इस तरह के कॉम्‍पैक्‍ट बायो गैस प्‍लांट शहरी इलाकों के लिए काफी उपयोगी साबित हो सकते हैं, जहां बड़े संयंत्र लगाने के लिए जगह नहीं होती। 

इस तरह के कॉम्‍पैक्‍ट बायो गैस प्‍लांट शहरी इलाकों के लिए काफी उपयोगी साबित हो सकते हैं, जहां बड़े संयंत्र लगाने के लिए जगह नहीं होती। 

स्रोत : फेसबुक

गैस संकट के बीच पुणे के युवा उद्यमी का यह इनोवेशन मुफ़्त में जला सकता है आपके घर का चूल्‍हा!

किचन वेस्‍ट से फ्री में बायो गैस बनाकर घर को बना सकते हैं 'एलपीजी फ्री' इनोवेशन के ज़रिये घरेलू बजट में की जा सकती है बड़ी बचत।
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ईरान-इज़रायल-अमेरिका के बीच चल रही जंग के कारण खाड़ी देशों से तेल-गैस की सप्‍लाई बाधित हो गई है। ईंधन की इस किल्‍लत ने देश में गैस का संकट खड़ा कर दिया है। इसे देखते हुए सरकार ने ऐतियाती कदम उठाए हैं। कॉमर्शियल एलपीजी सिलेंडर की आपूर्ति कई जगह रोक दी गई है। वहीं, शहरी इलाकों में घरेलू एलपीजी सिलेंडर की रीफिलिंग के लिए कम से कम 25 दिन और ग्रामीण इलाकों के लिए 45 दिन की पाबंदी लागू कर दी गई है। गैस आपूर्ति के इस संकट का फायदा उठाकर सिलेंडर की कालाबाज़ारी की खबरें भी सामने आ रही हैं। गैस की इस किल्‍लत के बीच लोग इंडक्‍शन चूल्‍हे जैसे एलपीजी के विकल्‍प ढूंढ रहे हैं। पर, इसमें बिजली की भारी खपत और खास तरह के बर्तन के इस्‍तेमाल जैसी बाधाएं हैं। ऐसे में महाराष्‍ट्र के पुणे में रहने वाले एक युवा उद्यमी की ओर से पेश किया गया एक वैकल्पिक मॉडल चर्चा में है। घरेलू कचरे (किचन वेस्‍ट) से मुफ्त में बायोगैस बनाने वाला यह संयंत्र लंबे समय (लॉन्‍ग टर्म) के लिए एक उपयोगी विकल्‍प बन सकता है।

पुणे के प्रियदर्शन सहस्त्रबुद्धे ने ‘वायु’ नाम के इस बायोगैस संयंत्र को तैयार किया है। उनका यह इनोवेशन दो तरह से पर्यावरण को बचाने का काम कर रहा है। एक तो, यह घरेलू गीले कचरे से निकले कार्बोहाइड्रेट को मीथेन गैस में बदल देती है। दूसरे, यह सह-उत्‍पाद यानी बाई प्रोडक्‍ट के रूप में ऑर्गेनिक लिक्विड फर्टिलाइज़र भी बनाकर देती है, जिसका इस्‍तेमाल किचन गार्डन, खेती-बागवानी में किया जा सकता है।

फैक्ट्री के वेस्ट से बनाई बायो गैस डिवाइस 

प्रियदर्शन ने बेटर इंडिया को बताया कि वह अपने पिता की ऑटो कॉम्पोनेन्ट मैन्युफैक्चरिंग कंपनी में काम करते थे। लेकिन वह हमेशा से अपने आस-पास के वातावरण और फैलते प्रदूषण से परेशान थे और वह कुछ ऐसा करना चाहते थे, जिससे आम आदमी भी जुड़ सकें और पर्यावरण के प्रति ज़िम्मेदार बन सकें। इसी दिशा में काम करते हुए प्रियदर्शन ने 2015 में प्रायोगिक तौर पर एक बायो गैस डिवाइस बनाई। इसकी शुरुआत दरअसल उसी समय डॉ. आनंद कर्वे से उनकी मुलाकात के बाद हुई, जो अपनी संस्था के ज़रिए  बायो गैस पर काम कर रहे थे। प्रियदर्शन ने उनसे जानकारियां लेकर एक छोटा बायो गैस डिवाइस बनाया, जिसे आगे चलकर उन्‍होंने ‘वायु' का नाम दिया। इस मशीन को बनाने के बाद, उन्हें बायो गैस की क्षमताओं के बारे में  अच्छे से पता चला।

प्रियदर्शन  बताते हैं, “मुझे पहले लगता था कि गोबर गैस के नाम से जानी जाने वाली बायोगैस को सिर्फ़ ग्रामीण इलाकों में ही बनाया और इस्तेमाल किया जाता है, क्‍योंकि पशुपालन के चलते वहां पर्याप्‍त मात्रा में गोबर उपलब्‍ध होता है। लेकिन, घरेलू गीले कचरे से गैस बनाने वाले छोटे से डिवाइस को बनाने के बाद, मुझे एहसास हुआ कि यह शहरी इलाकों में भी काफ़ी उपयोगी हो सकता है। अपनी फैक्ट्री में अपने बनाए डिवाइस को आज़माने के बाद उन्‍होंने अपने कुछ दोस्तों और रिश्तेदारों के लिए भी ऐसे ही बायो गैस डिवाइस बनाए। इसकी सफलता के बाद उन्‍होंने व्‍यावसायिक स्‍तर पर इसका उत्‍पादन शुरू करने की ठान ली। ‘वायु' की सफलता से ही उन्हें इस क्षेत्र में और काम करने की प्रेरणा मिली, जिसके चलते आज वह कई तरह के वेस्ट को रीसाइकल करने के लिए कई तरह के प्रोडक्ट्स बना रहे हैं। आज देशभर में 320 ‘वायु’ बायो गैस प्‍लांट का इस्‍तेमाल कर रहे हैं। कुछ बड़े साइज़ के ‘वायु’ सोसाइटी बिल्डिंग्स में लगे हैं और कुछ ‘वायु’ कंपनी कैंटीन और रिसॉर्ट्स में भी लगाए गए  हैं। प्रियदर्शन 2019 से पुणे में इसकी मदद से ‘क्लाइमेट कैफ़े’ नाम से एक अनोखा कैफ़े भी चला रहे हैं, जो एक ऐसा एलपीजी फ्री कैफ़े है, जिसमें बायो गैस से ही खाना बनाया जाता  है। 

<div class="paragraphs"><p>बड़े बायो गैस संयंत्रों से ज्‍यादा मात्रा में गैस का उत्‍पादन किया जा सकता है, पर इसके लिए जगह ज्‍़यादा चाहिए होती है, और गोबर या कचरे की भी अधिक मात्रा में आवश्‍यकता होती है।</p></div>

बड़े बायो गैस संयंत्रों से ज्‍यादा मात्रा में गैस का उत्‍पादन किया जा सकता है, पर इसके लिए जगह ज्‍़यादा चाहिए होती है, और गोबर या कचरे की भी अधिक मात्रा में आवश्‍यकता होती है।

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शहरी अपार्टमेंट्स के लिए उपयोगी

प्रियदर्शन ने अपनी बायो गैस डिवाइस की बदौलत अपने घर को  एलपीजी मुक्त भी बना दिया है। इसके लिए उन्‍होंने अपने इलाके के सफाईकर्मियों की मदद ली। वे आसपास के घरों का गीला कचरा लाकर उनके घर में लगे ‘वायु’ में डालते हैं। यह कचरा कुछ ही समय में डीकंपोज होकर मीथेन गैस बनाता है और बचा हुआ ठोस व गीला हिस्‍सा लिक्विड फर्टीलाइज़र के रूप में काम आता है। उन्हीं की तरह फ्री की गैस तैयार करने के लिए उनके इलाके के छह से सात परिवार सफाईकर्मियों को अपना एनर्जी सप्लायर बनाकर अब ‘वायु’ की मदद से ‘एलपीजी फ्री’ बन गए हैं।

इस तरह के कॉम्‍पैक्‍ट बायो गैस प्‍लांट शहरी अपार्टमेंट्स के लिए काफी उपयोगी साबित हो सकता है। अपार्टमेंट में अगर परिवार भी रहते हैं, तो उन सबके गीले कचरे से कम से कम तीन-चार परिवारों को मुफ्त गैस मिल सकती है। साथ ही इसके वेस्‍ट से लोगों को अपने टेरेस गार्डन के पौधों के लिए लिक्विड फर्टीलाइज़र के रूप में आर्गेनिक खाद भी मिलेगी। महानगरों की कॉलोनियों और अपार्टमेंंट्स में इस तरह बायो गैस संयंत्रों का इस्‍तेमाल करके कचरे की समस्‍या से निजात पाने के साथ ही मुफ्त में रसोई गैस भी प्राप्‍त की जा सकती है।  लोगों में इसके प्रति जागरूकता ला कर कम से कम गीले कचरे को तो डम्पिंग साइटों पर जाने से रोका जा सकता है और एलपीजी पर निर्भरता को भी कम किया जा सकता है। यानी नगर पालिका के काम को आसान करने के साथ ही लोगों के घरेलू बजट में अच्‍छी खासी बचत की जा सकती है।

एलपीजी खपत में बढ़ोतरी से बढ़ रही आयात पर निर्भरता
भारत दुनिया के सबसे बड़े एलपीजी उपभोक्ताओं में शामिल है। पेट्रोलियम मंत्रालय के हालिया आंकड़ों के अनुसार देश में एलपीजी की सालाना खपत करीब 2.9–3.0 करोड़ टन तक पहुंच चुकी है। इसमें घरेलू सेक्टर की हिस्सेदारी सबसे ज्यादा है, जिसे उज्ज्वला जैसी योजनाओं के विस्तार से बढ़ावा मिला है। हालांकि, उत्पादन की तुलना में खपत अधिक होने के कारण भारत अपनी जरूरत का लगभग 60% एलपीजी आयात करता है। यही वजह है कि एलपीजी की कीमतें अंतरराष्ट्रीय बाजार पर निर्भर रहती हैं और ऊर्जा सुरक्षा को लेकर चुनौती बनी रहती है।

कैसे काम करता है वायु, क्‍या है कीमत ?

वायु बायो गैस सिस्टम सूक्ष्‍म जीवों यानी माइक्रोब्‍स की मदद से काम करता है। माइक्रोब घरेलू कचरे को डीकंपोज करके मीथेन गैस बनाते हैं। “वायु” बायोगैस सिस्टम एनारोबिक डाइजेशन (Anaerobic Digestion) की वैज्ञानिक प्रक्रिया पर काम करता है, जिसमें सूक्ष्म जीव यानी माइक्रोब्स बिना ऑक्सीजन के जैविक कचरे को तोड़कर ऊर्जा में बदलते हैं। इस संयंत्र में घरों से निकलने वाला किचन वेस्ट जैसे सब्जियों के छिलके, बचा हुआ भोजन और फल-फूल का कचरा एक एयर-टाइट टैंक में डाला जाता है। टैंक के अंदर मौजूद विशेष प्रकार के बैक्टीरिया इस कचरे को चरणबद्ध तरीके से डीकंपोज करते हैं। पहले जटिल कार्बनिक पदार्थ सरल अणुओं में टूटते हैं, फिर उनसे एसिड बनते हैं और अंत में मीथेन (CH₄) व कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂) जैसी गैसों का मिश्रण तैयार होता है, जिसे बायोगैस कहा जाता है।

यह गैस पाइप के जरिए सीधे किचन स्टोव तक पहुंचाई जा सकती है और खाना पकाने में एलपीजी का विकल्प बनती है। गैस बनने के बाद टैंक में बचा घोल लिक्विड बायो-फर्टिलाइज़र के रूप में निकलता है, जिसमें नाइट्रोजन, फॉस्फोरस और पोटाश जैसे पोषक तत्व होते हैं। इसके साथ कुछ ठोस अवशेष यानी ऑर्गेनिक फाइबर भी मिलता है, जिसे मिट्टी सुधारक के तौर पर उपयोग किया जा सकता है। कीमत की बात करें तो घरेलू उपयोग के लिए छोटा “वायु” सिस्टम लगभग 23 हजार रुपये में तैयार हो जाता है, जबकि अधिक क्षमता वाला बड़ा संयंत्र करीब एक लाख रुपये तक का पड़ सकता है, जो सोसाइटी या छोटे संस्थानों के लिए उपयुक्त माना जाता है।

<div class="paragraphs"><p>अपनी जरूरत के मुताबिक बायो गैस तैयार करने के लिए कई टंकियों वाले संयंत्र को भी लगाया जा सकता है।&nbsp;</p></div>

अपनी जरूरत के मुताबिक बायो गैस तैयार करने के लिए कई टंकियों वाले संयंत्र को भी लगाया जा सकता है। 

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5,000 से अधिक CBG प्लांट लगाने का लक्ष्य
भारत में गोबर, कृषि अवशेष और शहरी गीले कचरे से बायोगैस उत्पादन की क्षमता काफी अधिक मानी जाती है। सरकार की SATAT पहल के तहत देश में 5,000 से अधिक Compressed Bio-Gas (CBG) प्लांट स्थापित करने का लक्ष्य रखा गया है। अनुमान है कि इनसे हर साल करीब 1.5 करोड़ टन बायो-CNG उत्पादन संभव हो सकता है, जो रसोई गैस और परिवहन ईंधन के रूप में फॉसिल फ्यूल का विकल्प बन सकता है।

बायोगैस के और भी हैं विकल्प

प्रियदर्शन के “वायु” संयंत्र की तरह देश में घरेलू कचरे से बायोगैस बनाने के कई अन्य इनोवेटिव मॉडल भी विकसित हो रहे हैं। ये तकनीकें न सिर्फ एलपीजी पर निर्भरता घटाने की दिशा में काम कर रही हैं, बल्कि कचरा प्रबंधन, जैव-उर्वरक उत्पादन और स्वच्छ ऊर्जा के बहुस्तरीय समाधान भी दे रही हैं। आइए, इन प्रमुख विकल्पों पर थोड़ा विस्तार से नज़र डालते हैं -

1. “BioUrja” – ड्राई एनारोबिक डाइजेस्टर

“BioUrja” तकनीक पारंपरिक गीले डाइजेस्टर से अलग ड्राई फर्मेंटेशन (Dry Fermentation) सिद्धांत पर आधारित है। इसमें किचन वेस्ट, पोल्ट्री लिटर या कृषि अवशेष जैसे अपेक्षाकृत ठोस जैविक पदार्थों को सीधे रिएक्टर में डाला जा सकता है, जिससे अतिरिक्त पानी मिलाने की आवश्यकता कम हो जाती है। इससे न केवल संयंत्र का आकार छोटा रहता है, बल्कि गैस उत्पादन की दक्षता भी बढ़ती है। बताया जाता है कि इस मॉडल में गैस उत्पादन पारंपरिक सिस्टम की तुलना में 1.5 से 2 गुना तक अधिक हो सकता है। कम जगह में स्थापित होने की वजह से यह शहरी आवासीय परिसरों, होटल-रेस्तरां और छोटे उद्योगों के लिए उपयुक्त विकल्प बन रहा है।

2. “Panchtatva” Waste-to-Biogas System

CSIR के सहयोग से विकसित “Panchtatva” सिस्टम इंटीग्रेटेड वेस्ट-टू-एनर्जी मॉडल का उदाहरण है। यह घरेलू जैविक कचरे को प्रोसेस करके करीब 70% मीथेन युक्त बायोगैस तैयार करता है, जिसे खाना पकाने, पानी गर्म करने या छोटे स्तर पर बिजली उत्पादन में उपयोग किया जा सकता है। इस प्रक्रिया के बाद बचने वाला स्लरी घोल पोषक तत्वों से भरपूर जैव-उर्वरक में बदल जाता है, जिससे खेतों में रासायनिक खाद की जरूरत घट सकती है। यह सिस्टम अपार्टमेंट सोसाइटी या कैंटीन जैसे स्थानों पर समूह आधारित ऊर्जा समाधान (Group-based Energy Solutions) के रूप में तेजी से लोकप्रिय हो रहा है।

3. Portable / Modular Home Biogas Plants (WonderBin, GreenHome आदि)

हाल के वर्षों में “पोर्टेबल” या “मॉड्यूलर” बायोगैस यूनिट्स का चलन बढ़ा है। WonderBin या GreenHome जैसे मॉडल प्री-फैब्रिकेटेड टैंकों में आते हैं, जिन्हें बिना भारी सिविल निर्माण के भी लगाया जा सकता है। ये यूनिट्स आमतौर पर रोज़ाना 3–5 किलो किचन वेस्ट से मीथेन गैस तैयार करने का दावा करती हैं। छोटे होटल, हॉस्टल, स्कूल-कॉलेज और गेटेड सोसाइटी में इनका उपयोग बढ़ रहा है, क्योंकि इन्हें आसानी से शिफ्ट या अपग्रेड भी किया जा सकता है। इनका एक बड़ा फायदा यह है कि उपयोगकर्ता घर के स्तर पर ही कचरे को संसाधन में बदलने की प्रक्रिया से जुड़ जाते हैं।

4. Biogas–LPG Auto Switcher Concept

मैसूर में विकसित एक हाइब्रिड किचन फ्यूल सिस्टम बायोगैस और एलपीजी के बीच ऑटो-स्विचिंग की सुविधा देता है। इसमें गैस पाइपलाइन और स्टोव को इस तरह डिज़ाइन किया जाता है कि जब बायोगैस उपलब्ध हो तो खाना उसी से बने और गैस खत्म होने पर स्वतः एलपीजी चालू हो जाए। यह तकनीक उन परिवारों या संस्थानों के लिए उपयोगी मानी जा रही है, जो पूरी तरह नए ईंधन पर निर्भर होने से हिचकिचाते हैं। इस तरह का मॉडल ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) को सहज बनाने में मदद कर सकता है।

5. केले के छिलके व सब्ज़ी अवशेष आधारित Enhanced Biogas (CSIR-CLRI रिसर्च)

चेन्नई स्थित वैज्ञानिकों ने शोध में पाया है कि केले के छिलके, फूलगोभी के डंठल जैसे क्षारीय जैविक अवशेषों को अन्य किचन वेस्ट के साथ मिलाने से मीथेन उत्पादन में 22–30% तक वृद्धि हो सकती है। यह “को-डाइजेशन” तकनीक सूक्ष्म जीवों के लिए अनुकूल रासायनिक वातावरण बनाती है, जिससे डीकंपोज़िशन प्रक्रिया तेज होती है। हालांकि यह मॉडल अभी प्रयोगशाला और पायलट स्तर पर है, लेकिन भविष्य में बड़े संयंत्रों में अपनाए जाने पर कम कचरे से ज्यादा ऊर्जा निकालने का रास्ता खोल सकता है।

6. Compressed Bio-Gas (CBG) Plants – शहर स्तर का विकल्प

घरेलू यूनिट्स के अलावा कई शहरों में बड़े Compressed Bio-Gas (CBG) संयंत्र लगाए जा रहे हैं, जो रोज़ाना टनों गीले कचरे को प्रोसेस कर बायो-CNG तैयार करते हैं। इस गैस का उपयोग वाहनों, कमर्शियल किचन या औद्योगिक जरूरतों में किया जा सकता है। ऐसे प्लांट शहरी कचरा प्रबंधन की समस्या को कम करने के साथ-साथ फॉसिल फ्यूल पर निर्भरता घटाने और ऊर्जा सुरक्षा बढ़ाने में अहम भूमिका निभा रहे हैं।

इस तरह, “वायु” जैसे घरेलू मॉडल से लेकर शहर स्तर के CBG प्लांट तक, बायोगैस तकनीकों की पूरी शृंखला विकसित हो चुकी है। यह संकेत है कि आने वाले समय में कचरा ही ऊर्जा का बड़ा स्रोत बन सकता है और एलपीजी जैसे पारंपरिक ईंधनों का व्यवहारिक विकल्प तैयार हो सकता है।

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