट के तहत फ्लो मीटर युक्त ग्राउंड वाटर रिचार्ज स्ट्रक्चर स्थापित किए गए हैं। यह प्रणाली वर्षा जल संचयन और भूजल स्तर में सुधार के साथ-साथ जल प्रवाह की सटीक निगरानी (Monitoring) सुनिश्चित करती है। जयपुर में फ्लो मीटर युक्त ग्राउंड वाटर रिचार्ज स्ट्रक्चर मुख्य रूप से नगर निगम जयपुर ग्रेटर (JMC Greater) के अधिकार क्षेत्र में आने वाले सार्वजनिक पार्कों और चुनिंदा सरकारी परिसरों में लगाए जा रहे हैं।  इससे भूजल को रिचार्ज करने के साथ ही ज़मीन के भेजे गए पानी की मात्रा (फ्लो) की भी सटीक जानकारी मिल रही है। यह इसलिए भी महत्‍वपूर्ण है, क्‍योंकि ठीक ढंग से जल संरक्षण करने का दायरा केवल पानी जमा करने तक सीमित नहीं होता, बल्कि यह भी जानना उतना ही जरूरी होता है कि कितना पानी वास्तव में जमीन के भीतर पहुंच रहा है। इसलि यह पहल केंद्र सरकार के ‘कैच द रेन’ अभियान के उद्देश्य को एक मजबूत तकनीकी आधार देती दिखाई दे रही है।

कहां-कहां स्थापित किए गए हैं यह स्ट्रक्चर 

चूंकि यह एक स्मार्ट मॉनिटरिंग और डेटा-संचालित (Data-driven) प्रोजेक्ट है, इसलिए इन्हें रणनीतिक रूप से उन चुनिंदा जगहों पर लगाया गया है जहाँ वर्षा जल का बहाव अधिक होता है और उथला भूजल (Shallow Aquifer) रिचार्ज करने की क्षमता है: 

सार्वजनिक पार्क (Public Parks) : मालवीय नगर, मानसरोवर और वैशाली नगर जैसे प्रमुख रिहायशी इलाकों के बड़े नगर निगम पार्कों में इन्हें पायलट प्रोजेक्ट के रूप में चालू किया गया है। यहाँ पार्कों के कैचमेंट एरिया (सतही जल) को इस स्ट्रक्चर से जोड़ा गया है।

सरकारी कार्यालय और सामुदायिक केंद्र: जेएमसी ग्रेटर के कुछ प्रशासनिक भवनों और चिन्हित सरकारी परिसरों की छतों (Rooftop) से गिरने वाले पानी को सीधे फ्लो मीटर वाले रिचार्ज पिट्स से जोड़ा गया है। 

संस्थागत परिसर (Institutional Sites) : Jaipur International Airport परिसर में भी कुछ स्‍ट्रक्‍चर लगाए गए हैं। निजी-सार्वजनिक भागीदारी (PPP) के तहत चलाए जा रहे एयरपोर्ट के परिसर में डिजिटल वॉटर फ्लो मीटर युक्त डीप रिचार्ज पिट्स काम कर रहे हैं।

एमिटी यूनिवर्सिटी परिसर : बड़े शैक्षणिक संस्‍थानों के परिसरों जैसे Amity University में  भी रूफटॉप और कृत्रिम झीलों के पास फ्लो मीटर युक्त रिचार्ज पिट्स सेटअप किए गए हैं।

भूजल पुनर्भरण संरचना की अनुमानित वार्षिक क्षमता

‘कैच द रेन’ क्या है और क्यों महत्वपूर्ण है?

भारत में वर्षा का अधिकांश हिस्सा मानसून सीजन के कुछ ही महीनों में गिरता है। यदि इस पानी को संरक्षित न किया जाए तो बड़ी मात्रा में जल बहकर नदियों के माध्यम से समुद्र तक पहुंच जाता है और क्षेत्र के लोगों को गर्मियों में जल संकट से जूझना पड़ता है। इसी चुनौती से निपटने के लिए केंद्र सरकार ने Catch the Rain – Where it falls, when it falls अभियान शुरू किया। जैसा कि स्‍लोगन से ही स्‍पष्‍ट है कि इस अभियान का मूल उद्देश्य है कि वर्षा जल को उसी स्थान पर संग्रहित और पुनर्भरित किया जाए जहां वह गिरता है। इसके तहत तालाबों का पुनर्जीवन, रूफटॉप रेनवॉटर हार्वेस्टिंग, सोख्ता गड्ढे, चेक डैम, परकोलेशन टैंक और भूजल पुनर्भरण संरचनाओं को बढ़ावा दिया जा रहा है। जयपुर की फ्लो मीटर युक्त संरचना इस अभियान का ही एक हिस्‍सा हैं।

भूजल स्तर सुधारने के लिए वाटर फ्लो मीटर वाले रिचार्जिंग स्ट्रक्चर लगाना अच्छी बात है। इससे पता चल सकेगा कि एक्वीफर्स में कितना पानी रिचार्ज हुआ। इन स्ट्रक्चर्स को लगाने के साथ ही सरकार को शहर की पुरानी बावड़ियों, झीलों, तालाबों और कुओं के समुचित रख रखाव और जीर्णोद्धार पर भी ध्यान देना चाहिए। अगर इन ऐतिहासिक और पारंपरिक जल स्रोतों की हालत को सुधार दिया जाए तो जल संकट को काफी हद तक दूर किया जा सकता है, क्योंकि हमारे पूर्वजों ने अपनी दूर दृष्टि और पारंपरिक ज्ञान से जल संरक्षण और जल सुरक्षा के पर्याप्त इंतज़ाम कर रखे थे। यह हमारी नासमझी और नाकामी है कि हम पूर्वजों की इन अमूल्य धरोहरों का महत्व नहीं समझ सके और इन्हें सुरक्षित नहीं रख सके।

डॉ सुधांशु, सुरेश ज्ञान विहार विश्वविद्यालय (SGVU) के सह-संस्थापक एवं पर्यावरणविद

जयपुर में वर्षा भूजल रिचार्ज की संभावित गणना

राजस्थान के लिए क्‍यों महत्‍वपूर्ण है यह प्रोजेक्‍ट ?

राजस्थान देश के सबसे जल-संकटग्रस्त राज्यों में शामिल है। यहां कई जिलों में भूजल का दोहन पुनर्भरण की तुलना में कहीं अधिक है। केंद्रीय भूजल बोर्ड (CGWB) की Dynamic Ground Water Resources, 2023 – Rajasthan रिपोर्ट के अनुसार राज्य की 302 आकलन इकाइयों में से 216 ब्लॉक (71.52%) अतिदोहन (Over Exploited) श्रेणी में हैं, जहां भूजल निकासी पुनर्भरण क्षमता से अधिक हो चुकी है। जयपुर सहित शहरी क्षेत्रों में तेजी से बढ़ती आबादी, कंक्रीट का विस्तार और वर्षा जल के प्राकृतिक रिसाव में कमी भूजल स्तर पर अतिरिक्त दबाव डालती है। ऐसे में यदि वर्षा जल को वैज्ञानिक तरीके से पुनर्भरित किया जाए और उसका मापन भी किया जाए तो जल प्रबंधन अधिक प्रभावी हो सकता है।

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रराजस्‍थान की राजधानी जयपुर में वर्षा जल संग्रहण के लिए सरकार ने कई स्‍थानों पर ‘फ्लो मीटर’ वाले भूजल रिचार्ज स्‍ट्रक्‍चर स्‍थापित किए हैं, जिनसे पता चल जाएगा कि ज़मीन में बारिश का कितना पानी गया। 

फोटो : डीडी न्‍यूज़

भूजल स्तर पर दीर्घकालिक प्रभाव

भूजल पुनर्भरण संरचनाओं का प्रभाव तुरंत दिखाई नहीं देता, लेकिन लगातार कई वर्षों तक संचालित होने पर इनके सकारात्मक परिणाम सामने आते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार ऐसे उपाय के प्रमुख दीर्घकालिक इस प्रकार होते हैं :

  • स्थानीय जलस्तर को स्थिर करने में मदद करते हैं

  • कुओं और हैंडपंपों के सूखने की गति कम कर सकते हैं

  • शहरी क्षेत्रों में भूजल पर दबाव घटा सकते हैं

  • बारिश के पानी के अपव्यय को कम करते हैं

  • जल उपलब्धता की दीर्घकालिक सुरक्षा में योगदान देते हैं

जयपुर में की गई इस पहल का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि यहां पुनर्भरण की मात्रा का प्रत्यक्ष रिकॉर्ड रखा जा रहा है।

1. शहरी बाढ़ नियंत्रण में भी उपयोगी

‘कैच द रेन’ का एक महत्वपूर्ण उद्देश्य केवल जल संग्रहण नहीं, बल्कि शहरी जल निकासी पर दबाव कम करना भी है। तेज बारिश के दौरान सड़कों पर जलभराव की स्थिति तब बनती है जब पानी के रिसाव के लिए पर्याप्त स्थान नहीं होता। यदि वर्षा जल को रिचार्ज संरचनाओं में मोड़ दिया जाए तो इससे यह लाभ होते हैं:

  • सतही बहाव कम होता है

  • नालियों पर दबाव घटता है

  • जलभराव की तीव्रता कम हो सकती है

  • बाढ़ जोखिम में कमी आती है

2. जल गुणवत्ता की निगरानी

कई बार वर्षा जल के साथ गाद, प्लास्टिक, पत्तियां और अन्य अशुद्धियां भी रिचार्ज प्रणाली में पहुंच जाती हैं। यदि फिल्टर समय पर साफ न किया जाए तो संरचना की क्षमता घट सकती है। फ्लो मीटर से पानी के प्रवाह में अचानक कमी दिखाई देने पर यह संकेत मिल सकता है कि फिल्टर या पाइपलाइन में अवरोध उत्पन्न हो गया है। इससे समय रहते रखरखाव किया जा सकता है और रिचार्ज दक्षता बनी रहती है।

3. अन्य शहरों के लिए मॉडल

जयपुर का मॉडल देश के जल संकट वाले शहरों के लिए काफी उपयोगी हो सकता है। खासतौर पर उन शहरों के लिए विशेष रूप से उपयोगी हो सकता जहां यह बातें देखने को मिल रही हों:

  • भूजल का अत्यधिक दोहन हो रहा हो

  • तेजी से शहरीकरण हो रहा हो

  • मानसून के दौरान जलभराव होता हो

  • वर्षा जल संचयन को अनिवार्य किया गया हो

  • जल संरक्षण परियोजनाओं के परिणाम मापने की जरूरत हो

ऐसे शहरों में यदि नगर निकाय भवन स्वीकृति के साथ फ्लो मीटर युक्त रिचार्ज प्रणाली को प्रोत्साहित करें तो जल संरक्षण की प्रभावशीलता कई गुना बढ़ सकती है।

कई चुनौतियों से भी होगा निपटना

हालांकि यह तकनीक उपयोगी है, लेकिन इसके सफल संचालन के लिए कुछ चुनौतियों का समाधान जरूरी है। प्रमुख चुनौतियां इस प्रकार हैं : 

  • इन संरचनाओं की शुरुआती लागत सामान्य संरचना से अधिक हो सकती है।

  • फ्लो मीटर का सही ढंग से कैलिब्रेशन और उसकी नियमित देखरेख जरूरी है।

  • फिल्टर की समय-समय पर सफाई करना जरूरी है।

  • डेटा रिकॉर्डिंग और विश्लेषण के लिए प्रशिक्षित कर्मियों की जरूरत होगी।

इन चुनौतियों के बावजूद जल संकट की गंभीरता को देखते हुए इसे जल संरक्षण की दिशा में एक दीर्घकालिक निवेश के रूप से लाभकारी माना जा सकता है।

निष्कर्ष : समझना होगा बारिश की हर बूंद का मोल 

जयपुर में स्थापित फ्लो मीटर युक्त भूजल पुनर्भरण संरचना केवल एक तकनीकी प्रयोग नहीं, बल्कि भारत के जल प्रबंधन दृष्टिकोण में संभावित बदलाव का संकेत है। यह पहल बताती है कि वर्षा जल संरक्षण की सफलता केवल संरचनाओं की संख्या से नहीं, बल्कि उस वास्तविक पानी से मापी जानी चाहिए जो जमीन के भीतर पहुंचकर भविष्य की जल आवश्यकताओं को सुरक्षित बनाता है।

‘कैच द रेन’ अभियान का मूल संदेश है कि हर बूंद को बचाया जाए। जयपुर का मॉडल इस संदेश को एक कदम आगे ले जाकर यह सुनिश्चित करने की कोशिश करता है कि हर बूंद का हिसाब भी रखा जाए। जल संकट के बढ़ते दौर में यही पारदर्शी और मापन-आधारित दृष्टिकोण भारत की दीर्घकालिक जल सुरक्षा को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

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