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फोटो - विकीकॉमन्स पर शक्ति के सौजन्य से 

दुनिया भर में दुगना हुआ ‘वेट बल्ब तापमान’, भारत के 50 शहर हाई रिस्क पर, देखें पूरी सूची

वेट बल्ब तापमान यानि वो तापमान जहां उमस वाली गर्मी खतरनाक स्तर पर पहुंच जाती है। यह रिपोर्ट दुनिया के 900 से अधिक शहरों की तस्वीर बयां करती है, जिसमें भारत के 59 शहर शामिल हैं। शहरों की सूची के साथ-साथ जानिए कि 1970-1979 के मुकाबले 2016-2025 में अत्यादिक उमस वाली गर्मी के दिनों में कितने प्रतिशत वृद्धि हुई।
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जलवायु परिवर्तन के कारण हीटवेव, समुद्र के जल-स्तर में बढ़ोत्तरी, हीटवेव आदि के साथ-साथ उमस वाली गर्मी भी खतरनाक पैमाने पर पहुंच रही है। क्लाइमेट सेंट्रल के नएं अध्‍ययन के अनुसार, 1970 के दशक की तुलना में अब दुनिया में खतरनाक उमस वाले दिनों की संख्या दोगुनी से अधिक हो गई है। भारत भी इस संकट से अछूता नहीं है और देश के कई बड़े शहर इस बढ़ते खतरे की चपेट में आते जा रहे हैं। 

क्लाइमेट सेंट्रल के नए विश्लेषण के मुताबिक, वर्ष 1970 के दशक में दुनिया भर में औसतन 10 दिन खतरनाक उमस वाली गर्मी दर्ज होती थी, जो 2016-2025 के दौरान बढ़कर 23 दिन प्रति वर्ष हो गई है। अध्ययन में बताया गया है कि 1970 के बाद से दर्ज हुए ऐसे 64 प्रतिशत दिनों के लिए सीधे तौर पर मानवजनित जलवायु परिवर्तन जिम्मेदार है। यानी बढ़ते तापमान के साथ अब हवा में नमी भी अधिक खतरनाक स्तर तक पहुंच रही है।

क्या होता है 'वेट बल्ब तापमान'?  

वेट बल्ब तापमान वह न्यूनतम तापमान है, जिस तक किसी स्थान की हवा केवल पानी के वाष्पीकरण के जरिए ठंडी हो सकती है। यह तापमान केवल गर्मी ही नहीं, बल्कि हवा में मौजूद नमी को भी ध्यान में रखता है। इसलिए यह बताता है कि किसी व्यक्ति का शरीर पसीने के जरिए खुद को कितना प्रभावी ढंग से ठंडा कर पाएगा।

जब हवा में नमी बहुत अधिक होती है, तो पसीना आसानी से नहीं सूखता। ऐसे में शरीर की प्राकृतिक शीतलन प्रक्रिया कमजोर पड़ जाती है और शरीर का तापमान तेजी से बढ़ने लगता है। यही स्थिति हीट स्ट्रोक, डिहाइड्रेशन और यहां तक कि मौत का कारण बन सकती है।

सामान्य तापमान की तुलना में वेट बल्ब तापमान इंसानों के लिए गर्मी के वास्तविक खतरे को बेहतर तरीके से दर्शाता है। वैज्ञानिकों के अनुसार, यदि वेट बल्ब तापमान 35 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाए, तो स्वस्थ व्यक्ति भी लंबे समय तक खुले वातावरण में जीवित नहीं रह सकता, क्योंकि उस स्थिति में शरीर पसीने के माध्यम से खुद को ठंडा नहीं कर पाता।

वैश्विक स्तर पर प्रतिवर्ष खतरनाक उमस वाली गर्मी के दिनों की संख्या 

दुनिया के सभी शहरों का औसत देखें तो 1970 से 1979 में 10 दिन प्रतिवर्ष थे जो 2016-2025 में बढ़ कर 23 दिन प्रतिवर्ष हो गए। रिपोर्ट के अनुसार, 2025 में दुनिया में औसतन 23 खतरनाक उमस वाले दिन दर्ज किए गए, जिनमें से 19 दिन यानी करीब 83 प्रतिशत केवल जलवायु परिवर्तन की वजह से जुड़े हैं। 

वर्ष 1970 से लेकर 2025 तक का डाटा (स्रोत - क्लाइमेट सेंट्रल)

961 शहरों का किया गया विश्‍लेषण 

अध्ययन में दुनिया के 961 शहरों का विश्लेषण किया गया है, जिसमें भारत के 59 शहर शामिल हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, देश के कई महानगर और तटीय इलाके बढ़ती उमस वाली गर्मी के लिहाज से अधिक संवेदनशील हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन पर प्रभावी नियंत्रण नहीं किया गया, तो आने वाले वर्षों में भारत में भी खतरनाक उमस वाली गर्मी लोगों के स्वास्थ्य, श्रम क्षमता और जनजीवन के लिए बड़ी चुनौती बन सकती है।

भारत के 59 शहरों में खतरनाक उमस वाली गर्मी के दिन 

भारत के आंकड़े बताते हैं कि तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र और पश्चिम बंगाल के शहर खतरनाक उमस वाली गर्मी से सबसे अधिक प्रभावित हो रहे हैं। दक्षिण भारत के तटीय राज्यों में बंगाल की खाड़ी और अरब सागर से आने वाली नमी तथा लगातार बढ़ते तापमान का असर साफ दिखाई देता है। 

तमिलनाडु के तिरुनवेली में 1970-79 के दौरान जहां औसतन 119 खतरनाक उमस वाले दिन दर्ज होते थे, वहीं 2016-2025 के दौरान यह संख्या बढ़कर 273 दिन हो गई। इसी तरह मदुरै में 57 से 200, तिरुचिरापल्ली में 129 से 251 और चेन्नई में 205 से बढ़कर 257 दिन दर्ज किए गए। आंध्र प्रदेश के विजयवाड़ा और विशाखापट्टनम जैसे शहरों में भी साल के दो-तिहाई से अधिक दिनों तक खतरनाक उमस की स्थिति बनी रहती है।

महाराष्ट्र में भी समुद्र तट और तेजी से फैलते शहरीकरण का संयुक्त प्रभाव दिखाई देता है। मुंबई, नवी मुंबई, ठाणे, डोंबिवली और कल्याण जैसे मुंबई महानगर क्षेत्र के शहरों में खतरनाक उमस वाले दिनों की संख्या लगातार बढ़ी है। मुंबई और नवी मुंबई में यह आंकड़ा 136 से बढ़कर 206 दिन पहुंच गया, जबकि ठाणे और डोंबिवली में यह 182 से बढ़कर 222 दिन हो गया। दूसरी ओर, पश्चिमी घाट की ऊंचाई पर बसे पुणे, पिंपरी-चिंचवाड़, नाशिक और औरंगाबाद जैसे शहरों में यह वृद्धि अपेक्षाकृत सीमित रही, जिससे स्पष्ट होता है कि समुद्र से निकटता और भौगोलिक स्थिति उमस के स्तर को काफी प्रभावित करती है।

उत्तर भारत के राज्य उमस भरी गर्मी की चपेट में 

उत्तर और मध्य भारत भी इस संकट से अछूता नहीं है। उत्तर प्रदेश के आगरा, प्रयागराज, कानपुर, लखनऊ, वाराणसी और गाजियाबाद में खतरनाक उमस वाले दिनों की संख्या में उल्लेखनीय बढ़ोतरी दर्ज की गई है। दिल्ली-एनसीआर में भी दिल्ली, नई दिल्ली, नजफगढ़ और फरीदाबाद में ऐसे दिनों की संख्या लगभग 30 से 40 दिन तक बढ़ी है। मध्य प्रदेश के भोपाल, जबलपुर, ग्वालियर और इंदौर, राजस्थान के जयपुर, जोधपुर और कोटा, तथा झारखंड के रांची, धनबाद और जमशेदपुर में भी गर्मी और नमी का संयुक्त प्रभाव पहले की तुलना में कहीं अधिक गंभीर हो चुका है। वैज्ञानिकों का मानना है कि बढ़ते तापमान के साथ मानसूनी नमी और शहरी 'हीट आइलैंड' प्रभाव इन शहरों में उमस को और अधिक खतरनाक बना रहे हैं।

हालांकि सभी शहरों में स्थिति एक जैसी नहीं है। कर्नाटक की ऊंचाई पर स्थित बेंगलुरु और जम्मू-कश्मीर के श्रीनगर में अध्ययन अवधि के दौरान खतरनाक उमस वाले दिन शून्य रहे। वहीं तमिलनाडु के टेनी और महाराष्ट्र के पुणे क्षेत्र के शहरों में भी ऐसे दिनों की संख्या अपेक्षाकृत कम रही। इससे स्पष्ट होता है कि समुद्र से दूरी, ऊंचाई, स्थानीय जलवायु और भौगोलिक बनावट किसी शहर में उमस वाली गर्मी की तीव्रता तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। लेकिन समग्र तस्वीर यही है कि भारत के अधिकांश मैदानी और तटीय क्षेत्रों में जलवायु परिवर्तन के साथ खतरनाक उमस वाली गर्मी तेजी से बढ़ रही है, जो आने वाले वर्षों में सार्वजनिक स्वास्थ्य और श्रम क्षमता के लिए बड़ी चुनौती बन सकती है।

दुनिया के टॉप 20 शहर जो हैं अत्याधिक रिस्क पर 

इस अध्‍ययन में दुनिया के 50 उन शहरों की सूची तैयार की गई जहां पर 2016-2025 के बीच खतरनाक नमी वाले दिनों में सबसे ज्यादा वृद्धि हुई। इस सूची में (स्रोत क्लाइमेट सेंट्रल) भारत के चार शहर - तिरुनेलवेली, चेन्नई, तिरुचिरापल्ली और विजयवाड़ा शामिल हैं। 

अत्याधिक उमस वाली गर्मी के कारण स्वास्थ्‍य का जोखिम 

वैज्ञानिकों का कहना है कि पहले जहां ऐसी परिस्थितियां बेहद दुर्लभ थीं, वहीं अब दुनिया के कई हिस्सों में यह सामान्य होती जा रही हैं। इसका सबसे अधिक असर बुजुर्गों, बच्चों, मजदूरों और पहले से बीमार लोगों पर पड़ सकता है। इस अध्‍ययन में खास तौर से उन क्षेत्रों में रहने वाले बुजुर्गों, किसी लंबी बीमारी से ग्रसित लोगों, गर्भवती महिलाओं, बच्चों का स्वास्थ्‍य जोखिम में है जिनके पास गर्मी से राहत पाने के संसाधनों का अभाव है।

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