गुजरात के वलसाड में मोती पलसन गांव की महिलाएं सूखे कुओं में उतरकर पानी जुटा रही हैं।

गुजरात के वलसाड में मोती पलसन गांव की महिलाएं सूखे कुओं में उतरकर पानी जुटा रही हैं।

चित्र: moneycontrol.com

गुजरात के मोती पलसन में पानी के लिए 45 फुट नीचे उतरने को मजबूर महिलाएं

वलसाड के मोती पलसन गांव में सूखे कुओं के भीतर उतरती महिलाओं की यह कहानी जल संकट की जमीनी सच्चाई दिखाती है। यह तस्वीर बताती है कि ‘हर घर जल’ के दावों के बावजूद कई गांव अब भी प्यास से जूझ रहे हैं।
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गुजरात के वलसाड जिले के कपराडा तालुका में बसे मोती पलसन गांव में पिछले कुछ दिनों से लोग अपनी सुबह की शुरुआत पानी की आवाज़ से नहीं, लोहे की सीढ़ियों की खड़खड़ाहट से कर रहे थे। 

गांव की महिलाएं मटके और प्लास्टिक के डिब्बे लेकर 45 फीट गहरे सूखे कुओं में उतर रही थीं। कुएं की दीवारों से चिपकी नमी के बीच जहां कहीं थोड़ी-सी बूंदें जमा होती, वहीं से दिन भर के पानी का इंतज़ाम किया जाता। ऊपर खड़े बच्चे रस्सी पकड़ते और नीचे उतरी महिलाएं अंधेरे में पैर रखने की जगह टटोलती ताकि फिसल न जाएं। एक चूक और जान जाने का ख़तरा, लेकिन प्यास जान से भी ज़्यादा बड़ी और क़ीमती होती है।

गांव के लोगों ने मीडिया से अपनी बातचीत में बताया कि गर्मियों में कुएं सूखने के बाद महिलाएं घंटों इंतजार करती हैं ताकि तल पर बूंद-बूंद जमा हुआ पानी भर सकें।
स्थानीय निवासी गुलाब ढांगरा का मानना है कि उनके गांव की ज्यादातर महिलाएं अब कुएं में उतरना सीख चुकी हैं, क्योंकि पानी का संकट उन्हें ऐसा करने पर मजबूर करता है।

दरअसल यहां पाइपलाइन और नल कनेक्शन होने के बावजूद आए दिन नियमित जलापूर्ति की समस्या बनी रहती है। दरअसल, कभी पानी नहीं होता तो कभी पाईपलाइन की मरम्मत से जलापूर्ति रुक जाती है या कुछ दिनों के लिए रोक दी जाती है।

वलसाड का यह इलाका विडंबना से भरा है। इसे गुजरात का “चेरापूंजी” कहा जाता है क्योंकि यहां मानसून में भारी बारिश होती है। लेकिन गर्मियों तक आते-आते यही इलाका पानी की कमी से जूझने लगता है। 

गांव के लोगों का कहना है कि सर्दी खत्म होते ही कुएं उथले पड़ने लगते हैं और अप्रैल-मई तक स्थिति भयावह हो जाती है।

इस साल की गर्मी में इस गांव के करीब आठों सरकारी कुएं सूख गए। लोगों को एक से दो बाल्टी पानी भरने के लिए भी घंटों इंतजार करना पड़ रहा है। महिलाएं सुबह और शाम लाइन लगाती हैं क्योंकि कुएं में धीरे-धीरे बूंद-बूंद पानी जमा होता है।

इतनी बारिश के बावजूद पानी क्यों खत्म हो जाता है?

वलसाड गुजरात के सबसे अधिक वर्षा वाले जिलों में गिना जाता है। दीर्घकालिक जलवायु आंकड़ों और जिला-स्तरीय औसत के अनुसार यहां वार्षिक वर्षा लगभग 1,400 से 2,000 मिमी के बीच दर्ज होती है।

लेकिन यह बारिश पूरे साल समान रूप से नहीं गिरती। यह कुछ ही हफ्तों में अत्यधिक तीव्रता के साथ होती है, जिससे पानी जमीन में रिसने के बजाय तेज़ी से बहकर निकल जाता है।

विशेषज्ञों के अनुसार, इसके पीछे कई कारण एक साथ काम करते हैं:

  • बारिश का कम दिनों में अत्यधिक केंद्रित होना

  • पहाड़ी ढलानों से तेज़ी से बहता पानी

  • भूजल पुनर्भरण संरचनाओं की कमी

  • जंगलों और पारंपरिक जलस्रोतों का कमजोर होना

  • पाइपलाइन आधारित योजनाओं पर अत्यधिक निर्भरता

  • बढ़ती गर्मी और लंबे शुष्क मौसम

केंद्रीय भूजल बोर्ड (CGWB) के आंकड़ों के अनुसार जिले के कई मॉनिटरिंग कुओं में प्री-मॉनसून जलस्तर पोस्ट-मॉनसून की तुलना में कई मीटर नीचे चला जाता है। यह बताता है कि इलाके में रिचार्ज और दोहन के बीच बड़ा मौसमी अंतर है।
CGWB के अध्ययन ही बताते हैं कि वलसाड जिले में प्री-मॉनसून के दौरान कई स्थानों पर भूजल स्तर 4 से 18 मीटर नीचे तक पहुंच जाता है, जबकि मानसून के बाद यही स्तर काफी ऊपर आ जाता है। जिसका सीधा मतलब है कि इन इअलकों में पानी की उपलब्धता बहुत हद तक मौसम पर निर्भर होती है।

मानसून का पानी जमीन में क्यों नहीं ठहरता?

दरअसल, कपराडा और आसपास का इलाका पश्चिमी घाट के पारिस्थितिक प्रभाव क्षेत्र में आता है। इसलिए प्राकृतिक ढलान और वनाच्छादन यानी फारेस्ट कवर इलाक़े के जल के बहाव और पुनर्भरण दोनों को प्रभावित करते हैं। 

भारतीय वन सर्वेक्षण (FSI) के आंकड़े बताते हैं कि दक्षिण गुजरात के कई हिस्सों में वन क्षेत्र में धीरे-धीरे गिरावट और भूमि उपयोग में बदलाव देखा गया है, जिसका असर स्थानीय जलधारण क्षमता पर पड़ता है।

National Institute of Hydrology और International Water Management Institute जैसी जल-विज्ञान पर काम करने वाली संस्थाएं भी इस पर जोर देती रही हैं। उनका भी मानना है कि ढलानों पर भूमि उपयोग में होने वाले परिवर्तन, मिट्टी की संरचना में बदलाव और प्राकृतिक जलस्रोतों का क्षरण भूजल पुनर्भरण को कमजोर करते हैं।

इसी के साथ ही यह अत्यधिक मौसमी वर्षा पैटर्न वाला इलाक़ा भी है। भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के जिला-स्तरीय आंकड़े बताते हैं कि दक्षिण गुजरात के वलसाड जैसे इलाकों में बारिश भले ही अच्छी होती हो, लेकिन इसका अधिकांश हिस्सा मानसून के कुछ महीनों में ही गिरता है।

इस तरह की बारिश का एक बड़ा हिस्सा ढलानों पर तेजी से बहकर नदियों-नालों में चला जाता है। जब पानी को रोकने या धीरे-धीरे जमीन में उतारने वाले स्थानीय ढांचे कमजोर हो जाते हैं, तो वह पानी उपयोग में नहीं आ पाता। इसका सीधा असर बारिश और भूजल रिचार्ज के संतुलन पर पड़ता है।

‘हर घर जल’ और जमीनी सच्चाई

केंद्र सरकार की जल जीवन मिशन (JJM) योजना का उद्देश्य ग्रामीण भारत के हर घर तक “कार्यशील घरेलू नल कनेक्शन (FHTC) के माध्यम से सुरक्षित पेयजल पहुंचाना है। इसमें प्रति व्यक्ति प्रतिदिन कम से कम 55 लीटर पानी उपलब्ध कराना शामिल है। योजना के आधिकारिक दिशानिर्देशों के अनुसार यह केवल नल लगाने की परियोजना नहीं, बल्कि निरंतर और गुणवत्ता युक्त जल आपूर्ति सुनिश्चित करने की व्यवस्था है।

भारत सरकार के आधिकारिक डैशबोर्ड के अनुसार देश में करोड़ों ग्रामीण घरों तक नल कनेक्शन पहुंचाए जा चुके हैं और कई राज्यों को हर घर जल की श्रेणी में भी दर्ज किया गया है।

लेकिन जल जीवन मिशन की अपनी परिभाषा में केवल नल का लगाया जाना पर्याप्त नहीं माना जाता। योजना की सफलता का वास्तविक मानक यह है कि हर घर तक नियमित, पर्याप्त और सुरक्षित पेयजल लगातार पहुंच रहा हो।

यही वह जगह है जहां आंकड़ों और जमीनी स्थिति के बीच अंतर साफ दिखाई देता है। कई गांवों में नल और पाइपलाइन तो मौजूद हैं, लेकिन पानी की आपूर्ति नियमित नहीं है।

इसी पृष्ठभूमि में कपराडा क्षेत्र के अस्टोल समूह जल आपूर्ति योजना (Astol Group Water Supply Scheme) का संदर्भ भी आता है। इसे दक्षिण गुजरात के आदिवासी और पहाड़ी क्षेत्रों में स्थायी जल आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए तैयार किया गया था। लेकिन कई स्थानों पर इसके क्रियान्वयन और नियमित आपूर्ति को लेकर स्थानीय शिकायतें सामने आई हैं।

जहां एक ओर सरकारी रिकॉर्ड में नल कनेक्शन दर्ज हैं, वहीं दूसरी ओर गर्मियों में लोग अब भी सूखे कुओं और सीमित स्रोतों पर निर्भर हैं।

महिलाओं पर सबसे ज्यादा बोझ

मोती पलसन की कहानी सिर्फ जल संकट नहीं, श्रम और लैंगिक असमानता की कहानी भी है। ग्रामीण भारत में पानी की अनुपलब्धता का सबसे बड़ा सामाजिक प्रभाव समय और श्रम के असमान वितरण के रूप में सामने आता है।

UNICEF के अध्ययन के अनुसार, ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाओं और लड़कियों को पानी लाने के लिए प्रतिदिन औसतन कई घंटे तक पैदल या कठिन रास्तों से यात्रा करनी पड़ती है। इससे उनका time poverty बढ़ता है यानी शिक्षा, आय और आराम के लिए उनके पास समय लगातार घटता जाता है।

भारत के राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS-5) के निष्कर्ष भी यह संकेत देते हैं कि ग्रामीण घरेलू जल प्रबंधन का बड़ा हिस्सा महिलाओं पर निर्भर रहता है, खासकर उन क्षेत्रों में जहां पाइपलाइन जल आपूर्ति अनियमित है या भूजल स्रोतों पर निर्भरता अधिक है।

मौसमी और अनिश्चित जलस्रोतों वाले इलाक़ों में महिलाओं को अक्सर सुबह और शाम कई घंटे पानी की व्यवस्था में लगाने पड़ते हैं। यह केवल शारीरिक श्रम नहीं, बल्कि स्वास्थ्य पर भी सीधा दबाव डालता है। लगातार भारी वजन उठाने, लंबी दूरी तय करने और पानी की कमी के कारण निर्जलीकरण (डीहाइड्रेशन) और मस्कुलोस्केलेटल की समस्या बढ़ जाती है।

आदिवासी और ग्रामीण इलाकों में यह स्थिति और भी मुश्किल हो जाती है, क्योंकि पानी लाना, घर की जिम्मेदारियां और आजीविका से जुड़े काम एक साथ महिलाओं पर आ जाते हैं। कई बार इसका असर बच्चों की देखभाल और उनके स्कूल जाने पर भी पड़ता है।

नतीजतन, जल संकट केवल एक संसाधन समस्या नहीं रह जाता, बल्कि यह सीधे स्वास्थ्य जोखिमों और जीवन की गुणवत्ता से जुड़ जाता है। गर्मी में कम पानी होने का असर स्वच्छता पर भी पड़ता है। साफ और पर्याप्त पानी न मिलने का सीधा असर लोगों की सेहत पर पड़ता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार गंदा पानी, खराब स्वच्छता और साफ-सफाई की कमी से डायरिया जैसी बीमारियां फैलती हैं। इसका सबसे ज्यादा असर बच्चों और कमजोर तबकों पर होता है।

भारत में राष्ट्रीय रोग नियंत्रण केंद्र (NCDC) और अन्य स्वास्थ्य संस्थानों के अध्ययन बताते हैं कि ग्रामीण इलाकों में जब साफ पानी की कमी होती है, तो डायरिया, त्वचा रोग और दूसरी जलजनित बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है। खासकर गर्मियों में, जब कुएं और हैंडपंप सूखने लगते हैं, यह समस्या और गंभीर हो जाती है।

गर्मी और जल संकट का संयुक्त प्रभाव स्थिति की गंभीरता को बढ़ा देता है। उच्च तापमान और सीमित पानी की उपलब्धता मिलकर निर्जलीकरण की संभावना बढ़ाते हैं, जिससे थकान, चक्कर आना और कार्यक्षमता में गिरावट जैसे लक्षण ग्रामीण आबादी में अधिक देखे जाते हैं।

ऐसे क्षेत्रों में जहां पानी लाने की जिम्मेदारी मुख्यतः महिलाओं और बच्चों पर होती है, वहां स्वच्छता प्रथाएं भी प्रभावित होती हैं। कम पानी उपलब्ध होने पर नहाना, कपड़े धोना और घरेलू सफाई जैसी बुनियादी गतिविधियां सीमित हो जाती हैं।

जलवायु परिवर्तन का दबाव

कई जलवायु अध्ययनों, जिनमें IPCC की रिपोर्ट और भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के विश्लेषण शामिल हैं, यह बताते हैं कि पश्चिमी भारत में बारिश का पैटर्न बदल रहा है। अब बारिश कम दिनों में बहुत तेज़ हो रही है, जबकि बीच-बीच में लंबे सूखे अंतराल देखने को मिल रहे हैं। इसका असर सीधे भूजल पुनर्भरण पर पड़ता है।

IITM पुणे और अन्य जलवायु शोध संस्थानों के अध्ययन भी इस बात की पुष्टि करते हैं कि बारिश का पैटर्न बदलने का सबसे सीधा असर जमीन में पानी के रिसाव (भूजल रिचार्ज) पर पड़ता है। 

जब बारिश कम दिनों में बहुत तेज़ होती है, तो पानी जमीन में धीरे-धीरे रिसने के बजाय तेजी से बहकर निकल जाता है। इससे भूजल भरने का समय घट जाता है।

इसके साथ ही, लंबे सूखे अंतराल मिट्टी को कठोर बना देते हैं, जिससे बाद की बारिश का पानी भी आसानी से जमीन में नहीं उतर पाता।

पश्चिमी भारत में गर्मी की तीव्रता भी बढ़ी है, जिससे पानी की मांग और उपलब्धता दोनों पर दबाव पड़ रहा है।

सिर्फ टैंकर और पाइपलाइन नहीं, स्थानीय जल संरचनाएं भी जरूरी

मोती पलसन जैसी घटनाएं बताती हैं कि जल संकट का समाधान केवल टैंकर या पाइपलाइन नहीं हो सकता। वैज्ञानिक अध्ययन लगातार यह दिखाते हैं कि भूजल रिचार्ज के लिए स्थानीय जल संरचनाएं सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।

गुजरात के सौराष्ट्र क्षेत्र पर किए गए एक अध्ययन में पाया गया है कि बड़े पैमाने पर बनाए गए चेकडैम और छोटे जल संचयन ढांचे वर्षा जल को रोककर भूजल स्तर बढ़ाने में मदद करते हैं। 

यह अध्ययन TU Delft और अंतरराष्ट्रीय शोधकर्ताओं द्वारा किया गया था, जिसमें पाया गया कि ऐसे ढांचे बारिश के पानी को रोककर उसे धीरे-धीरे जमीन में रिसने का अवसर देते हैं।

इसी तरह, अंतर्राष्ट्रीय जल प्रबंधन संस्थान (IWMI) के शोध में यह पाया गया है कि सौराष्ट्र और राजस्थान जैसे अर्ध-शुष्क क्षेत्रों में चेकडैम भूजल स्तर को स्थिर करने में मदद करते हैं, हालांकि उनका प्रभाव तभी अधिक होता है जब जल प्रबंधन और रखरखाव नियमित हो।

राजस्थान के अरावली क्षेत्र में हुए वॉटरशेड डेवलेपमेंट प्रोजेक्ट्स के अध्ययन से भी यह स्पष्ट होता है कि छोटे जलग्रहण ढांचे, जैसे तालाब और खेत-बंध, लंबे समय में भूजल पुनर्भरण और कृषि उत्पादन दोनों को सुधारते हैं।

इन सभी अध्ययनों का एक साझा निष्कर्ष यह है कि केवल केंद्रीकृत पाइपलाइन प्रणाली पर्याप्त नहीं होती, बल्कि स्थानीय स्तर पर पानी को रोकने और जमीन में उतारने वाली संरचनाएं जल सुरक्षा की असली नींव होती हैं।

सरकार की ही कार्यक्षमता मूल्यांकन (Functionality Assessment) रिपोर्ट के अनुसार जहां 98 फ़ीसद घरों में नल हैं, वहीं केवल लगभग 86 फ़ीसद में ही वे वास्तव में काम कर रहे हैं। इसके अलावा, सभी मानकों के अनुसार केवल लगभग तीन-चौथाई घरों को ही पूरी तरह सुरक्षित और नियमित पानी मिल पा रहा है।

कई स्वतंत्र विश्लेषण भी इसकी पुष्टि करते हैं कि ढेर सारी जगहों पर योजनाएं मुख्य रूप से इंफ्रास्ट्रक्चर निर्माण तक सीमित रह गई हैं। जबकि संचालन, रखरखाव और नियमित जल आपूर्ति जैसी सेवाएं कमजोर स्थिति में हैं।

प्यास सिर्फ पानी की नहीं, भरोसे की भी

भारत दुनिया का सबसे बड़ा भूजल उपयोगकर्ता है और देश के लगभग 60 फ़ीसद सिंचाई तथा बड़ी ग्रामीण आबादी की पेयजल जरूरतें भूजल पर निर्भर हैं।

मोती पलसन के कुएं में उतरती महिलाएं केवल पानी नहीं भर रहीं। वे उस विकास मॉडल की दरारों को भी उजागर कर रही हैं जिसमें कागज के आंकड़े तो दुरुस्त हैं लेकिन ज़मीनी हक़ीक़त दयनीय।

मोती पलसन की यह कहानी बताती है कि जल संकट केवल पानी की कमी नहीं, बल्कि नीति, भू-जल प्रबंधन और स्थानीय पारिस्थितिकी के बीच टूटे हुए संतुलन का परिणाम है। 

जब तक योजनाएं केवल बुनियादी ढांचे के निर्माण तक सीमित रहेंगी और जल स्रोतों की दीर्घकालिक स्थिरता पर बराबर ध्यान नहीं दिया जाएगा, तब तक गांवों में पानी और कागज़ी आंकड़ों के बीच यह खाई जमी रहेगी।

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