हिमस्खलन, चट्टानों के झील में गिरने, भारी बारिश या बांध की अस्थिरता जैसी घटनाएं GLOF को जन्म दे सकती हैं।

हिमस्खलन, चट्टानों के झील में गिरने, भारी बारिश या बांध की अस्थिरता जैसी घटनाएं GLOF को जन्म दे सकती हैं।

फ़ोटो: विकिमीडिया कॉमन्स

भारत में 7 हज़ार ग्लेशियल झीलें, ढाई हज़ार की होती है निगरानी, देखें GLOF रिस्क झीलों की सूची

भारत के हिमालयी क्षेत्र में ढाई हज़ार से ज़्यादा ग्लेशियल झीलें हैं, लेकिन इनमें से हर झील GLOF के लिहाज से खतरनाक नहीं है। कुछ झीलों के बढ़ते आकार और बदलती स्थिति के के चलते केंद्रीय जल आयोग इन झीलों की निगरानी करता है।
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ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF) तब होता है जब ग्लेशियल झील को रोकने वाला प्राकृतिक बांध टूटता या विफल होता है और पानी, बर्फ तथा मलबा तेजी से नीचे की ओर बहता है। हिमस्खलन, चट्टानों के झील में गिरने, भारी बारिश या बांध की अस्थिरता जैसी घटनाएं GLOF को जन्म दे सकती हैं।

GLOF का तेज बहाव सड़कों, पुलों, जलविद्युत परियोजनाओं और बस्तियों को नुकसान पहुंचा सकता है। लेकिन झील का बड़ा होना अपने आप में GLOF का खतरा साबित नहीं करता। जोखिम समझने के लिए झील के प्राकृतिक बांध, उसमें हो रहे बदलाव और उसके नीचे मौजूद आबादी व बुनियादी ढांचे को साथ देखना पड़ता है।

GLOF का जोखिम केवल झील के आकार से तय नहीं होता। इसके लिए झील और उसके प्राकृतिक बांध की स्थिति, पानी की मात्रा, आसपास का भू-भाग और नीचे मौजूद आबादी व बुनियादी ढांचे को भी देखना पड़ता है।

भारत में कितनी ग्लेशियल झीलें हैं?

राष्ट्रीय रिमोट सेंसिंग सेंटर (NRSC) के Glacial Lake Atlas of Indian River Basins के अनुसार 0.25 हेक्टेयर या उससे बड़ी 28,043 ग्लेशियल झीलें भारतीय हिमालयी नदी बेसिनों में मैप की गई हैं। इनमें 7,570 झीलें भारत की सीमा के भीतर हैं। बाकी झीलें हिमालयी नदी बेसिनों के सीमा-पार हिस्सों में स्थित हैं।

यह एटलस 2016-17 के उपग्रह आंकड़ों पर आधारित है, इसलिए 7,570 को आज मौजूद झीलों की वास्तविक संख्या नहीं माना जाना चाहिए। समय के साथ झीलों का आकार और स्थिति बदल सकती है। भारत के भीतर सबसे ज्यादा 3,219 ग्लेशियल झीलें लद्दाख में दर्ज हैं। इसके बाद अरुणाचल प्रदेश में करीब 2,189 और सिक्किम में 733 झीलें हैं।

इन 7,570 झीलों को खतरे की सूची मानना सही नहीं होगा। GLOF का जोखिम केवल झील के आकार से तय नहीं होता। इसके लिए झील और उसके प्राकृतिक बांध की स्थिति, पानी की मात्रा, आसपास का भू-भाग और नीचे मौजूद आबादी व बुनियादी ढांचे को भी देखना पड़ता है।

GLOF जोखिम को दो सवालों से समझा जा सकता है। पहला है झील के फटने की कितनी संभावना और दूसरा, अगर वह फटती है तो नीचे की ओर कितना नुकसान हो सकता है।

CWC की निगरानी 100 से 2,843 झीलों तक कैसे पहुंची?

केंद्रीय जल आयोग (CWC) हिमालयी क्षेत्र की ग्लेशियल झीलों और जल निकायों के जल-विस्तार में होने वाले बदलावों की रिमोट सेंसिंग के जरिए निगरानी करता है। यह निगरानी मुख्य रूप से जून से अक्टूबर के दौरान की जाती है, जब बर्फ पिघलने और भारी बारिश के कारण झीलों में पानी बढ़ सकता है।

2011 में CWC और NRSC ने 50 हेक्टेयर से बड़ी 477 ग्लेशियल झीलों और जल निकायों की निगरानी शुरू की। 2022 में 10 - 50 हेक्टेयर की 425 और झीलें जोड़ी गईं। इससे निगरानी वाली झीलों और जल निकायों की संख्या 902 हो गई। इन 902 में भारत की 100 ग्लेशियल झीलें थीं, जिनमें सबसे अधिक 42 सिक्किम की थीं।

2025 में निगरानी का दायरा और बढ़ा

CWC ने 2025 में NRSC के Glacial Lake Atlas of Indian Himalayan River Basins, 2023 के आधार पर 10 हेक्टेयर से बड़ी 1,941 नई ग्लेशियल झीलों को निगरानी में शामिल किया। इनमें 581 भारत के भीतर और 1,360 सीमा-पार क्षेत्र में थीं।

पुराने 902 और नई 1,941 झीलों को मिलाकर CWC का निगरानी नेटवर्क 2,843 ग्लेशियल झीलों और जल निकायों तक पहुंच गया। इनमें 2,485 ग्लेशियल झीलें और 358 जल निकाय शामिल हैं।

इन आंकड़ों से झीलों में हो रहे बदलाव की पहचान और आगे के जोखिम आकलन के लिए प्राथमिकता तय करने में मदद मिलती है। फिर भी उपग्रह निगरानी अंतिम जोखिम आकलन नहीं है। बांध की स्थिरता, पानी की गहराई और संभावित बाढ़ के रास्ते के लिए स्थल सर्वे और मॉडलिंग जरूरी हैं।

किन झीलों पर ज्यादा नजर है?

CWC की निगरानी पद्धति में जल-विस्तार में 40 प्रतिशत से अधिक वृद्धि वाली झीलों को अधिक गहन निगरानी के लिए प्राथमिकता दी जाती है। हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि ऐसी हर झील से GLOF आएगा। यह आगे जोखिम आकलन और निगरानी के लिए प्राथमिकता तय करने का संकेत है।

जुलाई 2025 के CWC विश्लेषण में पुराने 100 झील वाले भारतीय सेट की 55 विश्लेषण योग्य झीलों के कुल जल-विस्तार में 2011 की तुलना में 27.87 प्रतिशत वृद्धि दर्ज की गई।

हालांकि, झील का क्षेत्रफल बढ़ना अपने आप में GLOF की भविष्यवाणी नहीं करता। झील के आकार में बदलाव के पीछे ग्लेशियर का पीछे हटना, बर्फ पिघलना, वर्षा और भू-आकृतिक बदलाव जैसे कई कारण हो सकते हैं। इसलिए इसे आगे जोखिम आकलन की जरूरत के संकेत के रूप में देखना चाहिए।

उपग्रह निगरानी अंतिम जोखिम आकलन नहीं है। बांध की स्थिरता, पानी की गहराई और संभावित बाढ़ के रास्ते के लिए स्थल सर्वे और मॉडलिंग जरूरी हैं।

किस वजह से झील निगरानी की प्राथमिकता में आ सकती है?

  • झील का क्षेत्रफल तेजी से बढ़ना

  • प्राकृतिक बांध की अस्थिरता

  • झील के आसपास हिमस्खलन या चट्टान गिरने का खतरा

  • झील में पानी की मात्रा और गहराई

  • नीचे की ओर आबादी या महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचा

  • संभावित GLOF के बहाव क्षेत्र में सड़क, पुल या जलविद्युत परियोजनाएं

कुछ झीलें क्यों खास हैं?

GLOF जोखिम आकलन वाली कुछ प्रमुख झीलें

हिमाचल प्रदेश की गेपांग घाट झील इसका एक उदाहरण है। इसरो के उपग्रह विश्लेषण के अनुसार इसका क्षेत्रफल 1989 में 36.49 हेक्टेयर था, जो 2022 में बढ़कर 101.30 हेक्टेयर हो गया, लगभग 178 प्रतिशत वृद्धि। झील लगभग 4,068 मीटर की ऊंचाई पर है। गेपांग घाट के लिए GLOF जोखिम आकलन और डाउनस्ट्रीम मॉडलिंग भी की गई है।

सिक्किम की साउथ ल्होनाक झील इसका एक महत्वपूर्ण उदाहरण है। अक्टूबर 2023 में यहां GLOF के बाद तीस्ता में अचानक बाढ़ आई और बुनियादी ढांचे को बड़े पैमाने पर नुकसान पहुंचा। घटना ने दिखाया कि ऊंचाई पर स्थित झील में होने वाली GLOF का असर नीचे स्थित बस्तियों और परियोजनाओं तक पहुंच सकता है।

NRSC ने हिमालय की कई अन्य झीलों के लिए भी GLOF risk assessments किए हैं। इन आकलनों की सूची उसके राष्ट्रीय जल विज्ञान परियोजना पोर्टल पर उपलब्ध है।

इसरो के विश्लेषण में 1984 के बाद आकार बढ़ाने वाली 676 ग्लेशियल झीलों में अधिकांश मोरेन से बने प्राकृतिक बांधों वाली थीं। इन प्राकृतिक बांधों की स्थिरता पानी के दबाव, कटाव, हिमस्खलन या चट्टान गिरने जैसी घटनाओं से प्रभावित हो सकती है।

भारत की प्रमुख ग्लेशियल झीलें जो GLOF के मद्देनजर हाई रिस्क पर हैं। CWC जिन ग्लेशियल झीलों की निगरानी करती हैं, उनमें 20 झीलें अलग से सूचीबद्ध हैं। इन झीलों को GLOF के मद्देनजर हाई रिस्क के दायरे में रखा गया है। झीलों की सूची इस प्रकार है:

निगरानी से चेतावनी तक की चुनौती

GLOF जोखिम कम करने की अगली चुनौती निगरानी से मिली जानकारी को समय पर स्थानीय कार्रवाई में बदलना है। झील में बदलाव दर्ज होने के बाद जोखिम आकलन, स्थल निरीक्षण, चेतावनी प्रणाली और स्थानीय प्रशासन के बीच समन्वय जरूरी है।

हिमालय में खतरे का पैमाना झीलों की कुल संख्या से नहीं, बल्कि जोखिम के भूगोल से तय होता है।

उच्च जोखिम वाली झीलों के लिए जलस्तर सेंसर, मौसम स्टेशन और कैमरा आधारित निगरानी को प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली (early warning systems) से जोड़ा जा सकता है। हालांकि, ऊंचाई वाले दुर्गम इलाकों में उपकरणों की स्थापना, बिजली और संचार व्यवस्था बड़ी चुनौती हैं।

दूरदराज के इलाकों में स्थानीय समुदायों को चेतावनी और निकासी व्यवस्था से जोड़ना भी जरूरी है, क्योंकि वे नदी या झील में होने वाले अचानक बदलावों को सबसे पहले देख सकते हैं। GLOF जोखिम कम करने के लिए उपग्रह निगरानी के साथ उच्च जोखिम वाली झीलों में गहराई का सर्वेक्षण, प्राकृतिक बांध की स्थिरता का अध्ययन, बाढ़ के संभावित असर की मॉडलिंग और प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली जरूरी हैं।

सरकार ने ग्लेशियल झीलों के लिए जोखिम-आधारित प्राथमिकता तय करने की दिशा में भी कदम बढ़ाए हैं। CWC ने ग्लेशियल झीलों के लिए जोखिम सूचकांक (Risk Indexing) के मानदंड तैयार किए हैं और गेपांग घाट जैसी झीलों के लिए जोखिम आकलन व डाउनस्ट्रीम मॉडलिंग की गई है। 2023 की सिक्किम GLOF घटना के बाद संवेदनशील बांधों की सुरक्षा और उनकी spillway क्षमता की समीक्षा पर भी जोर दिया गया है।

हिमालय में खतरे का पैमाना झीलों की कुल संख्या से नहीं, बल्कि जोखिम के भूगोल से तय होता है। 7,570 झीलों की सूची संभावित क्षेत्र दिखाती है, जबकि CWC की निगरानी और NRSC के जोखिम आकलन से प्राथमिकता तय करने में मदद मिलती है। चुनौती अब इन आंकड़ों को समय पर स्थानीय चेतावनी और जोखिम कम करने की कार्रवाई में बदलने की है।

हर बढ़ती झील GLOF का खतरा नहीं है, लेकिन तेजी से बदलती झीलों को नजरअंदाज करना भी जोखिम भरा हो सकता है।

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