राजस्थान में मिट्टी और पत्थर की मदद से बनाया गया छोटा सा तालाब जोहड़।
चित्र: विकिमीडिया कॉमन्स
भारत की पारंपरिक एवं प्राचीन जल-संचयन प्रणालियों की सूची
भारत में अलग-अलग भौगोलिक परिस्थितियों, जैसे कि रेगिस्तान, पहाड़, तटीय क्षेत्र और नदी-घाटियों के अनुसार स्थानीय समुदायों ने सैकड़ों वर्षों में ऐसी जल-संचयन प्रणालियां विकसित कीं जो वर्षा जल संग्रह, भूजल रिचार्ज, सिंचाई और जल-सुरक्षा सुनिश्चित करती थीं।
इसी प्रकार भारत में खेती-किसानी के क्षेत्रीय परिस्थितियों के अनुसार भी विविधता पाई जाती है। किसी क्षेत्र में खेती का आधार बारिश का पानी होता है तो कहीं-कहीं नदियों, तालाबों और अन्य जल-निकायों के पानी को सिंचाई के लिए उपयोग में लाया जाता है।
इस तरह स्थानीय स्तर पर जल-उपलब्धता और पर्यावरण के अनुसार अलग-अलग कृषि पद्धतियां विकसित हुईं।
इनमें से कुछ प्रणालियों की राज्यवार सूची और संक्षिप्त विवरण इस प्रकार है।
1. जोहड़ (राजस्थान, हरियाणा): जोहड़ मिट्टी और पत्थर से बने छोटे बांध या तालाब होते हैं जिनमें वर्षा का पानी जमा किया जाता है। ये भूजल पुनर्भरण और ग्रामीण जल-सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण होते हैं।
2. डिग्गी (हरियाणा, राजस्थान): यह बड़े आकार का जलाशय होता है जिसमें नहर या वर्षा का पानी जमा किया जाता है और बाद में सिंचाई के लिए उपयोग किया जाता है।
3. खडीन (राजस्थान): यह खेतों के निचले भाग में मिट्टी का बांध बनाकर वर्षा जल रोकने की प्रणाली है। इससे पानी धीरे-धीरे मिट्टी में समा जाता है और खेतों में लंबे समय तक नमी बनी रहती है।
4. टांका (राजस्थान): टांका भूमिगत जल-टंकी होती है जिसमें छत या आँगन से वर्षा जल एकत्र किया जाता है। यह थार मरुस्थल में पेयजल उपलब्ध कराने का महत्वपूर्ण साधन रहा है।
5. कुंड (राजस्थान): कुंड गोलाकार या कटोरे के आकार की संरचना होती है। इसके चारों ओर ढलान बनाई जाती है ताकि वर्षा जल बहकर बीच के जलाशय में इकट्ठा हो सके।
6. नाड़ी (राजस्थान): नाड़ी गांवों के पास बनाए गए छोटे तालाब होते हैं जिनमें वर्षा का पानी जमा किया जाता है और इसका उपयोग पशुपालन व घरेलू जरूरतों के लिए किया जाता है।
7. चौका प्रणाली (राजस्थान): चौका वर्षा जल को रोकने के लिए बनाए गए चौकोर बांधों की श्रृंखला होती है, जिनसे पानी धीरे-धीरे खेतों में फैलता है और घास तथा मिट्टी की नमी बनाए रखता है।
8. जालरा (राजस्थान): जालरा सीढ़ीनुमा जलाशय होते हैं जिनके किनारों पर कई स्तरों की सीढ़ियां बनी होती हैं और इनमें वर्षा तथा भूजल का संग्रह होता है।
9. बावड़ी/बावली (राजस्थान, गुजरात, दिल्ली): बावड़ी या बावली सीढ़ीनुमा कुएँ होते हैं जो वर्षा जल को संग्रहित करने और लंबे समय तक सुरक्षित रखने के लिए बनाए जाते थे।
10. आहर-पाइन प्रणाली (बिहार): यह जल-संचयन और सिंचाई की पारंपरिक व्यवस्था है जिसमें आहर जलाशय होते हैं और पाइन नहरें होती हैं। यह प्रणाली बाढ़ के पानी को नियंत्रित कर खेतों तक पहुंचाने में मदद करती है।
11. पट प्रणाली (मध्य प्रदेश): इस प्रणाली में पहाड़ी नालों का पानी छोटे बांधों के माध्यम से मोड़कर सिंचाई नहरों में भेजा जाता है।
12. हवेली प्रणाली (मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़): इस प्रणाली में खेतों को वर्षा के पानी से भरकर रखा जाता है ताकि मिट्टी में नमी बनी रहे और रबी फसलों के लिए पानी उपलब्ध हो सके
बिहार की यह जल-संचयन और सिंचाई की पारंपरिक व्यवस्था है जिसमें आहर जलाशय होते हैं और पाइन नहरें होती हैं।
चित्र: इंडिया वाटर पोर्टल
13. रामटेक मॉडल (महाराष्ट्र): यह तालाबों और नहरों की श्रृंखला पर आधारित जल-संचयन प्रणाली है जिसका उपयोग सिंचाई और जल संरक्षण के लिए किया जाता था।
14. फड़ प्रणाली (महाराष्ट्र): यह सामुदायिक सिंचाई प्रणाली है जिसमें नदी पर छोटा बांध बनाकर पानी को नहरों के माध्यम से खेतों तक पहुंचाया जाता है।
15. बंधारा (महाराष्ट्र): बंधारा छोटे बांध या चेक-डैम होते हैं जिनके माध्यम से नदी या नाले का पानी रोककर सिंचाई और जल संरक्षण किया जाता है।
16. विरदा (गुजरात): कच्छ के रेगिस्तानी क्षेत्रों में रेत खोदकर मीठा पानी निकालने की पारंपरिक विधि को विरदा कहा जाता है।
17. भुंगरू (गुजरात): इस तकनीक में अतिरिक्त वर्षा जल को जमीन के भीतर जमा कर लिया जाता है और बाद में सिंचाई के लिए उपयोग किया जाता है।
18. केरे (कर्नाटक): केरे गांवों के पारंपरिक तालाब होते हैं जिनका उपयोग सिंचाई और भूजल पुनर्भरण के लिए किया जाता है।
19. कुंटे (कर्नाटक): छोटे जलाशय या तालाब जिनका उपयोग वर्षा जल संग्रह और सिंचाई के लिए किया जाता है।
20. कट्टा/मदाका (कर्नाटक): छोटे बांध या चेक-डैम जो वर्षा जल को रोककर खेतों की सिंचाई में मदद करते हैं।
21. कत्ता/कट्टा (कर्नाटक): कई छोटे जलाशयों की श्रृंखला जो वर्षा जल को क्रम में संग्रहित करती है।
22. सुरंगम (केरल, कर्नाटक): यह पहाड़ियों में बनाई गई क्षैतिज सुरंगें होती हैं जिनसे भूजल को गुरुत्वाकर्षण के सहारे बाहर लाया जाता है और जलाशय में संग्रह किया जाता है।
छोटे बांध या चेक-डैम जो वर्षा जल को रोककर खेतों की सिंचाई में मदद करते हैं।
चित्र: डाउन टू अर्थ
23. कोराम्बु (केरल): यह नदी के किनारे बनाई जाने वाली छोटी बांध संरचना है जिससे पानी खेतों की ओर मोड़ा जाता है।
24. पनम केनी (केरल): वायनाड क्षेत्र में आदिवासी समुदायों द्वारा उपयोग किए जाने वाले विशेष कुएँ जिनमें लकड़ी के बेलनाकार ढाँचे से झरने का पानी निकाला जाता है।
25. एरी प्रणाली (तमिलनाडु): एरी परस्पर जुड़े हुए टैंकों की श्रृंखला होती है। ये वर्षा जल को इकट्ठा करते हैं और अतिरिक्त पानी को अगले टैंक में भेजते हैं, जिससे सिंचाई और भूजल पुनर्भरण दोनों संभव होते हैं।
26. ऊरानी (तमिलनाडु): ऊरानी गांवों में बनाया गया छोटा जलाशय होता है, जिसका उपयोग मुख्य रूप से पेयजल के लिए किया जाता है।
27. चेरुवु (आंध्र प्रदेश, तेलंगाना): गांवों के बड़े तालाब जिनका उपयोग सिंचाई, पशुपालन और घरेलू जल आवश्यकताओं के लिए किया जाता है।
28. झिंग/झिंगरा (लद्दाख क्षेत्र): ये छोटे जलाशय होते हैं जिनमें ग्लेशियर के पिघले पानी को जमा किया जाता है। बाद में यही पानी सिंचाई के लिए उपयोग किया जाता है।
29. कुल/कूहल (हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर): ये छोटी नहरें होती हैं जिनके माध्यम से पहाड़ी नदियों या ग्लेशियर का पानी खेतों तक पहुंचाया जाता है।
30. घुल प्रणाली (हिमालयी क्षेत्र): घुल पहाड़ी ढलानों से पानी लाने वाली लंबी नहरें होती हैं जो सिंचाई के लिए उपयोग में लाई जाती हैं।
31. तालाब/बंधी (उत्तर भारत): ग्रामीण क्षेत्रों में बनाए जाने वाले पारंपरिक तालाब जिनमें वर्षा जल संग्रह कर कृषि और घरेलू उपयोग के लिए पानी उपलब्ध कराया जाता है।
32. बांस ड्रिप सिंचाई (मेघालय): इस प्रणाली में बांस की पाइपों के माध्यम से पहाड़ी झरनों का पानी धीरे-धीरे खेतों तक पहुंचाया जाता है। यह अत्यंत सटीक और कम पानी में प्रभावी सिंचाई का उदाहरण है।
33. अपातानी प्रणाली (अरुणाचल प्रदेश): यह जल-प्रबंधन प्रणाली धान और मछली की संयुक्त खेती पर आधारित है। पहाड़ी क्षेत्रों में जल का कुशल उपयोग कर खेती की जाती है।
34. चिओ-ओजिही (नागालैंड): यह बांस से बने चैनलों की प्रणाली है जिससे नदी का पानी पहाड़ी खेतों तक पहुंचाया जाता है।
35. ज़ाबो/रूजा (नागालैंड): यह पहाड़ी ढलानों पर विकसित जल-प्रबंधन प्रणाली है जिसमें जंगलों से आने वाला वर्षा जल तालाबों में जमा कर खेतों तक पहुंचाया जाता है।
36. जैकवेल (अंडमान-निकोबार): इस प्रणाली में पेड़ों से गिरने वाले पानी को बांस की नालियों से गड्ढों में इकट्ठा किया जाता है।
37. डोंग (असम): छोटी नहरें जिनके माध्यम से पहाड़ी नालों का पानी खेतों तक लाया जाता है।
38. तूरा/तुरा बांध (पूर्वोत्तर भारत): स्थानीय स्तर पर बनाए जाने वाले छोटे बाँध जिनसे वर्षा जल को रोका जाता है।
39. पोखर / पोखरी (उत्तर भारत, नेपाल सीमा क्षेत्र): गांवों में बनाए गए पारंपरिक तालाब जिनमें वर्षा जल संग्रहित किया जाता है।
40. कहुआ प्रणाली (बिहार): कहुआ बिहार के कुछ क्षेत्रों में प्रचलित पारंपरिक जल-प्रबंधन प्रणाली है। इसमें खेतों के बीच या निचले हिस्से में गड्ढेनुमा जलाशय बनाए जाते हैं, जहां वर्षा का पानी जमा होता है। यह पानी धीरे-धीरे आसपास की मिट्टी में समाकर भूजल स्तर बढ़ाने में मदद करता है और आवश्यकता पड़ने पर सिंचाई तथा पशुओं के लिए भी उपयोग में लाया जाता है।
41. पाट प्रणाली (मध्य प्रदेश): पाट प्रणाली मध्य प्रदेश के मालवा और निमाड़ जैसे क्षेत्रों में प्रचलित पारंपरिक सिंचाई व्यवस्था है। इसमें छोटी नदियों या पहाड़ी नालों पर अस्थायी या छोटे बांध बनाए जाते हैं, जिनसे पानी को मोड़कर नहरों के माध्यम से खेतों तक पहुंचाया जाता है।
42.करेज प्रणाली (राजस्थान): करेज प्रणाली राजस्थान के कुछ शुष्क क्षेत्रों में प्रचलित पारंपरिक भूमिगत जल-संचयन और जल आपूर्ति व्यवस्था है। इसमें पहाड़ी या ऊंचे भूभाग के नीचे कई भूमिगत सुरंग और कुएं बनाए जाते हैं, जिनके माध्यम से भूजल को गुरुत्वाकर्षण के सहारे सतह तक लाया जाता है।
43. डोभा प्रणाली (झारखंड, बिहार): डोभा छोटे गड्ढेनुमा तालाब होते हैं जिन्हें खेतों या गाँव के आसपास बनाया जाता है। इनमें वर्षा का पानी जमा होता है, जो धीरे-धीरे मिट्टी में समाकर भूजल बढ़ाता है और सिंचाई व पशुपालन में काम आता है। आमतौर पर इन्हें खेत के निचले हिस्से में बनाया जाता है ताकि आसपास का बहता पानी इसमें इकट्ठा हो सके।
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