जब तरन तारन के खेतों में जमी रेत 

जब तरन तारन के खेतों में जमी रेत 

फोटो - नीतू सिंह 

बाढ़ के महीनों बाद भी बुआई के लिए जूझ रहे किसान, तरनतारन के खेतों से ग्राउंड रिपोर्ट

2025 में पंजाब में आयी बाढ़ का असर अब भी जमीन पर दिखाई दे रहा है। तमाम खेत अब भी बुआई के योग्य नहीं हैं, किसान कर्ज में डूबे हुए हैं और मुआवजा लोगों तक पहुंचा नहीं है। तरनतारन की यह ग्राउंड रिपोर्ट सतलुज नदी के पास रह रहे किसानों का दर्द बयां करती है…
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तरनतारन। कार्ज सिंह अपनी पांच एकड़ भूमि पर बाढ़ से इकट्ठा लाद (रेत) को देखकर परेशान थे। उनकी जमीन के एक हिस्से में कमर तक पानी भरा था। ये अक्टूबर का आखिरी सप्ताह था। ये वो वक़्त था जब वो अपनी दूसरी फसल यानि गेंहू की बुवाई की तैयारी कर रहे थे। सबसे बड़ी चिंता इस बात की थी कि कैसे इतनी सारी मिट्टी को हटाकर खेत साफ़ करें। जब तक नमी रहेगी खेत का समतल नहीं होगा गेंहूँ की बुवाई नहीं कर सकते। 

सतलुज नदी के किनारे बसे गॉंवों में कार्ज सिंह जैसे तमाम किसान हैं जिनके खेतों में रेत भरी है और ऑंखों में आंसू। क्योंकि बीते वर्ष बाढ़ के रूप में जो आफत उन पर आयी थी, वो अब भी उनके जीवन में दु:खों का कारण बनी हुई है। 

कार्ज सिंह तरनतारन जिला मुख्यालय से करीब 45 किलोमीटर दूर जल्लोके गाँव के निवासी हैं। तरनतारन पंजाब में पाकिस्तान की सीमा से लगा एक जिला है जो अमृतसर और फिरोज़पुर के बीच में आता है। बीते वर्ष अगस्त महीने में आयी भीषण बाढ़ से इस गाँव के 85 घर प्रभावित हुए। इन परिवारों की 900 एकड़ जमीन पर लगी धान की फसल पूरी बर्बाद हो गई। इस आपदा से सिर्फ इंसान ही परेशान नहीं हुए बल्कि पशुओं पर भी गहरा असर पड़ा क्योंकि अब इन्हें खाने के लिए चारे का कोई विशेष इंतजाम नहीं है। आलम यह है कि कृषि संबंधित मूलभूत सुविधाओं के लिए किसान आज भी परेशान हैं। 

<div class="paragraphs"><p>इस तरह बर्बाद हुए थे तरनतारन के खेत&nbsp;</p></div>

इस तरह बर्बाद हुए थे तरनतारन के खेत 

फोटो - नीतू सिंह 

सबसे ज्यादा प्रभावित हुए तरनतारन, अमृतसर, गुरदासपुर 

पंजाब की तीन करोड़ की आबादी में से एक-चौथाई लोग कृषि पर निर्भर हैं। ऐसे में करीब चार दशक बाद आयी भीषण बाढ़ ने यहाँ के लोगों के सुचारू जीवन को तहस-नहस कर दिया। मीडिया रिपोर्ट बताती है कि पंजाब में बाढ़ के कारण कम से कम 43 लोगों की मौत हुई 1900 से अधिक गॉंव प्रभावित हुए। पंजाब में दशकों की सबसे भयानक बाढ़ ने तबाही मचाई, जिससे अमृतसर, गुरदासपुर और तरनतारन जैसे जिले बुरी तरह प्रभावित हुए। 

<div class="paragraphs"><p>2025 में पंजाब के बाढ़ प्रभावित जिले नक्शे में&nbsp;</p></div>

2025 में पंजाब के बाढ़ प्रभावित जिले नक्शे में 

जल्लोके गाँव में कार्ज सिंह की गिनती छोटी जोत के किसानों में होती है। पैंतालिस वर्षीय कार्ज सिंह अपनी आपबीती बताते हैं, “बाढ़ के दो महीने से ज्यादा हो गये हैं लेकिन खेतों की नमी अभी भी बनी हुई है। नमी खत्म होने में जितना ज्‍यादा समय लगेगा गेहूं की फसल की बुआई उतनी ज्‍यादा प्रभावित होगी। रेत हटाने और खेत समतल कराने के लिए पैसा चाहिए पर अभी तो पहले से ही कर्ज है क्या करूं समझ नहीं आ रहा।”

कर्ज में डूबे पंजाब के किसान 

कार्ज सिंह ने मंडी में आढतिया (मिडिल मैन) से 70,000 रूपये कर्ज लेकर धान की बुआई की थी। कुछ जरूरी काम के लिए 30,000 रुपये इन्होने और कर्ज लिए थे। इनके ऊपर अभी कुल एक लाख रूपये का कर्ज है, जिसका इन्हें हर महीने 2,000 रुपये मिडिल मैन को ब्याज देना पड़ता है। कार्ज सिंह बताते हैं, “एक एकड़ में 30-32 कुंतल धान पैदा होती जिससे करीब 70,000 से 80,000 रुपये निकलता। सोच रहा था कर्ज निपट जाएगा और गेहूं की बुआई कर लूँगा। सालभर की गृहस्थी इसी धान से चलती। अभी तो सब बर्बाद हो गया। समझ नहीं आ रहा कैसे क्या करूँ?।

<div class="paragraphs"><p>पंजाब के किसान&nbsp;</p></div>

पंजाब के किसान 

फोटो - नीतू सिंह

कार्ज सिंह इस गाँव के पहले किसान नहीं है जिन्होंने कर्ज लेकर धान की बुआई की हो। यहाँ हमारी जितने भी किसानों से मुलाक़ात हुई लगभग सभी किसान मंडी से कर्ज लिए थे।

यहाँ के किसान धान और गेहूं की बुआई के लिए मंडी से कर्ज लेते हैं और फिर फसल आने पर वापस कर देते हैं। इनका हर साल का यही रूटीन रहता है। इस साल जब बाढ़ में इनका सब कुछ बर्बाद हो गया है तो इनके लिए आगे की फसल की बुआई करना काफी मुश्किल हो गया है। 

सतलुज और बाढ़ क्षेत्र के बीच एक अटूट लेकिन जटिल संबंध 

सतलुज नदी और इसके बाढ़ क्षेत्रों (Floodplains) का पंजाब के तरनतारन, अमृतसर और गुरदासपुर जिलों के साथ गहरा और भावनात्मक रिश्ता है। यहां की मिट्टी सतलुज की ही देन है, लेकिन मानवीय हस्तक्षेप ने इस रिश्ते में कड़वाहट भी घोल दी है।

पंजाब की पाँच नदियों में से एक, सतलुज, जब तरनतारन और अमृतसर के सीमावर्ती क्षेत्रों से गुजरती है, तो यह केवल पानी नहीं, बल्कि जीवन की जीवनरेखा लेकर आती है। नदी और उसके किनारों, जिन्हें स्थानीय भाषा में 'बेत क्षेत्र' कहा जाता है, के बीच के संबंधों दो पहलु हैं:

1. मधुर संबंध: जीवन और समृद्धि का आधार

सतलुज और इसके बाढ़ क्षेत्रों का प्राकृतिक मेल पंजाब की खुशहाली की नींव रहा है:

  • नद का उपहार (जलोढ़ मिट्टी): सदियों से सतलुज ने मानसून के दौरान अपने तटों को पार कर तरनतारन और अमृतसर के मैदानों में बेशकीमती 'सिल्ट' और नई मिट्टी बिछाई है। यही कारण है कि यह क्षेत्र कृषि के लिए दुनिया की सबसे उपजाऊ जमीनों में से एक है।

  • भूजल का पुनर्भरण (ग्राउंड वाटर रिचार्ज): बाढ़ क्षेत्र एक विशाल स्पंज की तरह काम करते हैं। जब सतलुज का पानी इन क्षेत्रों में फैलता है, तो वह धरती के भीतर रिसता है। अमृतसर और गुरदासपुर जैसे जिलों में, जहां ट्यूबवेल पर निर्भरता अधिक है, यह बाढ़ क्षेत्र वाटर टेबल को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

  • विविध जैव विविधता: हरीके पत्तन, जहां सतलुज और ब्यास मिलते हैं, इस मधुर संबंध का सबसे बड़ा प्रमाण है। यह बाढ़ क्षेत्र हज़ारों प्रवासी पक्षियों और लुप्तप्राय 'इंडस डॉल्फिन' का घर है।

<div class="paragraphs"><p>सुतलज नदी का किनारा</p></div>

सुतलज नदी का किनारा

फोटो - नीतू सिंह

2. कड़वे संबंध: जब सीमाएँ टूटीं और विनाश आया

हाल के वर्षों में, जलवायु परिवर्तन और अनियोजित विकास के कारण सतलुज का अपने बाढ़ क्षेत्रों के साथ रिश्ता काफी तनावपूर्ण और 'कड़वा' हो गया है:

अतिक्रमण का दंश: तरनतारन और फिरोजपुर की सीमाओं पर, लोगों ने नदी के प्राकृतिक रास्ते ('बेत' इलाके) में पक्के निर्माण और गहन खेती शुरू कर दी है। जब नदी अपने स्वाभाविक विस्तार के लिए अपनी जगह पर फैलती है, तब जान-माल का नुकसान होता है और हम इसे बाढ़ का नाम दे देते हैं। 

अवैध रेत खनन : अमृतसर और गुरदासपुर के पास सतलुज के किनारों पर बड़े पैमाने पर रेत खनन ने नदी के पारिस्थितिकी तंत्र के संतुलन को बिगाड़ दिया है। रेत के गायब होने से नदी की गहराई अनियंत्रित हो गई है, जिससे किनारों का कटाव बढ़ गया है और बाढ़ आने पर उपजाऊ जमीन नदी में समा जाती है। 

प्रदूषण की मार: बुड्ढा नाला और लुधियाना के औद्योगिक कचरे ने सतलुज के पानी को 'जहरीला' बना दिया है। जब यह प्रदूषित पानी बाढ़ के दौरान तरनतारन और अमृतसर के खेतों में फैलता है, तो यह कड़वाहट मिट्टी और फसलों तक पहुँच जाती है, जिससे कैंसर जैसी बीमारियों का खतरा बढ़ गया है।

तटबंधों का डर: धुस्सी बांध की वजह से नदी और उसके मैदान का संपर्क कट गया है। जब कभी अत्यधिक बारिश होती है, तब इतनी अधिक गति से पानी आता है तब पूरे के पूरे गाँव का मंजर भयानक होता है, क्योंकि ऐसे में फसलें बर्बाद हो जाती हैं।

सरकार ने कहा ‘जिसदा खेत उसदी रेत’ 

बाढ़ के बाद पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान ने कैबिनेट बैठक जिसमें किसानों के खेतों में जमा रेत बेचने के अधिकार देने के लिए "जिसदा खेत, उसदी रेत" योजना को मंज़ूरी दी। किसान मिट्टी का निजी इस्तेमाल कर सकते हैं या बेच सकते हैं। इसके लिए उन्हें किसी तरह की अनुमति या अनापत्ति प्रमाण पत्र (NOC) की ज़रूरत नहीं होगी। उन्हें यह काम 15 नवंबर तक करने की अनुमति दी गई थी। आगे चलकर तारीख को बढ़ाकर 31 दिसंबर तक कर दिया गया है। लेकिन अब जनवरी आ गई है तमाम बाढ़ प्रभावित इलाकों में खेतों में रेत अब भी जमा है। जहां रेत निकाली भी गई वह बिकने योग्य नहीं है। जो किसान मिट्टी बेच भी रहे हैं उन्हें प्रति एकड़ बमुश्किल 400-500 रुपये ही मिल रहा है। दरअसल इस मिट्टी में बहुत अधिक मात्रा में बालू मिल गई है, इसलिए इसके खरीददार बहुत कम हैं। ये मिट्टी पौधे लगाने के काम नहीं आ सकती है।  

<div class="paragraphs"><p>बर्बाद हुई फसल को निहारते तरनतारन के किसान&nbsp;</p></div>

बर्बाद हुई फसल को निहारते तरनतारन के किसान 

फोटो - नीतू सिंह 

किसानों की मानें तो खेतों की मिट्टी को वापस फसल योग्य बनाने की पहल को लेकर सरकार का रवैया बेहद नकारात्मक रहा है। इसी गॉंव के किसान करनवीर कहते हैं, “सरकार ने तो कह दिया है कि  ‘जिसका खेत, उसकी रेत’। पर खेत की नमी जब तक खतम नहीं होगी तबतक ट्रैक्टर खेत में नहीं जाएगा। दूसरा हमारे खेत में जो रेत जमा हुई है उसमें मिट्टी मिक्स है जिसे कोई नहीं खरीद नहीं रहा। इसे जेसीबी से हटाकर ही बाहर फेकना पड़ेगा तभी फसल की बुआई हो पायेगी। जेसीबी वाले एक दिन का 500 से 1000 रुपए मांगते हैं।” 

जिस काम को सरकार ने अपनी प्राथमिकता से करना चाहिए था उसमें यहां के किसान उलझ कर रह गए हैं। हालांकि कुछ जगहों पर गैर सरकारी संस्थाओं की मदद से मिट्टी हटाने का काम पूरा किया जा रहा है। इस मदद से करीब डेढ़ एकड़ खेत को समतल करके बुआई हो गई है। बाकी के खेत में अभी नमी है और मिट्टी का ढेर है। हालांकि किसानों को अभी और मदद की जरुरत है।  

<div class="paragraphs"><p>उजड़े हुए खेतों की तरफ जाते किसान&nbsp;</p></div>

उजड़े हुए खेतों की तरफ जाते किसान 

फोटो - नीतू सिंह 

किसानों को नहीं मिल रहे रेत के उचित दाम 

दि ट्रिब्यून की रिपोर्ट के अनुसार ‘जिसदा खेत उसदी रेत’ योजना के शुरू होने के सिर्फ दो हफ्तों के भीतर ही पूरे क्षेत्र में रेत के दामों में 30–35 प्रतिशत तक की भारी गिरावट दर्ज हुई। पहले जो रेत 90–95 रुपये प्रति क्विंटल में बिक रही थी खुदरा बाज़ार में उसके दाम अचानक 60–62 रुपये प्रति क्विंटल हो गए। वहीं, थोक बाज़ार में इसकी कीमत 75–80 रुपये से घटकर 45–47 रुपये प्रति क्विंटल रह गई है। 

मुख्यमंत्री भगवंत मान ने घोषणा की थी कि बाढ़ से तबाह हुई फ़सलों का 20,000 रुपये प्रति एकड़ की दर से किसान को मुआवज़ा दिया जाएगा। बाढ़ के दौरान जान गंवाने वालों के परिजनों को 4 लाख रुपये की आर्थिक सहायता दी जाएगी।

कर्ज से दबे कार्ज सिंह बात करते-करते बार-बार हाथ जोड़ने लगे और बोले, “हमारे लिए अब कर्ज का हर महीने ब्याज चुकाना बहुत मुश्किल हो गया है। कर्ज चुकाने का तो सोच भी नहीं सकते। मेरी सरकार से विनती है कि मेरे जैसे किसानों की मदद की करें, जिससे हम पूरी फसल की बुआई कर सकें और कर्जा चुका सकें।” 

यह पंजाब का वो इलाका है जहां बाढ़ तो एक दो साल छोड़कर थोड़ी बहुत हर साल आती है पर इतना नुकसान कभी नहीं हुआ। 1988 की बाढ़ के बाद 2025 की बाढ़ में सबसे ज्‍यादा नुकसान हुआ। 

तरनतारन जिले में सतलुज नदी के किनारे बसे दर्जनों गाँव की फसलें इस साल की बाढ़ में पूरी तरह से नष्ट हो गईं। कई गाँवों की फसल सहित मिट्टी भी बह गई। जल्लोके गाँव की बात करें तो यहां पूरी 900 एकड़ जमीन की सतही मिट्टी बह गई। नदी के दूसरे छोर पर स्थित गाँव के 65 घरों की पूरी फसल नष्ट हो गई। कई सौ एकड़ जमीन पर सतलुज नदी का पानी भर गया। 

<div class="paragraphs"><p>सतलुज नदी का तट- इस तरह मिट्टी समेत नदी में बह गए खेत</p></div>

सतलुज नदी का तट- इस तरह मिट्टी समेत नदी में बह गए खेत

फोटो - नीतू सिंह 

सरकारी आंकड़ों के अनुसार तरनतारन जिले के कुल 45 गाँव पूरी तरह से बाढ़ प्रभावित हुए, जबकि स्थानीय एनजीओ और मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक़ तरनतारन जिले के 66 गाँव प्रभावित हुए हैं। रिपोर्ट के अनुसार इन गॉंवों की 28,000 एकड़ जमीन प्रभावित हुई है। वहीं फिरोजपुर जिले के 111 गाँव प्रभावित हुए जिसमें  5,000 एकड़ जमीन प्रभावित हुई। स्थानीय लोगों का आरोप है सरकार ने उन्ही गाँव को बाढ़ प्रभावित माना जिस गाँव में पूरी जमीन प्रभावित हुई। 

घर में राशन के लिए जद्दोजहद  

जल्लोके गाँव में ही हमारी मुलाकात कश्मीर कौर से हुई जिनके पास केवल सवा एकड़ जमीन है। कश्मीर कौर के घर में अभी स्थानीय संगठनों द्वारा दिया हुआ कुछ राशन ही था। वो बताती हैं, “हमारे घर में चार लोग हैं। सवा एकड़ जमीन में सालभर खाने के लिए धान और गेहूं हो जाता था जिससे साल भर चावल और आटा नहीं खरीदना पड़ता था। इस साल कैसे क्या होगा पता नहीं? बाढ़ के समय तो सभी लोगों ने खूब मदद की लेकिन कोई पूरे साल तो मदद नहीं करेगा। बेटा कहीं नौकरी नहीं करता। बहु है नहीं। दो पोता-पोती का खर्चा ऐसे ही चलता है। इस साल तो इनका पेट भरना ही मुश्किल होगा।” 

<div class="paragraphs"><p>अपना दु:ख बयां करतीं कश्‍मीर कौर&nbsp;</p></div>

अपना दु:ख बयां करतीं कश्‍मीर कौर 

फोटो - नीतू सिंह 

कश्मीर कौर की 2023 में आयी बाढ़ में भी फसल बर्बाद हो गई थी। वो कहती हैं, “जब 2023 में बाढ़ आयी थी तो पूरा खेत खराब हो गया था। एक साल खेत सही करने में लगा। फसल ले पाते उससे पहले ही बाढ़ आ गई। पोता-पोती सरकारी स्कूल में पढ़ते हैं। उनके लिए 250 ग्राम दूध खरीदने के लिए सोचना पड़ता है। अब पूरा साल दूसरों के खेत में मेहनत मजदूरी करके गुजरेगा।”

टाइम्स ऑफ़ इण्डिया की रिपोर्ट के अनुसार पंजाब के 2,508 गाँवों की फसलें बर्बाद हुईं हैं जिससे लगभग 3।5 लाख एकड़ खेती योग्य भूमि प्रभावित हुई। किसानों को प्रति एकड़ 20,000 रुपये का मुआवज़ा के आलावा केंद्र सरकार से कोई सहायता न मिलने के बाद राज्य सरकार की ओर से प्रत्येक किसान को अतिरिक्त 13,200 रुपये प्रदान किए जा रहे हैं। हालाँकि किसानों और स्थानीय संगठनों के अनुसार मुआवजा राशि अभी तक नहीं मिली है।

<div class="paragraphs"><p>जब तक इन खेतों में बालू जमी है तब तक यहां खेती संभव नहीं&nbsp;&nbsp;</p></div>

जब तक इन खेतों में बालू जमी है तब तक यहां खेती संभव नहीं  

फोटो - नीतू सिंह 

किसान बोले मुआवज़ा पर्याप्त नहीं 

पंजाब के बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में घर में रखा साल भर के स्‍टॉक में रखा राशन खराब हो गया है। इससे किसानों के रोज़मर्रा के खर्च का बजट पूरी तरह फेल हो गया है। किसानों का कहना है कि सरकार ने जिस मुआवजे का ऐलान किया है अगर वो मिल भी गया तो उससे तो केवल नुकसान की भरपायी हो पाएगी। रोज़ाना के घर खर्च में हुई बढ़ौत्तरी अलग है।    

किसान स्वरन सिंह के पास 10 एकड़ जमीन है उसमें रेत और मिट्टी मिक्स ढेर जमा हुआ था। श्रमिक भारती नामक संस्था द्वारा दी गई आर्थिक सहायता से उन्‍होंने अपने ट्रैक्टर में डीजल भरवाया और रेत हटवा पाये। एनजीओ की मदद से ही उन्‍हें बीज भी मिले ताकि आगे की बुआई कर सकें। स्‍वरन सिंह कहते हैं, “अभी तो काम हो गया, लेकिन आगे भी तो पैसों की जरूरत पड़ेगी तब फिर से हमें डीजल, खाद और बीज आदि के लिए मुंह ताकना पड़ेगा।”

<div class="paragraphs"><p>खेत से लौटते तरन तारन के किसान स्वरन सिंह&nbsp;</p></div>

खेत से लौटते तरन तारन के किसान स्वरन सिंह 

फोटो - नीतू सिंह 

सतलुज नदी के किनारे स्‍थि‍त जमीन पर खेती करने वाले स्वरन सिंह भी कर्ज के बोझ तले दबे हुए हैं। उनका कहना है कि सरकार ने जो मुआवजा की घोषणा की है वो पर्याप्त नहीं है लेकिन अगर उतना भी पैसा वक़्त से मिल जायेगा तो हमारी मुश्किलें कम हो जायेंगी। घोषणा तो दो महीने पहले कर दी पर हमारी जानकारी में अभी तक किसी को यह पैसा मिला नहीं। 

बाढ़ में नष्‍ट हुए करीब दो लाख हेक्टेयर खेत 

पंजाब के किसानों के लिए धान और गेहूं की फसल ही मुख्य फसलें हैं। अगस्त-सितंबर महीने में आयी बाढ़ अगर 10-15 दिन बाद आती तो किसान अपनी धान की फसल काट लेते। डाउन टू अर्थ की रिपोर्ट के अनुसार राज्य में इस वर्ष कुल 32।5 लाख हेक्टेयर में धान की बुआई की गई थी। जिसमें से लगभग 6।81 लाख हेक्टेयर में बासमती की फसल थी। किसानों और कृषि विभाग के आकलन के आधार पर करीब दो लाख हेक्टेयर (पांच लाख एकड़) खेतों में पूरी तरह से फसल नष्ट हुई जबकि बाकी क्षेत्रों में किसानों ने बताया कि औसतन 10 प्रतिशत पैदावार की कमी रही।

<div class="paragraphs"><p>मंडी में अनाज दिखाते किसान सुखविंदर सिंह</p></div>

मंडी में अनाज दिखाते किसान सुखविंदर सिंह

फोटो - नीतू सिंह 

तरनतारन जिले की धान मंडी में धान बिक्री की क्या स्तिथि है? इस पर सीतो मह जुगिया के रहने वाले किसान सुखविंदर सिंह ने बताया कि जब वे बाढ़ के बाद अपनी धान की फसल बेचने आये थे। तब उनके पास आधे से भी कम अनाज था। 

सुखविंदर सिंह बोले, “जितनी पैदावार होनी थी बाढ़ के बाद आधे से भी कम पैदावार हुई और जो हुई भी उसका बाजार में भाव नहीं। इस धान को लम्बे समय तक रख नहीं सकते इसलिए सस्ते रेट में बेचना हमारी मजबूरी है। हमारे गाँव के करीब 200 किसानो की लगभग 600 एकड़ जमीन खराब हो गई है। सभी बहुत परेशान हैं। बच्चों की सालभर की फीस, त्यौहार, शादी, सब कैसे निपटेगा? उससे भी ज्यादा चिंता आढतिये से जो कर्ज लिया है उसकी है। अभी धान का जो भाव मिल रहा उससे लागत भी निकल जाये तो बड़ी बात होगी।”

मंडी में काम करने वाले मजदूरों की आय भी घटी 

मंडी में मौजूद व्यापारी भी मानते हैं कि इस बार किसानों का बहुत नुकसान हुआ है। आम तौर पर फसल पूरी होने के बाद जिस मंडी में ट्रैक्टरों की कतारें लग जाती थीं, वहां सन्नाटा पसरा रहता है। बाढ़ का असर केवल किसानों पर नहीं बल्कि यहां बोरियां उठाने वाले मजदूरों पर भी पड़ा है। 

करीब 30 साल से मंडी में काम कर रहे एक मजदूर भोला राम ने कहा, “मंडी में इस बार धान न के बराबर आया है। अब हमें क्या ही मिलेगा? हमारा तो पूरा खर्चा ही मंडी की मजदूरी से चलता था। हमारे हमारा दुःख कहाँ सरकार तक पहुंच पायेगा?”

<div class="paragraphs"><p>मंडी में काम करने वाले मजदूर ने सुनायी अपनी आपबीती&nbsp;</p></div>

मंडी में काम करने वाले मजदूर ने सुनायी अपनी आपबीती 

फोटो - नीतू सिंह 

20 हजार करोड़ रुपए का नुकसान 

डाउन टू अर्थ से बातचीत में पंजाब राज्य कृषि विपणन बोर्ड के अध्यक्ष हरचंद सिंह बरसात ने कहा कि पंजाब का नुकसान करीब 20,000 करोड़ रुपये का है। पंजाब में बाढ़ और अतिवृष्टि के कारण कुल नुकसान यदि 20 हजार करोड़ का है तो सिर्फ खरीफ सीजन में धान के नुकसान का यदि आकलन किया जाए तो 37 फीसदी से ज्यादा की क्षति धान (परमल और बासमती) की हुई है। डाउन टू अर्थ ने बासमती और परमल किस्म की धान की क्षति का आकलन किया और प्राथमिक तौर पर पाया कि करीब 7,500 करोड़ रुपए का घाटा हुआ है।

कृषि और प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण की एक रिपोर्ट के अनुसार पंजाब में करीब 800 हेक्टेयर भूमि पर बासमती चावल पैदा होता है। जैसा कि हम जानते हैं कि पूरे विश्‍व में पैदा होने वाले बासमती चावल का 70 प्रतिशत भारत में होता है और भारत में जितना बासमती चावल होता है उसका करीब 40% पंजाब में। पंजाब में बासमती चावल सबसे ज्यादा पैदावार अमृतसर, तरन तारन, गुरदासपुर और पठानकोट में होती है। बीते वर्ष बाढ़ और फिर बाढ़ के कारण जमा हुई रेत के कारण इस वर्ष बासमती चावल के उत्पादन पर व्यापक असर पड़ सकता है।  

नदी से लगे क्षेत्रों में भूजल कम होने का खतरा 

तरन तारन के के जिन क्षेत्रों में रेत जमा हुई और बाद में निकाल भी ली गई, उन क्षेत्रों में भूजल पर भी असर पड़ सकता है। इंटरनेशनल सेंटर फॉर क्लीन वॉटर (ICCW) चेन्नई में वरिष्‍ठ वैज्ञानिक एवं हाइड्रोलॉजिस्ट डॉ. एम. चैतन्या सुधा ने इस बारे में बताया कि अगर खेतों में जमा रेत ठीक से नहीं निकाली गई तो उसका दो तरह से प्रभाव पड़ सकता है। पहला मिट्टी की उर्वरता पर और दूसरा क्षेत्र के भूजल पर। दरअसल रेत जमा होने के बाद मिट्टी का झरझरापन कम हो जाता है, जिसकी वजह से पानी जमीन के भीतर जाने में रुकावट आती है, जिससे ग्राउंट वाटर रिचार्ज की गति धीमी पड़ जाती है। क्षेत्र में भूजल पर कितना असर पड़ेगा, इस सवाल के जवाब में डॉ. चैतन्या ने कहा कि इसका आकलन मिट्टी का परीक्षण करने के बाद ही किया जा सकता है।

<div class="paragraphs"><p>सतलुज नदी में बाढ़ आने पर किनारे पर स्थित खेतों का ऐसा हुआ था हाल&nbsp;</p></div>

सतलुज नदी में बाढ़ आने पर किनारे पर स्थित खेतों का ऐसा हुआ था हाल 

फोटो - नीतू सिंह 

केंद्र ने दिये 481 करोड़ रुपए 

इस संबंध में 18 दिसंबर को जलशक्ति मंत्रालय में राज्य मंत्री राज भूषण चौधरी ने लोकसभा में बताया कि रावी, ब्यास, सतलुज और घग्गर नदियों में आयी बाढ़ के कारण 21.36 किलोमीटर तक तटबंध क्षतिग्रस्त हुए। इन तटबंधों को वापस बनाने के लिए पंजाब सरकार ने 192 करोड़ रुपए खर्च किए हैं। वहीं बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में राहत कार्यों के लिए राज्य आपदा प्रबंधन को केंद्र सरकार ने 481 करोड़ की धनराशि केंद्र सरकार ने दी है। 

सतलुज नदी के तट पर जमीनी हालात ऐसे हैं कि तरनतारन के जल्लोके, जल्लोके परला, गदाईके, भौवाल, बल्लरके, भोजोके, राम सिंह वाला, मुठियाँ वाला, रादलके, किड़ियाँ और मुण्डापिंड वो गाँव हैं जहां बहुत ज्यादा नुकसान हुआ है। बाढ़ के दौरान यहां जान बचाना मुश्किल था। तब लोगों को अपने नुकसान का अंदाजा नहीं हुआ। यहाँ किसानों की केवल फसल बर्बाद नहीं हुई बल्कि जमीन भी बर्बाद हुई। कई किसानों की तो 15 फीट तक जमीन पर बाढ़ का पानी भरने से बालू भर गई। और उपजाऊ मिट्टी पानी में बह गई। छोटे किसानों को लाखों का नुकसान हुआ तो बड़े किसानों का नुकसान एक करोड़ से ज्यादा है।  

<div class="paragraphs"><p>मार्केट कमेटी पट्टी के चेयरमैन सुखवंत सिंह कोट बुड्ढा&nbsp;</p></div>

मार्केट कमेटी पट्टी के चेयरमैन सुखवंत सिंह कोट बुड्ढा 

फोटो - नीतू सिंह 

इस संबंध में मार्केट कमेटी पट्टी के चेयरमैन सुखवंत सिंह कोट बुड्ढा ने कहा, “बाढ़ में तमाम किसानों की फसल और जमीन दोनों सतलुज नदी में बह गई। बहने वाली जमीन का कोई मुआवजा नहीं मिलता। इस वक़्त पंजाब के किसानों को डीजल, बीज और खाद की जरुरत है ताकि वे गेहूं की बुआई समय से कर सकें। कुछ किसानों ने स्थानीय लोगों के सहयोग से फसल की बुआई कर ली है लेकिन अभी भी 50 फीसदी लोग फसल की बुआई नहीं कर पाए हैं।”

सुखवंत सिंह के अनुसार यहाँ का हर किसान आढ़तिया से कर्ज लेकर ही बुआई करता है और फिर फसल आने पर वापस कर देता है। लेकिन इस साल वो कर्ज नहीं चुका पायेगा। बाढ़ में वो ऐसी ही चार पांच साल पीछे चला गया है। उन्‍होंने कहा, “मैं सरकार से निवेदन करता हूँ जो जिले सबसे ज्यादा बाढ़ प्रभावित हुए हैं वहां के किसानों का कर्जा माफ़ किया जाये। पंजाब का किसान देने वाला है मांगने वाला नहीं लेकिन इस साल यहाँ के किसान मजबूर हैं।  अगर सरकार और संस्थाएं मदद नहीं करेंगी तो छोटी जोत के किसानों का चूल्हा जलना मुश्किल हो जायेगा।

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