

फोटो: महेंद्र पारीख | CC BY-SA 4.0 | विकिमीडिया कॉमन्स
दिल्ली में यमुना का प्रदूषण लंबे समय से चिंता का विषय बना हुआ है। शहर में प्रवेश करने के बाद नदी में कई नालों का गंदा पानी मिलता है। इससे नदी के कुछ हिस्सों में प्रदूषण इतना बढ़ जाता है कि पानी में घुली ऑक्सीजन बहुत कम रह जाती है।
दिल्ली की यमुना के कुछ हिस्सों में पानी में घुली ऑक्सीजन बेहद कम दर्ज की गई है। मछलियों और दूसरे जलीय जीवों को सांस लेने के लिए इसी ऑक्सीजन की जरूरत होती है। ऐसे में सवाल है कि ऑक्सीजन की कमी इनके जीवन को किस तरह प्रभावित करती है।
यह समस्या केवल यमुना तक सीमित नहीं है। देश की दूसरी प्रदूषित नदियों में भी ऑक्सीजन की कमी जलीय जीवन को प्रभावित कर सकती है।
पानी में घुली ऑक्सीजन को अंग्रेज़ी में डिसॉल्व्ड ऑक्सीजन (Dissolved Oxygen या DO) कहते हैं। मछलियां और दूसरे जलीय जीव इसी ऑक्सीजन से सांस लेते हैं।
अमेरिकी भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (USGS) के अनुसार, पानी में ऑक्सीजन मुख्य रूप से हवा से घुलती है। नदी में मौजूद पौधे और शैवाल भी सूर्य के प्रकाश की मदद से ऑक्सीजन बनाते हैं। जब पानी बहता है या उसमें हलचल होती है, तो हवा से उसमें ऑक्सीजन घुलने में मदद मिलती है। पानी में कितनी ऑक्सीजन होगी, यह उसके तापमान, बहाव और प्रदूषण पर भी निर्भर करता है।
पानी में ऑक्सीजन की मात्रा मिलीग्राम प्रति लीटर (mg/L) में मापी जाती है। इसका मतलब है कि एक लीटर पानी में कितने मिलीग्राम ऑक्सीजन घुली हुई है।
केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) के मानकों के अनुसार, मछलियों और दूसरे जलीय जीवों के संरक्षण के लिए पानी में कम से कम 4 मिलीग्राम प्रति लीटर घुली ऑक्सीजन होनी चाहिए।
हालांकि, सभी जलीय जीवों को समान मात्रा में ऑक्सीजन की जरूरत नहीं होती। कुछ प्रजातियों को अधिक ऑक्सीजन चाहिए, जबकि कुछ कम ऑक्सीजन वाले पानी में भी जीवित रह सकती हैं।
जब पानी में ऑक्सीजन का स्तर बहुत कम हो जाता है, तो इस स्थिति को हाइपोक्सिया (Hypoxia) कहा जाता है। कई जलीय जीवों के लिए 2 मिलीग्राम प्रति लीटर से कम ऑक्सीजन खतरनाक हो सकती है। ऑक्सीजन की कमी का असर इस बात पर भी निर्भर करता है कि वह जीव किस प्रजाति का है और उसे कितने समय तक कम ऑक्सीजन वाले पानी में रहना पड़ता है।
नदियों में ऑक्सीजन घटने की एक बड़ी वजह सीवेज और जैविक कचरा है। जब घरों और दूसरी जगहों का गंदा पानी नदी में पहुँचता है, तो उसमें मौजूद जैविक कचरा सड़ने लगता है। इन्हें सड़ाने वाले सूक्ष्मजीव पानी में घुली ऑक्सीजन का इस्तेमाल करते हैं। इससे ऑक्सीजन की मात्रा घट सकती है। जैविक कचरा जितना अधिक होगा, उसे सड़ाने में उतनी अधिक ऑक्सीजन खर्च हो सकती है।
पानी में मौजूद जैविक कचरे को सड़ाने के दौरान सूक्ष्मजीव ऑक्सीजन का इस्तेमाल करते हैं। इस प्रक्रिया में कितनी ऑक्सीजन खर्च होती है, इसका पता जैव रासायनिक ऑक्सीजन मांग (Biochemical Oxygen Demand या BOD) से चलता है। BOD अधिक होना आमतौर पर जैविक प्रदूषण अधिक होने का संकेत है।
दिल्ली प्रदूषण नियंत्रण समिति (DPCC) के सितंबर 2026 के आंकड़ों के अनुसार, यमुना में आईएसबीटी पुल के पास BOD का स्तर 30 मिलीग्राम प्रति लीटर दर्ज किया गया, जबकि नहाने योग्य पानी के लिए CPCB की निर्धारित अधिकतम सीमा 3 मिलीग्राम प्रति लीटर है।
यानी यहां BOD का स्तर निर्धारित सीमा का दस गुना था। यह नदी के इस हिस्से में जैविक प्रदूषण की गंभीर समस्या को दिखाता है। इससे पानी में ऑक्सीजन ज्यादा खर्च हो सकती है और मछलियों तथा दूसरे जीवों को पर्याप्त ऑक्सीजन मिलने में मुश्किल हो सकती है।
कारखानों से निकलने वाला कुछ गंदा पानी और खेतों से बहकर आने वाले नाइट्रोजन तथा फॉस्फोरस जैसे तत्व भी पानी में ऑक्सीजन की कमी बढ़ा सकते हैं। नाइट्रोजन और फॉस्फोरस की अधिकता से शैवाल तेजी से बढ़ते हैं। बाद में इनके मरने और सड़ने पर ऑक्सीजन खर्च होती है।
पानी का तापमान और बहाव भी महत्वपूर्ण हैं। गर्म पानी में ठंडे पानी की तुलना में कम ऑक्सीजन घुलती है। जहां पानी का बहाव कम होता है, वहां उसकी हलचल भी कम हो सकती है। इससे हवा की ऑक्सीजन को पानी में घुलने में कम मदद मिलती है।
नदी के पानी में ऑक्सीजन की मात्रा दिन और रात में भी बदलती रहती है। दिन में जलीय पौधे और शैवाल ऑक्सीजन बनाते हैं, जबकि रात में यह प्रक्रिया बंद हो जाती है। इस कारण कुछ स्थानों पर सुबह के समय ऑक्सीजन का स्तर कम हो सकता है। इसलिए नदी के पानी की जांच अलग-अलग समय और मौसम में करना जरूरी है।
मछलियां अपने गलफड़ों से पानी में घुली ऑक्सीजन लेती हैं। जब पानी में ऑक्सीजन घटती है, तो उन्हें सांस लेने में कठिनाई होने लगती है। कुछ मछलियां पानी की सतह के पास आने लगती हैं। कुछ अधिक ऑक्सीजन वाले हिस्सों की ओर चली जाती हैं। लेकिन जहां पानी में ऑक्सीजन बहुत कम हो और मछलियां दूसरी जगह न जा सकें, वहां उनके मरने का खतरा बढ़ जाता है।
अमेरिकी पर्यावरण संरक्षण एजेंसी (EPA) के अनुसार, ऑक्सीजन की कमी का असर मछलियों की वृद्धि और प्रजनन पर भी पड़ता है। लंबे समय तक पर्याप्त ऑक्सीजन नहीं मिलने से उनकी वृद्धि धीमी हो सकती है। इससे मछलियों के अंडों का विकास प्रभावित हो सकता है और उनसे निकलने वाली छोटी मछलियों के लिए जीवित रहना मुश्किल हो सकता है।
ऑक्सीजन की कमी का असर सभी मछलियों पर एक जैसा नहीं होता। जिन मछलियों को अधिक ऑक्सीजन की जरूरत होती है, उन पर इसकी कमी का असर जल्दी पड़ सकता है। वहीं कुछ मछलियां कम ऑक्सीजन वाले पानी में भी जीवित रह सकती हैं। अगर लंबे समय तक ऑक्सीजन कम रहे, तो नदी में कुछ तरह की मछलियां कम हो सकती हैं और कुछ की संख्या बढ़ सकती है।
ऑक्सीजन का स्तर बहुत कम होने पर बड़ी संख्या में मछलियां मर सकती हैं। हालांकि, मछलियों की सामूहिक मौत के पीछे जहरीले रसायन, बीमारी और दूसरे कारण भी हो सकते हैं। इसलिए ऐसी घटनाओं में पानी की गुणवत्ता और दूसरे संभावित कारणों की जांच जरूरी है।
मई 2024 में केरल की पेरियार नदी में बड़ी संख्या में मछलियां मृत पाई गई थीं। एलूर और आसपास के इलाकों में मछलियां सांस लेने के लिए बार-बार पानी की सतह पर आती दिखाई दी थीं। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) की जांच रिपोर्ट के अनुसार, घटना के दौरान पानी में घुली ऑक्सीजन का स्तर मछलियों के जीवित रहने के लिए जरूरी मात्रा से कम पाया गया।
जांच के अनुसार, 20 मई 2024 को पथालम रेगुलेटर के गेट खुलने के बाद कम ऑक्सीजन वाला पानी नदी के निचले हिस्से में पहुंचा। वेट्टुकडवु क्षेत्र में पानी की ऑक्सीजन का स्तर 6.8 से घटकर 3.2 मिलीग्राम प्रति लीटर हो गया। केरल यूनिवर्सिटी ऑफ फिशरीज एंड ओशन स्टडीज (KUFOS) की प्रारंभिक जांच रिपोर्ट के अनुसार, पानी में ऑक्सीजन की कमी के साथ अमोनिया और हाइड्रोजन सल्फाइड का अधिक स्तर मछलियों की मौत के प्रमुख कारणों में शामिल था।
जांच में सामने आया कि ऑक्सीजन की कमी के साथ अमोनिया और हाइड्रोजन सल्फाइड की अधिक मात्रा ने भी मछलियों की मौत में भूमिका निभाई।
नदी में मछलियों के अलावा घोंघे, जलीय कीटों के लार्वा और कई छोटे जीव भी रहते हैं। इनमें से कई जीव नदी की तलहटी में रहते हैं। ये छोटे जीव जैविक पदार्थों को सड़ाने में मदद करते हैं और मछलियों के भोजन का हिस्सा भी होते हैं।
अमेरिकी पर्यावरण संरक्षण एजेंसी (EPA) के अनुसार, ऑक्सीजन कम होने से नदी में कुछ तरह के छोटे जीव घट सकते हैं, जबकि कुछ की संख्या बढ़ सकती है। उदाहरण के लिए, जिन जलीय कीटों के लार्वा को अधिक ऑक्सीजन चाहिए, उनकी संख्या घट सकती है। वहीं कम ऑक्सीजन में जीवित रहने वाले कीड़ों की संख्या बढ़ सकती है। इससे नदी की जैव विविधता प्रभावित होती है।
छोटे जलीय जीव कई मछलियों का भोजन होते हैं। इनकी संख्या घटने से मछलियों के भोजन की उपलब्धता भी कम हो सकती है। इस तरह ऑक्सीजन की कमी नदी की पूरी खाद्य शृंखला को प्रभावित कर सकती है।
नदियों में ऑक्सीजन की कमी रोकने के लिए जरूरी है कि घरों और कारखानों का गंदा पानी साफ किए बिना नदी में न छोड़ा जाए। गंदे पानी का सही तरीके से उपचार करने के बाद ही उसे नदी में छोड़ना चाहिए। इससे जैविक प्रदूषण और ऑक्सीजन की खपत कम करने में मदद मिल सकती है।
नदी में पर्याप्त पानी बहता रहे, यह भी जरूरी है। साथ ही पानी में घुली ऑक्सीजन, BOD और तापमान की नियमित जांच होनी चाहिए। इससे समय रहते उन स्थानों की पहचान की जा सकती है जहां जलीय जीवों के लिए खतरा बढ़ रहा है।
यमुना और पेरियार के उदाहरण बताते हैं कि नदी में पानी का होना ही काफी नहीं है। उस पानी में मछलियों और दूसरे जीवों के रहने लायक ऑक्सीजन भी होनी चाहिए।
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