जलवायु परिवर्तन के कारण फरवरी में तापमान बढ़ने का असर रबी की फसलों पर पड़ रहा है।
स्रोत : इंडिया वाटर पोर्टल
फरवरी में अधिक तापमान घटा सकता है रबी फसलों की पैदावार
मौसम विभाग ने चेतावनी दी कि जनवरी में असामान्य रूप से गर्म मौसम के बाद इस महीने भारत में गर्मी और सूखापन (शुष्कता) बढ़ेगा, जिससे गेहूं, सरसों और चना जैसी प्रमुख शीतकालीन फसलों की पैदावार घटने का जोखिम बढ़ जाएगा।
मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के महानिदेशक मृत्युंजय महापात्रा ने शनिवार को कहा कि फरवरी में देश के अधिकांश हिस्सों में अधिकतम और न्यूनतम तापमान औसत से अधिक रहेगा। इससे गेहूं और जौ जैसी फसलों की पैदावार में कमी आ सकती है, क्योंकि सामान्य से अधिक तापमान फसलों की ग्रोथ को प्रभावित कर सकता है। उन्होंने कहा कि देश के उत्तर-पश्चिमी भाग और उससे सटे मध्य भारत के कई हिस्सों में इस साल शीत लहर वाले दिन सामान्य से कम देखने को मिले हैं। इसके चलते फरवरी में औसत तापमान सामान्य से ज़्यादा रहने की संभावना है।
फरवरी में ही तय होती है रबी फसल की ग्रोथ
मौसम विभाग के आंकड़े भी इस बात की पुष्टि करते हैं, कि इस साल जनवरी में न्यूनतम और अधिकतम तापमान औसत से अधिक रहा, क्योंकि देश में औसत से 31.5% कम वर्षा हुई। इससे भारत के उत्तरी भाग में स्थित पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों और मध्य भारत में स्थित मध्य प्रदेश में रबी की फसलों की पैदावार कम रहने की आशंका है। दरअसल रबी की फसलों में कम तापमान की जरूरत होती है और, इस बार कड़ाके की ठंड और शीतलहर वाले दिनों की कमी के कारण फरवरी में ऐसा माहौल मिल पाना मुश्किल दिखाई दे रहा है। ऐसे में रबी फसलों की पैदावार प्रभावित होने की आशंका है।
उत्तर और मध्य भारत में रबी फसलों के तहत मुख्य रूप से गेहूं, सरसों और चना जैसी शीतकालीन फसलें अक्टूबर से दिसंबर तक बोई जाती हैं। अच्छी पैदावार के लिए उनके बढ़ने के दौरान कम तापमान की ज़रूरत होती है। कृषि वैज्ञानिकों और किसानों दोनों के अनुभव के मुताबिक फरवरी का महीना रबी फसलों, खासकर गेहूं और सरसों के लिए निर्णायक माना जाता है। इस दौरान गेहूं में बाल निकलने और दाना बनने की प्रक्रिया शुरू होती है, जिसे ग्रेन फिलिंग स्टेज कहा जाता है। इसी चरण में तापमान सामान्य से अधिक हो जाए तो दानों का आकार छोटा रह जाता है और वजन कम हो जाता है, जिससे सीधे तौर पर पैदावार प्रभावित होती है।
भारतीय मौसम विभाग पहले ही चेतावनी दे चुका है कि इस बार फरवरी में औसत से ज्यादा तापमान रहने की संभावना है, जो रबी फसलों के लिए जोखिम बढ़ाता है। इस साल यह चिंता इसलिए भी ज्यादा है क्योंकि किसानों ने रिकॉर्ड स्तर पर गेहूं की बुवाई की है।
कृषि मंत्रालय के अनुसार 23 जनवरी तक देश में 33.42 मिलियन हेक्टेयर क्षेत्र में गेहूं और 8.94 मिलियन हेक्टेयर में सरसों की बुवाई हो चुकी है। इतनी बड़ी खेती के बावजूद यदि फरवरी–मार्च में तापमान तेजी से बढ़ता है तो उत्पादन में गिरावट का असर राष्ट्रीय स्तर पर दिख सकता है। विशेषज्ञों का कहना है कि लगातार दो–तीन हफ्ते भी अगर तापमान सामान्य से ऊपर रहा, तो इसका असर अंतिम उत्पादन आंकड़ों पर पड़ना तय है।
गेहूं और धान की रबी फसल में दाने पड़ने और फूलने की प्रक्रिया फरवरी में ही पूरी होती है, जिसके लिए कम तापमान की ज़रूरत होती है। ऐसे में तापमान ज़्यादा रहने से उपज कम होने की संभावना है।
स्रोत : विकी कॉमंस
खाद्य तेल का करना पड़ सकता है आयात
सरसों और लाही (रेपसीड) जैसी तिलहनी फसलों की पैदावार में कमी का सीधा असर देश के खाद्य तेल संतुलन पर पड़ता है। भारत पहले से ही दुनिया का सबसे बड़ा वनस्पति तेल आयातक है और घरेलू उत्पादन में थोड़ी सी गिरावट भी आयात निर्भरता को और बढ़ा देती है। यदि फरवरी के ज्यादा तापमान के कारण सरसों की फसल प्रभावित होती है, तो सरकार को खाना पकाने के तेल की मांग पूरी करने के लिए आयात बढ़ाना पड़ सकता है।
वर्तमान में भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात के जरिए पूरा करता है। देश मुख्य रूप से इंडोनेशिया, मलेशिया और थाईलैंड से ताड़ का तेल मंगाता है, जबकि सोयाबीन तेल और सूरजमुखी तेल की आपूर्ति अर्जेंटीना, ब्राजील, रूस और यूक्रेन से होती है।
तिलहनों की घरेलू पैदावार कमजोर रहने की स्थिति में न सिर्फ आयात बिल बढ़ेगा, बल्कि वैश्विक बाजार की कीमतों का असर भी सीधे उपभोक्ताओं तक पहुंचेगा। ऐसे में फरवरी का मौसम रबी फसलों के साथ-साथ खाद्य तेल की कीमतों के लिहाज से भी अहम बन गया है।
खाद्य सुरक्षा और महंगाई पर भी असर पड़ने की आशंका
रबी फसलों की पैदावार में संभावित गिरावट का असर केवल किसानों की आमदनी तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इसका सीधा संबंध देश की खाद्य सुरक्षा और उपभोक्ता कीमतों से भी है।
गेहूं भारत की सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) की रीढ़ है और इसका इस्तेमाल राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम के तहत करोड़ों लोगों को सस्ती दरों पर अनाज उपलब्ध कराने में होता है। यदि अधिक तापमान के कारण गेहूं का उत्पादन अनुमान से कम रहता है, तो सरकारी खरीद प्रभावित हो सकती है और बफर स्टॉक पर दबाव बढ़ सकता है। इससे खुले बाजार में आपूर्ति घटने और कीमतों में तेजी आने का जोखिम बढ़ जाता है।
तिलहनी फसलों, खासकर सरसों, की पैदावार कमजोर रहने की स्थिति में खाद्य तेल की कीमतों पर भी दबाव बढ़ना तय माना जा रहा है। भारत पहले से ही वनस्पति तेल के लिए आयात पर निर्भर है और घरेलू उत्पादन में कमी आने पर अंतरराष्ट्रीय बाजार से ज्यादा मात्रा में तेल खरीदना पड़ता है। वैश्विक कीमतों में उतार-चढ़ाव और रुपये की स्थिति का असर सीधे घरेलू खुदरा कीमतों पर पड़ता है। ऐसे में फरवरी में तापमान का सामान्य से ऊपर जाना न केवल रबी उत्पादन के लिए चेतावनी है, बल्कि आने वाले महीनों में खाद्य महंगाई को लेकर भी एक गंभीर संकेत माना जा रहा है।
ग्लोबल वॉर्मिंग के कारण हो रहा तापमान का असंतुलन खेती और बागवानी को प्रभावित कर रहा है।
स्रोत : इंडिया वाटर पोर्टल
बढ़ता दिख रहा जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वॉर्मिंग का असर
इस साल सर्दियों के दौरान शीतलहर वाले दिनों की संख्या में कमी और फरवरी में औसत से अधिक तापमान का पूर्वानुमान केवल मौसमी उतार-चढ़ाव नहीं, बल्कि जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वॉर्मिंग के दीर्घकालिक रुझानों से जुड़ा माना जा रहा है। मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार भारत में सर्दियों का पैटर्न तेजी से बदल रहा है, जहां ठंड की अवधि छोटी होती जा रही है और तापमान में अचानक बढ़ोतरी की घटनाएं बढ़ रही हैं।
ग्लोबल वार्मिंग के कारण वायुमंडल में जमा अतिरिक्त ऊष्मा सर्दियों के महीनों में भी तापमान को सामान्य से ऊपर बनाए रख रही है, जिसका सीधा असर रबी फसलों के संवेदनशील विकास चरणों पर पड़ता है। हाल के वर्षों में फरवरी और मार्च के दौरान बार-बार रिकॉर्ड या औसत से अधिक तापमान दर्ज किया जाना इस बात का संकेत है कि कृषि को प्रभावित करने वाले जोखिम अब अपवाद नहीं, बल्कि नई सामान्य स्थिति बनते जा रहे हैं।
जलवायु परिवर्तन के कारण इस साल भी रबी फसलों पर मंडराता खतरा एक अकेली घटना नहीं, बल्कि बदलती जलवायु के व्यापक असर का हिस्सा है, जिसे कृषि नीति और खाद्य सुरक्षा की रणनीतियों में गंभीरता से शामिल करना जरूरी हो गया है।
भारत में तापमान वृद्धि से बढ़ रहा गेहूं उत्पादन का जोखिम
भारत में रबी की सबसे प्रमुख फसल गेहूं पर तापमान वृद्धि का नकारात्मक असर पहले से ही वैज्ञानिक अध्ययनों और कृषि डेटा में स्पष्ट रूप से देखा गया है। कई शोधों के अनुसार जैसे-जैसे तापमान में वृद्धि होती है, गेहूं की पैदावार में कमी के स्पष्ट संकेत मिलते हैं। उदाहरण के तौर पर, ICAR के एक अध्ययन में यह पाया गया कि तापमान में 2.5°C या उससे अधिक की वृद्धि से गेहूं के पत्तों का विकास कम होता है और दानों का वजन घटता है, जिससे उपज घट जाती है।
राष्ट्रीय और अंतर-राष्ट्रीय शोध यह भी संकेत देते हैं कि हर 1°C तापमान वृद्धि से भारत में गेहूं उत्पादन में 4–5 मिलियन टन तक की कमी आ सकती है, खासकर जब ऊष्मा वृद्धि फसल के संवेदनशील ‘दाना भरने’ के चरण में आती है।
साइंस जर्नल Pubmed में प्रकाशित एक अन्य अध्ययन में यह भी पाया गया कि भारत के विभिन्न क्षेत्रों में औसत तापमान में 1°C वृद्धि से गेहूं की पैदावार लगभग 7% तक कम हो सकती है। अगले कुछ दशकों में बदलते मौसम के रुझानों के आधार पर अनुमान है कि यदि तापमान में वृद्धि जारी रही, तो 2050 तक गेहूं और धान जैसी मुख्य खाद्य फसलों की पैदावार में 6–10% तक की कमी संभव है, जिससे देश के खाद्य सुरक्षा एजेंडों पर सीधा असर पड़ेगा। यह आंकड़े स्पष्ट रूप से दिखाते हैं कि फरवरी में तापमान का औसत से अधिक होना सिर्फ एक मौसमी घटना नहीं है, बल्कि यह भारत में कृषि पर बढ़ते जलवायु परिवर्तन के व्यापक प्रभाव का एक हिस्सा है, जिसे नीति और कृषि प्रबंधन में गंभीरता से शामिल करना जरूरी है।
पडोसी देश चीन में भी बीते वर्ष रिकॉर्ड गर्मी पड़ने की वजह से खेती प्रभावित हुई है।
स्रोत : फ्री पिक
पड़ोसी देश चीन में भी पड़ चुकी है रिकॉर्ड गर्मी
बीते वर्ष 2025 में भारत के पड़ोसी देश चीन में भी पड़ चुकी है रिकॉर्ड गर्मी। चीन के मौसम विभाग के मुताबिक देश का राष्ट्रीय औसत वार्षिक तापमान लगातार दूसरे वर्ष रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया, जो 10.9 डिग्री सेल्सियस (51.6 डिग्री फारेनहाइट) है। इस दौरान सबसे अधिक उच्च तापमान वाले दिनों का रिकॉर्ड दर्ज किया गया है।
यह बात बीते सप्ताह चीनी मौसम विभाग की ओर से जारी किए गए 2025 का जलवायु बुलेटिन में बताई गई है। बुलेटिन के अनुसार, चीन का औसत वार्षिक तापमान हाल के दशकों में बढ़ा है, और 2025, 1961 में राष्ट्रीय स्तर पर तापमान के रिकॉर्ड शुरू होने के बाद से सबसे गर्म वर्ष रहा। भारी वर्षा और भीषण गर्मी की तीव्रता भी बढ़ गई है, जिससे बाढ़ और प्राकृतिक आपदाओं जैसे खतरे बढ़ गए हैं।
मौसम विभाग ने बताया कि देश का 2025 का तापमान 10.9 डिग्री सेल्सियस रहा, जो 2024 के अब तक के उच्चतम तापमान के बराबर है। चीन में उच्च तापमान वाले दिन वे होते हैं जिनका तापमान 35 डिग्री सेल्सियस या उससे अधिक होता है। रिपोर्ट में कहा गया है कि जून के अंत से सितंबर की शुरुआत तक मध्य और पूर्वी चीन में लगातार उच्च तापमान बना रहा और औसत वर्षा सामान्य से 4.5% अधिक रही। इससे पहले विश्व मौसम विज्ञान संगठन ने भी जनवरी में कहा था कि पिछला वर्ष पृथ्वी के अब तक के तीन सबसे गर्म वर्षों में से एक था।
तापमान या गर्मी का प्रभाव विशेषकर फसल में बालियां आने और दाना भरने के चरण में अधिक गंभीर होता है। इस तरह के “हीट स्ट्रेस” से उत्तर-पश्चिमी भारत जैसे बड़े गेहूं उत्पादन क्षेत्रों में प्रतिवर्ष पैदावार में कमी देखी गई है, जहां पिछले सत्रों में तापमान में बढ़ोतरी के कारण उत्पादन में नुकसान दर्ज हुआ है।
गर्मी के प्रभाव का दीर्घकालिक डेटा: जोखिम और ट्रेंड
हाल के एक वैज्ञानिक और एजेंसी आधारित अध्ययन के आंकड़े बताते हैं कि तापमान में बढ़ोतरी से रबी फसलों पर न सिर्फ मौसमी, बल्कि दीर्घकालिक स्तर पर भी नकारात्मक असर पड़ रहा है। अध्ययन के अनुसार जैसे ही तापमान में हर 1°C की वृद्धि होती है, गेहूं की उत्पादन क्षमता औसतन घटती है।
इसी आधार पर राष्ट्रीय कृषि शोध नेटवर्क के डेटा से यह भी अनुमान लगाया गया है कि 2050 तक वर्तमान जलवायु परिवर्तन के रुझानों को जारी रहने पर गेहूं और धान जैसी मुख्य फसलों की उपज में 6–10% तक की कमी संभावित है, यदि अनुकूलन उपाय समय पर नहीं अपनाए गए। ऐसे रुझान इस साल फरवरी के औसत तापमान में असामान्य वृद्धि की चेतावनी को सिर्फ मौसमी खबर नहीं, बल्कि वैश्विक तापमान वृद्धि से जुड़ा कृषि-प्रभावित रुझान बनाते हैं, जिन्हें नीति और कृषि प्रबंधन में शामिल करना आवश्यक है।
खेती को जलवायु परिवर्तन के प्रभाव से बचाने के लिए किसानों को अतिरिक्त उपाय करने पड़ रहे हैं, जिससे कृषि की लागत बढ़ रही है।
स्रोत : पेक्सेल.कॉम
चेतावनी : खेती का 'न्यू नॉर्मल' बन रही जलवायु परिवर्तन की मार
फरवरी में औसत से अधिक तापमान की चेतावनी ने साफ कर दिया है कि रबी फसलों के सामने चुनौती सिर्फ मौसमी नहीं, बल्कि एक स्थायी तत्व या 'न्यू नॉर्मल' बनती जा रही है। मौसमी संकेतों से यह साफ़ है कि बदलते जलवायु पैटर्न के बीच खेती अब ज्यादा अनिश्चित हो चुकी है, जहां एक–दो हफ्तों का तापमान बदलाव भी पूरे सीजन की तस्वीर बदल सकता है। गेहूं, सरसों और चने जैसी महत्वपूर्ण फसलों पर पड़ने वाला यह दबाव उत्पादन, खाद्य सुरक्षा और महंगाई तीनों ही स्तरों पर असर डाल सकता है। ऐसे में मौसम पूर्वानुमान को कृषि नीति, फसल प्रबंधन और बाजार तैयारी से जोड़ना अब विकल्प नहीं, बल्कि एक ज़रूरत बन चुका है।

