जलवायु परिवर्तन से बढ़ रहा जल संकट: भारत में कम हो रहे मीठे पानी के भंडार - लैंसेट रिपोर्ट

भीषण गर्मी और समुद्री पानी में प्रदूषण की वजह से आये दिन मरती छोटी मछलियां

भीषण गर्मी और समुद्री पानी में प्रदूषण की वजह से आये दिन मरती छोटी मछलियां

फोटो - अजय मोहन

Published on: 
11 min read
Summary

भारत के परिप्रेक्ष्य में Lancet Countdown 2026 की 5 अहम बातें :  

  1. अधिक सूखे वाले महीनों की संख्या कम हुई, लेकिन जल भंडारण मेें कमी।

  2. भीषण गर्मी के कारण हर साल औसतन 193 अरब संभावित श्रम घंटे गंवाए।

  3. भारत में डेंगू फैलने की संभावित क्षमता 1951–1960 की तुलना में 84% बढ़ी।

  4. तटीय क्षेत्रों का तापमान 1981–2010 के औसत की तुलना में 0.4 डिग्री अधिक।

  5. समुद्र में पाए जाने वाले विब्रियो बैक्टीरिया से संक्रमण के मामले बढ़े।

जलवायु परिवर्तन का असर अब केवल गर्मी बढ़ने, बारिश के अनियमित होने या सूखा पड़ने तक सीमित नहीं है। अब इसका प्रभाव जमीन की सतह पर और जमीन के अंदर पानी की मात्रा पर भी पड़ रहा है। भारत की बात करें तो मीठे पानी की उपलब्धता दिन प्रतिदिन कम होती जा रही है, क्योंकि मीठे पानी के भंडार कम हो रेह हैं। इससे लोगों को मिलने वाले सुरक्षित पेयजल पर संकट मंडरा रहा है। इसके साथ ही जलवायु परिवर्तन से जुड़ी गर्मी, बाढ़ और बदलती पर्यावरणीय परिस्थितियां कई बीमारियों के जोखिम को भी बढ़ा रही हैं।

द लैंसेट काउंटडाउन ऑन हेल्थ एंड क्लाइमेट चेंज की 2026 की रिपोर्ट में भारत में हो रहे इन बदलावों की ओर ध्यान दिलाया गया है। 28 अक्टूबर को रिलीज़ हुए रिपोर्ट के दसवें वार्षिक संस्करण के अनुसार पेरिस जलवायु समझौते के लागू होने के बाद के दशक (2016–2025) में जलवायु परिवर्तन से जुड़े कई स्वास्थ्य जोखिम पिछले दशक (2006–2015) की तुलना में तेजी से बढ़े हैं।

भारत के लिए क्या कहां लैंसेट रिपोर्ट ने?

रिपोर्ट के भारत-केंद्रित आंकड़े बताते हैं कि देश में जल सुरक्षा की चुनौती को केवल अत्यधिक सूखे से प्रभावित क्षेत्र के आधार पर नहीं समझा जा सकता। एक ओर अत्यधिक सूखे से प्रभावित भूमि का औसत अनुपात घटा है, तो दूसरी ओर ऐसी घटनाएं बार-बार हो रही हैं, जिनकी वजह से मीठा पानी का भंडारण वाले कम हो रहा है या फिर जरूरत से कम हो रहा है। इसका असर कृषि, खाद्य सुरक्षा और लोगों की आजीविका पर पड़ सकता है।

<div class="paragraphs"><p>पंजाब में राबी नदी के पास स्थित खेत में रखी नाव&nbsp;</p></div>

पंजाब में राबी नदी के पास स्थित खेत में रखी नाव 

फोटो - नीतू सिंह 

भारत में जल सुरक्षा की चुनौती: सूखा कम, लेकिन पानी का भंडारण चिंता का विषय

रिपोर्ट की भारत संबंधी डेटा शीट के अनुसार, 2021 से 2025 के बीच देश के औसतन 13% भूभाग में हर साल कम से कम एक महीने अत्यधिक सूखे की स्थिति रही। 1981 से 1990 के दौरान यह औसत 34% था। पहली नजर में यह बदलाव राहत देने वाला लग सकता है, लेकिन इसी अवधि में पानी के भंडारण से जुड़ा एक दूसरा संकेत चिंता बढ़ाता है।

रिपोर्ट के प्रमुख जल संबंधी आंकड़े:

  • 2021–2025 के दौरान भारत में औसतन इतना क्षेत्र हर साल कम से कम एक महीने अत्यधिक सूखे से प्रभावित रहा। 1981–1990 में यह आंकड़ा 34% था।

  • 2006–2015 की तुलना में 2016–2025 के दौरान कम मीठे पानी के भंडारण वाले महीनों में 6.8% की वृद्धि हुई।

  • इसके बावजूद जल भंडारण में कमी आयी। कारण साफ है- पानी का अत्याधिक दोहन और भंडार तक पानी का नहीं पहुंचना।

दरअसल सूखे से प्रभावित क्षेत्र और पानी के भंडारण के आंकड़े दो अलग-अलग चीजों को मापते हैं। किसी क्षेत्र में भले ही अत्यधिक सूखा कम अवधि के लिए हो, लेकिन अगर उसी दौरान उसके जल भंडार में पर्याप्त सुधार नहीं हुआ तो स्थिति चिंताजनक हो जाती है।

इसी तरह जब बारिश होने के बावजूद पानी का बड़ा हिस्सा बहकर निकल जाता है या उसका संचयन जरूरत के मुताबिक नहीं हो पाता, तब भी जल भंडार सूखे ही रह जाते हैं। ऐसे में भूजल स्तर, जलाशयों में उपलब्ध पानी, मिट्टी की नमी, वर्षा के वितरण और घरेलू जल उपलब्धता जैसे संकेतकों को भी देखना होता है।

दुनिया के 80% से अधिक भूभाग में बदल रहे हैं पानी के भंडारण के पैटर्न

रिपोर्ट के वैश्विक निष्कर्ष बताते हैं कि जलवायु परिवर्तन के कारण दुनिया के कई हिस्सों में पानी के भंडारण की स्थितियां बदल रही हैं। कुछ क्षेत्र लंबे समय में अधिक शुष्क हो रहे हैं, जबकि दूसरे क्षेत्रों में पानी का भंडारण बढ़ रहा है। दोनों ही स्थितियां अपने साथ अलग-अलग चुनौतियां लेकर आती हैं।

रिपोर्ट में उपग्रह आधारित नए विश्लेषण के अनुसार, 2003 के बाद से दुनिया के 43% भूभाग में जल भंडारण में दीर्घकालिक गिरावट दर्ज की गई है, जबकि 37% भूभाग में इसमें वृद्धि हुई है। यानी दुनिया के 80% भूभाग में पानी के भंडारण के पैटर्न में उल्लेखनीय बदलाव देखने को मिले हैं। इसके अलावा, 2025 में दुनिया के 51.8% भूभाग में कम से कम एक महीने अत्यधिक सूखे की स्थिति रही। यह रिकॉर्ड में दूसरा सबसे खराब स्तर था।

भारत के संदर्भ में इन निष्कर्षों का महत्व इसलिए है क्योंकि देश की बड़ी आबादी खेती, भूजल और मानसूनी बारिश पर निर्भर है। पानी के भंडारण में बदलाव का अर्थ हर जगह एक जैसा नहीं होगा, लेकिन इसके प्रभावों में सिंचाई की उपलब्धता, पेयजल आपूर्ति, फसल उत्पादन और जल प्रबंधन की चुनौतियां शामिल हो सकती हैं। हालांकि, वैश्विक आंकड़ों को भारत की स्थिति का सीधा प्रतिनिधि नहीं माना जाना चाहिए। भारत के लिए स्थानीय जलवायु, नदी घाटियों, भूजल प्रणालियों और अलग-अलग राज्यों के आंकड़ों का अलग से विश्लेषण जरूरी है।

भारत में पानी की उपलब्धता केवल इस बात पर निर्भर नहीं करती कि कितनी बारिश हुई। यह भी महत्वपूर्ण है कि बारिश का कितना पानी जमीन में समाया, कितना जलाशयों में जमा हुआ, कितना नदियों के जरिए बह गया और कितनी मात्रा में भूजल का दोहन किया गया।

भूजल और जल संचयन पर क्यों देना होगा अधिक ध्यान?

रिपोर्ट में कम ताजे पानी के भंडारण वाले महीनों की बढ़ती आवृत्ति एक महत्वपूर्ण संकेतक है। भले ही ये आंकड़े यह नहीं बताते कि भारत के किन राज्यों या जिलों में भूजल स्तर सबसे अधिक गिरा है, लेकिन देशव्यापी स्तर पर देखें तो रिपोर्ट में सुझाए गए निम्न उपाय महत्वपूर्ण हो सकते हैं -

  • भूजल पुनर्भरण: स्थानीय भूगर्भीय परिस्थितियों के अनुकूल वर्षा जल संचयन और भूजल रिचार्ज को बढ़ावा देना।

  • तालाबों और पारंपरिक जल स्रोतों का संरक्षण: गांवों और शहरों में तालाबों, कुओं तथा अन्य स्थानीय जल संरचनाओं को पुनर्जीवित करना।

  • जल बजट तैयार करना: गांव, ब्लॉक और जलग्रहण क्षेत्र के स्तर पर उपलब्ध पानी, उसकी मांग और संभावित कमी का आकलन करना।

  • खेती में अधिक जल : स्थानीय जल उपलब्धता के अनुरूप फसल चयन, सिंचाई प्रबंधन और मिट्टी में नमी बनाए रखने के उपायों को बढ़ावा देना।

  • जलवायु आधारित निगरानी: बारिश, तापमान, मिट्टी की नमी और जल भंडारण के आंकड़ों को एक साथ देखकर जल संकट का पूर्वानुमान तैयार करना।

इन उपायों का चयन स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार होना चाहिए। उदाहरण के लिए, किसी क्षेत्र में वर्षा जल संचयन उपयोगी हो सकता है, जबकि किसी अन्य क्षेत्र में भूजल दोहन नियंत्रित करना, सिंचाई की मांग घटाना या जलाशयों का बेहतर प्रबंधन अधिक जरूरी हो सकता है।

extreme heat in north India
पूरे उत्‍तर भारत में लोग गरमी के तीखे तेवरों से हैं परेशान।

बढ़ती गर्मी और पानी की कमी का खेती पर दोहरा असर

रिपोर्ट बताती है कि भारत में बढ़ती गर्मी का असर लोगों की काम करने की क्षमता पर पड़ रहा है। इसका सबसे अधिक प्रभाव कृषि क्षेत्र पर दिखाई देता है, जहां बड़ी संख्या में लोग भीषण गर्मी वाले खुले वातावरण में काम करते हैं।

2016 से 2025 के बीच भारत में गर्मी के कारण हर साल औसतन 193 अरब संभावित श्रम घंटे गंवाए गए। यह 1990 के दशक के वार्षिक औसत से 75% अधिक था। इनमें लगभग 68% नुकसान कृषि क्षेत्र से संबंधित हैं। यानी बढ़ते तापमान का असर सीधे तौर पर देश के किसानों की प्रोडक्टिविटी पर पड़ रहा है।

रिपोर्ट के अनुसार, 2025 में गर्मी के कारण काम करने की क्षमता में कमी से संभावित आय का नुकसान 174 अरब अमेरिकी डॉलर आंका गया, जो भारत के सकल घरेलू उत्पाद (GDP) के 4.2% के बराबर था। इस संभावित आय नुकसान में कृषि की हिस्सेदारी 54% थी। इससे यह भी साफ है कि बढ़ती गर्मी किसानों की आय को प्रभावित कर रही है।

रिपोर्ट के दोनों भागों को जोड़ कर देखा जाए तो एक तरफ मीठे पानी का संकट बढ़ रहा है तो दूसरी तरफ बढ़ते तापमान के कारण किसानों का स्वास्थ्य और प्रोडक्टिविटी दोनों प्रभावित हो रही हैं। ऐसे में अगर खेत में नमी नहीं होगी, सिंचाई के लिए पानी नहीं होगा, अत्याधिक तापमान में फसलें खराब होंगी या उत्पादकता कम होगी तो इन सबका सीधा असर किसानों की आजीविका पर पड़ेगा।

हालांकि, रिपोर्ट के इन आंकड़ों से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि श्रम घंटे या आय का पूरा नुकसान पानी की कमी के कारण हुआ। इसके अलावा प्रत्येक राज्य और जिले की भौगोलिक स्थिति पर भी निर्भर करता है कि जलवायु परिवर्तन का असर स्थानीय स्तर पर कैसे पड़ रहा है।

जलवायु परिवर्तन से बढ़ सकता है जलजनित बीमारियों का जोखिम

जलवायु परिवर्तन का स्वास्थ्य पर असर केवल गर्मी से होने वाली बीमारियों तक सीमित नहीं है। तापमान, बारिश और अन्य पर्यावरणीय परिस्थितियों में बदलाव से कुछ संक्रामक बीमारियों के प्रसार के लिए अनुकूल स्थितियां भी बढ़ सकती हैं।

रिपोर्ट में भारत के लिए मच्छरों से फैलने वाली बीमारियों और समुद्री पर्यावरण से जुड़े विब्रियो संक्रमण के संकेतक दिए गए हैं।

  • डेंगू: Aedes albopictus मच्छर के जरिए डेंगू फैलने की संभावित क्षमता 1951–1960 की तुलना में 2016–2025 के दौरान 84% बढ़ी। रिपोर्ट के अनुसार, इस अवधि में इसका प्रसार संभावित क्षमता संकेतक 1 से नीचे के स्तर से ऊपर पहुंच गया।

  • मलेरिया: मलेरिया के लिए पर्यावरणीय रूप से अनुकूल महीनों की औसत संख्या में वृद्धि हुई। Plasmodium falciparum के लिए यह वृद्धि लगभग 19% और P. vivax के लिए 18% थी। 2016–2025 में अनुकूल महीनों की औसत संख्या लगभग चार महीने प्रति वर्ष रही।

  • विब्रियो संक्रमण: 1982–1991 की तुलना में 2025 तक भारत की तटरेखा का वह हिस्सा, जहां विब्रियो बैक्टीरिया के प्रसार के अनुकूल परिस्थितियां थीं, 27% बढ़कर लगभग 2,740 किलोमीटर हो गया। अनुमानित विब्रियो संक्रमण के मामले भी बढ़े।

इन आंकड़ों को समझते समय एक महत्वपूर्ण अंतर ध्यान में रखना चाहिए। डेंगू और मलेरिया के आंकड़े संक्रमण के लिए अनुकूल पर्यावरणीय परिस्थितियों या प्रसार की संभावित क्षमता को दर्शाते हैं। ये अपने आप वास्तविक मरीजों की संख्या में उतनी ही वृद्धि साबित नहीं करते।

जल से जुड़ी बीमारियों के मामले में सुरक्षित पेयजल, स्वच्छता, जल निकासी और स्वास्थ्य निगरानी की व्यवस्था महत्वपूर्ण है। बाढ़ के बाद दूषित पानी के संपर्क में आने, पेयजल स्रोतों के दूषित होने और स्वच्छता सेवाओं में बाधा आने जैसी स्थितियों में स्वास्थ्य संबंधी जोखिम बढ़ सकते हैं। हालांकि, भारत की डेटा शीट में इन सभी प्रभावों के लिए अलग-अलग राज्यवार आंकड़े नहीं दिए गए हैं। इसलिए जलवायु और स्वास्थ्य संबंधी निगरानी को मजबूत करने के साथ-साथ स्थानीय स्तर पर जल गुणवत्ता की जांच, सुरक्षित पेयजल आपूर्ति और बीमारी के शुरुआती संकेतों पर नजर रखना भी जरूरी है।

तटीय भारत के लिए समुद्र का बढ़ता तापमान और जलस्तर नई चुनौती

भारत की तटीय आबादी जलवायु परिवर्तन के कई प्रभावों का सामना कर सकती है। इनमें समुद्र का बढ़ता तापमान, समुद्र के स्तर में वृद्धि और तटीय बाढ़ के कारण जरूरी सेवाओं में व्यवधान शामिल हैं।

रिपोर्ट की भारत डेटा शीट के अनुसार:

  • 2025 में भारत की लगभग 1.82 करोड़ आबादी ऐसे क्षेत्रों में रहती थी, जो समुद्र तल से एक मीटर से कम ऊंचाई पर हैं। यह देश की आबादी का लगभग 1.3% है।

  • 2023–2025 के दौरान भारत के आसपास समुद्र की सतह का तापमान 1981–2010 के औसत की तुलना में 0.4 डिग्री सेल्सियस अधिक था।

  • तटीय समुद्री तापमान में वृद्धि समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र और मछलियों के भंडार को प्रभावित कर सकती है। इससे मछुआरों की आजीविका और खाद्य सुरक्षा पर असर पड़ने की आशंका है।

ये आंकड़े किसी एक राज्य को सबसे अधिक प्रभावित घोषित नहीं करते। लेकिन भारत के संदर्भ में पश्चिम बंगाल, ओडिशा, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक, महाराष्ट्र और गुजरात जैसे तटीय राज्यों में जोखिम का आकलन स्थानीय परिस्थितियों के आधार पर करना महत्वपूर्ण है।

तटीय क्षेत्रों में जलवायु अनुकूलन की योजना बनाते समय पेयजल स्रोतों की सुरक्षा, बाढ़ के बाद जल आपूर्ति बहाल करने की व्यवस्था, तटीय पारिस्थितिकी तंत्र का संरक्षण और मछुआरा समुदायों की आजीविका को भी शामिल किया जाना चाहिए।

भारत में प्रदूषण और ऊर्जा व्यवस्था का स्वास्थ्य पर असर

रिपोर्ट का एक अन्य महत्वपूर्ण निष्कर्ष जीवाश्म ईंधन के इस्तेमाल और वायु प्रदूषण के बीच संबंध को सामने लाता है। हालांकि यह सीधे जल भंडारण का संकेतक नहीं है, लेकिन जलवायु परिवर्तन, ऊर्जा नीति और स्वास्थ्य के व्यापक संबंध को समझने में मदद करता है।

रिपोर्ट की भारत डेटा शीट के अनुसार:

  • 2023 में सूक्ष्म कणों (PM2.5) के संपर्क से भारत में 22 लाख से अधिक मौतें जुड़ी थीं। यह 2016 की तुलना में 22% अधिक था।

  • जीवाश्म ईंधन के दहन का योगदान इन वायु प्रदूषण संबंधी मौतों में 38% था। जीवाश्म ईंधन से जुड़ी वायु प्रदूषण की मौतों में कोयले की हिस्सेदारी 67% थी।

  • प्रदूषणकारी घरेलू ईंधनों के इस्तेमाल से 2023 में लगभग 6.17 लाख मौतें जुड़ी थीं। 2016 में यह आंकड़ा लगभग 7.83 लाख था।

  • 2024 में भारत में जीवाश्म ईंधन पर शुद्ध सब्सिडी 62.3 अरब अमेरिकी डॉलर थी, जो राष्ट्रीय स्वास्थ्य व्यय के लगभग 49% के बराबर थी।

वैश्विक स्तर पर 2025 में स्वच्छ ऊर्जा में निवेश रिकॉर्ड 2.1 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर तक पहुंच गया। यह जीवाश्म ईंधन में निवेश से लगभग 82% अधिक था। रिपोर्ट के अनुसार, जिन कम से कम 77 देशों में 2016 के बाद जीवाश्म ईंधन से होने वाला वायु प्रदूषण घटा, वहां स्वच्छ हवा के कारण हर साल अनुमानित 3.23 लाख मौतों को टाला गया।

ये वैश्विक आंकड़े बताते हैं कि ऊर्जा व्यवस्था में बदलाव से स्वास्थ्य को लाभ हो सकता है। भारत के लिए स्वच्छ ऊर्जा, ऊर्जा दक्षता और प्रदूषणकारी ईंधनों पर निर्भरता घटाने की नीतियां उत्सर्जन कम करने के साथ सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिहाज से भी महत्वपूर्ण हैं।

COP31 में स्वास्थ्य और जलवायु अनुकूलन पर जोर

लैंसेट की यह रिपोर्ट ऐसे समय जारी हुई है, जब अंतरराष्ट्रीय समुदाय तुर्की के अंताल्या में होने वाले संयुक्त राष्ट्र जलवायु सम्मेलन COP31 की तैयारी कर रहा है। इस सम्मेलन को 'इम्प्लीमेंटेशन COP' यानी जलवायु प्रतिबद्धताओं को जमीन पर लागू करने पर केंद्रित सम्मेलन के रूप में देखा जा रहा है। रिपोर्ट के लेखक जलवायु परिवर्तन को औपचारिक रूप से वैश्विक स्वास्थ्य आपातकाल के रूप में मान्यता देने और जलवायु संबंधी निर्णयों में स्वास्थ्य को केंद्रीय स्थान देने की मांग कर रहे हैं। इसके साथ ही वे उत्सर्जन में तेजी से और न्यायसंगत तरीके से कटौती, वैज्ञानिक शोध में निवेश और जलवायु अनुकूलन के लिए पर्याप्त वित्तीय सहायता की जरूरत पर जोर देते हैं।

विकासशील देशों के लिए स्वास्थ्य संबंधी जलवायु अनुकूलन की अनुमानित जरूरत कम से कम 3.3 अरब अमेरिकी डॉलर प्रति वर्ष है। रिपोर्ट में जिन देशों की जरूरतों का आकलन उपलब्ध था, उनमें से 48 देशों के आंकड़ों के आधार पर यह अनुमान लगाया गया। इसके मुकाबले 2024 में लगभग 1.1 अरब अमेरिकी डॉलर की राशि देने की प्रतिबद्धता दर्ज की गई।

यह अंतर बताता है कि जलवायु परिवर्तन से स्वास्थ्य संबंधी जोखिमों को कम करने के लिए योजनाएं बनाना पर्याप्त नहीं है; उनके क्रियान्वयन के लिए धन और संसाधन भी जरूरी हैं।

भारत के लिए जलवायु अनुकूलन और जल सुरक्षा को साथ लेकर चलना महत्वपूर्ण होगा। इसके लिए जल संसाधनों की निगरानी, सूखे और बाढ़ की पूर्व चेतावनी, सुरक्षित पेयजल, जलजनित बीमारियों की निगरानी और तटीय समुदायों की तैयारी जैसे क्षेत्रों में समन्वित प्रयासों की आवश्यकता है।

जल सुरक्षा को जलवायु और स्वास्थ्य नीति से जोड़ने पर जोर

द लैंसेट काउंटडाउन 2026 की रिपोर्ट का व्यापक संदेश है कि जलवायु परिवर्तन से जुड़े स्वास्थ्य नुकसान तेजी से बढ़ रहे हैं और मौजूदा प्रयास पर्याप्त नहीं हैं। भारत के लिए इस संदेश का एक महत्वपूर्ण हिस्सा जल सुरक्षा है।

देश में अत्यधिक सूखे से प्रभावित भूमि के औसत अनुपात में गिरावट एक सकारात्मक संकेत हो सकती है, लेकिन कम ताजे पानी के भंडारण वाले महीनों की बढ़ती आवृत्ति बताती है कि जल संसाधनों की स्थिति को समझने के लिए व्यापक निगरानी की जरूरत है।

आगे की रणनीति में कुछ प्राथमिकताएं महत्वपूर्ण होंगी:

  • जल भंडारण और भूजल की स्थिति पर नियमित, स्थानीय स्तर के आंकड़े जुटाना।

  • गांवों और शहरों में वर्षा जल संचयन, जल स्रोतों के संरक्षण और जल की मांग के प्रबंधन को बढ़ावा देना।

  • सूखे, बाढ़ और अत्यधिक गर्मी की पूर्व चेतावनी को पेयजल तथा स्वास्थ्य सेवाओं की तैयारी से जोड़ना।

  • जलजनित और जलवायु-संवेदनशील बीमारियों की निगरानी को मजबूत करना।

  • तटीय क्षेत्रों में पेयजल, स्वच्छता और आजीविका पर जलवायु परिवर्तन के संभावित प्रभावों को ध्यान में रखना।

लैंसेट की 2026 की इस रिपोर्ट पर विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के महानिदेशक डॉ. टेड्रोस अधनोम घेब्रेयेसस ने जलवायु परिवर्तन को मानव स्वास्थ्य के लिए सबसे बड़े खतरों में से एक बताया है। उनके अनुसार, इसके प्रभाव बढ़ती गर्मी, चरम मौसमी घटनाओं, खाद्य असुरक्षा और बीमारियों के रूप में सामने आ रहे हैं। भारत के संदर्भ में इन चुनौतियों का सीधा संबंध जल सुरक्षा से भी है। पानी की उपलब्धता और गुणवत्ता प्रभावित होने से खेती, पेयजल आपूर्ति और स्वच्छता व्यवस्था पर दबाव बढ़ सकता है।

वहीं जलवायु और स्वास्थ्य कार्यक्रम के निदेशक एलन डांगूर के अनुसार, जलवायु परिवर्तन से होने वाले नुकसान का सबसे अधिक बोझ बच्चों, गर्भवती महिलाओं, बुजुर्गों, खुले में काम करने वाले श्रमिकों और पहले से स्वास्थ्य समस्याओं का सामना कर रहे लोगों पर पड़ता है। भारत में जलवायु अनुकूलन की योजनाओं के लिए यह एक महत्वपूर्ण पहलू है। जल संकट और अत्यधिक गर्मी का सामना करने वाले समुदायों की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए पेयजल, स्वच्छता और स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करना जरूरी है। जलवायु कार्रवाई की सफलता का आकलन इस आधार पर भी होना चाहिए कि उससे लोगों के स्वास्थ्य और जीवन की गुणवत्ता में कितना सुधार आया।

यानी कुल मिलाकर जलवायु परिवर्तन का समाधान केवल अधिक पानी जमा करने या अधिक तालाब, झील, बांध बनाने में नहीं है। इसके लिए यह समझना भी जरूरी है कि पानी कहां उपलब्ध है, कब उपलब्ध है, उसकी गुणवत्ता कैसी है और उसे किन लोगों तक पहुंचाने की जरूरत है। भारत के लिए जल सुरक्षा, स्वास्थ्य सुरक्षा और जलवायु अनुकूलन को अलग-अलग नीतिगत विषयों के बजाय एक-दूसरे से जुड़े मुद्दों के रूप में देखना आने वाले वर्षों में निर्णायक साबित हो सकता है।

लेटेस्ट अपडेट्स के लिए हमारे व्हाट्सऐप चैनल को फॉलो करें

India Water Portal - Hindi
hindi.indiawaterportal.org