सूखते नौले, बदलता पहाड़: कुमाऊं के परंपरागत जल स्रोतों की खत्म होती विरासत

उत्तराखंड में सैकड़ों साल पुराने नौले और धारें सूख रहे हैं। इसका सीधा असर महिलाओं, किसानों और गांव की रोज़मर्रा की ज़िंदगी पर पड़ रहा है, पर कुछ समुदाय इन्हें बचाने के लिए खुद आगे भी आए हैं।
सूखते नौले, बदलता पहाड़: कुमाऊं के परंपरागत जल स्रोतों की खत्म होती विरासत
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कुमाऊं के पहाड़ी गांवों में सुबह की शुरुआत आज भी वैसी ही दिखती है, जैसी दशकों पहले दिखती थी। घरों से महिलाएं गगरी और बाल्टी लेकर निकलती हैं, पगडंडियों से उतरती हैं, और नौले के पास कतार में लग जाती हैं। पर जो नहीं दिखता, वह है वह वक़्त जो अब इस काम में लगता है। जिन नौलों तक पहुंचने में कभी दस-पंद्रह मिनट लगते थे, वहां अब आधा घंटा या उससे ज़्यादा लग जाता है। कतार लंबी हो गई है, और पानी की धार पतली। यह बदलाव धीरे-धीरे हुआ है, इतना धीरे कि किसी एक दिन इसे महसूस करना मुश्किल है।

जब गांव के बुज़ुर्ग अपने बचपन की बातें करते हैं, तो फ़र्क साफ़ दिखता है। गाँव गडकोट की बुजुर्ग महिला कहती हैं, "पैली नौल जा बेरे उनो मुश्किल है जांछो मुश्किलेले 15 मिनट लागछय आब अद्ध घंट लाग जो" यानी पहले नौले तक जाकर आना मुश्किल से पंद्रह मिनट का काम था, अब आधा घंटा तो अकेले लाइन में ही लग जाता है।

वे बताती हैं कि नौले का पानी कभी इतना भरपूर होता था कि वह गांव की गलियों तक बह आता था और गर्मियों में भी पानी कभी कम नहीं पड़ता था। "हम आस्यंछनो पानी बाट लेंगे आ जाछो गोरु बाछछो हन लगे अलग-अलग पानी वाली जाग छी आब बरख में ले एती पानी नहॉन" (हमारे बचपन में इसी नौले का पानी गली तक बह आता था, मवेशियों के लिए अलग धारा थी। अब तो बरसात में भी उतना पानी नहीं दिखता)। आज वही नौले साल के कई महीने सूखे या कम पानी वाले रहते हैं। यह किसी एक गांव की बात नहीं है। यह पूरे कुमाऊं हिमालय में दोहराई जा रही एक ही कहानी है, और अब इसके पीछे ठोस आंकड़े भी मौजूद हैं।

<div class="paragraphs"><p>खरकाखोला (गाँव में पीने के पानी का एकमात्र  साधन) </p></div>

खरकाखोला (गाँव में पीने के पानी का एकमात्र साधन)

फोटो - सचिन गड़कोटी 

पूरे कुमाऊं में घटते जलस्रोत 

नौला पहाड़ों में बना एक पारंपरिक जल स्रोत है। इसे पत्थरों से इस तरह बनाया जाता है कि जमीन के अंदर से आने वाला पानी इसमें जमा हो सके। राज्य के वन विभाग की अगुवाई में बनी जल स्रोत प्रबंधन समिति की एक रिपोर्ट बताती है कि उत्तराखंड के तक़रीबन 4,000 गांव इस समय जल संकट से जूझ रहे हैं। राज्यभर में लगभग 510 जल स्रोत या तो सूख चुके हैं या सूखने की कगार पर हैं।

इनमें सबसे बुरा हाल अल्मोड़ा जिले का है, जहां अकेले 300 जल स्रोत दम तोड़ चुके हैं। नीति आयोग की एक रिपोर्ट इस तस्वीर को और गहरा करती है। इसके अनुसार राज्य के प्राकृतिक जल स्रोतों के जल-स्तर में साठ फीसदी तक की गिरावट दर्ज की गई है।  

उत्तराखंड जल संस्थान की एक अलग रिपोर्ट के अनुसार राज्यभर में 1,544 इलाके जल संकट-ग्रस्त चिन्हित किए गए हैं, जिनमें देहरादून, नैनीताल और टिहरी सबसे आगे हैं। राज्य की बड़ी ग्रामीण आबादी आज भी पीने के पानी के लिए, प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से, इन्हीं परंपरागत स्रोतों पर निर्भर है। यह निर्भरता इतनी गहरी है कि नौले का सूखना सिर्फ़ एक पर्यावरणीय घटना नहीं, बल्कि पूरे गांव की अर्थव्यवस्था, खेती और सामाजिक ढांचे को हिला देने वाली घटना बन जाती है।

आंकड़े तो हमारे पास भी हैं, पर हर गांव तक टीम पहुंचा पाना अभी भी एक चुनौती है।

जल संस्थान टीम चंपावत

नौलों में पानी क्यों कम हो रहा है?

नौला पहाड़ों में भूगर्भीय जलधाराओं के ऊपर बनी सीढ़ीदार पत्थर की संरचना सदियों से इस इलाके की जीवनरेखा रहा है। कुएं, नलकूप और पाइपलाइन आने से पहले, यही नौले और धारे गांव-गांव की प्यास बुझाते थे। अल्मोड़ा शहर, जिसे चंद राजाओं ने 1563 में अपनी राजधानी बनाया था, कभी अपने 360 नौलों के लिए जाना जाता था, जिनमें चम्पानौला, घासनौला, बालेश्वर नौला, हाथी नौला, कपीना नौला प्रमुख रूप से शामिल हैं।

अल्मोड़ा के निवासी रोहन कुमार बताते हैं, "नौला हमारे यहां सबसे पुराना माना जाता है, बुज़ुर्ग कहते थे उसमें एक देवी बसती हैं इसलिए कोई उसे गंदा नहीं करता था"।

अगर इतिहास के पन्ने पलटें तो पाएंगे कि गाँव की सामूहिकता ही नौले की असली ताकत थी। गांव के लोग मिलकर नौले की सफ़ाई करते, उसके आसपास के जंगल को बचाए रखते, और यह सब बिना किसी सरकारी योजना या फंडिंग के होता था। यह सामाजिक अनुबंध जितना मज़बूत रहा, नौला उतना ही ज़िंदा रहा। जैसे-जैसे यह सामूहिकता कमज़ोर हुई, नौलों की सेहत भी बिगड़ती गई।

पांच सदियों बाद, अल्मोड़ा के ज़्यादातर नौले या तो पूरी तरह ग़ायब हो चुके हैं, या अपने अस्तित्व की आख़िरी लड़ाई लड़ रहे हैं। बेतरतीब निर्माण, सड़कों के लिए हो रहा कंक्रीटीकरण और बार-बार आने वाले भूकंपीय झटकों ने इन नौलों की नाज़ुक भूमिगत जल-नाड़ियों को तोड़ दिया है। जब पानी का यह प्राकृतिक प्रवाह रुक जाता है, तो नौले का सूखना शुरू हो जाता है और कई बार वह दोबारा कभी नहीं भर पाता। ऐसा ही कुछ पूरे उत्तराखंड में हो रहा है। 

<div class="paragraphs"><p>संज्ञुताल (गडकोट) </p></div>

संज्ञुताल (गडकोट)

फोटो - सचिन गड़कोटी 

जलवायु परिवर्तन का इशारा

नौलों के सूखने के पीछे सिर्फ़ निर्माण और कंक्रीटीकरण ही कारण नहीं हैं। पहाड़ों में बारिश का पैटर्न बदल रहा है। कुल बारिश उतनी कम नहीं हुई जितनी उसकी नियमितता गड़बड़ाई है। पहले जो बारिश महीनों में फैली रहती थी, वह अब कुछ दिनों की तेज़ बौछारों में सिमट जाती है। कुमाऊं हिमालय पर फ्रंटियर्स में प्रकाशित एक हालिया अध्ययन के मुताबिक, बढ़ता तापमान, बारिश की बढ़ी हुई तीव्रता, मौसमी पैटर्न में बदलाव और खासकर सर्दियों की बारिश में आई कमी, जल स्रोतों के घटते प्रवाह से सीधे जुड़े पाए गए हैं। इतनी तेज़ बारिश ज़मीन में रिसने का मौक़ा नहीं पाती, वह ढलानों से बहकर सीधे नदी-नालों में चली जाती है, और भूजल भंडार (जलभृत) को उतना नहीं भर पाती जितना पहले भरता था। यही वह पानी है, जो सालों में रिस-रिसकर नौलों की जल-नाड़ियों तक पहुंचता था।

एक अनुमान के मुताबिक उत्तराखंड की लगभग नब्बे फीसदी आबादी पीने के पानी के लिए प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से इन्हीं प्राकृतिक जल स्रोतों पर निर्भर है। भूजल के रिचार्ज कम होने से यह पूरी आबादी जलसंकट की ओर बढ़ रही है। यह परेशानी आम जनता के चेहरे पर दिखने भी लगी है। गड़कोट के भुवन चंद्र गडकोटी कहते हैं, "बरख ए बेर ले उत्ती बड़ीय भे, पर नौलों में पानी उत्ती रे जो समझ ना उनु की पानी जान को रो" (बारिश तो इस साल भी अच्छी हुई, पर नौले में पानी उतना ही रहा जितना पहले था समझ नहीं आता कहां चला जाता है)।  

<div class="paragraphs"><p>सप्तेश्वर वाटरफॉल, उत्तराखंड&nbsp;</p></div>

सप्तेश्वर वाटरफॉल, उत्तराखंड 

फोटो - सचिन गड़कोटी 

जंगलों में आग की घटनाओ का नौलों पर असर 

पहाड़ पहले बांज, बुरांश और काफल से भरे रहते थे। गधेरों में हमेशा पानी रहता था। अब वो सूखे पड़े हैं, बस चीड़ के पेड़ ही बचे हैं। ये बात पौड़ी गढ़वाल और अल्मोड़ा के कई गाँवों में बार-बार सुनने को मिली, और यही याद है जो बताती है कि लोग इस बदलाव को कैसे महसूस करते हैं। बुज़ुर्गों का कहना है कि बांज और मिश्रित जंगल ज़्यादा ठंडे रहते थे, मिट्टी में नमी बनी रहती थी, इसी वजह से गर्मियों में भी धाराएँ और स्रोत काफी देर तक चलते रहते थे। बुज़ुर्गों का एक समूह बताता है, "गाँवों की पहाड़ी ढलानें पहले ज़्यादातर बांज से ढकी रहती थीं, इसी वजह से हमारा प्राकृतिक गधेरा बहता रहता था, पर अब वहाँ सिर्फ़ सूखी चीड़ की पत्तियों की मोटी परत बची है।" बुज़ुर्गों का यह भी मानना है कि बढ़ता तापमान और बदलता बारिश का पैटर्न उन इलाकों में चीड़ को फैलने का मौका दे रहा है, जहाँ पहले चौड़ी पत्ती वाले जंगल हुआ करते थे।

<div class="paragraphs"><p>बड़ौली गांव की नदी </p></div>

बड़ौली गांव की नदी

फोटो - सचिन गड़कोटी 

अध्ययन में शामिल कुल 110 लोगों में से 85% ने पिछले दस सालों में चीड़ की बढ़ोतरी महसूस की, और गाँव वाले इसे मिट्टी की सूखापन, घटती जैव-विविधता और जंगल की आग से जोड़कर देखते हैं। वन सर्वेक्षण विभाग (2023) के आँकड़े भी यही कहते हैं उत्तराखंड में चीड़ के पेड़ों की संख्या 2019 में करीब 1,67,274 हज़ार से बढ़कर 2023 में 1,93,883 हज़ार तक पहुँच गई, जबकि इस दौरान कोई नया चीड़ रोपण अभियान भी नहीं चला। जंगल की आग स्थानीय लोगों के लिए बड़ा खतरा बन गई है। सूखी पत्तियाँ और जलते चीड़ के शंकु (pine cones) ढलान से नीचे लुढ़कते हुए आग को तेज़ी से फैला देते हैं। 82% लोगों ने बताया कि आग की घटनाएँ काफी बढ़ी हैं। ये बात सरकारी आँकड़ों से भी मिलती है।

अल्मोड़ा में जंगल की आग 2022-23 के 786 मामलों से बढ़कर 2023-24 में 2,810 हो गई, और पौड़ी गढ़वाल में 928 से बढ़कर 3,193 तक पहुँच गई। पानी के सूखने का सीधा नाता भी लोग इसी बदलते जंगल से जोड़ते हैं  88% लोगों ने प्राकृतिक जल स्रोतों में साफ गिरावट देखी है। खेती पर भी असर पड़ा है, 69% ने खेती की पैदावार घटने की बात कही, और चारा व लकड़ी जुटाने वाली महिलाओं को अब दस साल पहले के मुकाबले 3-4 किलोमीटर ज़्यादा चलना पड़ता है। स्थानीय निवासी गोपाल कहते हैं, "बांज के जंगलों में पहले ठंडक रहती थी, पानी टिका रहता था, पर चीड़ के जंगलों में सब कुछ सूख जाता है मिट्टी, हवा, यहाँ तक कि पानी भी।"  

<div class="paragraphs"><p>गोठ्या गाड़ </p></div>

गोठ्या गाड़

फोटो - सचिन गड़कोटी 

महिलाओं के जीवन को कैसे प्रभावित कर रहे सूखते नौले 

कुमाऊं के गांवों में सुबह का समय अब भी महिलाओं के इर्द-गिर्द घूमता है। पानी लाना, खाना बनाना, मवेशियों की देखभाल यह सब एक ही सुबह में समा जाता है, और नौले तक बढ़ती दूरी इस पूरे दिन को प्रभावित करती है। जिस समय पहले घर के दूसरे काम में लगता था, वह अब पानी के इंतज़ार में बीतता है। पाटी गाँव की एक महिला कहती है, " जत्ती टाइम पानी लुन मे जाझ उत्ती में ननतिनो स्कूलो को काम करा दिच्छ्यू और सिलाई काम ले कर लिच्छ्यू " (जो समय पानी लाने में जाता है, उतने में बच्चों का होमवर्क भी करा देती, सिलाई का काम भी निकाल लेती) यह असर सिर्फ़ शारीरिक थकान का नहीं है, यह उस वक़्त का नुकसान है जो कहीं और, शायद बच्चों की पढ़ाई में या अपनी आमदनी बढ़ाने में लग सकता था। 

खेतों में नहीं पहुंच रहा नौलों का पानी 

किसानों के लिए यह संकट एक अलग रूप में सामने आता है। नौले और धारे सिर्फ़ पीने के पानी के लिए नहीं, बल्कि सिंचाई के लिए भी इस्तेमाल होते रहे हैं। जब जल स्तर घटता है, तो सबसे पहले खेतों की सिंचाई प्रभावित होती है। सब्ज़ियों और मौसमी फसलों की पैदावार कम होने लगती है, और धीरे-धीरे खेती को जारी रखना मुश्किल होता जाता है। खेतिखान के अमर राम कहते है, " पैली ये गड़ मे तीन बार खेती करच्छया  आब पानी कमी मे एक बार गुजार करन पड़नो " (पहले इसी खेत में तीन बार फ़सल लेते थे, अब पानी की कमी से एक ही बार में गुज़ारा करना पड़ता है ) यही वह मोड़ है, जहां पानी की कहानी पलायन की कहानी से जुड़ जाती है। 

पहाड़ी खेती वैसे भी बारिश और छोटे जल स्रोतों पर निर्भर सीढ़ीदार खेतों की खेती है, जहां बड़ी सिंचाई परियोजनाएं पहुंच ही नहीं पातीं। ऐसे में नौले और धारे ही किसान का असली भरोसा रहे हैं। जब यह भरोसा टूटता है, तो पहला असर उन फसलों पर पड़ता है जिन्हें बार-बार पानी चाहिए होता है। किसान धीरे-धीरे उन फसलों की ओर मुड़ते हैं जिन्हें कम पानी चाहिए, या फिर खेत को खाली छोड़ देते हैं। खाली पड़े खेत किसी गांव के भविष्य के सबसे शांत, पर सबसे साफ़ संकेत होते हैं।

पानी और पलायन की आपस में बुनी कहानी

कुमाऊं में जब भी पलायन की बात होती है, उसके कारणों में शिक्षा और रोज़गार सबसे ऊपर गिनाए जाते हैं। पर पानी इस सूची में अक्सर पीछे छूट जाता है, जबकि यह उतना ही बड़ा कारण है। जिस गांव में पानी लाने के लिए रोज़ घंटों चलना पड़े, वहां खेती टिकना मुश्किल हो जाता है। जब खेत सूखते हैं, तो परिवार शहर की ओर मुड़ते हैं। और जब परिवार जाते हैं, तो नौले की देखभाल करने वाले हाथ भी कम होते जाते हैं। गड़कोट मे रही दादी माँ कहती  है, " घर बठै द्वी च्यैल माँव निस ग्यौन आब नौले सफाई में एक द्वि आदमी छन बस और उने बच रयौन" (घर से दो लड़के शहर चले गए, अब नौले की सफ़ाई के वक़्त गिने-चुने हाथ ही बचते हैं ) सफ़ाई, मरम्मत, कैचमेंट एरिया की रखवाली यह सब सामूहिक ज़िम्मेदारी थी, जो अब बिखरती जा रही है। यह एक चक्र बन जाता है: पानी की कमी पलायन को बढ़ाती है, और पलायन उस सामुदायिक ढांचे को कमज़ोर करता है, जो पानी को बचाए रख सकता था। इस चक्र को समझे बिना, न पलायन की कहानी पूरी होती है, न पानी की।

<div class="paragraphs"><p>कफलांग में पीने योग्य पानी के लिए नौले की सफाई।  </p></div>

कफलांग में पीने योग्य पानी के लिए नौले की सफाई।

फोटो - सचिन गड़कोटी 

कुछ नौले अब भी कैसे बचे हैं? 

हर जगह कहानी उजड़ने की नहीं है। पिथौरागढ़ के गंगोलीहाट में बारहवीं सदी का जाह्नवी का नौला, और चम्पावत में उससे भी पुराना रानी का नौला, आज भी साल भर पानी से भरे रहते हैं। यह उन्हीं शहरों में हो रहा है, जहां गर्मियों में टैंकरों से पानी पहुंचाना अब आम बात बन चुकी है। यह विरोधाभास ही इस पूरी कहानी की सबसे तीखी परत है। कुछ सैकड़ों साल पुराने जल स्रोत आज भी ज़िंदा हैं, जबकि उनके ठीक बगल में बनी दशकों पुरानी पाइपलाइनें दम तोड़ चुकी हैं। 

सवाल यह नहीं है कि पानी कहां गया, सवाल यह है कि कुछ जगहों पर यह अब भी क्यों बचा हुआ है। हिमांतर की एक रिपोर्ट के अनुसार, जिन नौलों का कैचमेंट एरिया यानी उसके आसपास का जंगल सुरक्षित रह गया, वे नौले भी बचे रहे। जहां जंगल कटा, वहां पानी भी साथ ले गया।

<div class="paragraphs"><p>पानी का कुंड ( सिप्टी )</p></div>

पानी का कुंड ( सिप्टी )

जब समुदाय खुद आगे आता है

उत्तराखंड अकेला राज्य नहीं है जहां पानी को लेकर समुदाय ने खुद कमान संभाली है। बुंदेलखंड जैसे गंभीर जल-संकट वाले इलाकों में महिलाओं के समूहों ने, जिन्हें 'जल सहेली' कहा जाता है, पहाड़ काटकर अपने गांव तक पानी लाने और तालाबों को पुनर्जीवित करने का काम किया है। इन प्रयासों का असर सिर्फ़ पानी तक सीमित नहीं रहा   इससे महिलाओं के बीच सामाजिक भेदभाव कम हुआ, और कई जल सहेलियां बाद में ग्राम प्रधान जैसे पदों तक पहुंचीं। बांदा ज़िले के जखनी गांव में जल संरक्षण के बाद जो युवा पलायन कर चुके थे, वे वापस लौटकर खेती करने लगे। यह उदाहरण दिखाते हैं कि जल संकट कोई ऐसी नियति नहीं है, जिसे सिर्फ़ झेला जा सकता है। कुमाऊं के भी कुछ गांवों में लोगों ने इसी तरह की पहल की है   नौले के आसपास बांज, बुरांश और रिंगाल जैसे पारंपरिक पेड़ों को फिर से लगाना, नौले की नियमित सफ़ाई करना, और शैवाल-फर्न जैसी वनस्पतियों को हटाकर पानी की गुणवत्ता बनाए रखना। भरत ने कहा  "हमने बांज के पेड़ फिर से लगाने शुरू किए, धीरे-धीरे नौले में पानी लौटता दिख रहा है"  यह कोई नई तकनीक नहीं है, यह वही पुराना ज्ञान है, जिसे पीढ़ियों ने बिना किसी रिपोर्ट या फंडिंग के अपनाया था। फ़र्क बस इतना है कि अब इसे फिर से, जानबूझकर, दोबारा अपनाना पड़ रहा है। बुंदेलखंड के अगरौठा और भोयरा जैसे गांवों की जल सहेलियों की कहानी एक और बात स्पष्ट करती है   जल संरक्षण का काम अक्सर उन्हीं महिलाओं ने सबसे आगे बढ़कर किया, जो रोज़ इस संकट को सबसे क़रीब से झेलती थीं। इस काम का असर सिर्फ़ पानी तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इससे जाति और लैंगिक भेदभाव जैसी पुरानी सामाजिक दीवारों में भी दरार पड़ी। जो महिलाएं कभी सिर्फ़ पानी ढोने के लिए जानी जाती थीं, वे बाद में गांव के फ़ैसलों में भी बराबर की हिस्सेदार बनीं। कुमाऊं में भी यह मॉडल उतना ही मौजूं है, क्योंकि यहां भी पानी का बोझ सबसे ज़्यादा महिलाओं के कंधों पर ही है।

<div class="paragraphs"><p>नौले के रूप में जल मंदिर&nbsp;</p></div>

नौले के रूप में जल मंदिर 

क्या सिखाती है नौले की वास्तुकला में छिपी सोच? 

कुमाऊं के पुराने नौलों के भीतरी हिस्से में देवी-देवताओं की मूर्तियां स्थापित की गई हैं। मान्यता है कि जलशायी विष्णु को जल-वापी यानी जल संरचनाओं में प्रतिष्ठित किया जाना चाहिए, इसलिए विष्णु को नौलों में प्रमुखता से स्थान दिया गया। हथिया नौला, स्यूनराकोट का नौला, नागनौला, जाह्नवी का नौला ये सिर्फ़ पानी के स्रोत नहीं, कलात्मक वास्तुकला के नमूने भी हैं, जिनमें पत्थरों पर लोकजीवन के दृश्य उकेरे गए हैं। 

यह कलात्मकता बताती है कि पुराने समय के समुदायों के लिए पानी सिर्फ़ एक संसाधन नहीं, एक पवित्र चीज़ थी, जिसे संजोकर रखना धार्मिक और सामाजिक, दोनों तरह का दायित्व माना जाता था। आज जब नौले सिर्फ़ एक तकनीकी समस्या की तरह देखे जाते हैं, तो शायद उस पुरानी श्रद्धा का कुछ हिस्सा भी कहीं खो गया है, जो कभी इन जल स्रोतों की सबसे बड़ी रक्षक हुआ करती थी।

<div class="paragraphs"><p>एकहथिया नौला (ढकना गांव)</p></div>

एकहथिया नौला (ढकना गांव)

कानून है, पर ज़मीन पर कहां?

1975 का कुमाऊं-गढ़वाल जल संचय संग्रह वितरण अधिनियम आज भी किताबों में मौजूद है। यह कहता है कि किसी भी जल स्रोत के 100 मीटर के दायरे में कोई झाड़ी, पौधा या पेड़ नहीं काटा जाएगा, क्योंकि यही इलाका, जिसे कैचमेंट एरिया कहा जाता है, नौले को पानी देता है। लेकिन जिन शहरों और गांवों में यह कैचमेंट एरिया ख़ुद कंक्रीट के जंगल में बदल चुका है, वहां यह कानून सिर्फ़ काग़ज़ पर रह गया है। राज्य सरकार ने भी हाल के वर्षों में इस समस्या को गंभीरता से लिया है। मुख्य सचिव स्तर पर इस मुद्दे पर चिंता जताए जाने के बाद, नौले-धारों और अन्य जलस्रोतों को संरक्षित करने के लिए एक एकीकृत एजेंसी बनाने की दिशा में कदम उठाए गए हैं। यह एक ज़रूरी और स्वागतयोग्य शुरुआत है। पर सरकारी योजनाओं का उत्तराखंड में एक जाना-पहचाना इतिहास रहा है   नीयत अच्छी होती है, पर ज़मीन पर असर सीमित रह जाता है। गाँव के सरपंच कहते है  "नई कम्पनी जहै उने उम्मीद त छ आब काम कागजो है अग्गधा बढलो" (नई एजेंसी बन रही है, उम्मीद है इस बार बात सिर्फ़ कागज़ पर नहीं रहेगी )  नौलों के संरक्षण के नाम पर पहले भी जो प्रयास हुए, वे अक्सर नाकाफ़ी साबित हुए हैं। असली इम्तिहान यही है कि क्या यह नई एजेंसी किसी दूरदराज़ गांव के नौले तक पहुंच पाएगी, या फिर यह भी सिर्फ़ एक और घोषणा बनकर रह जाएगी।

<div class="paragraphs"><p>चनोली गाँव का प्राचीन नौला </p></div>

चनोली गाँव का प्राचीन नौला

क्या नल लग जाना सचमुच पानी की समस्या हल कर देता है?

सरकार कहती है कि ‘हर घर जल’ के तहत गांवों में नल से पानी पहुंचाया जा रहा है। जल जीवन मिशन के उत्तराखंड के आंकड़ों के अनुसार राज्य में 14,979 गांव और करीब 14.48 लाख ग्रामीण परिवार दर्ज हैं। इनमें 14.20 लाख घरों में नल कनेक्शन दर्ज है, यानी करीब 98 प्रतिशत ग्रामीण घर नल कनेक्शन से जुड़े हुए हैं।  उत्तराखंड के सरकारी आंकड़े लेकिन सवाल यहीं से शुरू होता है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार उत्तराखंड के 14,925 गांवों में पाइप्ड वाटर सप्लाई दर्ज है। इन गांवों में करीब 14.46 लाख ग्रामीण परिवार हैं, जिनमें 14.20 लाख परिवारों के घरों में नल कनेक्शन दर्ज है। यानी इन गांवों में भी करीब 26,400 परिवार ऐसे हैं जिनके घरों में नल कनेक्शन दर्ज नहीं है। लेकिन जमीन पर सवाल सिर्फ उन घरों का नहीं है जहां नल अभी पहुंचा ही नहीं। कई गांवों में घर के बाहर नल लगा है, लेकिन उसमें नियमित पानी नहीं आता। लोग आज भी नौले, धारे और दूसरे प्राकृतिक जलस्रोतों से पानी लाते हैं। कई परिवारों को इसके लिए रोज पैदल दूरी तय करनी पड़ती है और खासकर महिलाओं का काफी समय पानी लाने में चला जाता है। 

<div class="paragraphs"><p>धारा – गडकोट गाँव का जीवनदायी जलस्रोत।</p></div>

धारा – गडकोट गाँव का जीवनदायी जलस्रोत।

यहीं असली सवाल है नल कितने घरों में लगा है, यह जानना काफी नहीं है। उन नलों में पानी कितने घरों में और कितनी नियमितता से आता है, यह जानना ज्यादा जरूरी है। खुद जल जीवन मिशन के अनुसार ‘हर घर जल’ का मतलब केवल नल कनेक्शन होना नहीं है। ‘रिपोर्टेड’ गांव वह है जहां राज्य का जलापूर्ति विभाग पुष्टि करता है कि सभी घरों, स्कूलों और आंगनबाड़ी केंद्रों में नल से पानी पहुंच रहा है, जबकि ‘सर्टिफाइड’ होने पर ग्राम सभा भी इसकी पुष्टि करती है। 

इसलिए उत्तराखंड की असली कहानी सिर्फ 14.20 लाख नल कनेक्शन की नहीं है। असली सवाल यह है कि इन नलों में पानी कहां से आ रहा है या भविष्य में आयेगा। जल जीवन मिशन के तहत घरों में पानी की सप्लाई भी नौलों, धारोें और नदियों से की जा रही है। ऐसे में घूम फिर कर राज्य में पीने के पानी की निर्भरता नौलों-धारों पर ही है और पानी के इन स्रोतों की वर्तमान स्थिति भविष्य के लिए चुनौती बन रही है। 

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