भारतीय मौसम विज्ञान विभाग रोज़ाना नए शहरों में हीटवेव की चेतावनी जारी कर रहा है।इन चेतावनियों के बीच एक के बाद एक शहर जलसंकट ग्रस्त क्षेत्रों में जुड़ता जा रहा है।
चित्र: भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD)
हीटवेव : भारतीय शहरों में गर्मी का प्रकोप, कैसे और कहां-कहां हो रही है पानी की कमी?
अप्रैल का महीना अभी ख़त्म भी नहीं हुआ है लेकिन चिलचिलाती धूप और चालीस का पारा पार कर चुके तापमान ने जैसे जीवन का रूप-स्वरूप ही बदल दिया है। भारतीय मौसम विज्ञान विभाग रोज़ाना नए शहरों में हीटवेव की चेतावनी जारी कर रहा है। इन चेतावनियों के बीच एक के बाद एक शहर जलसंकट ग्रस्त क्षेत्रों में जुड़ता जा रहा है।
अप्रैल माह के तापमान के आंकड़े वाकई में डराने वाले हैं। भारत के शहरों में हीटवेव अब एक असामान्य घटना नहीं रह गई है, बल्कि धीरे-धीरे एक न्यू नॉर्मल बनता जा रहा है। मौसम विज्ञान विभाग ने देश के अधिकांश राज्यों में लू (हीटवेव) की चेतावनी जारी की है।
इसमें कहा गया है कि इस साल मई माह की शुरुआत तक तापमान सामान्य से ऊपर रहेगा और मैदानी इलाकों में राहत मिलने की संभावना बहुत कम है।
भारतीय मौसम विभाग (IMD) के आंकड़ों के अनुसार अप्रैल माह में भारत के 10 सबसे गर्म शहरों का तापमान कुछ इस प्रकार है:
26 अप्रैल को मौसम विभाग द्वारा जारी चेतावनी के अनुसार जिन स्थानों पर तापमान सामान्य से 5.1 डिग्री सेल्सियस या उससे अधिक रहेगा, उनमें से पश्चिमी उत्तर प्रदेश और पूर्वी राजस्थान में कुछ स्थान हैं, असम और मेघालय, बिहार, पूर्वी उत्तर प्रदेश, हरियाणा-चंडीगढ़-दिल्ली, हिमाचल प्रदेश, पश्चिम राजस्थान, पश्चिम मध्य प्रदेश, पूर्वी मध्य प्रदेश, सौराष्ट्र और कच्छ और मध्य महाराष्ट्र में अलग-अलग स्थानों पर। शामिल हैं।
इन शहरों में 3 से 5 डिग्री ज्यादा दर्ज होगा तापमान
सामान्य से काफी ऊपर (3.1°C से 5.0°C): उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश में कई स्थानों पर, अरुणाचल प्रदेश, झारखंड, बिहार, पश्चिम उत्तर प्रदेश, पश्चिम राजस्थान, पूर्वी मध्य प्रदेश और मराठवाड़ा में कुछ स्थानों पर, अंडमान और निकोबार द्वीप समूह, उप-हिमालयी पश्चिम बंगाल और सिक्किम, गांगेय पश्चिम बंगाल, ओडिशा, पूर्वी उत्तर प्रदेश, हरियाणा-चंडीगढ़-दिल्ली, पंजाब, पूर्वी राजस्थान, पश्चिम मध्य प्रदेश, गुजरात क्षेत्र, सौराष्ट्र और कच्छ, मध्य महाराष्ट्र, विदर्भ, तटीय आंध्र प्रदेश और यनम और तमिलनाडु, पुडुचेरी और कराईकल में अलग-अलग स्थानों पर।
तेजी से बढ़ रही भारत में हीटवेव की फ्रीक्वेंसी
नेचर पत्रिका में प्रकाशित अध्ययनों में भी यही बताया गया है कि, भारतीय शहरों में हीटवेव की आवृत्ति (फ़्रीक्वेंसी), अवधि और तीव्रता इंटेंसिटी, तीनों में लगातार वृद्धि हो रही है। यह बदलाव सिर्फ थर्मामीटर पर दर्ज होने वाले आंकड़े नहीं है, बल्कि शहरों के रोज़मर्रा के जीवन, बुनियादी ढांचे और संसाधनों पर पड़ने वाले दबाव का संकेत भी हैं।
लेकिन इस बढ़ती गर्मी को केवल तापमान का संकट मान लेना वास्तव में अधूरी तस्वीर देखना है। असल में, यह एक बहु-स्तरीय संकट है जहां जलवायु परिवर्तन, अनियोजित शहरीकरण और कमजोर जल प्रबंधन एक-दूसरे से टकराते हैं। इससे जल संसाधनों पर दबाव बढ़ने लगता है। लेकिन शहरों की जल आपूर्ति व्यवस्था इस अचानक बढ़े दबाव के लिए अक्सर तैयार नहीं होती।
शहर जहां तेज़ी से बढ़ रहा है जल संकट
एक सर्वे के अनुसार, अनौपचारिक बस्तियों में रहने वाले लगभग एक-तिहाई लोग टैंकर या निजी सप्लायर पर निर्भर हैं। कई बस्तियां ऐसी भी हैं जो पाइपलाइन नेटवर्क से जुड़ी ही नहीं हैं और पूरी तरह टैंकर आपूर्ति पर निर्भर रहती हैं।
हीटवेव और पानी के बीच एक गहरा संबंध है। बहुत ज़्यादा गर्मी सीधे तौर पर जल आपूर्ति पर अपना असर डालती है। गांवों में जहां छोटे तालाब सूख जाते हैं वहीं शहरों में घरों से कुछ ही मीटर और किलोमीटर दूर पर पानी के स्टोरेज टैंकों की मदद से कूलिंग सिस्टम चल पड़ते हैं। पीने के लिए पानी के लिए टैंकरों की आवाजाही तेज हो जाती है।
दिल्ली इसका एक स्पष्ट उदाहरण है, जहां गर्मियों के दौरान पानी की कमी बढ़ने पर बड़ी संख्या में बस्तियां टैंकरों पर निर्भर हो जाती हैं। दिल्ली जल बोर्ड भी इस बात को मानता है कि शहर के कई जल-अभाव वाले इलाकों में पाइपलाइन आपूर्ति के साथ टैंकरों के जरिए पानी पहुंचाया जाता है।
एक सर्वे के अनुसार, अनौपचारिक बस्तियों में रहने वाले लगभग एक-तिहाई लोग टैंकर या निजी सप्लायर पर निर्भर हैं। कई बस्तियां ऐसी भी हैं जो पाइपलाइन नेटवर्क से जुड़ी ही नहीं हैं और पूरी तरह टैंकर आपूर्ति पर निर्भर रहती हैं।
इस पूरी प्रक्रिया में इसका असर सबसे ज्यादा कमजोर समुदायों पर पड़ता है, जो पहले से ही संसाधनों की कमी से जूझ रहे हैं। यानी अनौपचारिक बस्तियों में रहने वाले परिवार, रोज़ाना पानी ढोने वाली महिलाएं, और वे समुदाय जिनके लिए हर अतिरिक्त डिग्री तापमान का मतलब है पानी तक पहुंचने के लिए और लंबा इंतजार।
इस तरह, हीटवेव अब शहरों के भीतर मौजूद असमानताओं, बुनियादी ढांचे की सीमाओं और जल प्रबंधन की कमजोरियों को उजागर करने वाला एक “स्ट्रेस टेस्ट” बन चुकी है।
शहर जहां तेज़ी से हो रही है पानी की कमी
गर्मी आते ही देश के तमाम शहरों में पानी की कमी होने की खबरें आने लगी हैं। हम यहां उन शहरों का जिक्र कर रहे हैं, जो अप्रैल माह में सबसे ज्यादा सुर्खियों में रहे।
बेंगलुरु (कर्नाटक): बेंगलुरु की पहचान दक्षिण भारत के सबसे संवेदनशील शहरों में से एक के रूप में की गई है। यहां 55 गांवों में पानी की गंभीर कमी है। जक्कूर, जलाहल्ली, हेब्बल और कोरमंगला सहित 65 से अधिक वार्डों में भूजल स्तर में 10-15 मीटर की गिरावट के कारण पानी की कमी है।
दिल्ली: इस शहर में पानी की भारी कमी है, गोविंदपुरी जैसे इलाकों में पानी की आपूर्ति के लिए टैंकरों पर अत्यधिक निर्भरता है। राजधानी के कुछ हिस्सों, विशेषकर अनधिकृत बस्तियों में, पानी की गंभीर कमी है, और शहर की पानी की मांग उपलब्ध आपूर्ति के लगभग बराबर पहुंच गई है
चेन्नई (तमिलनाड): यह क्षेत्र लगातार जल संबंधी चुनौतियों से जूझ रहा है और वर्षा के पैटर्न के प्रति अत्यधिक संवेदनशील है। जिसके कारण कई क्षेत्रों में टैंकरों द्वारा जल आपूर्ति पर भारी निर्भरता बनी हुई है।
हैदराबाद (तेलंगाना): तेजी से बढ़ती शहरी मांग के कारण यहां जल आपूर्ति प्रणालियों पर दबाव बढ़ रहा है।
मुंबई (महाराष्ट्र): पाइपलाइन की मरम्मत के कारण 18 घंटे (16-17 अप्रैल) तक पानी की कटौती का सामना करना पड़ रहा है, जिससे सीएसएमटी जैसे क्षेत्र प्रभावित हो रहे हैं।
नासिक (महाराष्ट्र): बुनियादी ढांचे को मजबूत करने के लिए अप्रैल की शुरुआत में 'मेगा वाटर शटडाउन' लागू किया गया, जिससे जल आपूर्ति प्रभावित हुई।
श्रीनगर (जम्मू और कश्मीर): नहरों की तत्काल मरम्मत के काम के कारण 6 अप्रैल, 2026 से शहर के प्रमुख हिस्सों में 24 घंटे जल आपूर्ति बाधित रही।
मोरमुगांव (गोवा): लंबे समय से जल की कमी बनी हुई है और अधिकारी अप्रैल 2026 तक इस कमी को दूर करने के लिए जल आपूर्ति परियोजनाओं को लागू करने का प्रयास कर रहे हैं।
अन्य शहर जहां स्थिति चिंताजनक होती जा रही है
जयपुर (राजस्थान): गर्मी बढ़ने के साथ यहां पानी की मांग तेजी से बढ़ी है, जबकि सप्लाई सीमित बनी हुई है। कई कॉलोनियों में वैकल्पिक दिनों पर पानी दिया जा रहा है।
पुणे (महाराष्ट्र): कम वर्षा और बढ़ती शहरी मांग के कारण जलाशयों का स्तर गिरा है, जिससे कई इलाकों में पानी की कटौती लागू करनी पड़ी है।
इंदौर (मध्य प्रदेश): शहर में पानी की आपूर्ति पर दबाव बढ़ रहा है, खासकर बाहरी और तेजी से विकसित हो रहे क्षेत्रों में, जहाँ नियमित जल वितरण एक चुनौती बना हुआ है।
लखनऊ (उत्तर प्रदेश): तेजी से बढ़ती आबादी और पुराना जल ढांचा यहां समस्या को बढ़ा रहा है। कई इलाकों में गर्मियों के दौरान पानी की अनियमित आपूर्ति की शिकायतें बढ़ जाती हैं।
चंडीगढ़ (पंजाब): यहां भी गर्मियों में पानी की मांग बढ़ने के कारण आपूर्ति पर दबाव आता है, और प्रशासन को समय-समय पर सप्लाई को नियंत्रित करना पड़ता है।
भारतीय मौसम विभाग (IMD) के अनुसार, मैदानी इलाकों में जब तापमान 40°C से ऊपर चला जाए और सामान्य से 4-6°C अधिक हो, तो उसे हीटवेव की स्थिति माना जाता है।
क्या होता है अर्बन हीट आइलैंड इफेक्ट?
आसान भाषा में समझा जाए तो हीटवेव वह स्थिति होती है जब किसी क्षेत्र का तापमान लगातार कई दिनों तक सामान्य से काफी ज्यादा बना रहता है। भारतीय मौसम विभाग (IMD) के अनुसार, मैदानी इलाकों में जब तापमान 40°C से ऊपर चला जाए और सामान्य से 4-6°C अधिक हो, तो उसे हीटवेव की स्थिति माना जाता है।
यह केवल एक स्थानीय परिभाषा नहीं है। जलवायु परिवर्तन से संबंधित अंतर-सरकारी पैनल (IPCC) की आकलन रिपोर्ट में भी स्पष्ट कहा गया है कि extreme heat events की आवृति और तीव्रता दोनों में वृद्धि दर्ज की गई है।
लेकिन शहरों में यह असर और भी ज्यादा महसूस होता है, और इसकी एक बड़ी वजह शहरी हीट आइलैंड प्रभाव शहरी ताप द्वीप प्रभाव यानी Urban Heat Island Effect है। इसका मतलब है कि शहर अपने आसपास के ग्रामीण इलाकों की तुलना में ज्यादा गर्म हो जाते हैं।
स्प्रिंग नेचर के स्प्रिंग डायरेक्ट सेक्शन के एक अध्ययन के अनुसार, शहरी इलाकों में कंक्रीट और डामर जैसी सतहें अधिक गर्मी सोखती हैं, हरियाली और खुले स्थानों की कमी प्राकृतिक ठंडक को घटाती है, और एसी, वाहन और उद्योगों से निकलने वाली ‘मानव-निर्मित गर्मी’ तापमान को और बढ़ा देती है।
इसी अध्ययन में यह भी बताया गया है कि घनी आबादी वाले शहरी इलाकों में रात का तापमान आसपास के क्षेत्रों की तुलना में 2-5°C तक ज़्यादा रह सकता है। यह अंतर हीटवेव के दौरान और ज्यादा खतरनाक हो जाता है, क्योंकि शरीर को रात में भी राहत नहीं मिल पाती।
भारत के संदर्भ में, विभिन्न आकलनों से यह संकेत मिलता है कि देश के आधे से अधिक जिले उच्च हीट जोखिम में हैं, और शहरी क्षेत्र इसमें सबसे ज्यादा संवेदनशील बनते जा रहे हैं।
हीटवेव का पानी पर असर: बढ़ती मांग और गिरता भूजल
हीटवेव का सबसे सीधा दबाव पानी पर पड़ता है। जैसे-जैसे तापमान बढ़ता है, पानी की मांग भी उसी तेजी से बढ़ने लगती है। पीने, नहाने, कूलिंग और स्टोरेज जैसे सभी स्तरों पर पानी की खपत बढ़ जाती है।
IPCC के अनुसार, बढ़ते तापमान के साथ पानी की मांग (water demand) में वृद्धि और जल-तनाव (water stress) में इजाफा एक स्पष्ट ट्रेंड है। भारत के संदर्भ में यह दबाव और ज्यादा दिखता है, क्योंकि शहरों में पानी का बड़ा हिस्सा भूजल से आता है।
केंद्रीय भूजल बोर्ड (CGWB) की रिपोर्ट के अनुसार, देश के कई शहरी इलाकों में भूजल का दोहन सस्टेनेबल लिमिट से ज्यादा हो चुका है। वैज्ञानिक अध्ययन यह भी बताता है कि भारत के कई शहरों में भूजल स्तर लगातार गिर रहा है, क्योंकि खपत की दर पुनर्भरण (रिचार्ज) से ज्यादा है।
शहरी ढांचा इस स्थिति की गंभीरता को और भी बढ़ा देता है। यहां हीटवेव की स्थिति में दबाव दोगुना हो जाता है। इसके कारण जहां एक तरफ़ माँग बढ़ती है वहीं आपूर्ति सीमित हो जाती है।
आख़िर किसके लिए ‘कूल’ है शहर: शहरी असमानता और पानी तक पहुंच
पब्लिक हेल्थ विशेषज्ञों का भी मानना है कि हीटवेव अब सिर्फ मौसम नहीं, बल्कि एक गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट बन चुकी है।
हीटवेव का संकट सब के लिए एक जैसा नहीं है। शहरों के भीतर ही पानी और ठंडक दोनों का बंटवारा असमान स्तर पर है। जिन लोगों के पास संसाधन हैं, वे एसी, आरओ और टैंकर से पानी ख़रीदकर अपने लिए राहत का इंतज़ाम कर सकते हैं। लेकिन वहीं दूसरी तरफ़ अनौपचारिक बस्तियों में रहने वाले लोग सीमित और अनिश्चित पानी आपूर्ति पर निर्भर रहते हैं।
नीति आयोग की समग्र जल प्रबंधन सूचकांक रिपोर्ट बताती है कि भारत के कई शहर उच्च जल संकट की स्थिति में हैं। लाखों लोगों को नियमित रूप से सुरक्षित पानी उपलब्ध नहीं हो पाता है। वहीं विश्व बैंक का कहना है कि शहर में रहने वाले आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के लोगों को अक्सर ज्यादा कीमत पर पानी खरीदना पड़ता है। इतना ही नहीं, अधिक पैसे देकर भी इन्हें गुणवत्ता से समझौता करना पड़ता है और अनिश्चितता की स्थिति भी झेलनी पड़ती है।
हीटवेव असमानता की इस खाई को और भी गहरा कर देता है। दरअसल अनौपचारिक और आर्थिक रूप से कमजोर बस्तियों में हरियाली कम होती है और तापमान ज्यादा होता है। साथ ही साफ़ पानी तक उनकी पहुंच और उपलब्धता दोनों कम होती है। नतीजतन, डिहाइड्रेशन, हीट स्ट्रेस जैसे स्वास्थ्य जोखिम बढ़ जाते हैं।
पब्लिक हेल्थ विशेषज्ञों का भी मानना है कि हीटवेव अब सिर्फ मौसम नहीं, बल्कि एक गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट बन चुकी है।
इन स्थितियों को देखकर कहा जा सकता है कि हीटवेव एक सामाजिक और आर्थिक असमानता को गहरा करने वाला कारक भी बन जाती है।
जब बढ़ती गर्मी और घटता पानी एक साथ शहरों पर दबाव डालते हैं, तो सवाल सिर्फ संकट का नहीं रह जाता है,। बल्कि सवाल यह भी होता है कि नीतियां इस बदलती हकीकत को कितनी गंभीरता से समझ रही हैं।
हीटवेव से निपटने के प्रयास: क्या काम कर रहा है, क्या नहीं?
अहमदाबाद के Heat Action Plan का ज़िक्र अक्सर एक सफल मॉडल के रूप में किया जाता है। इसमें अर्ली वार्निंग सिस्टम, सार्वजनिक जागरूकता अभियान और कूलिंग सेंटर जैसी व्यवस्थाएं शामिल हैं।
बढ़ती हीटवेव और पानी के संकट को देखते हुए भारत के कई शहरों और संस्थानों ने अलग-अलग स्तर पर पहल की है। भारत में हीटवेव से निपटने के लिए Heat Action Plans (HAPs) एक अहम नीति उपकरण के रूप में उभरे हैं।
विशेष रूप से अहमदाबाद के Heat Action Plan का ज़िक्र अक्सर एक सफल मॉडल के रूप में किया जाता है। इसमें अर्ली वार्निंग सिस्टम, सार्वजनिक जागरूकता अभियान और कूलिंग सेंटर जैसी व्यवस्थाएं शामिल हैं। राष्ट्रीय स्तर पर भी राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) ने हीटवेव प्रबंधन के लिए विस्तृत दिशा-निर्देश जारी किए हैं। इसमें जोखिम आकलन, चेतावनी प्रणाली और स्वास्थ्य सुरक्षा उपायों पर जोर दिया गया है।
विश्व बैंक की एक रिपोर्ट भी इस कमी की ओर इशारा करती है, जिसमें कहा गया है कि Heat Action Plans को प्रभावी बनाने के लिए उन्हें जल-सुरक्षा और शहरी नियोजन के साथ एकीकृत करना जरूरी है।
हालांकि, Heat Action Plans ने हीटवेव को नीति विमर्श में लाने और शुरुआती स्तर पर जोखिम कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। लेकिन बढ़ती शहरी गर्मी और पानी के संकट के संदर्भ में इनका दायरा अभी भी सीमित बना हुआ है।
विज्ञान एवं पर्यावरण केंद्र (CSE) के विश्लेषण के अनुसार, रेनवॉटर हार्वेस्टिंग की नीतियां तो मौजूद हैं, लेकिन उनका अनुपालन और निगरानी कमजोर है।
रेनवॉटर हार्वेस्टिंग: नीति में मजबूत, क्रियान्वयन में कमजोर
शहरी जल संकट से निपटने के लिए रेनवॉटर हार्वेस्टिंग (RWH) को लंबे समय से एक प्रभावी समाधान के रूप में देखा जाता रहा है। कई राज्यों और नगर निकायों ने नए निर्माण में इसे अनिवार्य भी किया है, ताकि वर्षा जल को सीधे जमीन में पहुंचाकर भूजल रिचार्ज बढ़ाया जा सके। केंद्रीय भूजल प्राधिकरण (CGWA) के अनुसार भी भूजल संरक्षण के लिए यह एक प्रमुख है। इसके विभिन्न दिशानिर्देशों में इसके व्यापक उपयोग की सिफारिश की गई है।
हालांकि, जमीन पर इसका सीमित प्रभाव ही देखने को मिला है। कई अध्ययनों और आकलनों से यह सामने आया है कि शहरी क्षेत्रों में स्थापित RWH सिस्टम या तो ठीक से लगाए ही नहीं गए हैं, या उनका नियमित रखरखाव नहीं होता।
विज्ञान एवं पर्यावरण केंद्र (CSE) के विश्लेषण के अनुसार, रेनवॉटर हार्वेस्टिंग की नीतियां तो मौजूद हैं, लेकिन उनका अनुपालन और निगरानी कमजोर है।
इसके अलावा, शहरी ढांचे की भी अपनी सीमाएं हैं। कंक्रीट और डामर की सतहें वर्षा जल को जमीन में जाने से रोकती हैं, जिससे प्राकृतिक रिचार्ज और भी कम हो जाता है। ऐसे में RWH की संभावनाएं होते हुए भी, उसका वास्तविक प्रभाव सीमित रह जाता है।
रेनवॉटर हार्वेस्टिंग एक मजबूत नीतिगत विचार तो है, लेकिन इसे प्रभावी रूप से लागू करने, उसकी निगरानी और सामुदायिक भागीदारी के बिना यह शहरी जल संकट को कम करने में अपनी पूरी क्षमता तक नहीं पहुंच पा रहा है।
शहरी जल निकाय: संभावनाएं और चुनौतियां
शहरों में झील, तालाब और अन्य पारंपरिक जल निकाय लंबे समय से सिर्फ पानी के स्रोत ही नहीं, बल्कि स्थानीय जलवायु को संतुलित रखने वाले प्राकृतिक तंत्र के रूप में भी काम करते रहे हैं। ये जल निकाय तापमान को नियंत्रित करने, आसपास के क्षेत्रों में ठंडक बनाए रखने और भूजल रिचार्ज को बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
शहरी जल निकायों के सामने सबसे बड़ी चुनौती अतिक्रमण और अनियोजित शहरी विस्तार है। विज्ञान एवं पर्यावरण केंद्र (CSE) के अनुसार, शहरों में जल निकायों और उनके कैचमेंट क्षेत्रों पर आवास और निर्माण गतिविधियों का लगातार अतिक्रमण हुआ है, जिससे कई झीलें सिकुड़ गई हैं या समाप्त हो चुकी हैं।
इसके साथ ही, वैज्ञानिक अध्ययन से यह भी सामने आया है कि शहरी झीलों में सीवेज और ठोस अपशिष्ट के प्रवाह से जल गुणवत्ता गंभीर रूप से प्रभावित होती है। उदाहरण के लिए, चेन्नई की झीलों पर किए गए एक अध्ययन में पाया गया कि अधिकांश जल निकाय शहरी प्रदूषण और अतिक्रमण के कारण अपने मूल आकार और गुणवत्ता का बड़ा हिस्सा खो चुके हैं।
इसी तरह, GIS आधारित एक अध्ययन (Ambattur Lake, Chennai) दिखाता है कि बस्तियों और उद्योगों के विस्तार के कारण झील का क्षेत्रफल लगभग 40 फ़ीसद तक घट गया और पानी की गुणवत्ता लगातार खराब होती गई।
इस प्रकार, अतिक्रमण, प्रदूषण और भूमि उपयोग में बदलाव, तीनों मिलकर शहरी जल निकायों के प्राकृतिक पुनर्भरण तंत्र को कमजोर कर रहे हैं और उन्हें धीरे-धीरे समाप्त कर रहे हैं।
नीतिगत खामियां: हीटवेव और जल संकट में समस्या कहां है?
हीटवेव और शहरी जल संकट से निपटने के लिए विभिन्न नीतिगत प्रयासों के बावजूद कुछ बुनियादी खामियां लगातार सामने आती हैं, जो इन चुनौतियों को और जटिल बना देती हैं।
सबसे बड़ी समस्या यह है कि हीटवेव और पानी को अक्सर अलग-अलग मुद्दों के रूप में देखा जाता है, जबकि दोनों गहराई से एक-दूसरे से जुड़े हैं। IPCC की आकलन रिपोर्ट से यह स्पष्ट होता है कि जलवायु परिवर्तन के प्रभाव, जैसे बढ़ती गर्मी आदि सीधे जल संसाधनों और उनकी उपलब्धता को प्रभावित करते हैं, जिससे जल-तनाव बढ़ता है। इसके बावजूद, अधिकांश शहरी नीतियों में हीट प्रबंधन और जल प्रबंधन के बीच समन्वय का अभाव बना हुआ है।
दूसरी प्रमुख खामी शहरी योजना में एकीकृत दृष्टिकोण की कमी है। वर्तमान शहरी विकास मॉडल में ग्रीन कवर, जल निकायों और कूलिंग इंफ्रास्ट्रक्चर को अक्सर अलग-अलग तत्वों के रूप में देखा जाता है, जबकि ये सभी मिलकर ही शहरी तापमान और जल संतुलन को प्रभावित करते हैं। UN Habitat के अनुसार, जलवायु-संवेदनशील शहरी योजना के लिए इन तत्वों को एकीकृत रूप से शामिल करना आवश्यक है।
नीति आयोग की Composite Water Management Index रिपोर्ट भी यह संकेत देती है कि शहरी जल संकट का प्रभाव अलग-अलग सामाजिक समूहों पर असमान रूप से पड़ता है, लेकिन नीतियां इस अंतर नज़रअंदाज़ कर देती हैं।
डेटा और स्थानीय स्तर पर निगरानी की कमी भी एक प्रमुख समस्या है। कई शहरों में न तो रियल-टाइम तापमान और पानी की उपलब्धता से जुड़ा पर्याप्त डेटा मौजूद है, और न ही स्थानीय स्तर पर निर्णय लेने के लिए मजबूत मॉनिटरिंग सिस्टम। विश्व बैंक की रिपोर्ट के अनुसार, शहरी जल प्रबंधन में डेटा की कमी नीति-निर्माण और प्रभावी हस्तक्षेप दोनों को सीमित करती है।
अंततः, नीतियों में असमानता के आयाम को पर्याप्त महत्व नहीं दिया जाता। अनौपचारिक बस्तियों और कमजोर वर्गों की विशेष जरूरतें अक्सर योजनाओं में शामिल नहीं होतीं, जिसके कारण “वन-साइज़-फिट्स-ऑल” दृष्टिकोण असफल साबित होता है।
नीति आयोग की Composite Water Management Index रिपोर्ट भी यह संकेत देती है कि शहरी जल संकट का प्रभाव अलग-अलग सामाजिक समूहों पर असमान रूप से पड़ता है, लेकिन नीतियां इस अंतर नज़रअंदाज़ कर देती हैं।
हीटवेव और जल संकट से प्रभावी ढंग से निपटने के लिए केवल अलग-अलग उपाय पर्याप्त नहीं हैं। इसके लिए एकीकृत, डेटा-आधारित और समानता-केंद्रित नीति दृष्टिकोण की आवश्यकता है, जो इन परस्पर जुड़ी चुनौतियों को साथ लेकर चले।
समाधान: हीटवेव और जल संकट से निपटने का आगे का रास्ता
बढ़ती हीटवेव और शहरी जल संकट को देखते हुए यह स्पष्ट होता जा रहा है कि पारंपरिक, अलग-अलग समाधानों से आगे बढ़कर एक एकीकृत और बहु-स्तरीय दृष्टिकोण अपनाने की जरूरत है। इस दृष्टिकोण में जल, शहरी डिजाइन और सामाजिक समानता को साथ लेकर योजना बनाई जाए।
प्रकृति-आधारित समाधान इस दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। शहरी हरियाली, जल निकायों का संरक्षण और ऐसी सतहों का उपयोग जो पानी को जमीन में जाने दें (permeable surfaces), ये सभी मिलकर तापमान को कम करने और जल रिचार्ज बढ़ाने में मदद करते हैं। UN पर्यावरण प्रोग्राम के अनुसार, ऐसे समाधान शहरों में हीट को कम करने के साथ-साथ जल प्रबंधन को भी मजबूत करते हैं
दूसरा, हीट और पानी को अलग-अलग नहीं, बल्कि एक साथ देखने की जरूरत है। वर्तमान Heat Action Plans में हीटवेव के दौरान पानी की उपलब्धता सुनिश्चित करना और जल आपूर्ति को मजबूत करना जरूरी है, क्योंकि बढ़ती गर्मी शहरों के जल संसाधनों पर अतिरिक्त दबाव डालती है।
उदाहरण के तौर पर अहमदाबाद में इस के तहत कूलिंग के लिए छत वाली और ढंकी जगहों और आपातकालीन सुविधा केंद्रों की पहचान की गई, जहां लोगों को छाया, पीने का पानी और प्राथमिक स्वास्थ्य सहायता मिलती है।
साथ ही, प्रशासन इन स्थानों की जानकारी लोगों तक पहुंचाने और हीटवेव के दौरान उनके उपयोग को बढ़ाने पर भी जोर देता है। विश्व बैंक भी इस एकीकृत दृष्टिकोण पर जोर देता है।
इसके अलावा, विकेंद्रीकृत जल प्रबंधन को बढ़ावा देना जरूरी है। सामुदायिक स्तर पर रेनवॉटर हार्वेस्टिंग, स्थानीय जल स्रोतों का पुनर्जीवन और उपचारित अपशिष जल (treated wastewater) के दोबारा उपयोग जैसे उपाय शहरों पर कुल जल दबाव को कम कर सकते हैं। CGWB भी स्थानीय स्तर पर जल संरक्षण और रिचार्ज उपायों को भूजल संकट से निपटने के लिए महत्वपूर्ण मानता है।
नीतियों में समानता (equity) को केंद्र में रखना ज़रूरी है। अनौपचारिक बस्तियों और कमजोर वर्गों के लिए सस्ती और भरोसेमंद पानी आपूर्ति, सार्वजनिक कूलिंग स्पेस। नीति आयोग की रिपोर्ट का भी मानना है कि जल प्रबंधन में समानता को शामिल किए बिना स्थायी और लंबी अवधि वाला समाधान संभव नहीं है।
समाधानों को केवल तकनीकी या इंफ्रास्ट्रक्चर आधारित नहीं होना चाहिए। इसके लिए एक ऐसा दृष्टिकोण जरूरी है जो प्रकृति, नीति और समाज, तीनों को एक साथ जोड़कर शहरों को अधिक लचीला (resilient) और न्यायपूर्ण बना सके।
अगर नीतियां हीट और पानी को एक साथ नहीं देखेंगी, तो शहर सिर्फ ज्यादा गर्म ही नहीं, बल्कि ज्यादा असमान और रहने के लिए कठिन होते जाएंगे।
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