रात के समय भी तापमान में होने वाली गिरावट का दर बहुत कम है।

रात के समय भी तापमान में होने वाली गिरावट का दर बहुत कम है।

चित्र: gavi.org

रात में भी नहीं मिल रही गर्मी से राहत, ‘Indoor Heat’ बना नया खतरा, आसान भाषा में समझें नई स्टडी

नई स्टडी के मुताबिक घरों के अंदर बढ़ती गर्मी यानी ‘Indoor Heat’ अब लोगों की सेहत के लिए बड़ा खतरा बनती जा रही है।
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मई के पहले सप्ताह में जारी हुई भारतीय मौसम विज्ञान विभाग की रिपोर्ट के अनुसार मई के महीने में राजस्थान, गुजरात, विदर्भ, मध्‍य प्रदेश और उत्तर प्रदेश में हीटवेव का खतरा निरंतर बना रहेगा। ऐसे दिनभर तपती सड़कों पर काम करने के बाद जब डिलीवरी वाले, ई-रिक्शा चालक, बनती इमारतों में काम करने वाले और ईंटें ढोने वाले मजदूर और दिहाड़ी कामगार दिन भर धूप में रहने के बाद जब रात को घर पहुंचते हैं, तब क्या उन्हें राहत मिलती है?

नहीं! जब ये लोग अपने छोटे कमरों में लौटते हैं, तो अक्सर वहां भी गर्मी उनका इंतजार कर रही होती है। उनकी छत से लटका पंखा चल रहा होता है, लेकिन कमरे की हवा गर्म ही रहती है। और यह रात में होने वाली यह गर्मी भी जानलेवा हो सकती है।

यह बात सिद्ध की गई है क्लाइमेट ट्रेंड्स की नई स्टडी में जिसकी रिपोर्ट नई दिल्ली में बुधवार को आयोजित Climate India Summit में रिलीज़ की गई। रिपोर्ट में चेन्नई शहर को उदाहरण के रूप में प्रस्तुत किया गया है।

समिट में जारी हुई एक नई स्टडी ने पहली बार विस्तार से दिखाया कि चेन्नई के निम्न और मध्यम आय वर्ग के घरों में रहने वाले लोग लगातार कितनी गंभीर इंडोर हीट एक्सपोज़र का सामना कर रहे हैं। 

कई घरों की छतें रातभर दिन की गर्मी छोड़ती रहती हैं और सुबह होने तक भी ठंडी नहीं हो पातीं। गर्मी के कारण नींद न पूरी होने के कारण अगले दिन शरीर में थकान बनी ही रह जाती है। और तो और, उसी थकान के साथ अगली सुबह फिर उसी गर्म शहर में काम पर निकलना होता है।

क्लाइमेट ट्रेंड्स की “Nighttime Thermal Stress in Low and Middle Income Housing in India: Linking Indoor Temperatures and Relative Humidity with Perceptions of Comfort” नाम का यह अध्ययन इस बात पर जोर देता है कि भारत की Heat Action Plans को अब केवल बाहर के तापमान तक सीमित नहीं रखा जा सकता।

भारत के कई शहरों में पिछले कुछ वर्षों में गर्म रातों की संख्या बढ़ी है, लेकिन घरों के भीतर होने वाले heat exposure पर अब तक बहुत कम शोध हुआ है। रिपोर्ट में गिग वर्कर, निर्माण मजदूरों और असंगठित क्षेत्र के कामगारों के अनुभवों को केंद्र में रखा गया। और यही इस रिपोर्ट इस विषय से जुड़े दूसरे शोध और रिपोर्ट से अलग करती है।

क्या आप जानते हैं? मौसम विभाग अपनी दैनिक रिपोर्ट में गर्म रातों की जानकारी भी देता है। गर्म रात की परिभाषा- "अगर दिन का तापमान 40°C पार हो और रात का न्यूनतम तापमान सामान्य से 4.5°C से 6.4°C ज्यादा हो, तो इसे गर्म रात यानि 'Warm Night' कहते हैं।"

लंबे समय तक गर्मी पर बनी नीतियों में इन समुदायों की थकान, नींद में ख़लल, निर्जलीकरण (dehydration) और लगातार बने रहने वाले हीट स्ट्रेस पर बहुत कम चर्चा हुई थी।

घरों के भीतर महीनों तक 32 डिग्री से ज्यादा तापमान

इस अध्ययन में शामिल किए गए कई घरों का भीतरी तापमान लगातार 32 डिग्री सेल्सियस से ऊपर दर्ज किया गया। सबसे ज्यादा प्रभावित घरों में 5,700 से 5,800 घंटे तक तापमान इस स्तर से ऊपर रहा, यानी गर्मी का असर लगभग आठ महीने तक लगातार बना रहा।

अधिकांश घरों में यह समय 3,000 से 5,000 घंटे के बीच दिखा, जो गर्मी के लगातार संपर्क के चार से सात महीनों तक का समय बताती है।

इस अध्ययन में एक सबसे बड़ी चिंता जो उभर कर सामने आई है, वह यह कि रात के समय भी तापमान में होने वाली गिरावट का दर बहुत कम है। 

अध्ययन अवधि के “ठंडे” महीनों में भी रात 8 बजे से सुबह 6 बजे के बीच तापमान अक्सर 31 डिग्री से नीचे नहीं पाया गया।

रिपोर्ट बताती है कि घरों के भीतर सबसे अधिक तापमान दोपहर में नहीं बल्कि रात 8 से 9 बजे के बीच दर्ज हुआ। प्रबलित सीमेंट कंक्रीट (RCC) से बने मकानों की दीवारें और छतें दिनभर की गर्मी को सोखकर देर रात तक छोड़ती रहती हैं।

घनी आबादी वाले शहरों में बने छोटे RCC घर बाहर की तुलना में देर तक गर्म बने रहते हैं, क्योंकि उनमें जमा हुई गर्मी रातभर धीरे-धीरे निकलती है।

कई घरों में रात के दौरान भी तापमान 34 डिग्री से ऊपर बना रहा।

इसका सीधा असर नींद, शरीर की रिकवरी और काम करने की क्षमता पर पड़ा। लोगों ने बार-बार नींद के टूटने, लगातार थकान और बेचैनी की शिकायत की है। गिग वर्कर के लिए यह स्थिति और गंभीर हो जाती है, क्योंकि उन्हें अगले दिन फिर लंबे समय तक बाहर काम करना पड़ता है।

रात के समय का तापमान बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। जब आर्द्रता बढ़ती है, तो सामान्य तापमान में भी शरीर को अधिक तापमान और गर्मी महसूस होती है।

मृत्युंजय महापात्र, महानिदेशक, भारतीय मौसम विज्ञान विभाग

“रात का तापमान शरीर को ज्यादा थका देता है”

समिट में बोलते हुए भारतीय मौसम विज्ञान विभाग के महानिदेशक मृत्युंजय महापात्र ने कहा कि भारत में हीटवेव अब लंबे समय से एक गंभीर चुनौती बनी हुई है। लेकिन अब गर्म रात की स्थिति की समस्या तेज़ी से और गंभीरता से उभर रही है।

उन्होंने कहा कि गरीब तबकों पर इसका असर सबसे ज्यादा पड़ता है क्योंकि शरीर को रात में आराम और थकान दूर करने का समय नहीं मिल पाता।

उन्होंने ज़ोर देते हुए यह भी कहा कि, “रात के समय का तापमान बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। जब आर्द्रता बढ़ती है, तो सामान्य तापमान में भी शरीर को अधिक तापमान और गर्मी महसूस होती है।”

उनके अनुसार हीट गवर्नेंस को अब सिर्फ तापमान तक सीमित रखना असंभव हो चुका और IMD अब समग्र ताप सूचकांक (composite heat index) जैसे नए तरीकों पर काम कर रहा है।

2015 के बाद अब तक देश में Heat Action Plans का विस्तार हुआ है। अहमदाबाद से शुरू हुई पहल अब 240 जिलों तक पहुंच चुकी है। देश, राज्य और जिला स्तर पर तीन-स्तरीय प्रणाली विकसित की जा रही है, जिसमें ग़ैर-सरकारी संस्थानों, इंडियन मेडिकल एसोसिएश और आशा कार्यकर्ताओं की भी भागीदारी है।

हालांकि इसके बावजूद मौसम के पूर्वानुमान को देश के प्रत्येक व्यक्ति तक पहुंचाने का काम अब भी चुनौतीपूर्ण है। अर्ली वार्निंग महत्वपूर्ण है, लेकिन शीघ्र कार्रवाई भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।

गर्मी सिर्फ मौसम नहीं, मानवाधिकार का मुद्दा भी

समिट में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के महासचिव एवं मुख्य कार्यकारी अधिकारी, भारत लाल ने heat stress को मानवाधिकारों से जोड़ते हुए कहा कि संविधान राज्य को अपने नागरिकों की सुरक्षा की जिम्मेदारी देता है।

उन्होंने कहा कि जलवायु परिवर्तन, तापमान और पर्यावरणीय प्रभावों का असर सबसे ज्यादा कमजोर और हाशिये के तबके के लोगों जैसे दिहाड़ी मजदूर, निर्माण श्रमिक और गिग वर्कर पर पड़ता है।

उन्होंने हीटस्ट्रोक से होने वाली मौतों का ज़िक्र करते हुए कहा कि इस मुद्दे पर राज्यों और प्रशासनिक संस्थाओं को एडवाइज़री जारी की जा चुकी हैं।

उनके अनुसार आने वाले समय में पर्यावरण और मानव अधिकार अंतरराष्ट्रीय व्यापार और समझौतों में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।

सिर्फ कूलिंग नहीं, पूरी व्यवस्था का संकट

वहीं IIT के प्रोफ़ेसर अजय माथुर ने heat crisis को ऊर्जा, इंफ्रास्ट्रक्चर और शहरीकरण से जुड़ी प्रणालीगत और नीतिगत समस्या बताया है।

उन्होंने कहा कि भारत में 35 डिग्री से ऊपर के तापमान की घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं और कई शहर अत्यधिक गर्मी और तापमान के नए रिकॉर्ड बना रहे हैं।

यानी की हीटवेव का ख़तरा अब कई स्तरों पर और कई गुना बढ़ चुका है। यह अब शहरों, खेती, बिजली व्यवस्था और परिवहन के साधनों सभी को प्रभावित कर रही है।

अपने वक्तव्य में प्रोफ़ेसर माथुर ने हीट प्रबंधन के लिए अलग बजट और राष्ट्रीय ताप सहनशीलता ढांचे की ज़रूरत पर विशेष जोर दिया है। इसके अलावा उन्होंने इमारतों के निर्माण में इस्तेमाल होने वाली सामग्रियों, इमारतों के बीच एक तय दूरी, एयरटेड कंक्रीट और कूलिंग-ओरिएंटेड शहरी डिज़ाइन को भी कारगर समाधान बताया है।

Heat Action Plans में indoor heat क्यों जरूरी है

यह रिपोर्ट सीधे तौर पर यह सवाल उठाती है कि अगर लोग रातभर गर्म घरों में सो नहीं पा रहे, तो केवल दिन के समय गर्मी की चेतावनी पर्याप्त कैसे हो सकती है।

अब तक अधिकांश Heat Action Plans बाहर के तापमान और daytime exposure पर केंद्रित रहे हैं। लेकिन indoor heat stress , खासकर घनी आबादी वाले शहरी इलाकों में तेजी से सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट बनता जा रहा है।

विशेषज्ञों का कहना है कि अगर घरों के भीतर तापमान की निगरानी, आर्द्रता मानचित्रण और विशेष रूप से आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए कूलिंग रणनीतियां तैयार नहीं की गईं, तो आने वाले वर्षों में गर्मी से संबंधित बीमारियां बढ़ेंगी और लोगों की कार्य क्षमता भी कम होगी।

इन तमाम चर्चाओं से यह साफ़ होता है कि भारत में बढ़ती गर्मी का सबसे कठिन हिस्सा शायद दोपहर की लू नहीं, बल्कि वे रातें हैं जिनमें शरीर को आराम ही नहीं मिल पाता। और इसका सबसे बड़ा बोझ वे लोग उठा रहे हैं जिनका काम शहरों को चलाए रखना है।

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