इस बार क्यों हुई कम बर्फ़बारी : खेती पर पड़ सकती है मौसम की मार, गहराएगा जल संकट !
इस साल पहाड़ों पर काफ़ी कम बर्फ़बारी हुई है। उत्तराखंड के पौड़ी-गढ़वाल और हिमाचल के शिमला, कोटखाई, मनाली सहित अन्य स्थानों पर दिसंबर और जनवरी में हिमपात में कमी देखने को मिली। लाहौल, स्पीती जैसे दुर्गम इलाक़ों में भी महज़ दो दिन पहले 16 जनवरी को पहली बर्फ़बारी हुई है। इसका कारण इस बार जाड़े में पश्चिमी विक्षोभ का कमज़ोर पड़ना और जलवायु परिवर्तन के चलते भारत सहित पूरी दुनिया के मौसम चक्र का बिगड़ना बताया जा रहा है। पहाड़ों पर हिमपात में हुई इस कमी का खामियाज़ा इस साल कम बारिश, ज़्यादा गर्मी और खेती की कम पैदावार के रूप में उठाना पड़ सकता है।
15 साल बाद दिखा ऐसा नज़ारा
विशेषज्ञों का कहना है कि जलवायु परिवर्तन के चलते भारत सहित पूरी दुनिया के मौसम चक्र पर असर साफ दिखने लगे हैं। विश्व मौसम संगठन (WMO) की हालिया रिपोर्ट में कहा गया है कि 2026 में जनवरी से मार्च के बीच भारत सहित दुनिया के कई हिस्सों में तापमान सामान्य से ज्यादा रहने की आशंका है। यानी इस साल गर्मी ज़्यादा पड़ सकती है। इसके साथ ही बारिश भी असामान्य रह सकती है।
पूर्वानुमान में बताया गया है कि जून-जुलाई-अगस्त के दौरान अल नीनो की स्थिति बनने की संभावना है। अल नीनो वाले वर्षों में भारत में मानसून कमजोर होता है और भीषण गर्मी पड़ती है। इसकी वजह दिसंबर 2025 में पश्चिमी हिमालय में रिकॉर्ड स्तर पर कम बर्फबारी दर्ज किया जाना है। असामान्य बारिश और गर्मी के चलते कृषि उत्पादन पर भी प्रतिकूल असर पड़ने की आशंका है।
हिमाचल और उत्तराखंड में इस तरह की स्थिति कई वर्षों के बाद बनी है, जब सर्दियों में तीन माह तक व्यापक वर्षा या हिमपात न हुआ हो। वर्षा न होने से गेहूं, जौ, मटर और सरसों की फसल पर काफी असर पड़ा है। नमी की कमी के कारण फसलें पीली पड़ गई हैं। चीकू, आड़ू, सेब, संतरे और नाशपाती, जैसे फलों की पैदावार में भी कमी देखने को मिल रही है। सूखे के कारण प्राकृतिक जलस्रोत, नाले और छोटी नदियां सिकुड़ने लगी हैं।हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड के ऊंचाई वाले इलाकों में अक्टूबर के दूसरे सप्ताह से अभी तक वर्षा नहीं हुई है। केवल ऊंची चोटियों पर ही मामूली हिमपात हुआ है।
बीते वर्षों से तुलना की जाए तो दिसंबर और जनवरी में शिमला, कोटखाई, मनाली सहित अन्य स्थानों पर हिमपात में भारी कमी देखने को मिली है। हालांकि जनवरी के पहले हफ्ते में स्थिति में कुछ सुधार आता दिखा है, जिससे उम्मीद है 22 जनवरी के बाद एक अच्छी बर्फबारी देखने को मिल सकती है। इसकी शुरुआत 16 जनवरी को लाहौल, स्पीती में इस सीजन की पहली बर्फ़बारी के रूप में देखने को मिल चुकी है। ऐसे में अगर अगले कुछ महीनों में स्थितियां बदलती हैं, तो मानसून सामान्य भी रह सकता है।
क्या है बर्फ़ में कमी वजह?
ईरान और अफगानिस्तान से आने वाले पश्चिमी विक्षोभ के कमजोर रहने के कारण हिमाचल में सूखे जैसे हालात बने हैं। मौसम वैज्ञानिकों के मुताबिक नवंबर से अब तक करीब 10 बार पश्चिमी विक्षोभ सक्रिय तो हुआ, लेकिन जलवायु परिवर्तन और तापमान अपेक्षाकृत अधिक रहने की वजह से हर बार कमजोर रहा। प्रशांत महासागर के कुछ हिस्सों में समुद्र की सतह का तापमान औसत से ज्यादा बने रहने की बात WMO की ताजा रिपोर्ट में कही गई है।
दूसरी ओर, भारतीय महासागर और उत्तरी अटलांटिक में भी सामान्य से ज्यादा गर्मी दर्ज की जा रही है। ये नीना जैसी स्थिति की ओर इशारा करते हैं। इससे बारिश का पैटर्न भी प्रभावित होने की संभावना है। साथ ही जनवरी-मार्च 2026 के दौरान औसत से ज्यादा तापमान रहने की संभावना है। मौसम विज्ञान विभाग (IMD) की ओर से हाल ही में दिए गए पूर्वानुमान के मुताबिक, मानसून के दूसरे हिस्से में अल नीनो विकसित होने की संभावना लगभग 50 फीसदी है। मानसून के दौरान अगर अल नीनो की स्थिति बनती है तो भारत में मानसूनी बारिश कमजोर हो सकती है और भीषण गर्मी भरे दिन बढ़ सकते हैं। हालांकि भारतीय मौसम विभाग (IMD) के मुताबिक अभी निश्चित रूप से यह कहना जल्दबाजी होगी कि अल नीनो किस महीने में बनेगा। ये शुरुआती पूर्वानुमान हैं और आने वाले महीनों में स्थिति और स्पष्ट हो जाएगी।
अमेरिकी एजेंसी नेशनल ओशियानिक एंड एटमॉस्फेरिक एडमिनिस्ट्रेशन (NOAA) के मुताबिक अल नीनो जैसी प्राकृतिक घटनाओं पर भी अब जलवायु परिवर्तन का असर साफ तौर पर दिखने लगा है। अब ये घटनाएं इंसानी गतिविधियों के चलते हो रहे जलवायु परिवर्तन की वजह से पहले की तुलना में ज़्यादा हो रही हैं। रिकॉर्ड तोड़ गर्मी, मानसून में कमजोरी और हिमालय में सर्दियों के मौसम में बारिश और बर्फबारी में कमी साफ तौर पर इसी का संकेत हैं। वैज्ञानिकों के मुताबिक यदि ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन पर लगाम नहीं लगाई गई तो आने वाले सालों में मौसम की चरम स्थितियां यानी एक्स्ट्रीम वेदर इंवेंट्स बड़े पैमाने पर देखे जाएंगे।
10 साल में बर्फ़बारी 2 मिलीमीटर घटी
साइंस जर्नल रिसर्च गेट में छपे नेशनल रिमोट सेंसिंग सेंटर और इसरो के वैज्ञानिकों के एक अध्ययन के मुताबिक हिमालय की नुब्रा और भागीरथी घाटियों के बीते 30 साल (1991-2020) की बर्फबारी के आंकड़ों पर नज़र डालने पर पता चलता है कि 1991 से 2020 के बीच नुब्रा बासिन में बर्फबारी में हर 10 साल में 2 मिलीमीटर की कमी दर्ज की गई है। जलवायु परिवर्तन के चलते दोनों घाटियों में बर्फबारी में तो कमी आई है, लेकिन बारिश बढ़ी है।
अध्ययन में पाया गया कि पिछले तीन दशकों में दिसंबर के महीने में काफी उतार चढ़ाव देखा गया है। डीआरडीओ के वैज्ञानिक एम. आर. भूटियानी ने Climate change and the precipitation variations in the northwestern Himalaya: 1866-2006 शीर्षक से प्रकाशित अपनी रिसर्च रिपोर्ट में अगले 120 सालों में उत्तर-पश्चिमी हिमालय में अधिकतम तापमान 3 डिग्री तक बढ़ने की संभावना जताई है। तापमान में इस वृद्धि से पहाड़ों की जलवायु में बदलाव आएगा। ऐसे में आने वाले समय में बर्फबारी में और कमी देखी जा सकती है।
हिमाचल प्रदेश के राज्य जलवायु परिवर्तन केंद्र और अंतरिक्ष अनुप्रयोग केंद्र की ओर से सैटेलाइट डेटा के आधार पर जारी एक रिपोर्ट में दावा किया गया कि पिछले एक दशक में, हिमाचल प्रदेश में बर्फबारी में कमी आई है। जलवायु परिवर्तन के कारण बर्फबारी और बारिश के पैटर्न में भी बदलाव आया है। रिपोर्ट के मुताबिक 2021-22 की तुलना में 2022-2023 की सर्दियों में हिमाचल प्रदेश में बर्फ से ढके कुल क्षेत्र में 14.05% की कमी देखी गई है। वहीं, हिमाचल प्रदेश का औसत अधिकतम और न्यूनतम तापमान लगातार बढ़ रहा है। रिपोर्ट में वैज्ञानिकों ने पर्वतीय क्षेत्रों में बर्फ़ के घटते आवरण पर चिंता जताते हुए जलविद्युत, जल स्रोतों, पेयजल, पशुधन, जंगलों, खेतों और बुनियादी ढांचे पर इसका प्रतिकूल असर पड़ने की आशंका जताई है।
ग्लेशियरों पर प्लास्टिक की वजह पिघल रही बर्फ़
साइंस जर्नल पब मेड में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार हाल ही में चीन की एकेडमी ऑफ साइंस और कॉलेज ऑफ अर्थ एंड इनवायरमेंटल साइंस के शोधकर्ताओं ने अपने शोध में पाया कि उत्तरी हिमालय और तिब्बत के इलाके में हवा के साथ 50 माइक्रोमीटर से भी छोटे आकार के प्लास्टिक के छोटे कण ग्लेशियरों पर पहुंच कर जमा हो रहे हैं।
सामान्य तौर पर ग्लेशियर में जमी बर्फ पर जब सूरज की रौशनी पड़ती है तो वो उसे परावर्तित कर देता है। लेकिन, जब बर्फ के ऊपर प्लास्टिक के छोटे कण जमा हो जाते हैं तो सूरज की रौशनी से आने वाली गर्मी को अवशोषित कर लेते हैं। इससे ग्लेशियर में तापमान बढ़ता है और वो पिघलने लगता है।
इन परिवर्तनों ने बड़े पैमाने पर जल संसाधनों और जल विज्ञान चक्र को प्रभावित किया है। संभावना जताई जा रही है कि 21वीं सदी में तिब्बती पठारों में जमा ग्लेशियर 21% तक गल सकते हैं, इसके चलते यहां से निकलने वाली नदियों में ग्लेशियर से आने वाले पानी मात्रा में 28% तक की कमी देखी जा सकती है। अध्ययन के मुताबिक 1960 से 2000 के बीच तिब्बत में स्थित नैम-को लेक के करीब जमे ग्लेशियर को तेजी से गलाने में माइक्रोप्लास्टिक की हिस्सेदारी 8% की रही। प्लास्टिक के छोटे कणों के चलते यहां का तापमान ढाई डिग्री तक बढ़ गया। माइक्रोप्लास्टिक के अलावा ब्लैक कार्बन के चलते भी ग्लेशियर तेजी से गल रहे हैं। आर्कटिक के कुछ हिस्सों में ब्लैक कार्बन के चलते जुलाई से सितम्बर के बीच बर्फ के गलने की गति एक से तीन फीसदी तक बढ़ गई। शोधकर्ताओं को आर्कटिक, आल्प्स, एंडीज और अंटार्कटिका में भी ऐसे ही माइक्रोप्लास्टिक के कण मिले हैं।
बिजली, पानी, पर्यटन पर भी होगा असर
हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड में लगातार कम होती बर्फबारी के प्रभाव अब केवल मौसम तक सीमित नहीं रह गए हैं, बल्कि इसका सीधा असर आजीविका और आर्थिक गतिविधियों पर भी दिखने लगा है। सर्दियों में सामान्य हिमपात न होने से नदियों और जलस्रोतों में अपेक्षित जल संचय नहीं हो पा रहा, जिसका असर गर्मियों के महीनों में और गहराता है। कई ग्रामीण और पहाड़ी इलाकों में पेयजल संकट पहले ही उभर चुका है। प्राकृतिक झरने और धाराएं या तो सूख रही हैं या उनका प्रवाह कमजोर हो गया है। इस जल सकंट का सीधा असर खेती, पशुपालन और रोजमर्रा की जरूरतों पर भी पड़ने वाला है।
इसके अलावा बर्फबारी और वर्षा में आई कमी का सबसे गंभीर प्रभाव जलविद्युत उत्पादन पर भी पड़ रहा है। हिमाचल और उत्तराखंड जैसे राज्यों में पनविद्युत परियोजनाएं मुख्य रूप से हिमनदों और वर्षा से मिलने वाले पानी पर निर्भर हैं। सर्दियों में बर्फ का पर्याप्त भंडारण न होने से गर्मियों में नदियों का बहाव कमजोर पड़ता है, जिससे कई परियोजनाएं अपनी स्थापित क्षमता से काफी कम बिजली पैदा कर पा रही हैं। इससे न केवल राज्यों की ऊर्जा जरूरतों पर दबाव बढ़ा है, बल्कि राजस्व में भी कमी आने की आशंका जताई जा रही है।
हिमाचल प्रदेश और उत्तरराखंड की अर्थव्यवस्था की रीढ़ माने जाने वाले पर्यटन क्षेत्र भी इस बदलाव से अछूता नहीं रहा है। हिमाचल और उत्तराखंड के कई प्रसिद्ध पर्यटन स्थल सर्दियों की बर्फबारी पर निर्भर रहते हैं, जहां स्नोफॉल देखने और उससे जुड़ी गतिविधियों के लिए हर साल बड़ी संख्या में पर्यटक पहुंचते हैं। लेकिन, इस साल बर्फबारी कम होने से इन इलाकों में पर्यटकों की संख्या घट गई है। इसके चलते होटल, टैक्सी, गाइड और स्थानीय कारोबारियों की आमदनी प्रभावित हुई है। स्थानीय लोगों का कहना है कि मौसम का यह बदला हुआ मिज़ाज पहाड़ों की अर्थव्यवस्था की रीढ़ माने जाने वाले पर्यटन और पनबिजली दोनों क्षेत्रों के लिए दीर्घकालिक चुनौती बनता जा रहा है।

