तेल और पेट्रोकेमिकल कीमतों में बदलाव का असर केवल ईंधन तक सीमित नहीं रहता।
चित्र: विकिमीडिया कॉमन्स
पश्चिम एशिया युद्ध के कारण बढ़ सकते हैं बोतलबंद पानी के दाम, जानिए कैसे
पानी जीवन की सबसे बुनियादी जरूरत है, लेकिन आज इसकी कीमत केवल बारिश, नदियों या स्थानीय जल स्रोतों से तय नहीं होती। पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और विशेष रूप से ईरान से जुड़े संघर्ष ने वैश्विक तेल और पेट्रोकेमिकल बाजार को प्रभावित किया है, जिसका असर अब बोतलबंद पानी उद्योग तक पहुंचने लगा है।
बोतलबंद पानी पर बढ़ती निर्भरता और युद्ध का असर
भारत में बोतलबंद पानी का बाजार पिछले दो दशकों में तेजी से बढ़ा है। इसके पीछे केवल उपभोक्ता सुविधा नहीं, बल्कि सुरक्षित पेयजल की असमान उपलब्धता, शहरीकरण और जल गुणवत्ता को लेकर बढ़ती चिंताएं भी महत्वपूर्ण कारण हैं।
रोजमर्रा की ज़िंदगी में बोतलबंद पानी
मई-जून की गर्मियों में कई रेलवे स्टेशनों पर प्लेटफॉर्म दुकानों के सामने पानी की बोतल खरीदने के लिए यात्रियों की छोटी-छोटी कतारें दिखाई देती हैं। ट्रेन रुकते ही यात्री जल्दी-जल्दी बोतलें खरीदते हैं, क्योंकि लंबी यात्रा में सुरक्षित पीने का पानी सुनिश्चित करना जरूरी होता है।
भारतीय रेलवे की कैटरिंग इकाई के अनुसार रेलवे परिसरों में रोज़ाना लाखों लीटर बोतलबंद पानी की मांग होती है। ऐसे में कई जगहों पर आधिकारिक ब्रांड “रेल नीर” की आपूर्ति भी यात्रियों की कुल मांग से कम पड़ जाती है और बाकी मांग अन्य ब्रांडों से पूरी की जाती है।
यात्रा के दौरान यह खपत इतनी अधिक होती है कि कई व्यस्त स्टेशनों पर गर्मी और भीड़ के समय बोतलबंद पानी की कमी तक देखी गई है। यह स्थिति दिखाती है कि यात्रा और सार्वजनिक स्थानों पर पैकेज्ड पानी अब एक जरूरी उपभोग वस्तु बन चुका है।
भारत के कई शहरों और कस्बों में बोतलबंद पानी अब रोजमर्रा की जिंदगी का सामान्य हिस्सा बन चुका है। रेलवे स्टेशनों, बस अड्डों, पर्यटन स्थलों और सड़क किनारे दुकानों पर 20 रुपये की पानी की बोतल सबसे तेजी से बिकने वाले उत्पादों में शामिल होती है।
शादी-समारोहों, बड़े सार्वजनिक कार्यक्रमों और दफ्तरों में भी अक्सर पैकेज्ड पानी की बोतलें ही परोसी जाती हैं। कई छोटे शहरों और कस्बों में स्थानीय स्तर पर छोटे पैमाने की पैकेज्ड पानी इकाइयाँ भी चल रही हैं, जो आसपास के बाजारों, होटलों और आयोजनों में बोतलों की आपूर्ति करती हैं।
भारतीय रेलवे की कैटरिंग इकाई के अनुसार रेलवे परिसरों में रोज़ाना लाखों लीटर बोतलबंद पानी की मांग होती है। ऐसे में कई जगहों पर आधिकारिक ब्रांड “रेल नीर” की आपूर्ति भी यात्रियों की कुल मांग से कम पड़ जाती है और बाकी मांग अन्य ब्रांडों से पूरी की जाती है।
इस तरह बोतलबंद पानी केवल यात्रा के दौरान खरीदा जाने वाला उत्पाद नहीं रहा, बल्कि कई जगहों पर यह रोजमर्रा के पीने के पानी का विकल्प बनता जा रहा है।
अलग-अलग उद्योग रिपोर्ट के अनुसार भारत का बोतलबंद पानी बाजार तेजी से बढ़ रहा है। कुछ आकलनों के मुताबिक इसका आकार 2025 में लगभग 3.7 अरब डॉलर था और 2032 तक यह 9 अरब डॉलर से अधिक हो सकता है। वहीं अन्य उद्योग अनुमानों में बाजार का आकार 10 अरब डॉलर से अधिक बताया गया है।।
जल गुणवत्ता की चुनौतियां इस निर्भरता को और बढ़ाती हैं। ग्रामीण भारत में पेयजल का लगभग 85 फ़ीसद और शहरी क्षेत्रों में करीब 48 फ़ीसद हिस्सा भूजल से आता है, जबकि कई राज्यों में भूजल में फ्लोराइड, आर्सेनिक और अन्य रसायनों की मौजूदगी की समस्या दर्ज की गई है। नतीजा यह हुआ है कि कई जगहों पर लोग स्थानीय स्रोतों के पानी की जगह बोतलबंद पानी को अपेक्षाकृत सुरक्षित विकल्प मानते हैं।
यात्रा और पर्यटन में भी पैकेज्ड पानी की खपत तेजी से बढ़ी है। उदाहरण के लिए, भारतीय रेलवे की आधिकारिक रिपोर्ट के अनुसार, IRCTC के “रेल नीर” ब्रांड ने 2023-24 में लगभग 39.49 करोड़ बोतलें तैयार कीं, जो यह दिखाता है कि रेल यात्रा के दौरान पैकेज्ड पानी किस तरह बड़े पैमाने पर उपभोग का हिस्सा बन चुका है।
इसके अलावा देश में हजारों लाइसेंस प्राप्त और असंगठित इकाइयां बोतलबंद पानी का उत्पादन कर रही हैं, जिससे यह बाजार लगातार विस्तार कर रहा है।
युद्ध और प्लास्टिक लागत का असर
दरअसल, बोतलबंद पानी की पूरी व्यवस्था प्लास्टिक पैकेजिंग पर आधारित है। पानी की बोतलें आमतौर पर PET (पॉलीएथिलीन टेरेफ्थेलेट) जैसे पेट्रोलियम आधारित पॉलिमर से बनती हैं, जबकि ढक्कन भी तेल से बने प्लास्टिक रेज़िन से तैयार होते हैं। जब वैश्विक स्तर पर तेल और पेट्रोकेमिकल आपूर्ति में अस्थिरता आती है, जैसे युद्ध या भू-राजनीतिक तनाव के कारण, तो इन कच्चे माल की कीमतें बढ़ने लगती हैं।
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार पश्चिम एशिया में संघर्ष के बाद प्लास्टिक बोतलों और उनके ढक्कनों के कच्चे माल की कीमतों में उल्लेखनीय वृद्धि देखी गई है, जिससे भारत के पैकेज्ड पानी निर्माताओं की उत्पादन लागत बढ़ रही है।
कुछ मामलों में पॉलिमर की कीमतों में लगभग 50 फ़ीसद तक वृद्धि देखी गई।
ढक्कनों की कीमत दोगुने से अधिक बढ़ गई।
भारत के करीब 2000 छोटे पैकेज्ड पानी निर्माताओं ने लागत बढ़ने के कारण प्रति बोतल लगभग 1 रुपये तक कीमत बढ़ाई है।
गर्मी और मांग का दबाव
भारत में तापमान बढ़ने के साथ पानी की मांग भी तेजी से बढ़ती है। मार्च से जून के बीच तापमान तेजी से बढ़ने के कारण इस अवधि में बोतलबंद पानी की मांग भी अपने चरम पर पहुंच जाती है।
गर्मियों के दौरान शहरों, बस अड्डों, रेलवे स्टेशनों, पर्यटक स्थलों और सड़क किनारे दुकानों पर बोतलबंद पानी सबसे अधिक बिकने वाले उत्पादों में शामिल होता है।
उद्योग रिपोर्टों के अनुसार भारत दुनिया के सबसे तेजी से बढ़ते बोतलबंद पानी बाजारों में शामिल है, जहां बढ़ती गर्मी, शहरीकरण और स्वास्थ्य संबंधी चिंताएं मांग को बढ़ा रही हैं।
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार कुछ क्षेत्रों में कच्चे माल की कीमतों में तेज़ उछाल भी देखा गया है। उदाहरण के लिए, प्लास्टिक उद्योग के प्रतिनिधियों के अनुसार PET पॉलिमर की कीमतें कुछ ही दिनों में लगभग 40 फ़ीसद तक बढ़ गईं, जिससे पानी की बोतलों के उत्पादन और आपूर्ति पर दबाव बढ़ा है।
गर्मियों में मांग बढ़ने और साथ ही प्लास्टिक पैकेजिंग की लागत बढ़ने से पैकेज्ड पानी उद्योग पर दोहरा दबाव बन रहा है। इसका असर सबसे पहले छोटे वितरकों और खुदरा विक्रेताओं पर पड़ता है जो आख़िर में कीमतों के रूप में उपभोक्ताओं तक पहुंच सकता है।
प्लास्टिक और पर्यावरण का सवाल
बोतलबंद पानी की व्यवस्था केवल एक पेयजल विकल्प नहीं है, बल्कि यह पूरी तरह प्लास्टिक पैकेजिंग पर आधारित एक प्रणाली भी है। पानी की अधिकांश बोतलें PET (पॉलीएथिलीन टेरेफ्थेलेट) जैसे पेट्रोलियम आधारित प्लास्टिक से बनती हैं। इस प्लास्टिक को बनाने में ऊर्जा और प्राकृतिक संसाधनों का बड़े पैमाने पर उपयोग होता है, इसलिए इसकी बढ़ती खपत पर्यावरणीय दबाव भी बढ़ाती है।
वैश्विक स्तर पर प्लास्टिक बोतलों की खपत बहुत तेज़ी से बढ़ी है। संयुक्त राष्ट्र के एक विश्लेषण के अनुसार दुनिया भर में हर मिनट लगभग 10 लाख प्लास्टिक बोतलें खरीदी जाती हैं, जिनमें बड़ी संख्या बोतलबंद पानी और अन्य पेय पदार्थों की होती है।
समस्या केवल खपत तक सीमित नहीं है, बल्कि कचरे के प्रबंधन से भी जुड़ी है। वैश्विक स्तर पर उत्पादित प्लास्टिक कचरे का केवल लगभग 9 प्रतिशत ही पुनर्चक्रित (recycled) हो पाता है, जबकि बाकी का बड़ा हिस्सा लैंडफिल, जल स्रोतों या खुले पर्यावरण में पहुंच जाता है।
संयुक्त राष्ट्र के एक विश्लेषण के अनुसार दुनिया भर में हर मिनट लगभग 10 लाख प्लास्टिक बोतलें खरीदी जाती हैं, जिनमें बड़ी संख्या बोतलबंद पानी और अन्य पेय पदार्थों की होती है।
शोध बताते हैं कि दुनिया की लगभग 1000 नदियां समुद्र में पहुंचने वाले प्लास्टिक प्रदूषण का बड़ा हिस्सा लेकर जाती हैं, जिनमें कई एशियाई नदियां भी शामिल हैं।
प्लास्टिक प्रदूषण का एक नया पहलू माइक्रोप्लास्टिक के रूप में सामने आया है। एक अंतरराष्ट्रीय अध्ययन में पाया गया कि दुनिया भर से लिए गए बोतलबंद पानी के नमूनों में करीब 93 प्रतिशत में माइक्रोप्लास्टिक कण मौजूद थे।
भारत में भी प्लास्टिक कचरा एक बड़ी पर्यावरणीय चुनौती बनता जा रहा है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) के अनुसार 2021–22 में देश में लगभग 41 लाख टन प्लास्टिक कचरा पैदा हुआ, जिसमें एक बड़ा हिस्सा सिंगल-यूज़ प्लास्टिक का है। बोतलबंद पानी की बढ़ती खपत इस प्रवृत्ति को और तेज़ कर सकती है।
क्या हैं समाधान
सुरक्षित नल जल व्यवस्था को मजबूत करना: विशेषज्ञों का मानना है कि यदि शहरों और गांवों में भरोसेमंद पाइप्ड पेयजल उपलब्ध हो, तो बोतलबंद पानी पर निर्भरता कम हो सकती है। भारत में जल जीवन मिशन जैसी योजनाओं का एक लक्ष्य घरों तक नल से सुरक्षित पानी पहुंचाना है, जिससे पैकेज्ड पानी की जरूरत कम हो सके।
स्थानीय जल स्रोतों का संरक्षण और पुनर्जीवन: तालाब, झील, नदियाँ और भूजल जैसे स्थानीय स्रोत यदि सुरक्षित और स्वच्छ बनाए जाएँ तो समुदायों को दूर से आने वाले या बोतलबंद पानी पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा।
भूजल प्रबंधन को बेहतर बनाना: भारत में पेयजल का बड़ा हिस्सा भूजल से आता है, इसलिए इसका टिकाऊ उपयोग जरूरी है। वैज्ञानिक अध्ययन बताते हैं कि सामुदायिक स्तर पर भूजल प्रबंधन और पुनर्भरण (recharge) से जल संकट कम किया जा सकता है।
भारत में ‘मैनेज्ड एक्वीफ़ायर रिचार्ज’ (MAR) से जल उपलब्धता बढ़ी: काउंसिल ऑफ़ साइंटिफिक एंड इंडस्ट्रियल रिसर्च से जुड़े शोध में पाया गया कि समुदाय की भागीदारी से किए गए मैनेज्ड एक्वीफ़ायर रिचार्ज (MAR) कार्यक्रमों से कई क्षेत्रों में भूजल स्तर में सुधार हुआ और कृषि व आजीविका पर सकारात्मक प्रभाव पड़ा।
सामुदायिक स्तर पर recharge आंदोलन से भूजल स्तर में सुधार: जर्नल ऑफ़ हाइड्रोलॉजी के रीजनल स्टडीज़ में प्रकाशित एक अध्ययन में गुजरात के सौराष्ट्र क्षेत्र का विश्लेषण करते हुए पाया गया कि समुदाय आधारित भूजल पुनर्भरण प्रयासों से भूजल संसाधनों में उल्लेखनीय सुधार हुआ।
वर्षा जल संचयन और रिचार्ज संरचनाएं: भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान से जुड़े एक अध्ययन के अनुसार वर्षा जल संरक्षण संरचनाएं भूजल रिचार्ज बढ़ाने, बाढ़ के जोखिम कम करने और जल उपलब्धता सुधारने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
यह स्थिति दिखाती है कि पानी जैसी बुनियादी जरूरत भी अब वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं और भू-राजनीतिक घटनाओं से जुड़ती जा रही है। जब बोतलबंद पानी जैसी व्यवस्था प्लास्टिक और पेट्रोकेमिकल उद्योग पर निर्भर हो, तो युद्ध जैसे दूर के संकट भी रोजमर्रा की पानी की कीमतों को प्रभावित कर सकते हैं।
ऐसे में लंबी अवधि वाले समाधान बोतलबंद पानी के विस्तार में नहीं, बल्कि भरोसेमंद सार्वजनिक जल प्रणालियों, स्थानीय जल स्रोतों के संरक्षण और टिकाऊ भूजल प्रबंधन को मजबूत करने में है।
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