

फ़ोटो- सयाली पराते
मध्य प्रदेश के पांढुर्ना के किसान गजानन कराले की, जो पानी की बचत कर उसका उचित इस्तेमाल करते हैं।
गजानन पिछले 7 वर्षों से फूलों की खेती कर रहे हैं, जिससे उनकी कमाई लाखों में पहुंच गई है।
इंडिया वाटर पोर्टल से उन्होंने अपने अनुभव साझा किए और इसकी मार्केटिंग स्ट्रैटेजी बतायी।
फ़ोटो - सयाली पराते
किसानों को आमदनी बढ़ाने के सुझाव देने वाले लोग अकसर फूलों की खेती करने को कहते हैं, लेकिन फूलों की खेती किसानों के लिए अच्छी आमदनी का जरिया तभी बन सकती है, जब उसका सही तरीका पता हो। पानी की कमी और सिंचाई की बढ़ती लागत इस काम में चुनौती पैदा कर सकती है। ऐसे में सही फूलों का चुनाव, ड्रिप सिंचाई, मल्चिंग और वर्षा जल संचयन जैसी तकनीकों को कैसे अपनाना है, यह हमें बता रहे हैं मध्य प्रदेश के पांढुर्ना जिले के किसान गजानन कराले।
गजानन कराले ने करीब 8 वर्ष पूर्व अपनी पारंपरिक खेती के बीच पानी बचा-बचा कर फूलों की खेती शुरू की। तब उनकी आर्थिक स्थिति भी बहुत अच्छी नहीं थी, आज वे लाखों की कमाई करते हैं।
2018 से पहले वे बाजार से फूल खरीद कर व्यापार करते थे। फूलों के व्यापार से जुड़े रहने के कारण उन्हें बाजार की मांग, कीमतों के उतार-चढ़ाव और व्यवहार की अच्छी समझ पहले से थी। इसी अनुभव ने उन्हें खुद खेती शुरू करने के लिए प्रेरित किया। उन्हें विश्वास था कि अगर वहीं फूल खुद उगाए जाएं, तो लागत कम होगी और मुनाफा कई गुना बढ़ेगा।
शुरुआत में खेती छोटे स्तर पर की गई, लेकिन जैसे-जैसे अनुभव बढ़ा वैसे-वैसे खेती का दायरा भी बढ़ाया गया। आज फूलों की खेती उनके लिए सिर्फ एक सहायक काम नहीं, बल्कि पूरे साल चलने वाली मुख्य फसल है।
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गजानन कराले बताते हैं कि वे बारिश के मौसम की शुरुआत में, यानी जुलाई महीने में सबसे पहले गेंदा (झेंडू) कि फसल लगाते है। गेंदा जुलाई से लेकर दिवाली तक लगातार उत्पादन देता है। सितंबर में गणपति उत्सव के दौरान फूलों की मांग अचानक बढ़ जाती है और दिवाली तक खेतों में फूलों की भरपूर कटाई होती है।
दीवाली के बाद गेंदा धीरे-धीरे समाप्त होने लगता है। इसके बाद खेत में शेवंती (क्रिसेंथेमम) की रोपाई की जाती है। शेवंती की फसल शिवरात्रि तक, यानी फरवरी-मार्च तक चलती है। कुछ क्षेत्रों में यदि सिंचाई और देखभाल सही रहे, तो यह फसल मार्च-अप्रैल तक भी बनी रहती है।
किसान बताते हैं कि बारिश के मौसम में शेवंती लगाना जोखिम भरा होता है, क्योंकि अधिक पानी में पौधे सड़ने लगते है। इसलिए उस समय केवल गेंदा ही सुरक्षित विकल्प होता है। शेवंती का सीजन खत्म होने के बाद खेत की जुताई कर रोटावेटर से जमीन तैयार की जाती है और अगली फसल की योजना बनाई जाती है।
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गजानन कराले के पास 10 एकड़ कृषि भूमि है। इसमें से 3 एकड़ में फूलों की खेती की जाती है। इन तीन एकड़ में आधा एकड़ शेवंती के लिए और बाकी में गेंदा, रजनीगंधा और गुलाब लगाए जाते है। इसके अलावा उनके पास संतरे की बाग भी है।
वे बताते हैं कि इसमें मेहनत काफी अधिक होती है। रोजाना निगरानी, समय पर सिंचाई, कीट नियंत्रण और नियमित तुड़वाई बेहद जरूरी है। मजदूरों की जरूरत भी लगातार बनी रहती है, क्योंकि फूल समय पर नहीं तोड़े गए तो उनकी गुणवत्ता और कीमत दोनों गिर जाती है।
वे बताते है कि एक एकड़ फूलों की खेती में पूरे सीजन में 40 हजार रुपये का खर्च आता है। शुरुआती चरण में जमीन की तैयारी पर करीब 1000 रुपये, रोपाई के लिए 1600 से 2000 पौधों पर लगभग चार हजार रुपये, खाद और गोबर पर दो हजार रुपये, स्प्रे और दवाओं पर दो हजार रुपये तथा पानी और मजदूरी जैसे अन्य खर्च शामिल है। पहली कटाई तक खर्च करीब 10 से 12 हजार रुपये रहता है, जबकि पूरे सीजन का खर्च 40 हजार रुपये तक पहुंचता है।
किसान बताते है की मेरे पास कुल 10 एकड़ जमीन है, जिसमें 3 एकड़ में फूलों की खेती और बाकी 7 एकड़ में संतरे का बगीचा है। मेरी जमीन अलग-अलग जगहों पर स्थित है। तीन जगहों पर पानी उपलब्ध है, जबकि एक जगह पानी का स्रोत नहीं है।
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फूलों की खेती वाले खेत में करीब 105 फीट गहरा कुआं है, जिसमें लगभग 50–60 फीट तक पानी रहता है। फिलहाल कुएं में पानी है, लेकिन इस साल सूखे की आशंका बनी हुई है। ऐसे में पानी का सही प्रबंधन बहुत जरूरी है।
फूलों और संतरे की फसल की जरूरत के अनुसार सिंचाई की योजना बनानी चाहिए, ताकि पानी की बर्बादी न हो और फसलों को पर्याप्त पानी मिल सके। जिन किसानों के पास पानी के सीमित स्रोत हैं, उन्हें बारिश के पानी का संचयन करना चाहिए, खेत में नमी बनाए रखने के उपाय अपनाने चाहिए और उपलब्ध पानी के अनुसार खेती की योजना बनानी चाहिए, ताकि पानी की कमी के कारण फसलों को होने वाले नुकसान को कम किया जा सके।
किसान बताते है कि फूलों की खेती की सबसे बड़ी खासियत इसका लगातार उत्पादन है। एक बार पौधे तैयार हो जाने के बाद हर तीसरे दिन फूलों की तुड़ाई की जाती है। शुरुआती दिनों में प्रतिदिन 5 से 10 किलो फूल निकलते है। जैसे-जैसे पौधे पूरी तरह विकसित होते है, पीक सीजन में यह मात्रा 15 से 20 किलो प्रतिदिन तक पहुंच जाती है। हर तीसरे दिन औसतन ढाई क्विंटल यानी करीब 250 किलो फूलों की तुड़ाई होती है।
गजानन कराले बताते है कि इसके पीछे उनकी अकेले की मेहनत नहीं है, इसमें उनके भाई चन्द्रशेखर कराले और पिता सुधाकर कराले पूरी तरह साथ देते है l उनके घर में एक फूलों की दुकान है जिसमें उनके भाई चंद्रशेखर कराले इन फूलों को बेचने का काम करते है l वे कहते है कि अलग अलग स्तर पर हम मिलकर काम करते है l मैं ज्यादातर समय खेत में काम करता हूं l
वे बताते है कि उनकी कुल सालाना आय 5 लाख रुपये से अधिक हो जाती है। किसान का मानना है कि आने वाले वर्षों में खेती का रकबा और उत्पादन बढ़ने से यह आय और भी बढ़ सकती है।
गजानन कराले, पिता और भाई चंद्रशेखर कराले सब मिलकर पिछले 25 वर्षों से फूलों की दुकान चला रहे है। इस लंबे अनुभव ने उन्हें बाजार की छोटी-बड़ी बातें पहचानना सिखाया है। वे जानते हैं कि किस त्योहार पर कौन सा फूल ज्यादा बिकेगा और किस समय कीमतें बढ़ती है।
फ़ोटो - सयाली पराते
वे फूलों को केवल किलो के हिसाब से नहीं बेचते, बल्कि हार, माला और सजावट जैसे वैल्यू-एडेड उत्पादों के रूप में बाजार में उतारते है। जहां खेत से फूलों की कीमत 10 रुपये प्रति किलो मिल सकती है, वहीं फूल दुकान में 50 से 100 रुपये तक बिक जाते है।
उन्हें खेत में चार महिला मजदूर सालभर स्थायी रूप से काम करती है। त्योहारी सीजन में अतिरिक्त मजदूरों की भी जरूरत पड़ती है।
खेती को आधुनिक और टिकाऊ बनाने के लिए किसान ने ड्रिप इरिगेशन, पाइपलाइन, स्प्रे सिस्टम और फेंसिंग जैसी सुविधाओं को अपनाया है। उनके अनुसार इससे पानी की बचत हुई है, उत्पादन में बढ़ोतरी हुई है और फसल पर बेहतर नियंत्रण संभव हो पाया है।
अपने अनुभव साझा करते हुए गजानन कराले कहते हैं कि केवल फसल उगाना ही काफी नहीं है, उसे सही तरीके से बेचना आना चाहिए। खेती को भावनात्मक नहीं, बल्कि व्यावसायिक नजरिए से देखना जरूरी है। फूलों की कीमतें रोज बदलती है, लेकिन उनकी मांग कभी खत्म नहीं होती।
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